आम ने बनायी खिचड़ी : जनसंदेश टाइम्‍स 11 दिसम्‍बर 2012 स्‍तंभ 'उलटबांसी' में प्रकाशित



खास के जमाने हवा हुए। अब आम चर्चा में है। सर्दियां हैं और आम चर्चा में, कैसा विरोधाभास है। जरूर जनाब कोरी गप्‍प हांक रहे हैं। जबकि यह सरासर गप्‍प नहीं है। धूल में लट्ठमारी भी नहीं की जा रही है क्‍योंकि आजकल किसी भी मौसम में कोई भी तरकारी बाजार में मिल जाती है, वैसे ही मौसम कोई भी हो मौसम और बे-मौसमी फल उपजते ही नहीं, पकते भी हैं। पूरी तरह पकने के बाद फल को या तो कोई खा लेता है अथवा पके हुए फल को देखकर अन्‍य वृक्षों पर लदे फल भी पकने लगते हैं। संगत का असर सिर्फ इंसान और हैवान की ही नहीं, अपितु प्रकृति की प्रत्‍येक कसक और तरंग की गत बना देता है। एक सड़ा आमफल, भरी पूरी आमों की टोकरी को सड़ा कर खास बना देता है। बिजनेसपुरुष उससे भी नोट बनाने नहीं चूकता और सड़ा आम काट-निकाल कर, बाकी के गूदे का आम पापड़ बनाकर जब बेचता है तो खाने वाले उसे जीभ चटका चटका और आंखें मटका मटका कर स्‍वाद लेते हैं।
आम पकाने की कोशिशें जारी हैं। सिर्फ गर्मियों में ही पकने वाला आम नहीं है आम आदमी। खासजन आजकल किसी भी मौसम में भी पकने और पकाने में शातिर हो चुके हैं। कई बार तो अधपके फलों में से भी आवाज आने लगती है कि पक गए, पक गए,पक गए। आम पके या न पके, कोई फल पका या कच्‍चा रह गया किंतु आम आदमी की चर्चा सुनकर खास आदमी के कान जरूर पक चुके हैं। उनके कानों को आम आदमी के पकने के प्रभाव से मुक्ति दिलाने वाला चाहिए। खास आदमी आज आम आदमी से बेइंतहा नाखुश है और अपनी नाराजगी का खुलकर इजहार कर रहा है। कान पके तो दर्द दिमाग में होता है इसलिए कानों को पकने से बचाना चाहिए। आपके कानों को पकाने वाले,आपके तो कान पका रहे हैं किंतु वे जिस खिचड़ी को पकाने में मशगूल हैं, उसका आपको झूठे भी इल्‍म नहीं है।  खिचड़ी बनाने में कम आग लगती हैं। कम समय लगता है फिर भी कितनी ही खिचडि़यों को पकने में पूरे जमाने लग जाते हैं। बीरबल की बनाई जाने वाली खिचड़ी का आज तक स्‍वादुजन इंतजार कर रहे हैं। खाने वाले इंतजार करते हुए गुजर जाते हैं परंतु खिचड़ी नहीं पकती, पकाने वाला पक जाता है। अब अगर खिचड़ी बुखार से पीडि़त को खिलानी है या पेट दर्द से दुखी को, फिर तो खिचड़ी का पका होना जरूरी हो जाता है। कई बार खिचड़ी तो पक जाती है किंतु वे कंकर नहीं पकते जो कभी पकने के लिए नहीं पैदा होते हैं। जबकि पकने वाली खिचड़ी को कोई नहीं पूजता है जबकि वह रोगों में राहत पहुंचाती है और पूजनीय होनी चाहिए। लेकिन आज तक खिचड़ी को पूजने की कोई मिसाल न तो ढूंढने पर मिलती है और न पूजने पर।
पत्‍थर को पूजो तो हरि मिल जाते हैं, इंसान को पूजो तो खास जन मिल जाते हैं। फिर आम आदमी कैसे मिलेगा। आम आदमी को खोलने की यह प्रक्रिया, कहो कैसी रही ?

