प्‍यार की पुंगी बजाते चलो : डीएलए के 30 अप्रैल 2012 अंक में प्रकाशित

हिंदी ब्‍लॉगिंग और सोशल मीडिया एक दूसरे के पूरक : दैनिक जनसत्‍ता में 30 अप्रैल 2012 अंक में पेज 7 पर प्रकाशित समाचार


तोप का ताप : डेली न्‍यूज एक्टिविस्‍ट में 28 अप्रैल 2012 अंक में प्रकाशित


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तोप का ताप कभी नहीं बुझता,  उसकी गर्मी कभी कम नहीं होती, चाहे उसके कारण कि कितने ही गम बढ़ जाएं। सुख सदा सुलगते रहते हैं। सुख के मूल में ही सारे जगत के दुख हैं। वह ताप किसके लिए चिंगारी बनता है और किसके लिए ठंडक। कब ठंडक, भाप बनकर झुलसा देती है। कौन जान पाया है, वह भी नहीं जो इन सबके पीछे अपने कारनामों को अंजाम दे रहा है। भर भर कर जाम पी रहा है। मालूम चल गया है कि बिग बी को डुबोने के लिए फोर्स को बोया गया। लगता है इसी फोर्स के चलते तोपों के इस घोटाले के मामले का नाम बोफोर्स हुआ, यह रहस्‍य अब खुला है। पर इससे बाहर आने के लिए बिग बी बीते 25 बरस भीतर ही भीतर सुलगते रहे। उनके दिल को कितनी पीड़ा मिली। पीड़ा की सच्‍चाई अब सामने आई है। पोल थी जो खुल गई है। बोफोर्स को ‘लो’ फोर्स होने में 25 साल लग गए। तोप का ताप भी सुलग सुलग कर लगा कि ‘गो’ फोर्स हो गई होगी। लेकिन चिंगारियां फिर से सुलग उठी हैं।  उन्‍हें हवा मिली, वे शोले बने लेकिन इस बार शोले शाल बने और बिग बी का के मन के संताप रूपी ज्‍वाला को हरने का सबब बन सके। पूरा दुख तो नहीं हरा नहीं हुआ, पर जितना भी हरा हुआ, उससे मन को हरियाली का सुखद अहसास हुआ। संताप की कालिमा कुछ तो कम हुई।
जाहिर है कि फोर्स सिर्फ बीज में ही नहीं होता है। यह सत्य है कि बीज का अंकुरण होता है। फोर्स तोप में भी होता है। झूठ में सबसे अधिक फोर्सफुल होता है लेकिन सच्‍चाई के फोर्स की तुलना किसी हॉर्स से नहीं की जा सकती है, वह तो सर्वोपरि होता है। फोर्स जब बोया जाता है उस समय हॉर्स की गति से कुलांचे भरता है। किसी को उसकी तेज चाल में सच नजर नहीं आता है। जो प्‍लांट किया जाता है, वह सामने आता है। आंखें देख रही होती हैं लेकिन उनमें में भी चमक चढ़ जाती है। चमक जो झूठ है, चमक जो धोखा है, चमक जो चकमक नहीं है, चमक नमक हो सकती है। नमक अधिक हो तो दुख दारूण देता है। बिना नमक के भी चमक फीकी हो जाती है। चमक चीनी हो जाए तब भी उसकी अधिकता सुगर बन शरीर को गलाती है।
साफ है किसी चीज की अधिकता बुरी होती है। सच्‍चाई पूरी होते हुए भी उसकी फोर्स लो रही और वह सामने नहीं आ सकी। इस बोने में सिर्फ तोपें ही नहीं बोई गईं। तोपों के नाम पर नोटों के अंकुर फूटे।  नोट का फोर्स इन सबसे ताकतवर है। सब इन्‍हीं के इर्द-गिर्द मंडराते रहते हैं। भागते हैं तो घोड़े हो जाते हैं। नोट दिखलाई दें या उनका आभास भी होने लगे तो मच्‍छर बन मंडराते हैं। वहां से कहीं जाते नहीं हैं। जबकि कभी किसी ने नोटों को मच्‍छरदानी से नहीं ढका होगा क्‍योंकि बाहर से ही दिखलाई दे जाएंगे। फिर भी इंसान मच्‍छर की तरह नोटों परे मंडराने से बाज नहीं आता। आजकल तो बाबा भी इसकी फुल किरपा अपने ऊपर बरसा रहे हैं। मौसम बारिस का हो, न हो।  गर्मी हो नोटों की, न हो। लेकिन नोटों की चाहत मरने तक भी खत्‍म नहीं होती। यह वह प्‍यास है जो जितनी बुझाने की कोशिश की जाए, उतनी और बढ़ जाती है। दूसरे का गला भी घोंटने से परहेज नहीं किया जाता। दूसरे ही क्‍या सबसे पहले अपनों का गला ही तराशा जाता है क्‍योंकि इसमें सबसे अधिक नोट मिलने की आशा है। आशा जो विश्‍वास बन चुकी है। उसे पाने के लिए सारे भरोसे तोड़ दिए जाते हैं। कोई शर्म नहीं, कोई जिल्‍लत नहीं महसूस होती। यह मानवीय वृतियों का क्षरण काल है। इंसानी वृतियों पर आक्रमण हो रहा है और आक्रमण करने वाले भी हम ही हैं।  
करेंसी नोटों को किसने बोया, यह अलग से बौनेपन की कुत्सित वृति को जाहिर करता है। बोना सिर्फ लाभदायक नहीं होता। बोफोर्स मामले से मालूम चलता है कि फोर्स लो हो तो भी नुकसान पहुंचाती है, अधिक हो तो इससे शान नहीं चढ़ती। यह सच्‍चाई को झूठ के आवरण में ढकती है। आवरण का वरण हटाकर झूठ के विरुद्ध रण में डट जाना चाहिए। उसके नतीजे बेहतर होते हैं। बोफोर्स में लोफोर्स होने पर ताजा मामले में यह खुलासा हो गया है। अब भी क्‍या आपको फोर्स के कम या अधिक होने पर संदेह हो रहा है ? 

हार का ठीकरा किसके सिर ? : दैनिक हिंदी मिलाप में 28 अप्रैल 2012 अंक में प्रकाशित



ठीकरों की फसल लहलहा रही है। जिस हारे हरिया को देखो, वही हार का ठीकरा, अपने साथी के सिर पर फोड़ रहा है। यह तो अच्‍छा है कि ठीकरा सीधा सामने वाले सिर पर ठोक कर फोड़ने का रिवाज है। वरना कहीं अगर ठोकरों से ठीकरे फोड़े जाया करते तो सिर में ठीकरा न लगता और बदले में जोरदार लात लग जाती, जिससे सिर में फोड़े जरूर हो जाया करते। उन फोड़ों की चिकित्‍सा अगले चुनाव तक नहीं की जा सकती। वैसे कोई गारंटी नहीं है कि अगले चुनाव में चिकित्‍सा ही होती। पता लगा कि लात लगने से जो फोड़ा हुआ, उसमें मवाद भर गया और वह रिस रहा है। वैसे भी जो रिसने लगता है, वह नासूर बन जाता है। फिर उसमें न जीत का सुर मिलता है और हार का सुर नहीं, साबुत सूअर ही निकलता है। सूअर के दर्शन से भी बचने वाले कुत्‍तों से लिपटते हैं। उन्‍हें तो गोद में लेकर दुलारने से भी परहेज नहीं करते। कुत्‍ते कुत्‍ते होते हैं, सूअर सूअर और बंदर बंदर।
ठोकरें खाकर भी जो नहीं संभलते, वे बिना पिए भी इधर उधर गिरते हैं, मानो गंदी नालियों को अधिक ठोकेंगे या सड़क को। न वे अनुभव से सीखते हैं, अनुभव मतलब ठोकर। अनुभव को ढोते जाओ, ठोकर खाकर रोते जाओ। ठोकर खाकर भी जो नहीं संभलते, उनके सिर पर ठीकरे फूटा करते हैं। इस बार तो अद्भुत ही हो गया है कि युवराज ने हार का ठीकरा खुद के सिर पर फोड़ लिया है। कितना मजबूत सिर है, लगता है अदृश्‍य हेलमेट पहन रखा होगा।  चाहे पैर लड़खड़ा रहे हैं, चलना तो दूर संभलकर खड़े भी नहीं हो पा रहे हैं। जिनका मानना है कि अपनी हार का ठीकरा दूसरे के सिर पर फोड़ने से अच्‍छा है कि अपना सिर अपने ही ठीकरे से फोड़ सहानुभूति बटोर ली जाए। अगर फोड़ा हो जाए, उसमें मवाद भर जाए, तब जिम्‍मेदारी सामने वाले के नाम थोप दी जाए। अनुभव बंदर है, ठीकरा भी किसी बंदर से कम नहीं है। ठीकरा फोड़ने वाले, चाहे अपने या दूसरे के सिर पर फोड़े, खुद को सिकंदर ही समझता है। हिटलर या मुसोलिनी क्‍यों नहीं समझता, इस बारे में आप ही चिंतन करके कुछ निष्‍कर्ष निकालिए, आखिर पाठकों की भी तो कोई जिम्‍मेदारी बनती है कि नहीं। साबुत या फूटा हुआ विचार हो या अचार, ठीकरा हो या किरकिरा  सब तैयार माल की तरह सामने परोस दिया जाए।
बंदर सिर्फ उछलने कूदने का नाम नहीं है। बंदर नकल मारने का भी खूब फेमस नाम है। बंदर याद कर लेता है। अब वह बंदर नहीं है जो एक टोपी के बदले टोपियां वापिस फेंक दे। टोपी के बदले पत्‍थर फेंकने वाले बंदरों का विकास हो चुका है। सब कुछ याद की करामात है। याद करना मतलब अनुभव से सीखना। इंसान स्‍मरण करता है और खुद का मरण कर लेता है पर सीखता सिर्फ पैसा कमाना है, सबको लूटना अच्‍छे से सीख लेता है। और बंदर एक बार ठोकर खाई तो दूसरी बार उछलकर पार की खाई। टहनी चाहे कितनी ही हिला लो, बंदर कभी नहीं गिरता। गिरता भी है तो अनुभव की तरह संभल जाता है। टहनी चाहे टूट जाए पर बंदर संभलना नहीं भूलता जबकि हमारे देश के चालक बंदर की तरह भी नहीं हो पा रहे हैं। फिर बापू की तरह ही कैसे हो पाएंगे।
बंदर हर दर पर नहीं पाया जाता है जबकि सूअर हर गंदगी में पाए जाते हैं। गंदगी के कारण मन सूअर सूअर हो गंदाता है। हरेक मन के आसपास सूअर ही घूमता नजर है। सड़क और घर के दर पर अनेक संख्‍या में कुत्‍ते पाए जाते हैं, उन्‍हें नेक माना जाता है। वैसे इस बार कोशिशें तो हाथी उपलब्‍ध करवाने की भी जोरदार थीं, हाथी तो नहीं मिला लेकिन मोर जरूर चारों ओर लिपट गए। जबकि हाथी को अगर दर पर सजा लिया जाए तो घर नजर ही न आए। आजकल हाथियों की मूर्तियों ने मिलकर सत्‍ता के दर और घर के रास्‍ते पर रोक लगा रखी है। जिससे वहां पर ठीकरों के कारण सिरों की शामत आई हुई है। ठीकरे और ठोकरें हाथी पर असर नहीं करते हैं। ठीकरे चुनाव के बाद परिणाम मिलने पर ही अवतरित होते हैं जबकि उन्‍हें मालूम है कि हारने वाला अपने ही किसी साथी के सिर पर फोड़ कर पुण्‍य लाभ प्राप्‍त करेगा।
ठीकरे जरा नहीं शर्माते हैं और जैसे बेशर्म हार खिसियानी हंसी हंस दांत फाड़ रही होती है, उसी प्रकार ठीकरे पानी के भरे गुब्‍बारों की तरह फूट रहे होते हैं। इसे आप हार की रंगीन आतिशबाजी समझ सकते हैं जो बे-चमक होती है, पर होती जरूर है, यह बाबा की फोर्थ आई से पहचानी जाती है। जीत की आतिशबाजी सरेआम सब खुद ही चमकाते हैं ताकि उसकी चमक में खुद का चेहरा देदीप्‍यमान हो जाए, इसे जीत का श्रेय लूटना कहा जाता है। जीत मतलब लूटने का प्रमाण पत्र, जिसे मिल गया, वह तो तर गया। यह तरना गंगा से पावन व निर्मल होता है। इसमें तैरने की आवश्‍यकता नहीं होती है। बिना तैरे तरने का सुख यहीं हासिल होता है। ठीकरों की डिमांड चुनाव के दौर में शिद्दत से महसूस की जाती रही है, अगर आप मेरी इस बात से इत्‍तेफाक रखते हैं तो चुनाव और ठीकरों का अंतर्संबंध विकसित कीजिएगा और बतलाइएगा ?

