खरबूजा आपका बन गया डॉ. एमबीबीएस : दैनिक हिन्‍दी मिलाप में 21 मई 2011 के अंक में बैठे ठाले स्‍तंभ में प्रकाशित

डॉ. खरबूजा एमबीबीएस : दैनिक हरिभूमि में 21 मई 2011 को प्रकाशित व्‍यंग्‍य

श्‍मशान घाट का इंडेक्‍स यमराज के हवाले : दैनिक लोकसत्‍य 9 मई 2011 में पेज 6 पर प्रकाशित

है तो पुराना
यहां है नया
मृत्‍यु से लगता है डर
सदा रहता है नया
जब तक जीते हैं
भय में जीते हैं।

मैं सीडी हूं, औकात बता दूंगी : दैनिक जनसंदेश टाइम्‍स 9 मई 2011 के अंक में स्‍तंभ उलटबांसी में प्रकाशित

सीडी और पेनड्राइव
हैं भाई-बहन
आपको शक क्‍यूं
हो रहा है
पढ़ लीजिए

सूना-सूना सा जहां : आई नेक्‍स्‍ट 5 मई 2011 के अंक में स्‍तंभ खूब कही


लादेन कहां चले गए तुम? क्यों चले गए तुम? अब आतंकवाद डरा सहमा सा रहेगा. आतंक तो होगा पर आतंक का वो जलवा नहीं होगा, जिसने अमेरिका में बलवा मचाया था. पाकिस्तान के लिए तो वो असीम ऊर्जा थी. अब नहीं रही. लादेन के जाने से अमेरिका अब उसे वो सब कुछ देने से मना कर देगा, जो अब तक वो उसे देता रहा है. आप सब जानते हैं कि इस लेन-देन के किस्से का खुलासा करने का कोई लाभ नहीं है. अमेरिका उसे मारकर भी दुखी है. लादेन वो था, जब तक जिंदा था, तब तक उसने अमेरिका को जिंदा रखा. अब लादेन के गुजरने के बाद से अमेरिका में आलस का साम्राज्य हो जाएगा. अमेरिकावासी अब चैन की नींद सोया करेंगे, मतलब सोयेंगे तो गले में चैन बांधकर चैन का अहसास करेंगे. बहुत दिन, बल्कि कई सालों से पूरी नींद नहीं ले सके थे. कौन सोच सकता है कि इस अनिद्रा का कारण सिर्फ और सिर्फ लादेन ही रहा है. वैसे अमेरिका का विचार है कि लादेन की लाश का सौदा कर लिया जाए या सार्वजनिक तौर पर नीलाम कर दिया जाये. हर चीज में बाजार की तलाश करने वाला अमेरिका यह मौका गंवाना नहीं चाहता. पर देखते हैं कि अब अमेरिका और पाकिस्तान में गुपचुप क्या डील होती है. उस सौदे के तहत फायदा तो दोनों को होगा. वैसे वैज्ञानिक सोच रहे हैं कि उसकी लाश को हासिल करके उस पर शोध कर लिया जाये, उस पर शोध करना, आतंक पर शोध करने के समान होगा. आतंक पर शोध करने वाले का तो सम्मान ही होगा. लादेन मरकर भी कितने ही चैनलों की कमाई करवा गया, टीआरपी बढ़वा गया. अमेरिका का बस चलता तो वो इस खबर के प्रसारण के अधिकार बेचकर भी करोड़ों-अरबों कमा लेता. पर चूक गया. कई बार बहुत अधिक खुशी भी नुकसान कर देती है. इस मामले में यही हुआ है. आतंकवाद के सुप्रीमो का काम तमाम करने के चक्कर में अमेरिका इतना खुश है कि.. जितनी खुशी मरकर लादेन को नहीं हुई होगी. लादेन कोई वसीयत नहीं करके गया है, जिससे जाहिर है कि वो यहीं मौजूद है और सबके मन में तो आतंक के रूप में मौजूद है ही, क्या है कोई ऐसा देश या उसका बाशिंदा जो लादेन के आतंक से निजात पा सके. हैरत मत कीजिएगा कि कल लादेन की वेबकास्टिंग स्वर्ग अथवा नरक से सीधे धरती पर की जा रही हो, और आप सोच रहे हों कि लादेन तो मरा नहीं है, वैसे आप मेरी बात मान लीजिए कि जब हम रावण को इतने अरसे से नहीं मार पाए हैं, जबकि उसके खूब सारे पुतले जलाए हैं, तो लादेन को क्या मार पायेंगे, जबकि फर्जी लादेन भी मौजूद हैं. लादेन के यूं एकाएक चले जाने से आतंक की दुनिया एकदम सूनी-सूनी सी हो गई है.

आतंकवाद की दुनिया अंधेरी हो गई है : दैनिक हिन्‍दी मिलाप 5 मई 2011 के अंक में पढि़ए

और दुनिया को लगता है
अंधेरे से डर
डरने वाला तो मरने से भी
डरता है
क्‍या करेगा
तख्‍ते-जि़गर
(जिसका जि़गर तख्‍त की तरह सख्‍त हो)
अंधेरे में तो
वो तख्‍त भी
टूट टूट जाएगा।