व्‍यंग्‍य का शून्‍यकाल : कादम्बिनी मासिक दिसम्‍बर 2012 अंक में किताबें मिलीं में उल्‍लेख


अब पैदल चलने के लाईसेंस बनेंगे .. : मिलाप दैनिक स्‍तंभ 'बैठे ठाले' 10 दिसम्‍बर 2012 में प्रकाशित



आप पैदल चलना जानते हैं और आपके पास लाइसेंस नहीं है तो सावधान हो जाइए। दिल्‍ली में पैदल चलने वालों के लिए लाइसेंस अनिवार्य होने वाला है। बहरहाल, शुरूआत में एक वर्ष की अवधि के लिए इस लाइसेंस की कीमत सिर्फ एक सौ रुपये सालाना रखी जाएगी। यह लाइसेंस सबको एक ही कीमत पर मिलेगा, मतलब बूढ़े, बच्‍चे, जवान हों या बीमार सबको एक ही तराजू पर तोला जाएगा। तोलने का यह कार्य नगर निगम करेगी। इसके आरंभिक दौर में अभी घोड़े, घोडि़यों, बग्घियों पर एकमुश्‍त चार हजार रुपये वसूले जाने की योजना तैयार है और बस लागू होने ही वाली है। इस योजना का अगला चरण पैदल चलने वालों की जेब पर रखा जाएगा। इसके बाद साईकिल चालकों के लिए भी लाइसेंस लेना अनिवार्य किया जा रहा है। इसके लिए मात्र पांच सौ रुपये का खर्च आएगा और लर्निंग लाइसेंस के लिए सिर्फ एक महीने के लिए एकमुश्‍त दस रुपये ही चुकाने होंगे और सिर पर लालरंग से चिन्हित ‘एल’ लगाने के लिए एक विशेष टोपी पहननी होगी। नगर निगम की एक चहेती कंपनी ऐसी पांच टोपियां 250 रुपये में मुहैया करवाने के लिए तैयार हो गई है।
अभी तक सिर्फ रिक्‍शे पर लाइसेंस जरूरी था, लेकिन नए निर्णय में रिक्‍शा चालकों को भी लाइसेंस लेना होगा और यह व्‍यवसायिक श्रेणी में जारी किए जाएंगे जिनका सालाना शुल्‍क एक हजार रुपये होगा। निगम सोच रही है कि इससे रिक्‍शों की संख्‍या में कमी आएगी और भीड़ भरी सड़कों पर यातायात का संचालन सुचारू रूप से हो सकेगा। पांच बरस तक के बच्‍चों को पैदल चलने के लाइसेंस से छूट रहेगी बशर्ते कि वे दस वर्ष या उससे अधिक की आयु के किसी अभिभावक के साथ पैदल चल रहे हों। जो बच्‍चे अकेले घूमते पाए जाएंगे उन्‍हें निगम जब्‍त कर लेगी और छोड़ने के लिए एक सौ रुपये का जुर्माना वसूलेगी। दो घंटे से अधिक देरी से अपने बच्‍चों को लेने आने वाले अभिभावकों से 500 रुपये उनकी खुराक के नाम पर वसूल किए जाएंगे। चाहे बच्‍चे को निगम की ओर से एक अदद टॉफी भी न दी गई हो।
निगम के इस अभूतपूर्व कदम की वित्‍त मंत्री ने प्रशंसा की है और गृह मंत्री ने विश्‍वास जताया है कि इससे बच्‍चों के खोने की घटनाओं में कमी आएगी क्‍योंकि जब बच्‍चे को अकेला छोड़ा ही नहीं जाएगा तो उनके खोने का तो सवाल ही बेमानी है। इससे पुलिस पर भी बोझ कम होगा किंतु उन्‍होंने जुर्माना वसूलने के लिए लगाए जाने वाले पुलिसकर्मियों के कार्य के बारे में कोई टिप्‍पणी नहीं की है। इससे ऐसा लगता है कि उन्‍हें अपने पुलिसकर्मियों पर भरोसा है कि वे अपने चाय-पानी का खर्च इससे खुद ही निकालने में कामयाब हो जाएंगे।
इसके अनूठी योजना के सफल होने के बाद आवारा जानवरों के पैदल चलने पर इस प्रक्रिया को व्‍यवहार में लाया जाएगा। जिससे सड़कों पर आवारा पशुओं के घूमने पर लगाम लग सके और कुत्‍तों के इंसानों को काटने की घटनाएं में कमी आए। अभी यह स्‍पष्‍ट नहीं किया गया है कि आवारा पशुओं को पकड़ने पर जुर्माना कौन देगा, हो सकता है कि इसे पुलिस और निगम के विवेक पर छोड़ दिया जाए और वे आजाद हों कि इसके लिए वे राह चलते किसी को भी पकड़ उस पर आरोप मढ़कर वसूली कर सकते हैं। अभी पक्षियों के उड़ने और चलने के संबंध में और कौवों इत्‍यादि के शोर मचाने पर भी राजस्‍व वसूलने की कई योजनाएं विचाराधीन हैं। देश को खुशहाली की राह पर ले जाने वाले इन कदमों में भरपूर दम है, इसलिए इसके विरोध किए जाने का कोई समाचार अभी तक नहीं मिला है। 
चार साल पहले दिल्‍ली की सीएम ने पैदल चलने वालों पर चलते समय सतर्क रहने के लिए उपदेश झाड़ा था। कयास लगाया जा रहा है कि यह उसी आदेश की अगली कड़ी है। आपके पास भी इसे अमली जामा पहनाने और देश को विकास की ओर ले जाने के कई सूत्र होंगे तो देर किस बात की, आप भी ऐसे मशविरों को सरकारहित में साझा कीजिए और देशभक्त सिद्ध होने का मौका मत गंवाइए ? 