प्‍यार की पुंगी बजाते चलो : दैनिक हरिभूमि में 25 अप्रैल 2012 अंक में प्रकाशित

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घास चिल्‍ला चिल्‍लाकर कह रही है लेकिन कोई गधा नहीं सुन रहा है। सब घास खाने में तल्‍लीन हैं। गधे का स्‍वभाव है कि जो मिल जाए, खाए जाओ और घास हरी हो या लाल। लाल चाहे बापू का खून हो लेकिन गधा भी तो धोबी का लाल है। लाल वही जो कमाई करके दे, गधा खूब लाद कर ले जाता है और कमाई होती है। कमाई को लादने की जरूरत नहीं होती क्‍योंकि वह तो धोबी की जेब में समा जाती है। धोबी गधे पर लादे कपड़ों की भरपूर धुलाई करता है, उन्‍हें चमकदार बनाता है लेकिन गधे को एक दिन भी नहीं नहलाता। कहता है कि वह तो कपड़ों को भी कूट पीट कर चमकाता है। अगर गधे को चमकदार बनाने की कोशिश की और वो कुछ ज्‍यादा ही चमक गया तो जरूर किसी चिकनी चमेली गधी के पीछे हो लेगा, और उसकी कमाई को दुलत्‍ती लग जाएगी। यह प्‍यार की पुंगी बजना है, बजाते चलो। बाबा बजा रहे हैं, नीलामी करने वाले बजा रहे हैं तो व्‍यंग्‍यकार और अखबार वाले भी इस दौड़ में पीछे क्‍यों रह जाएं।
गधे की इस दुलत्‍ती से बचने के लिए धोबी का तर्क मौजूं लगता है लेकिन चिकना बनाने के चक्‍कर में ज्‍यादा कूट पीट दिया या निचोड़ पटक दिया तो उसके खून से भी घास लाल हो जाएगी। इससे भी बचने के लिए वह गधे को नहलाने से बचता रहा है। वैसे भी गधा नहाए या बिना नहाया रहे, कमाई तो उतनी ही करेगा। दुलत्‍ती भी उतनी ही मारेगा और ढेंचू ढेंचू में भी उसकी कोई फर्क नहीं आएगा। जितना समय गधे को नहलाने में बरबाद होगा उतने में तो और पचास जोड़ी कपड़े धो पटक लेगा और अपनी कमाई में इजाफा करेगा।
मामला बापू के खून से सनी घास की नीलामी का है और मैं भटक या अटक गया हूं धोबी और गधे पर। धोबी की कमाई पर क्‍योंकि कमाई की जो महत्‍ता है, वह सर्वोपरि है। कमाई का मामला हो तो भटकना स्‍वाभाविक है। आजकल बाबा किरपा कर रहे हैं लेकिन असल मामला नोटों का है। नोट में लोटने के लिए बाबा बनना सबसे अच्‍छा बिजनेस है। चाहे कोई बाबा कहे या गधा कहे, गधा मिट्टी में लोटेगा और बाबा नोटों में, धोबी घाट पर लेकिन घाट के पत्‍थर पर लोटना उसकी नियति है, गधा इसलिए धूल में लोट कर खुश हो लेता है। पत्‍थर की प्रकृति सख्‍त होना है। वह मुलायम नहीं हो सकता, उससे भगवान बना दो या इंसान की मूर्ति लेकिन सख्‍ती उसमें से गायब नहीं हो सकती है। वही सख्‍ती माया या उसके हाथियों की मूर्तियों में से गायब होने की भनक पाकर, माया हनक में लौट आई है। यह किसने कहा है कि जो हार जाता है, वह हनक नहीं रखता। हारने के बाद क्‍योंकि अब उसकी निगाहें केन्‍द्र पर हैं जो जरूर तो सत्‍तरवें आसमान पर ही होगा, क्‍या आपको इसमें कोई शक है ?

प्‍यार की पुंगी बजाने के निहितार्थ : हिंदी मिलाप में 24 अप्रैल 2012 को प्रकाशित



बोली घास की नहीं बापू के खून की हुई है। खरीदने वाले गधे थोड़े ही हैं जो घास के लालच में इतने नोट खर्च कर देंगे। उस घास में बापू का खून है, खून लाल ही रहा होगा लेकिन इतना लाल भी नहीं कि बापू के असर से घास का रंग बदल कर लाल हो गया हो और खरीदने वाले लाल रंग की घास उपजाने के लिए बोली लगा बैठे हैं। तब खून करने की कीमत थी, आज खूनी घास की कीमत है। खूनी घास कहने से घास को हत्‍यारा मत समझ लीजिए। हत्‍यारे तो वह भी नहीं हैं जिन्‍होंने बोली लगाई है। वह घास को बोली लगाकर इसलिए खरीद रहे हैं ताकि भावनाओं से खिलंदड़पना करने का जालिम अहसास किया जा सके। आप इसे प्‍यार की पुंगी बजाना समझ सकते हैं जबकि यह भावनाओं की पुंगी बजाई जा रही है।
घास चिल्‍ला चिल्‍लाकर यही कह रही है लेकिन कोई गधा नहीं सुन रहा है, वैसे भी जब गधा घास खा रहा होता है तो उसे घास खाने के सिवाय कुछ और नहीं सूझता है। फिर वह न तो दुलत्‍ती मारने की ओर ध्‍यान लगाता है और न ढेंचू ढेंचू का रियाज करता है। सब घास खाने में तल्‍लीन हैं। गधे का स्‍वभाव है कि जो मिल जाएखाए जाओ और घास हरी हो या लाल। लाल चाहे बापू का खून हो लेकिन गधा भी तो धोबी का लाल है। लाल वही जो कमाई करके देगधा खूब लाद कर ले जाता है और कमाई होती है। कमाई को लादने की जरूरत नहीं होती क्‍योंकि वह तो धोबी की जेब में समा जाती है। धोबी गधे पर लादे कपड़ों की भरपूर धुलाई करता हैउन्‍हें चमकदार बनाता है लेकिन गधे को एक दिन भी नहीं नहलाता। कहता है कि वह तो कपड़ों को भी कूट पीट कर चमकाता है। अगर गधे को चमकदार बनाने की कोशिश की और वो कुछ ज्‍यादा ही चमक कर किसी चिकनी चमेली गधी के इश्‍क में पड़ गया तो उसकी तो कमाई धरी रह जाएगी। गधा गधी से रोमांस करता रहेगा और धोबी कपड़ों का गट्ठर ढोता और धोता रहेगा।  नतीजा उसकी कमाई को बिना गधे के मारे ही जोरदार दुलत्‍ती लग जाएगी। यह प्‍यार की पुंगी बजना-बजाना नहीं है। प्‍यार की सभी पुंगियां आजकल बाबा बजा रहे हैं,नीलामी में बापू का खून हड़पने वाले बजा रहे हैं। फिर व्‍यंग्‍यकार और अखबार वाले इस दौड़ से बाहर क्‍यों रह जाएं।
गधे की इस दुलत्‍ती से बचने के लिए धोबी का तर्क मौजूं लगता है लेकिन चिकना बनाने के चक्‍कर में ज्‍यादा कूट पीट दिया या निचोड़ पटक दिया तो उसके खून से भी घास लाल हो जाएगी। इससे भी बचने के लिए वह गधे को नहलाने से बचता रहा है। फिर उस लाल घास को कोई नहीं खरीदना चाहेगा, गधे के खून की वैसे भी कोई कीमत नहीं है, उसे तो आप अवाम ही समझ लीजिए। गर्दभराज नहाएं या बिना नहाए मस्‍त रहेंकमाई तो उतनी ही होगी। दुलत्‍ती भी उतनी ही मारेगा और ढेंचू ढेंचू से भी कोई सुर नहीं सधेगा। जितना समय गधे को नहलाने में बरबाद होगा, उतने में तो और पचास जोड़ी कपड़ों को धोबी महाराज धो पटक लेगा और अपनी कमाई में खूब इजाफा करेगा।
मामला बापू के खून से सनी घास की नीलामी का है और मैं भटक या अटक गया हूं धोबी और गधे के करतबों पर यानी धोबी-गधे से होने वाली कमाई। कमाई की महत्‍ता सर्वोपरि है, उसी से जीवन चलता है इसलिए विशेषज्ञ नोटों का जंगल बनाते रहते हैं। कमाई का मामला हो तो भटकना स्‍वाभाविक है। चाहे बाबा की किरपा का मामला हो या खूनी घास की नीलामी का, असल मामला नोटों की चाहत का है। नोट में लोटने के लिए बाबा बनना और अब खूनी घास बेचना सबसे अच्‍छा बिजनेस है। चाहे कोई बाबा कहे या गधा कहे,गधा मिट्टी में लोटेगा और बाबा नोटों मेंधोबी घाट पर लेकिन घाट के पत्‍थर पर लोटना किसकी अंतिम परिणति है, आप परिचित हैं। पत्‍थर की प्रकृति सख्‍त होना है। वह मुलायम नहीं हो सकताउससे भगवान बना दो या इंसान की मूर्ति लेकिन सख्‍ती उसमें मौजूद रहेगी। वही सख्‍ती की माया हाथियों की मूर्तियों में से गायब होने की भनक पाकरमाया की हनक के रूप में वापिस लौट आई है। यह किसने कहा है कि जो हार जाता हैवह हनक नहीं सकता। हारने के बाद हनक बढ़ने के मूल में अब निगाहें केन्‍द्र पर जमना हैं। आओ सब मिलकर इसे सत्‍तरवें आसमान पर तलाशने चलते हैं, आप भी मेरे साथ चल रहे हैं क्‍या ?

खूनी घास का बिजनेस : डेली न्‍यूज एक्टिविस्‍ट के चकल्‍लस स्‍तंभ में 21 अप्रैल 2012 के अंक में प्रकाशित


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बोली घास की नहीं बापू के खून की हुई है। खरीदने वाले गधे थोड़े ही हैं जो घास के लालच में इतने नोट खर्च कर देंगे। उस घास में बापू का खून है, खून लाल ही रहा होगा लेकिन इतना लाल भी नहीं कि बापू के असर से घास का रंग बदल कर लाल हो गया हो और खरीदने वाले लाल रंग की घास उपजाने के लिए बोली लगा बैठे हैं। तब खून करने की कीमत थी, आज खूनी घास की कीमत है। खूनी घास कहने से घास को हत्‍यारा मत समझ लीजिए। हत्‍यारे तो वह भी नहीं हैं जिन्‍होंने बोली लगाई है। वह घास को बोली लगाकर इसलिए खरीद रहे हैं ताकि भावनाओं से खिलंदड़पना करने का जालिम अहसास किया जा सके। आप इसे प्‍यार की पुंगी बजाना समझ सकते हैं जबकि यह भावनाओं की पुंगी बजाई जा रही है।
घास चिल्‍ला चिल्‍लाकर यही कह रही है लेकिन कोई गधा नहीं सुन रहा है, वैसे भी जब गधा घास खा रहा होता है तो उसे घास खाने के सिवाय कुछ और नहीं सूझता है। फिर वह न तो दुलत्‍ती मारने की ओर ध्‍यान लगाता है और न ढेंचू ढेंचू का रियाज करता है। सब घास खाने में तल्‍लीन हैं। गधे का स्‍वभाव है कि जो मिल जाएखाए जाओ और घास हरी हो या लाल। लाल चाहे बापू का खून हो लेकिन गधा भी तो धोबी का लाल है। लाल वही जो कमाई करके देगधा खूब लाद कर ले जाता है और कमाई होती है। कमाई को लादने की जरूरत नहीं होती क्‍योंकि वह तो धोबी की जेब में समा जाती है। धोबी गधे पर लादे कपड़ों की भरपूर धुलाई करता हैउन्‍हें चमकदार बनाता है लेकिन गधे को एक दिन भी नहीं नहलाता। कहता है कि वह तो कपड़ों को भी कूट पीट कर चमकाता है। अगर गधे को चमकदार बनाने की कोशिश की और वो कुछ ज्‍यादा ही चमक कर किसी चिकनी चमेली गधी के इश्‍क में पड़ गया तो उसकी तो कमाई धरी रह जाएगी। गधा गधी से रोमांस करता रहेगा और धोबी कपड़ों का गट्ठर ढोता और धोता रहेगा।  नतीजा उसकी कमाई को बिना गधे के मारे ही जोरदार दुलत्‍ती लग जाएगी। यह प्‍यार की पुंगी बजना-बजाना नहीं है। प्‍यार की सभी पुंगियां आजकल बाबा बजा रहे हैंनीलामी में बापू का खून हड़पने वाले बजा रहे हैं। फिर व्‍यंग्‍यकार और अखबार वाले इस दौड़ से बाहर क्‍यों रह जाएं।
गधे की इस दुलत्‍ती से बचने के लिए धोबी का तर्क मौजूं लगता है लेकिन चिकना बनाने के चक्‍कर में ज्‍यादा कूट पीट दिया या निचोड़ पटक दिया तो उसके खून से भी घास लाल हो जाएगी। इससे भी बचने के लिए वह गधे को नहलाने से बचता रहा है। फिर उस लाल घास को कोई नहीं खरीदना चाहेगा, गधे के खून की वैसे भी कोई कीमत नहीं है, उसे तो आप अवाम ही समझ लीजिए। गर्दभराज नहाएं या बिना नहाए मस्‍त रहेंकमाई तो उतनी ही होगी। दुलत्‍ती भी उतनी ही मारेगा और ढेंचू ढेंचू से भी कोई सुर नहीं सधेगा। जितना समय गधे को नहलाने में बरबाद होगा, उतने में तो और पचास जोड़ी कपड़ों को धोबी महाराज धो पटक लेगा और अपनी कमाई में खूब इजाफा करेगा।
मामला बापू के खून से सनी घास की नीलामी का है और मैं भटक या अटक गया हूं धोबी और गधे के करतबों पर यानी धोबी-गधे से होने वाली कमाई। कमाई की महत्‍ता सर्वोपरि है, उसी से जीवन चलता है इसलिए विशेषज्ञ नोटों का जंगल बनाते रहते हैं। कमाई का मामला हो तो भटकना स्‍वाभाविक है। चाहे बाबा की किरपा का मामला हो या खूनी घास की नीलामी का, असल मामला नोटों की चाहत का है। नोट में लोटने के लिए बाबा बनना और अब खूनी घास बेचना सबसे अच्‍छा बिजनेस है। चाहे कोई बाबा कहे या गधा कहे,गधा मिट्टी में लोटेगा और बाबा नोटों मेंधोबी घाट पर लेकिन घाट के पत्‍थर पर लोटना किसकी अंतिम परिणति है, आप परिचित हैं। पत्‍थर की प्रकृति सख्‍त होना है। वह मुलायम नहीं हो सकताउससे भगवान बना दो या इंसान की मूर्ति लेकिन सख्‍ती उसमें मौजूद रहेगी। वही सख्‍ती की माया हाथियों की मूर्तियों में से गायब होने की भनक पाकरमाया की हनक के रूप में वापिस लौट आई है। यह किसने कहा है कि जो हार जाता हैवह हनक नहीं सकता। हारने के बाद हनक बढ़ने के मूल में अब निगाहें केन्‍द्र पर जमना हैं। आओ सब मिलकर इसे सत्‍तरवें आसमान पर तलाशने चलते हैं, आप भी मेरे साथ चल रहे हैं क्‍या ?