जनसत्‍ता 9 दिसम्‍बर 12 के रविवारी परिशिष्‍ट में प्रकाशित अविनाश वाचस्‍पति के बाल गीत

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दैनिक हरिभूमि 9 दिसम्‍बर 2012 अंक में प्रकाशित पुस्‍तक समीक्षाएं

क्‍या होंगे वहां खुदाबख्‍श 
कार्यालय तेरी अकथ कहानी
कार्यालय तेरी अकथ कहानी : व्‍यंग्‍यकार वीरेन्‍द्र सरल
क्‍या होंगे वहां खुदाबख्‍श : कहानीकार श्‍याम विमल

भूल कर भी कोई भूल हो न ! : जनसत्‍ता वार्षिकांक दीपावली 2012 में प्रकाशित

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आपका पैसा आपका हाथ, किंतु वोट हमारा है : जनसंदेश टाइम्‍स 4 दिसम्‍बर 2012 स्‍तंभ 'उलटबांसी' में प्रकाशित



‘आपका पैसा आपके हाथ’ सत्‍ता पक्ष ने लुभावना जाल फेंका है। जाल लुभाए न तो पब्लिक झांसे में नहीं आती और सदा से फंसता शिकार ‘आम आदमी’ इस बार फिर से हाथ के फेर में उलझने को अभिशप्‍त हो गया है। इस बार शातिर शिकारी ने ऐसा पांसा फेंका है जिसके असर से दूर की कौड़ी भी समीप की हो गई है। अपने पैसे को वह शिकार का बतला रहा है, शिकार भी  उसे अपना मान बैठा है। वह सोचता है कि मानने में क्‍या हर्ज है, जब खर्च नहीं हो रहा है, उल्‍टे खर्चा पानी ऑन एकाउंट मिल रहा है। जिससे सुखद की सुखदाहट गुदगुदी में बदल गई है। गुदगुदी सर्वर होती है, गुदगुदाने से दोनों को असीम सुख की प्राप्ति होती है। सुख न हो, उसकी गुदगुदी ही हो, यथार्थ न हो, स्‍वप्‍न ही हो – आखिर उससे हौसला मिलता है। कितने तो सिर्फ हौसलों के बल पर किले फतह कर लेते हैं।
अब कुछ और मिल रहा होता तो एकबारगी विचार भी किया जाता पर जब साक्षात धन मिल रहा है या मिलने की संभावना नजर आए तो भ्रमित होना बनता है। भ्रम का जाल ‘फेसबुक’ के नशे से कम नहीं होता। इसलिए आम आदमी इसमें पूरा उलझता है। नशा ‘राम’ नाम का भी टल्‍ली कर देता है फिर धन का नशा तो शान में रोजाना बढ़ोतरी करता है। नशा या शान किसी में भी हो इजाफा, दोनों चीजें भरपूर मजा देती हैं। मजा ‘जाम’ बनकर टकराता है। इसलिए पैसा सदा सबको सुहाता है। पहले शराब की बोतलें छिपकर बांटी जाती रही हैं। पैसा भी छिपाकर ही बांटा गया है किंतु इस बार तो क्रांति हो गई है। करेंसी नोट ढोल बजाकर, पीटकर बांटे जाएंगे, मानो भ्रष्‍टाचार को कानूनी मान्‍यता मिल गई है और वे सीधे ‘आम आदमी’ के बैंक खातों को रोशन करेंगे। बस कहा उसे सब्सिडी जाएगा और सबको सिड़ी बनाया जाएगा। दलाली का खेल खत्‍म, जिससे दलाल चिंता के मारे लाल हुए जा रहे हैं कि ऐसा क्‍या किया जाए ताकि दलाली बंद न हो, दलाली का जाना दीवाली का लुप्‍त होना है। तभी एकाएक उनके चेहरे खिल उठते हैं। दलाली चालू हो गई है।
वोट हथियाना है तब भी किसी को नाराज करना नहीं बनता। वरना गणित को कैसे उखाड़ा जाए, यह चिंता करने से बेहतर है कि न बिगड़ने दिया जाए, न गड़ने दिया जाए। शर्मो हया का कहीं नामोनिशां नहीं है। वैसे भी कर्म फोड़ने से, अच्‍छा बेशर्म होना इंडिया है। नोट बांटने से वोट बढि़या संख्‍या में मिलेंगे, सौदा सुच्‍चा और खरा है क्‍योंकि उसी की ताकत से भविष्‍य में नोट जुगाड़े जाएंगे। सुन रहे हैं कि खातों को पैसे खिलाने का खेल जारी रहेगा, अच्‍छा इंवेस्‍टमेंट है। खाते तरावट की खबर सुन प्रसन्‍न हैं। लोकतंत्र के सभी खंबे नोटों की चिनाई करके मजबूत कर दिए गए हैं। इस बार यह दांव सफल हो जाए तो अगली बार सोशल मीडिया (न्‍यू मी‍डिया) का तोड़ भी निकाला जाएगा। एक भी खंबा कमजोर नहीं रहने दिया जाएगा। इस बार गरीबों को और अगली बार तथाकथित गरीबों को, सरकार की यह चाल, कहो कैसी रही ?