बाबे दी फुल किरपा : डीएलए दैनिक में 18 अप्रैल 2012 के अंक में प्रकाशित


किरपा करना किरपाण चलाने से जनहितकारी, सुंदर और नेक कार्य है। सब चाहते हैं कि उस पर किरपा हो, किरपा करना कोई नहीं चाहता। अब ऐसे में एक बाबा आए और खूब किरपा बरसाई, किरपाण भी नहीं चलाई, फिर लोग दुखी क्‍यों हैं, टी वी चैनल वालों पर भी खूब किरपा बरसी। वे मालामाल हैं और मालामाल हो गए। फिर जब इतना सा डिस्‍क्‍लेमर लगाकर छुटकारा मिल जाता है कि ‘इन चमत्‍कारों के लिए चैनल वाले उत्‍तरदायी नहीं हैं’, फिर भला चैनल वाले क्‍यों नहीं चलाएंगे। जबकि बाबा चैनल के जरिए किरपा ही कर रहे हैं, सब पर किरपा बरस रही है। आप यह क्‍यों नहीं समझ रहे हैं कि बाबा तो सिर्फ 2000 रुपये में किरपा कर रहे हैं। जबकि चैनल वाले लाखों लेकर किरपा करवा रहे हैं। अब अगर बाबा लालची होते तो सब धन समेट लेते। न चैनल वालों को देते, न सरकार को टैक्‍स चुकाते। फिर देश की बैंकों में ही क्‍यों जमा करवाते, विदेशी बैंकों में नहीं जमा करवाते। एक प्रकार से समझा जाए तो पब्लिक से किरपा करने के लिए इकट्ठे हुए माल असबाब में हिस्‍सेधारी बंटाने के लिए चैनल वाले सक्रिय हैं और एक दो नहीं बीसियों चैनल। अब एक दो तो बाबा पर आफत आते देख पल्‍ला झाड़कर निकल लिए हैं। बाबा ने कभी चैनल वालों का उधार नहीं रखा और न जिन पर किरपा की, उनको उधारी का लाभ दिया। नकद का इतना शानदार और चोखा धंधा बल्कि इसे व्‍यवसाय कहना चाहिए, भला इस कलयुग में और कौन सा हो सकता है। कोई चोरी चकारी नहीं, लूट खसोट नहीं, किरपा के लिए थोड़ा सा धन, लेकिन बदले में ‘बाबे दी फुल किरपा’।
किरपा मतलब कर पा, जितना बाबा कर पा रहे हैं, खूब कर रहे हैं। कोई भेद भाव नहीं, दो साल का बच्‍चा हो या 30 साल का युवा अथवा 50 साल का अधेड़ या फिर 80 साल का बुजुर्ग, कन्‍या हो, महिला हो, किन्‍नर हो – किरपा करने में कोई भेद भाव नहीं। सबकी फीस सिर्फ 2000 नकद। अब यह शोर मचाना कितना जायज है कि बाबा पहले दुकान चलाते थे या ठेकेदारी करते थे और सफलता नहीं मिली। अब यह किसने कहा है कि एक धंधा सफल न हो तो दूसरा काम नहीं किया जा सकता। सबको आजादी है कि वह किसी भी धंधे में किस्‍मत आजमा सकता है। अब अगर बाबा की किस्‍मत चमक गई है और वह देशवासियों की किस्‍मत चमकाने में जुट गए हैं तो इसमें दुखी होने की क्‍या बात है।
किस्‍मत की चमक निराली होती है। जब जिसकी चमक जाती है तो वो दूसरे की चमकाना नहीं चाहता बल्कि सारी चमक खुद ही बटोरना चाहता है। बाबा इस मामले में सिर्फ नाम के ही नहीं, मन के भी निर्मल हैं और वे चमक को बांट रहे हैं, क्‍या हुआ जो इसके बदले में ‘सब धन धूरि समान’ के अंश को भरपूर सम्‍मान दे रहे हैं, आप इसमें इतना अपमान क्‍यों महसूस कर रहे हैं, जलते हैं न बाबा पर हुई किरपा से और बाबा जो कर रहे हैं उस किरपा को पाना चाहते हैं। चिंता कीजिए और बुद्धिमान बनिए, एक हालिया शोध तो यही कह रहा है।

किरपा ही तो कर रहे हैं : दैनिक अमर उजाला में 17 अप्रैल 2012 के अंक में नुक्‍कड़ स्‍तंभ में प्रकाशित



किरपा करना किरपाण चलाने से जनहितकारी, सुंदर और नेक कार्य है। सब चाहते हैं कि उस पर किरपा हो, किरपा करना कोई नहीं चाहता। अब ऐसे में एक बाबा आए और खूब किरपा बरसाई, किरपाण भी नहीं चलाई, फिर लोग दुखी क्‍यों हैं, टी वी चैनल वालों पर भी खूब किरपा बरसी।  फिर जब इतना सा डिस्‍क्‍लेमर लगाकर छुटकारा मिल जाता है कि ‘इन चमत्‍कारों के लिए चैनल वाले उत्‍तरदायी नहीं हैं’, फिर भला चैनल वाले क्‍यों नहीं चलाएंगे। बाबा चैनल के जरिए किरपा ही कर रहे हैं। अब अगर बाबा लालची होते तो सब धन समेट लेते। न चैनल वालों को देते, न सरकार को टैक्‍स चुकाते। फिर देश की बैंकों में ही क्‍यों जमा करवाते, विदेशी बैंकों में नहीं जमा करवाते।  नकद का इतना शानदार और चोखा धंधा बल्कि इसे व्‍यवसाय कहना चाहिए, भला इस कलयुग में और कौन सा हो सकता है। कोई चोरी चकारी नहीं, लूट खसोट नहीं, किरपा के लिए थोड़ा सा धन, लेकिन बदले में ‘बाबे दी फुल किरपा’।
किरपा मतलब 'कर पा', जितना बाबा कर पा रहे हैं, खूब कर रहे हैं। कोई भेद भाव नहीं, दो साल का बच्‍चा हो या 30 साल का युवा अथवा 50 साल का अधेड़ या फिर 80 साल का बुजुर्ग, कन्‍या हो, महिला हो, किन्‍नर हो – किरपा करने में कोई भेद भाव नहीं। सबकी फीस सिर्फ 2000 नकद। अब यह शोर मचाना कितना जायज है कि बाबा पहले दुकान चलाते थे या ठेकेदारी करते थे और सफलता नहीं मिली। अब यह किसने कहा है कि एक धंधा सफल न हो तो दूसरा काम नहीं किया जा सकता। सबको आजादी है कि वह किसी भी धंधे में किस्‍मत आजमा सकता है। अब अगर बाबा की किस्‍मत चमक गई है और वह देशवासियों की किस्‍मत चमकाने में जुट गए हैं तो इसमें दुखी होने की क्‍या बात है।
किस्‍मत की चमक निराली होती है। जब जिसकी चमक जाती है तो वो दूसरे की चमकाना नहीं चाहता बल्कि सारी चमक खुद ही बटोरना चाहता है। बाबा इस मामले में सिर्फ नाम के ही नहीं, मन के भी निर्मल हैं और वे चमक को बांट रहे हैं, क्‍या हुआ जो इसके बदले में ‘सब धन धूरि समान’ के अंश को भरपूर सम्‍मान दे रहे हैं, आप इसमें इतना अपमान क्‍यों महसूस कर रहे हैं, जलते हैं न बाबा पर हुई किरपा से और बाबा जो कर रहे हैं उस किरपा को पाना चाहते हैं। चिंता कीजिए और बुद्धिमान बनिए, एक हालिया शोध तो यही कह रहा है।

अगर हम पार्षद होते ... दैनिक नवभारत टाइम्‍स में 13 अप्रैल 2012 के अंक में पढि़ए अविनाश वाचस्‍पति के विचार


निर्मल बाबा का निर्मल मन : दैनिक हरिभूमि में 13 अप्रैल 2012 के अंक में प्रकाशित





निर्मल बाबा, निर्मल है, मैल बाबा नहीं है, घोटाला नहीं है। मैल मिटाने वाला, दुख दर्द हटाने वाला बाबा है। बाबा वही जो बेटे पोतों के मन भाए। अपने साथ सबके मन को हर्षाए। इसमें भी कोई दुख पाए तो पाए, सुख से सूख जाए तो बूंद भर में ही डूब जाए। जनता को सब कुछ सरकार ही दिखता है। जबकि सरकार नाम की है, बेअसर है। बाबा हमारा तो सरकार है। सरकार है लेकिन उनकी नितांत अपनी सरकार है। वहां वोटिंग नहीं होती, इसलिए वोटिंग संबंधी बुराईयां उसमें नहीं हैं। बाबा की सरकार बे-असर सरकार नहीं है, असरदार सरकार है। बाबा सरदार भी है। असरदार भी है। सरदार का असरदार होना, इतना आसान नहीं है। सरकार में नहीं होता है ऐसा, लेकिन बाबा की सल्तनत में हो रहा है। भक्तगण खुश हैं। सुखी हैं लेकिन भक्तों और बाबा की सुख-समृद्धि देख सूखने वाले चाहे कितने बढ़ जाएं परंतु वे दुख से सूखने वालों की तुलना में बहुत अधिक हैं। धन का सही उपयोग हो रहा है। धन से कैसी माया, अगर उससे सुख ही नहीं पाया, मोदक खाकर मोद नहीं मनाया। बाबा के मनोबल का ही प्रताप उनका धनोबल है। एडंवास जमा करके, एडवांस बुकिंग का नियम है। नियम पक्का है उसमें कोई कोताही नहीं। कोताही सरकार में होती है। सरकार में भी घोटालों में कोताही का नियम नहीं है। एक बड़े घोटाले के बाद, दूसरा उससे बड़ा घोटाला सरकार के नुमाइंदों द्वारा खूब आसानी से घोल दिया जाता है। इन घोटालों के चलते कितने ही चमत्कार हुए हैं। परंतु निर्मल बाबा वाला चमत्कार इन ऑरीजनल है। ऐसा बेसिक घोटाला मतलब अद्भुत मनभावन चमत्कार जनता के साथ पहले होता रहा है परंतु इतनी धुरंधरता में नहीं हुआ है। अब इससे चमत्कृत सिर्फ र्शद्धालु ही नहीं हैं, उनमें आस्था रखने वाले और भक्तगण ही नहीं हैं। अंदर की बात बतलाऊं इससे चमत्कृत बाबा खुद भी हैं। वे घंटों अपनी इस सफलता पर बिना नहाए आत्ममुग्ध रहते हैं। उन्हें अपनी यह सफलता नागमणि प्रतीत होती है। जिससे वह कुछ भी कर और पा सकते हैं और कर पा रहे हैं, यही कृपा (कर पा) बनकर बाबा पर सबसे अधिक और कुछ कम भक्तगणों पर बरस रही है। उमड़ घुमड़ कर आई कृपा। बाबा के मन को भायी कृपा। नोटों की बरसात है कृपा। कृपालुओं पर चमत्कार है कृपा। धन जो हजारों लाखों की जेबों में बिखरा पड़ा है। वहां से कुछ कम होगा तो भी कुछ फर्क नहीं पड़ेगा लेकिन वही जब बाबा की झोली में आकर गिरेगा और अंबार लगेगा तो धन की असली ताकत का मालूम चलेगा। धन की शक्ति बिखरने में नहीं, इकट्ठे होने में है, इसे सब मानते हैं। अब वह नेताओं के विदेशी खातों में तो इकट्ठा नहीं हो रहा है, यह भी एक संतोष की बात है। बाबाओं के खातों में भक्तगणों की कृपा लगातार बरस रही है और उतनी बरस रही है जितनी पूरे देश में कुल मिलाकर बारिश भी नहीं होती है तो इससे तो देश का विकास ही सामने आ रहा है न, इसमें भी आपकी आपत्ति की वजह नहीं समझ पा रहा हूं मैं, कोई समझाएगा मुझे ?