कहो, कैसी रही ? : जनवाणी स्‍तंभ 'तीखी नज़र' में 4 दिसम्‍बर 2012 को प्रकाशित


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चारों की चौकड़ी आज स्‍पेशल सुविधाओं के तहत स्‍वर्ग में धूम मचा रही है। जबकि उन्‍होंने जिन कारनामों को अंजाम दिया था, उसके अनुसार उनकी नर्क में सजा पाने की ग्राह्यता बनती थी। ठाकरे भगवान के सैनिकों का गठन करके उनकी दबंगई के बल पर वहां मौजूद थे। कसाब को यमराज के कार्यों में हस्‍तक्षेप के चलते तुरंत बुलाया गया था, मच्‍छर ने यमराज के काम को आसान किया था जिससे यम मंत्रालय का टीए/डीए और यमराज को अलॉट किए जाने वाले विशेष भत्‍तों में इकानॉमी लाने के कारण और दारू किंग पोंटी चड्ढा को अपरोक्ष तौर पर यम मंत्रालय के कामकाज में सहयोगी पाया गया था।
स्‍वर्ग में काफी लंबे अरसे से रह रहे शहीद, महान पुरुष, बलिदानी, परोपकारी, दानवीर, शुभ कर्मों के प्रणेता और इंसानियत के पैरोकारों की इनके स्‍वर्ग में बंगलों के अलॉटमेंट पर कानाफूसी जारी थी। जिस स्‍वर्ग का माहौल सदैव आनंददायक रहा है और कश्‍मीर से जिसकी तुलना की जाती है,आज वहां भी मौसम काफी गर्म बना हुआ है।  यमसत्‍ता के शीर्ष में बैठे विशिष्‍टगण ही जानते थे कि अगर इन चारों में से किसी को भी विशेष सुविधाएं न दी गईं तो स्‍वर्ग और नरक की सत्‍ता की वे ईंट से ईंट बजा देंगे। इस शुभ कार्य के लिए उन्‍हें ईंटें भी पृथ्‍वी अथवा नर्क से मंगवा कर देनी होंगी।
चारों चर्चा कर रहे हैं कि स्‍वर्ग में आगे की रणनीति क्‍या हो। इन्‍हें पैंतीस-पैंतीस लाख के टॉयलेट्स, अत्‍याधुनिक गैजेट्स इत्‍यादि सभी प्रकार की विलासिता श्रेणी की उच्‍चस्‍तरीय सुविधाएं दी गई हैं। बजट कहां से आ रहा है, इस बारे में धरती की तरह स्‍वर्ग में चिंता नहीं की जाती है। स्‍वर्ग में गरीबों के झांकने पर भी प्रतिबंध है। स्‍मार्ट फोन, टेबलेट्स तो उपलब्‍ध कराए ही गए हैं।