निर्मल बाबा का निर्मल मन : दैनिक जनवाणी में 12 अप्रैल 2012 अंक में प्रकाशित

निर्मल बाबा, निर्मल है, मैल बाबा नहीं है, घोटाला नहीं है। मैल मिटाने वाला, दुख दर्द हटाने वाला बाबा है। बाबा वही जो बेटे पोतों के मन भाए। अपने साथ सबके मन को हर्षाए। इसमें भी कोई दुख पाए तो पाए, सुख से सूख जाए तो बूंद भर में ही डूब जाए। जनता को सब कुछ सरकार ही दिखता है। जबकि सरकार नाम की है, बेअसर है।  बाबा हमारा तो सरकार है। सरकार है लेकिन उनकी नितांत अपनी सरकार है। वहां वोटिंग नहीं होती, इसलिए वोटिंग संबंधी बुराईयां उसमें नहीं हैं। बाबा की सरकार बे-असर सरकार नहीं है, असरदार सरकार है। बाबा सरदार भी है। असरदार भी है। सरदार का असरदार होना, इतना आसान नहीं है। सरकार में नहीं होता है ऐसा, लेकिन बाबा की सल्‍तनत में हो रहा है। भक्‍तगण खुश हैं। सुखी हैं लेकिन भक्‍तों और बाबा की सुख समृद्धि देख सूखने वाले चाहे कितने बढ़ जाएं परंतु वे दुख से सूखने वालों की तुलना में बहुत अधिक हैं। धन का सही उपयोग हो रहा है। धन से कैसी माया, अगर उससे सुख ही नहीं पाया, मोदक खाकर मोद नहीं मनाया। बाबा के मनोबल का ही प्रताप उनका धनोबल है।
एडंवास जमा करके, एडवांस बुकिंग का नियम है। नियम पक्‍का है उसमें कोई कोताही नहीं। कोताही सरकार में होती है। सरकार में भी घोटालों में कोताही का नियम नहीं है। एक बड़े घोटाले के बाद, दूसरा उससे बड़ा घोटाला सरकार के नुमाइंदों द्वारा खूब आसानी से घोल दिया जाता है। यह घुलना तेल में पानी के घुलने को भी संभव बना देता है। इन घोटालों के चलते कितने ही चमत्‍कार हुए हैं। परंतु निर्मल बाबा वाला चमत्‍कार इन ऑरीजनल है। ऐसा बेसिक घोटाला मतलब अद्भुत मनभावन चमत्‍कार जनता के साथ पहले होता रहा है परंतु इतनी धुरंधरता में नहीं हुआ है। अब इससे चमत्‍कृत सिर्फ श्रद्धालु ही नहीं हैं, उनमें आस्‍था रखने वाले और भक्‍तगण ही नहीं हैं। अंदर की बात बतलाऊं इससे चमत्‍कृत बाबा खुद भी हैं। वे घंटों अपनी इस सफलता पर बिना नहाए आत्‍ममुग्‍ध रहते हैं। उन्‍हें अपनी यह सफलता नागमणि प्रतीत होती है। जिससे वह कुछ भी कर और पा सकते हैं और कर पा रहे हैं, यही कृपा (कर पा) बनकर बाबा पर सबसे अधिक और कुछ कम भक्‍तगणों पर बरस रही है। परंतु भक्‍तगण अथाह हैं इसलिए एक एक बूंद कृपा से भी कृपा का सागर बन हिलोरें मार रहा है। उमड़ घुमड़ कर आई कृपा। बाबा के मन को भायी कृपा। नोटों की बरसात है कृपा। कृपालुओं पर चमत्‍कार है कृपा।
बाबा सबका अतीत, वर्तमान और भविष्‍य संवार रहे हैं और खंगालने वाले उनका अतीत खंगालने में समय जाया कर रहे हैं। मानो, बाबा को नीचा दिखलाकर, अपनी नीचवृत्ति को जाहिर करना ही उनका ध्‍येय हो। इस संसार में सब दूसरों के सुख से सुखी हैं। बाबा के सुख से भी बहुत सारे लोग सूख रहे हैं कि, हाय, बाबा हम ही क्‍यों न हुए ? मैं भी अपनी कोशिशों में सक्रिय हूं। मैं भी उनका अपना ही हूं, बस अभी तक बुकिंग नहीं कराई है और दो हजार की राशि अग्रिम जमा नहीं कराई है। इसलिए मेरे सपने अधूरे हैं। अब अगर बाबा बनकर भी धन का अंबार नहीं लगा पाए तो, कितनी शर्मनाक स्थिति हो जाएगी। जब मंदिरों में और सत्‍य साईं बाबा के खजाने में धन के अंबार लगे हैं, फिर बाबा के पास क्‍यों न लगें, और हम भी बाबा ही क्‍यों न बनें, क्‍या हम भारत देश के सच्‍चे पक्‍के नागरिक नहीं हैं, आप हमारी नागरिकता की जांच कर सकते हैं। जहां डाल डाल पर सोने की चिडि़या करती है बसेरा। बस, क्‍योंकि अब चिडि़याएं खतरे में हैं, प्रदूषण और मोबाइल के सिग्‍नल उनका सफाया कर रहे हैं। फिर बाबा अगर ऐसे में पर्यावरण प्रेमी बन कर सामने आए हैं ....  जहां डाल डाल पर बाबा करते हैं बसेरा, वह भारत देश है मेरा। अब अगर डाल खूब सारी हैं तो बाबा भी खूब सारे ही होंगे न, जैसे चिडि़यां खूब सारी हुआ करती हैं या हुआ करती थीं। अब अगर मैंने बाबा की तुलना चिडि़या से कर दी है तो आप उन्‍हें चिडि़याघर में क्‍यों रखना चाह रहे हैं, चिडि़या भी चाहती हैं कि उनका अपना बनाया बसेरा हो। जिसे तिनका-तिनका जोड़कर बनाया हो। फिर बाबा अगर दो-दो हजार रुपये का तिनका जोड़ कर बसेरा मजबूत करने में जुटे हैं और अपना वर्तमान और भविष्‍य संवार रहे हैं। फिर इसमें आपके दुखी होने की कोई वजह मुझे तो दिखाई नहीं देती है।
धन जो हजारों लाखों की जेबों में बिखरा पड़ा है। वहां से कुछ कम होगा तो भी कुछ फर्क नहीं पड़ेगा लेकिन वही जब बाबा की झोली में आकर गिरेगा और अंबार लगेगा तो धन की असली ताकत का मालूम चलेगा। धन की शक्ति बिखरने में नहीं, इकट्ठे होने में है, इसे सब मानते हैं। अब वह नेताओं के विदेशी खातों में तो इकट्ठा नहीं हो रहा है, यह भी एक संतोष की बात है। बाबाओं के खातों में भक्‍तगणों की कृपा लगातार बरस रही है और उतनी बरस रही है जितनी पूरे देश में कुल मिलाकर बारिश भी नहीं होती है तो इससे तो देश का विकास ही सामने आ रहा है न, इसमें भी आपकी आपत्ति की वजह नहीं समझ पा रहा हूं मैं, कोई समझाएगा मुझे ?

फ्री गुड़ या फील गोबर का अहसास फील गुड है : दैनिक हिंदी मिलाप में बैठे ठाले स्‍तंभ में 10 अप्रैल 2012 को प्रकाशित