ठाकरे दहाड़ते हुए कसाब को बतला रहे हैं कि मैं पृथ्‍वी पर रहा, तब तक तुम्‍हें फांसी नहीं लगने दी। यह मेरा ही प्रताप है क्‍योंकि मैं ही भगवान के सैनिकों का बिग बास हूं। वैसे महाराष्‍ट्र में तो मैं सबका ही बिग बास हूं।
मेरे आने के तुरंत बाद सरकार मनमानी पर उतर आई है और उन्‍होंने तुम्‍हारा गला भी काट दिया है। इस घटना को यूं तो इस डेंगू मच्‍छर ने अंजाम दिया है। मेरे परिवारजन और सरकारी अमले ने मेरी देह से प्रेम के चलते मेरे दिवंगत होने की प्रामाणिक घोषणा भी तीन दिन बाद ही जारी की। यह सब उस राज की बदमाशी है, वरना तो मेरा बेटा उद्धव तो बहुत मासूम है और उसी दिन से गुमसुम है। राज ने सबको सैट कर लिया। उधर मैंने पृथ्‍वी छोड़ी,  मेरे पीछे यूपी हरियाणा के दारू किंग पोंटी चड्ढा को उसके भाई के साथ मेरे पीछे रवाना कर दिया। उसका भाई तो स्‍वर्ग पहुंचने से पहले ही हिंदी फिल्‍मों की तरह कहीं बिछड़ गया।
मीडिया में मुझे ही सुर्खी मिलनी थी लेकिन पोंटी चड्ढा और उसके भाई की मौत के कारण मेरे स्‍पेस पर कब्‍जा कर लिया गया। अब मेरे से जुड़े किसी मामले को तूल न मिले इसके लिए सरकार ने तेरी गर्दन को कस के मसक दिया। सरकार जानती थी कि कसाब की अंतिम और पहली इच्‍छा भारत में सदा आतंक फैलाने की रही है। दूसरी और अंतिम इच्‍छा  'जब तक रहा मेहमान' फिल्‍म में लीड रोल करने की थी।  
मच्‍छर ने बतलाया कि मैं उनके सामने था किंतु किसी ने मुझे मारने की कोशिश नहीं की। वे चाहते थे कि मैं कसाब को काटूं, तभी मुझे प्राणदान मिलेगा, इसलिए मुझे मजबूरन कसाब को काटना पड़ा। अब ऐसी सरकार पर मैं क्‍या भरोसा करूं। 
अभी यह चर्चा चल ही रही थी कि तभी घोषणा की गई कि स्‍वर्ग में इन चारों की गतिविधियों के जीवंत प्रसारण के लिए ‘बिग बॉस’ ने ठेका ले लिया है और जल्‍दी ही चारों तरफ से स्‍वर्ग को घेर लिया गया है और आधुनिक गैजेट्स की फिटिंग करवाई जा रही है ताकि पृथ्‍वी के टीवी चैनलों में इसका सीधा प्रसारण करके टीआरपी बटोरी जा सके। नरक की ग्राह्यता धारक इन महानुभावों के स्‍वर्ग में कब्‍जे और वहां पर इनके कारनामों का सीधा प्रसारण, कहो कैसी रही ?