फीका गुड़ चखा है या चखने का अवसर मिला है। जब यह जाना होगा कि गुड़ भी फीका होता हैतब हैरानी तो बहुत हुई होगी जब किसी एक शातिर चखने वाले ने स्‍वाद गोबर का बतलाया होगा। मैं मानता हूं कि किसी ने चखा न होगा, बस यूं ही बका होगा। बकबक करना यानी बकबकाहट कब किसको अपने चंगुल में गुल कर दे, अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। गुड़ का गोबर करने वाले को भी नहीं अंदाज हुआ होगा।  सोचा होगा कि फ्री में मिल रहा है, चलो, कुछ तो बकें। चखने की जगह खाते भी रहें और बकते भी रहें। मुंह के भीतर जो चटोरी देवी विराजमान हैउसको प्रसन्‍न करने के लिए ब्‍यान दिया होगा। आपकी तरह मुझे भी बहुत आश्‍चर्य हुआ थाजब मैंने ‘फील गुड’ शब्‍द पहली बार सुना था। ऐसे लगा था कोई बार बार बहुत प्‍यार से ‘फ्री गुड़’ खाने के लिए न्‍यौत रहा है। गुड़ वैसे डायबिटीज वालों को भी अधिक नुकसान नहीं पहुंचाता हैअधिक खा लिया जाए तो फिर बख्‍शता भी नहीं है। यह उन सबके लिए चेतावनी है जो फ्री और दो दो नहींफ्री और चार सौ बीस में यकीन रखते हैं। मतलब फ्री का माल भी हड़पेंगे और उसमें भी अपने कारनामों से चार सौ बीसी अवश्‍य प्रदर्शित कर देंगे। इससे उनमें कई तरह की संभावनाओं और क्षमताओं का पता चलता है। आप उनका लाभ चाहे न ले पाएंपर सतर्क तो अवश्‍य रह सकते हैं।
सतर्क रहना जीवन के आधे जोखिम खत्‍म कर देता है। फिर फ्री का गुड़ मिले और फील गुड का अहसास तक न होयह संभव नहीं है। फिर भी आपको यह सावधानी तो रखनी ही होगी कि जो फ्री गुड़ आपको मिल रहा हैवह फीका तो नहीं है। उसी में फील गुड के परमतत्‍व का अहसास समाया हुआ है। फ्री गुड़ का अहसास गांवों के निवासियों को,खेतों में फ्री गन्‍ना मिलने नहींतोड़ने अथवा बैलगाड़ी में लादकर ले जाए जा रहे गट्ठर में से खींच लेने से ही हो जाता है। यह गुड़ के प्राकृतिक स्‍वाद का अहसास है और इसमें दांतों को चबाने जैसी कसरत अवश्‍य करनी पड़ती हैइसी से वह मुहावरा चलन में आया होगा कि मेहनत का फल मीठा होता हैजबकि होना चाहिए था कि मेहनत का रस मीठा होता है। बशर्ते कि जिसके गन्‍ने फ्री में हथियाए हैंवह मरम्‍मत न कर देजबकि गांवों में ऐसा होता नहीं है,ऐसे कार्यों को लूट-झपट या राहजनी शहरों में माना जाता है। गांवों में यह प्रवृत्ति नहीं पाई जाती है। इसलिए शहर धन से अमीर होते हुए भीगांवों के मन से गरीब ही होते हैं। पर यह तय मानिए कि इसमें किसानों की आत्‍महत्‍या के मामले का एक भी सूत्र नहीं है। शहरों में इसके बदले जो कुटिल टकराहटें होती हैंवह सब अच्‍छे और सुखद अनुभवों को ‘फ्री गोबर’ में बदल कर रख देती हैं जबकि गांव वाले गोबर को उपयोगी मानते हैं। गोबर होता ही उपयोगी हैउसके लाभ इतने अनेक और नेक हैं परंतु शहर वालों की आंखें इस कदर चौंधियाई हुई हैं कि उनमें इसमें फील गुड की संवेदना नहीं जागती और वे नाक भौं तक सिकोड़ने लगते हैं। जबकि सिकुड़ना जीभ का बनता है।
वैसे फील गुड का अहसास सामने वाले को मूर्ख बनाने और समझने में भी खूब होता है। वह बन जाए तो अहसास की मात्रा आपमें कई हजार गुना बन जाती है। सामने वाला जानते-बूझते मूर्ख बनने का कुशल अभिनय कर रहा है तो फील गुड दोनों को खूब शिद्दत से होता है। वैसे इसे अब तक गलतफहमी माना जाता रहा है। किसको कितनी मात्रा में अहसास हो रहा है – इसको तोलने-मापने के लिए वैज्ञानिक अभी तक कोई तराजू भी नहीं बना पाए हैं और कंप्‍यूटर भी इस काम को नहीं कर पा रहा है। कंप्‍यूटर को तो वही काम करना आता है जो इंसान उसे सिखाता है। मतलब वही है कि किस तरह के साफ्टवेयर उसमें घुसाता है। इसके बाद अगर किसी को इस आइडिये को अपनाने का आइडिया मन में आ जाएगा तो वह इसे जरूर कापी कर लेगा और कापी किया हुआ ऑरीजनल और ऑरीजनल कापी बनकर रह जाएगा। यह तकनीक के नुकसान भी हैं पर प्रेरणा भी इनसे ही मिलती है और प्रेरणा देने वाला सदा गुमनाम ही रहता है। उसका जिक्र कोई उसका पाठक भी नहीं करता कि भला कौन सिरदर्दी में फील गुड महसूस करे।
पिछले काफी समय से फील गुड की धमक अब सबके मन मेंकार्यों में धमाल मचा रही है। इसने मजबूत पैठ बनाई हैव्‍यंग्‍य भी इससे नहीं बच पाया है। कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है जो इसकी जद में आने से बचा हो। किसी को जंक फूड खाने मेंकिसी को कोल्‍ड ड्रिंक पीने मेंकिसी को इन्‍हें रोकने में सदा से इसका अहसास होता रहा है। किसी को धोखा देने में इसका जबर्दस्‍त रोल मालूम चल गया है और नेताओं को वोटर को चकमा देने में इसका अनूठा अहसास होता है। जिसका कोई सानी नहीं है।
साधारणतयाबस में यात्रा करने वाला टिकट बचाकर,जुर्माने से बचकर अपने हिस्‍से के लिए फील गुड बटोर लेता है। मतलब यही है कि सब अपनी अपनी औकात के अनुसार फील गुड की मौजूदगी में रमे रहते हैं और जीवनदायिनी सकारात्‍मक ऊर्जा एकत्र कर उसका उपयोग कर लेते हैं। काम वाली आ जाए तो गृहिणी को और उसके ग्रहण (पतिदेव) को उसके अपने नजरिए से यह निराला अहसास होता है। छुट्टी कर ले तो काम वाली बाई को इससे उसके अपने मन के भीतर तक मनभावन सुकून मिलता है। कुल मिलाकर इससे यही साबित होता है कि गुड़ और गोबर दोनों में फील गुड कराने के कीटाणु मौजूद रहते हैंक्‍या आपको इस बारे में  कुछ कहने का मन हो रहा है तो फील गुड का अहसास पाने के लिए मौनी बाबा मत बनिएगा ?

होली, चुनाव और हाईटेकीय धमाल : उदंती मासिक के मार्च 2012 अंक में प्रकाशित





चुनाव और होली। नेता भर रहे हैं वोटों से झोली। वाह जनाब वाह। हाथी ढक दिए गए हैं। परदे कस दिए गए हैं। फेंकने वाले तो परदे लगने पर भी तानों के रंग फेंक रहे थे। तानों के रंग कौन से गुब्‍बारे में भरे जाते हैं और कौन सी पिचकारियों से फेंके जाते हैं। इस बारे में चाइना वाले भी नहीं बतला पा रहे हैं। इस पर शोध कार्य जारी हैं, कुछ रोषपूर्वक कर रहे हैं और अधिकतर धौंस में आकर कर रहे हैं। बच्‍चे बचपने के दवाब में करके खुश हैं और मजा मार रहे हैं। इस बार होली हाई टेक होकर आई है. हाई टेक और चुनावी भी। इलेक्‍ट्रानिक वोटिंग मशीनें कितने ही तरह के रंग उगल रही हैं। चुनावों से पहले ही उनका अलग तरह के रंग खौफ छाया हुआ है। वोटर के मन में शंका है कि वोट राम को दूंगा तो क्‍या मशीन उसे श्‍याम के खाते फारवर्ड तो नहीं कर देगी, इसकी क्‍या गारंटी है। जब इस जमाने में वारंटी किसी चीज की नहीं है। गारंटियों वाले जमाने तो ईद का चांद हो गए हैं। गारंटी वारंटी की बात भर कर लो तो मंगल पर दंगल हो जाता है। जब होली के रंग ही गारंटिड नहीं रहे हैं कि आप लाल रंग डालेंगे तो लाल ही करेंगे, हो सकता है वो थोबड़े को हरा रंग दें। इसे होली का पर्यावरण कहा जा सकता है। नतीजे काले, लाल या स्‍याह सफेद भी आएंगे। वे भी तो होली मनाएंगे। आखिर चुनावी नतीजों के बीच में होली का आ धमकना, अकारण ही तो नहीं है। गुब्‍बारे का फूटना अब स्टिकी रंगीय बम का कमाल है। जो अपने आप में अपनी मिसाल है।
कभी आपने एक मेंढक को दूसरे मेंढक को गुब्‍बारा मारते देखा है, देखा तो आपने एक विजयी नेता को पराजित नेता को गुब्‍बारा मारते भी नहीं होगा। चाहे वे ऊपर से हार जीत जाएं पर उनके भीतर विजयी भाव सदा समाया रहता है। उस समाने में रंग काले नहीं होते, वे रंगीन होते हैं। जो सबको मुग्‍ध करते हैं। आप कल्‍पना कर सकते हैं कि नीला रंग करेंसी नोटों की नीली छटा बिखेर रहा है, लाल रंग भी करेंसी नोटों की लालिमा निखार रहा है और हरा रंग तो हरियाली सदा बिखेरने में सदा से निपुण ही है। सबने मिलकर सब तरफ सिर्फ धन और धन की बरसात ही कर रखी है और इसमें नहाने को हर कोई बेताब है। जब धन लबालब दिखलाई दे रहा हो तो फिर कोई भी कहीं ओर क्‍यों जाएगा। सब एक बार होली बिना खेले तो काम चला लेंगे परंतु नोटों की झोली भरे बिना उनके मन और तन को चैन नहीं मिलेगा। गुझिया और कांजी के बिना भी एक बार होली मना लेंगे परंतु धन पाने के बिना वासना का ज्‍वार कैसे शांत होगा।
अब तो कंप्‍यूटर का जमाना है। आप कौन से रंग की होली खेलना चाहते हैं। बस एक बार जाहिर करेंआपका मोबाइल वही रंग उगलने लगेगा. आप घबरा रहे हैं कि सामने वाले के ऊपर रंग डाला तो उसका मोबाइल भीग जाएगालेकिन वही मोबाइल आपको ऊपर रंग उगलने लगता है। जिसका बटन दबाए बिना सिर्फ सोचने भर से ही सामने वाले के चेहरेकी रंगीन फेसबुक बन जाती है। आप उस मोबाइल से संदेश भेजते हैंतो उसमें से बतौर संदेश रंग भरे गुब्बारे निकलते हैं और पूछते हैंबोल मुझे भेजने वालेमेरे स्वामीमेरे बिल को भुगतने वालेजल्दी बतला मुझेकिसके फेस को रंगीन करना हैया रंगहीन करना है। मैं दोनों काम करने में भली-भांति सक्षम हूं। आजकल जिन्न दीये को रगड़ने से नहीं,मोबाइल के बटन को क्लिकाने सेनिकलता है. होली का यह हाईटेकीय स्वरूप मोबाइल और कंप्यूटर के मेल से ही संभव हो पाया है। होली पर रंग इतने नहीं होते हैंजितनी उनकी उमंगें हसीन होती हैं। भंग की तरंग उतना असर नहीं करती जितना असर कंप्‍यूटर की वायरस की जंग करती है। उमंगों में बसी तरंगें उन्हें सदा युवा रखती हैं। उमंगों पर बुढ़ापे का असर नहीं होता है। जिस तरह काले रंग पर कोई दूसरा रंग असर नहीं करता हैबिलकुल उसी प्रकार उमंगों में सदा जवानी उफनती रहती है। होली हो या न हो,उमंग शरीर के प्रत्येक अंग से फूट पड़ती है किसी गीले रंग भरे गुब्बारे की तरह और आपको मस्ती से सराबोर कर देती है। इन उमंगों को लूटने के लिए सभी तैयार रहते हैं। आप भी तैयार हैं न सभी के अपने अपने रंग हैं. अलग-अलग स्टाइल हैं. आप कितनी ही होली खेल खिला लेंअगर आपने साली को रंग नहीं लगाया तो काहे की होली। वैसे महंगाई और भ्रष्टाचार मिलकर खूब भर रहे हैं झोली। होली खेल खिला रहे हैं। महंगाई इतरा रही है। सबने जबकि उसका चौखटा काला कर डाला है पर उससे बच न सका कोई साली या साला है। महंगाई अब पूरे वर्ष होली खेलती हैकभी प्याज सेकभी आलू सेकभी टमाटर सेआजकल नींबू से खेल रही है।
महंगाई जिससे भी होली खेले पर निचोड़ी जनता जाती है। वो होली खेलने में मगन रहती है। पर अपने ऊपर रंगों की फुहार से वो इतना ओत-प्रोत हो जाती है कि चारों तरफ से लिप-पुत जाती है। कहीं से कुछ नजर नहीं आता है। अंधाता नहीं है पर खुली आंखें भी मुंदी रहती हैं। चैन पल भर नहीं लेने देती है महंगाईन होली पर दिवाली पर दिवाली की होली और होली की दिवाली ऐसे ही मनती है और जनता मतवाली रहती है और उसका दिवाला निकल जाता है। वह ईद के इंतजार में लगन लगा लेती है। सभी को ऐसे उत्सव ही भाते हैं। सभी रंगाते हैं और साथ में होली के फिल्मी गीत गुनगुनाते हैं। कहींभांग सॉन्ग बनकर ओठों से फूटती है। होली अभी दरवाजे पर है। माहौल बन रहा है, मैं भी सोच ही रहा हूं कैसे इस बार हाईटेक होली का बेनिफिट उठाऊं। फेसबुकिया फ्रेंड्स को रंगों से कैसे नहलाऊं। कोई आइडिया हो तो बतानामैसेज टाइप कर सेंड का बटन दबाना और अन्‍ना हमारे हैं परेशान, इस बार उनकी होली और तबीयत दोनों ढीली ढीली हैं। भ्रष्‍टाचार का रंग लाल गुलाल है, देखकर सारा देश अब हैरान है लेकिन यह सब हाईटेकीय होली का कमाल धमाल है। बच्‍चा देश के गुब्‍बारे फोड़ कर बन रहा नौनिहाल है। फेसबुक को लेकर मच रहा बवाल है।  

दारू के दांत की गुणवत्‍ता : कोई डर नहीं अलबत्‍ता - व्‍यंग्‍योदय के मार्च 2012 अंक में प्रकाशित






दूध के दांत बड़े फेमस हैंइधर जन्‍म लिया और उधर मां के दूध का असर शुरू हो जाता है। जबकि दांत दिखाने, खानेडरानेकाटने और इन सबसे बढ़कर चबाने जैसी क्रियाओं को भी बखूबी अंजाम देते हैं और अपना दांत धर्म बखूबी निबाहते हैं। इधर भाई लोगों ने दांत की एक नई वैरायटी खोज निकाली है और वह है दारू के दांत। यह भी माना-स्‍वीकारा जाता है कि दूध के दांत ही कालांतर में दारू के दांत बनते हैं तो कुछ का कहना है कि कुछ दांत सिर्फ बीयर के होकर ही रह जाते हैं। वैसे जो दांत शरीफ रहते हैं ताजिंदगी वह दूध के ही कहलाते हैं। बहुत हुआ और किसी बाबा के कथन से रूबरू नहीं हुए तो कोल्‍ड ड्रिंक और हॉट ड्रिंक के दांत भी बहुतायत में पाए जाए हैं। इन सबके बीच सबसे अधिक विख्‍यात चाय के दांत रहते हैं। उनकी प्रसिद्धि को कोई छू तक नहीं पाया हैमुकाबले की कौन कहे ?
आज माहौल में हाथी के दांत खूब लोकप्रियता पा रहे हैं। छिपाने वाले उन्‍हें लाखों के परदों के पीछे छिपा रहे हैं। हाथी के खाने के दांत देखने की जिसने भी कोशिश की है, उसे अपने सिर से जीवन का शैम्‍पू कराना पड़ा है। जिसने भीचाहे वह महावत ही क्‍यों न होजिंदा हाथी के खाने के दांत देखने की जुर्रत की हैवह अपने सिर को साबुत मुंह से बाहर नहीं निकाल पाया है कि उनकी महिमा का बखान कर पाता। इसी का नतीजा है कि आज तक यह नहीं मालूम चला है कि हाथी के खाने के दांत होते भी हैं या सिर्फ दिखाने के दांत दिखलाकर ही वह अपनी उम्र गुजार देता है। हाथी के दिखाने के दांत बहुत अनमोल हैं। उनका कोई मुकाबला नहीं सका है। उसकी भिन्‍न वैरायटियां, बहुत कुछ बनाने के काम में लाई जाती हैं। कहने को तो दांत होते हैं और बना ली कंघियां जाती हैं, यह सच्‍चाई और इससे इतर हाथी के दिखाने और खाने के दांतों के बारे में कितनी ही अफवाहें जमाने भर के किस्‍से-कहानियों में भरी पड़ी हैं लेकिन उनका जिक्र करके आपको बोर करने का मेरा रत्‍ती भर भी इरादा नहीं है।
दारू पीने वालों के दांत के बारे में मिली जानकारी को आपके साथ साझा करने के लालच से नहीं बच पा रहा हूं। आप भी इसी को जानने में इंट्रेस्टिड नजर आ रहे हैं क्‍योंकि जो ताउम्र दारू पीते हैंउन्‍हें कभी अपने दांतों की दैनिक सफाई, पेस्‍ट कर्मदातुन कर्म, ब्रश धर्म, ऊंगली सरसों-नमक में भिगो-भिगो कर मलने के कार्य से निजात मिली रहती है। रोज दारू में नहाते-भीगते रहने वाले दांत, सदैव डायमंड की तरह चमचमाते रहते हैं और गंदगी का कोई कीटाणु वहां पल नहीं सकता। आप तो जानते ही हैं कि दारू खुद ही ऐसे जानलेवा कीटाणुओं से बनती है कि उसके भीतर डूबने-उतराने वाला पूरी उम्र के लिए सब प्रकार के कीटाणुओं के प्रभाव से मुक्‍त हो जाता है।
जहां तक चीटियों के दांतों का संबंध है,कोशिश करने पर भी दांत की हड्डीनुमा किसी सफेद दांताकृति को ढूंढने में सफलता नहीं मिली है। जबकि चींटी जब काटती है तो वह अपने जिन डैनों का प्रयोग काटने में करती हैइससे पहले तो वह लचीली मूंछों का सा आभास देते रहते हैं और चींटी के द्वारा काटे जाने वाला सोच भी नहीं पाता कि उसे चींटी काट रही होगी। तब भी जब वह उसे अपनी खाल से खींचकर अलग करता हैतब भी उसे विश्‍वास नहीं होता कि जरा सी चींटी बिना दांतों के ही काटने पर इतनी दर्दकारिणी हो सकती है।
वैसे नेताओं के दांत न दिखाने के होते हैं और न काटने के बल्कि नेता उन्‍हें निपोरे घूमते रहते हैं। कुछ कवियों को तो खिली-बत्‍तीसी के नाम पर बत्‍तीस सौ कविताएं छपवाते रहने का ऐसा लालच मन में पैठ गया है कि उससे इस जन्‍म में तो मुक्ति मिलती नहीं दिख रही है। फिर भी नेता के दांतों से काटे का इलाज न तो किसी झाड़ फूंक करनेन सर्पदंश से मुक्ति दिलानेअथवा अन्‍य किसी नीम हकीमडॉक्‍टर या वैद्य या किसी कवि के  के पास बरामद हुआ है। फिर भी नेता का काटा न कभी चाय मांगता है और न पानी क्‍योंकि उसे पहले खूब दारू पिलाई जाती हैफिर देशी अथवा विदेशी दारू में स्‍नान कराया जाता हैऔर जब वह पूरे होशो हवास खोकर नशे में फंस जाता हैतब उसे नेता बिना मौका गंवाए इतनी तेजी से काट लेता है कि अन्‍य किसी वोटर को इसकी भनक तक नहीं पड़ती।
एक किस्‍सा बहुत मशहूर हुआ है कि बिना दांतों वाले कुत्‍ते ने एक आदमी के काट लिया तो डॉक्‍टर ने प्रस्‍ताव पेश किया कि टीका तो तुम्‍हें लगवाना ही होगाचाहे बिना सुई का लगवाओ। इस पर भी तुर्रा यह कि डॉक्‍टर ने फीस में तनिक भी रियायत बरतना मंजूर नहीं किया। इसे तब से बिना दांतों के काटना कहा जाता है।
दांत की तुक आंत से मिलती है और किससे मिल रही हैतलाश रहा हूं। लेकिन दांत पीसने और दांतों में चबा चबाकर महीन पीसने के कार्य अलग-अलग पहचान रखते हैं, वह दांतधारक भी इससे भ्रमित पाए गए हैं। फिर भी दांत की जगह शरीर के शिखर पर स्‍थापित मुंह में मिक्‍सर ग्रांइडर की स्‍थापना नहीं की जा सकी है। हां, वैज्ञानिक इस प्रयत्‍न में जुटे हुए हैं कि दांत की जगह सैल फोन स्‍थापित कर दिया जाए तो एक वर्ल्‍ड रिकार्ड तो कायम हो ही जाएगा। मिक्‍सर-ग्राइंडर का स्‍थापना कार्य मुंह में संपन्‍न हो गया होता तो निश्चित ही आंतों को कठिनाई नहीं होती और जब आंतों को कोई कठिनाई न हो तो पाचन क्रिया भी दुरुस्‍त बनी रहती है। इससे निश्चित ही अग्‍नाश्‍य, पित्‍ताशय, किडनी, लीवर और पेंक्रियाज के कार्यों को जो राहत मिलती, उसका कोई सानी न होता। वैसे शरीर का हाजमा दुरुस्‍त रहे तो जमा पानी भी फिजूल खर्च नहीं होता है। धन जिसके पास पानी की तरह लबालब बचा रहे उसे दांतों की चाह भी नहीं रहती है,सोचता है लिक्विड ही पी लूंगा और अब यह जानकर वह कल्‍पना के घोड़ों पर सवार हो गया होगा कि अब कुछ ही दिनों की ही तो बात है, मिक्‍सर ग्राइंडर में पीस कर पी लूंगा। सब पौष्टिक भी मिलेगा। स्‍वाद पाने के लिए उसमें इसके विकल्‍प के तौर पर कैप्‍सूल व टेबलेट मिलाने की खोज का कार्य अब अंतिम चरण में है।