खादी वाला सफेदपोश गुंडा : देशबंधु 1 दिसम्‍बर 2012 के संपादकीय पेज पर प्रकाशित

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देशबंधु पर घूम रहा था
मैंने देखा और अपने
प्रिय पाठकों लिए
पकड़ लाया हूं।


जयशंकर प्रसाद की कहानी ‘गुंडा’ और उसका मुख्‍य किरदार ‘नन्‍हकू’ खूब फेमस हुआ। गुंडागिरी, लंपटता, चोरी, डकैती में कमाई की भरपूर संभावनाएं रही हैं जबकि इनके विकल्‍प के तौर पर आजकल राजनीति जरायमपेशाओं के लिए काफी मुफीद हो गई है। चोरी करना वह काम है जो छिपकर और बचते बचाते और मुंह छिपाते किया जाता है किंतु जब इसे निर्लज्‍ज, बेशर्म या दबंग होकर ढीठता से अंजाम तक पहुंचाया जाए तो वही डकैती हो जाती है। चोरी और डकैती के भिन्‍न अर्थों का यह सामान्‍यीकरण है।  
समाज में गुंडई और दबंगई के नए-नए प्रयोग किए जा रहे हैं, इससे गुंडों की रुचि-संपन्‍नता का पता चलता है। नेता वही जो गुंडई करें और इन्‍हीं के कारनामों से गुंडई के निहितार्थों को पब्लिक बेहतर तरीके से जानने और समझने लग गई है। इसमें रोजाना हो रहे बदलावों से आम पब्लिक रूबरू हो रही है।
फिल्‍मों में सभी प्रकार के गुंडों का वर्चस्‍व रहा है और वे पब्लिक को भाते हैं। फिल्‍मों का सबसे मनपसंद गुंडा शोले के गब्‍बर सिंह को माना जा सकता है जिसने गुंडा-सह-डाकू के कॉम्‍बो किरदार में जीवन के अनूठे रंग भरकर विलेनत्‍व को भरपूर ऊंचाइयां दीं। कितने डाकू और विलेन आए परंतु कोई गब्‍बर की महानता को छू भी नहीं पाए। गब्‍बर‍ सिंह की ऐसी शख्सियत से प्रभावित होकर नेता भी गुंडई पर उतर आएं है तो इसमें हैरान होने की बात नहीं है, यह समय की पुकार है। नेता यूं तो सभी कारनामों पर अपना अवैध कब्‍जा कर चुके हैं परन्‍तु जिम्‍मेदारी लेने से सदा पीछे रहे हैं। कुछ कहें और शोर मच जाए तो डर कर तुरंत मुकर जाते हैं। गुंडईकर्म की पहचान आजकल नेताधर्म से होने लगी है। नेताओं के इस क्षेत्र में धाक जमाने से गुंडई में निर्भीकता का बोलबाला बढ़ गया है।
गुंडाकर्म जिसे मवालीगिरी कहा जाता है, को भरपूर प्रतिष्‍ठा मिली है। यह गर्व का सूचकांक बन गया है। इसके विरोध में चाहे मीडिया कितना ही चीखे चिल्‍लाए, पब्लिक सोशल साइटों पर कमेंट करे, लाइक करे या जमकर हल्‍ला–गुल्‍ला करे। फिल्‍मों में चोर खुद शोर मचाते रहे हैं। शशिकपूर अभिनीत फिल्‍म ‘चोर मचाए शोर’ का नाम बेसाख्‍ता आपके जहन में कौंध गया होगा। वही शोर मचाने का जिम्‍मा आजकल ‘आम आदमी’ ने संभाल लिया है।  इसी के परिणामस्‍वरूप शोर मचाने को वैधानिक मान्‍यता दिलाने के लिए ‘आम आदमी’ नामक एक दल रूपी दलदल की स्‍थापना हो चुकी है। जल्‍दी ही आप ‘शोरगुल’नामक पार्टी को चुपचाप राजनीति में घुसता देखेंगे।  
‘आम आदमी’ जब चर्चा में है तो ‘आम औरत’ क्‍यों न चर्चित होना चाहेगी। उनके मन में भी  ‘आम आदमी’ के कंधा से कंधा मिलाकर कंधा मिलाने का सुख लूटने की हसरत पलती होगी।  बस मेरी आपसे इतनी गुजारिश है कि आप लूटने को लेटना मत समझ लीजिएगा। चर्चा  गुंडई के विभिन्‍न रूपों की हो रही थीं कि लूटना से लेटना तक भटक गई जबकि विमर्श गुंडई पर केन्द्रित हो गया। दरअसल, इसके लिए दोषी व्‍यंग्‍य लेखक नहीं है। यह सब चीजें आपस में इतनी रली मिली हैं कि इनमें मिलावट होने का भ्रम होने लगता है। एक की चर्चा हो रही हो तो दूसरी भी उसमें कूद पड़ती है और मानव मन इनकी कूदन--कला से मुग्‍ध हुए बिना नहीं रहता। जो सहज अपनी गति से चल रहा है,वह परदे के पीछे छिप जाता है।
‘वर्दीवाला गुंडा’ फिल्‍म हिट हुई और इसका उपन्‍यास खूब बिका। यह गुंडों की शराफत है वरना वे बे-वर्दी वाला गुंडई कर्म निबाहने में पीछे नहीं रहते हैं, बलात्‍कार इसी को तो कहते हैं। गुंडे का क्‍या है विवस्‍त्र होकर भी कूद सकता है। वर्दी खाकी भी हो सकती है और खाली भी, सेना की भी और खादी की भी। सुर्खियों में आने के लिए एक चिकित्‍सा मंत्री ने अपना ही इलाज कर डाला, इसे कहते हैं ‘अपना इलाज बवाले जान’। मंत्री ने खुद को ‘खादीवाला सफेदपोश गुंडा’ कहकर हल्‍की सर्दी के माहौल में गजब की गरमाहट ला दी है। इससे उनकी मल्‍टीटास्किंग प्रतिभा का परिचय बखूबी मिल जाता है। खादी को प्रतिष्‍ठा और सम्‍मान दिलाने के लिए महात्मा गांधी जी चरखा काता। उसी को कुख्‍याति और अपमान का सूचक सिद्ध करने में मंत्री ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। खादी की साख को राख करने के लिए नेताओं ने सफेद खाकी में खूब कारनामे किए हैं परंतु अ‍ब खुले आम स्‍वीकार करके अपनी नेकनीयत को जाहिर  कर दिया है। देश का खूब तेजी से विकास हो रहा है इसलिए उन्‍होंने खुद को खादीवाला गुंडा कहकर परोक्ष तौर पर गांधीगिरी को दोबारा से जीवंत कर दिया है और खादी की इज्‍जत को सरेआम मिट्टी में सान करके लूट लिया है। गुंडों का खादी पहनना मुझे तो अचंभित नहीं कर रहा, कहिए कैसी रही ?