चटोरेपन को चाटें या निचोड़ें ? : दैनिक जनसंदेश टाइम्‍स में 3 अप्रैल 2012 के अंक में उलटबांसी स्‍तंभ में प्रकाशित


चाट सिर्फ चाटी जानी चाहिए । चाट को खाना तो उसके साथ रेप करने जैसा है। जैसे खाने वाली चीज को चाटनाउसके साथ बलात्‍कार माना जाना चाहिए। जबकि आज बलात्‍कार को साबित करना ही सबसे अधिक कठिन कार्य है। इसमें हादसे के शिकार को ही सजा दिए जाने का प्रावधान है। इससे जीभ जोखिम में है, वह जीभ किसी भी मुंह की हो सकती है लेकिन पहचानी मुंह के साथ ही जाती है। मुंह वाला चेहरा दिखाई न दे तो कयास लगाना भी कठिन कि जीभ भीतर है भी या नहीं। अंजाम देने वाला तो सदा सुरक्षित ही रहा है। चाट का आनंद चटकारे लेने में ही है जबकि चाटना जीभ का गुण है और आनंद मन का। चटोरापन तो जीभ का ही माना गया। जबकि इसे गुनाह मानने वालों की कमी नहीं है। मीठी गोली सिर्फ चूसने पर ही आनंद देती हैकड़वी गोली को मीठे लेप के साथ निगला जाता है,उसे चूसना चाहा तो गोली देखकर शर्म आने लगती है। टाफी को दांतों में कुचलकर खाने में स्‍वाद आता है। कई टाफियां बहुत बेशर्म होती हैं और खाने वाले के दांतों में इस कुशलता से यत्र-तत्र-सर्वत्र हो जाती हैं कि दांत निर्वस्‍त्र नहीं रह पाते। वे जुगाड़ जमा कर ऊपर नीचे चिपक जाती हैं कि जीभधारक अपनी जीभ को घटनास्‍थल के दौरे पर व्‍यस्‍त पाता है।
अब चूसने और चाटने में जो बारीक भेद हैउसका ज्ञान सबको सरलता से नहीं होता। आम आदमी तो चूसने और चाटने को एक प्रक्रिया ही समझ कर गलतफहमी का शिकार हो जाता है और उसे निचोड़ भी दिया जाता है। आम को चूसा जाता है इसलिए नेताओं के लिए अवाम आम ही है जिसे चूसना उनका अधिकार है। चूसने और चाटने में भेद करना वैसे तो असीम ज्ञान की दरकार नहीं रखता है लेकिन अज्ञानी इसे एक ही समझ बैठने की खुशफहमी पाल बैठता है। निचोड़ना प्रत्‍येक के बस का नहीं है। पता लगा कि निचोड़ने गए और जब वापिस लौटे तो खुद ही चुसा हुआ आम या गन्‍ना बन इंतकाल फरमा गए।
चाटने वाले दिमाग चाटते हैंउसे चूसना संभव नहीं है और तो और माहिर से माहिर व्‍यंग्‍यकार भी दिमाग को चूस नहीं पाते हैं। वे दिमाग को चाटें नहीं तो उनके लिए व्‍यंग्‍य लिखना पॉसीबल नहीं है। न दिमाग और न चाट को लेमनचूस माना गया है। इनके चूसने का भेद पाने के लिए चाटने की अनिवार्यता मानी गई है। इसमें भावनाओं के साथ शब्‍दों को इस कारीगरी के साथ निचोड़ा जाता है कि जोड़ जोड़ लहक जाता है।
चाटने का एक गुण चटाई में भी पूरी शिद्दत से मौजूद रहता है। चटाई जब जमीन पर या मिट्टी मेंघास में या धूल में बिछाई जाती है तो काफी धूल धूसरित होकर अपने चटाई धर्म को साकार करती है। चटाई का यह कार्य जनहित में स्‍थान पाता है। खुद गंदे होकर भी उसका उपयोग करने वाले की गंदगी और धूल मिट्टी से बचाव करना चटाई का विशेष गुण है। लेकिन चटाई की बिछाई सलीके से की जानी चाहिए। अगर वह सलीके से न बिछी हो तो चित्‍त को चटकाने की ताकत रखती है। चटाई यूं तो चटकती नहीं है परंतु बेढंगी बिछी हो तो कितनों को ही चटका देती है।

मूर्ख दिवस पर सेव यॉर वॉयस मूवमेंट ने सिब्‍बल को दी शुभकामनाएं : दैनिक हरिभूमि में 2 अप्रैल 2012 को प्रकाशित समाचार

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मूर्ख दिवस पर सेव यॉर वॉयस मूवमेंट ने सिब्बल को दी शुभकामनाएं
हरिभूमि न्यूज. नई दिल्ली
रविवार को राजघाट पर सेव योर वाइस की टीम ने केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल की प्री-सेंसरशिप पर दिए गए उनके बयानों के लिए मूर्ख दिवस की शुभकामनाएं दी। राजघाट परिसर में बड़ी संख्या में पुलिस बल, आईबी, सीआईडी और सीबीआई के लोग मौजूद थे। सुबह जैसे ही सेव यॉर वॉयस मूवमेंट के सदस्य बापू की समाधि की ओर जाने लगे उन्हें आगे जाने से रोका दिया गया, लेकिन कुछ गिने चुने लोग चुपचाप राजघाट पर पहुंच पाए। पुलिस से पूर्व अनुमति होने के बावजूद सिब्बल दिवस का आयोजन नहीं होने दिया। कारण पूछने पर उच्चस्तरीय आदेशों का हवाला दिया गया और कहा गया कि उन्हें पीएमओ और आईटी मिनिस्ट्री से आदेश दिए गया है। बाद में टीम के सदस्य राजघाट के बाहर समता स्थल पर एकत्र हुए।

ब्लागर्स और नेट यूर्जस हुए शामिल

सिब्बल दिवस पर सेव योर वाइस के सपोर्ट में कई जाने माने ब्लागर्स, समाज सेवक और इंटरनेट एक्टिविस्ट शामिल हुए। कार्यक्रम में शामिल लोगों ने आनलाइन मीडिया को सेंसर करने की वकालत करने वाले सूचना प्रसारण मंत्री कपिल सिब्बल से आईटी एक्ट को हटाने की मांग किया। इसमें हिंदी ब्लागिंग में बेहद सक्रिय अविनाश वाचस्पति अण्णा भाई, राजीव तनेजा और विनीत कुमार भी शामिल हुए। 

अण्णा भाई ने भरोसा दिलाया कि इंटरनेट की लड़ाई में वे सेव योर वाइस टीम के साथ हैं और अपने ब्लॉग नुक्कड़ के जरिये लोगों में इंटरनेट यूर्जस को आईटी नियमों के लिए जागरूक करेंगे।

अरविंद गौर का नैतिक सर्मथन

हर गंभीर मुद्दे पर अपनी आवाज बुलंद करने वाले टीम अण्णा की कोर कमेटी के सदस्य अरविंद गौर भी कार्यक्रम में शामिल हुए। उनका कहना था कि अभिव्यक्ति की आजादी पर किसी भी तरह के हमले को एक कलाकार के तौर पर तो वे कतई स्वीकार नहीं करेंगे। सेव योर वाइस टीम के सदस्यों को उन्होंने शुभकामनाएं दीं और कहा कि वे हर उस लड़ाई का सर्मथन करते हैं जो किसी अच्छे उद्देश्य के लिए लड़ी जाती है।

बजट ने मारा : दैनिक जनसत्‍ता के रविवारीय 1 अप्रैल 2012 अंक में प्रकाशित


मूर्खता ब्‍लॉगस्‍पॉट डॉट कॉम : डेली न्‍यूज एक्टिविस्‍ट में 1 अप्रैल 2012 के अंक में प्रकाशित

बिना चश्‍मे के पढ़ने के लिए यहां क्लिक कीजिए। फिर मत कहिएगा कि बताया नहीं और जानबूझकर ही हम मूर्ख बनते रहे, वैसे फर्स्‍ट अप्रैल के दिन बुराई भी क्‍या है, मूर्ख बनना भी एक कला है, आज तक जो नहीं बने, जरा उनका दर्द तो महसूस कर देखिए।