शून्‍यकाल से सवाल ! : दैनिक अमर उजाला 1 दिसम्‍बर 2012 के अंक में 'शब्दिता' में 'परख' के अंतर्गत प्रकाशित

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मन से मुकाबला कर रही है इंटरनेट की गति : दैनिक प्रभात 20 नवम्‍बर 2012 अंक में प्रकाशित आलेख

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दैनिक प्रभात के रविवार 28 अक्‍टूबर 2012 में 'बुक वॉच' स्‍तंभ में 'व्‍यंग्‍य का शून्‍यकाल' की समीक्षा

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संसद और शून्‍य की गोलाई पर सार्थक चिंतन : दैनिक देशबंधु 30 नवम्‍बर 2012 के अंक में संपादकीय पेज पर प्रकाशित टिप्‍पणी

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गोल वस्‍तुओं के साथ यह विडंबना है कि चलती हुई भी वे रुकी हुई दिखती हैं। इसीलिए ऐसा लगता है कि जानबूझकर संसद को गोलायमान बनाया गया है। संसद चल रही हो या रुकी हो,  कोई खास फर्क नहीं पड़ता। गतिशीलता मापने के लिए उसे छूना पड़ता है, छूने को चीटिंग कहा जाएगा क्‍येंकि एक कवि कह गए हैं कि ‘छाया मत छूना मन’। सही मायनों में संसद आम पब्लिक की छाया है और अपनी छाया को स्‍वयं छूना मुमकिन नहीं है। जबकि जान ऐसा पड़ता है कि आम पब्लिक को इसे छूने की मनाही है। शून्‍यकाल संसद में क्‍यों होता है, इसी से साफ समझ आता है। पता चल जाता कि संसद छल रही है या चल रही है। पब्लिक शून्‍य की गोलाई में निरंतर चली जा रही है, तलाश में जुटी है, किंतु मिलता कुछ नहीं है और वह स्‍वयं को भी भूल एक प्रकार की साधनावस्‍था में लीन हो जाती है।
भला हो चैनल वालों का, जो बुद्धू बक्‍से के कब्‍जे में आ जाते हैं और अपनी टीआरपी बढ़ाने के फेर में सब बताते हैं। न बुद्धू बक्‍सा होता, न संसद का चलना रुकना मालूम पड़ता। इससे बुद्धू बक्‍से के संबंध में निर्मित भ्रांतियां खंड-खंड हो जाती हैं कि बक्‍सा सिर्फ बुद्धू ही नहीं बनाता बल्कि इस संवेदनशील मामले में बुद्धू बनने से हमें रोकता भी है। प्रिंट मीडिया का भी ऐसा ही  रोल समझ में आया है कि वे पब्लिक को सचेत करते रहते हैं। वो बात दीगर है कि कभी-कभार वे खुद भी अचेत हो जाते हैं। अब इतना जोखिम तो सहना ही पड़ता है। वे संसद के भीतर इसीलिए घुसे रहते हैं कि संसद गतिमान है या नहीं, इससे पर-पल पर पब्लिक को अवगत कराते रहें। न्‍यू मीडिया चाहे कितना ही ताकतवर हो गया है परंतु वह अभी संसद में घुसने और उसे महसूसने की कला में निष्‍णात नहीं हो पाया है। गति मापना और उसे भांपना दो भिन्‍न कलाएं हैं। मति की गति अनेक बार जड़मति हो जाती है, जड़मति से आशय आप ब्रेकिंग से लगाएं। मन की गति संसद नहीं इंटरनेट है और इसीलिए सदा गतिशील और प्रगतिशील बनी रहती है। मन के आकार के बारे में मालूम नहीं चला है कि वह गोल होता है या बेडौल क्‍योंकि वह सदा सीधा नहीं रहता। कभी घूमता है, कभी कूदता है और कभी उछलता तथा फुदकता है, उसके रुकने का भी पता नहीं चलता। मन संसद के मानिंद चक्‍करघिन्‍नी बनने से बचा रहता है।
रात में संसद सदा चलती रहती है इसलिए रात में संसद के आसपास धरना अथवा प्रदर्शन आयोजित नहीं किए जाते क्‍योंकि ऐसा करके वे शर्तिया ही कुचले जाएंगे। रात में उनको बचाने पुलिस वाले भी नहीं आएंगे। पब्लिक के लिए यह जानना सम्‍मान की बात है कि संसद की ताजा स्थिति क्‍या है, किंतु इसकी स्‍पीड की जानकारी के लिए न ता जनता दीवानी है और न वहां पर स्‍पीडोमीटर होने की जानकारी ही है।  संसद चल रही है सोचकर इसके भागीदार हल्‍ला-गुल्‍ला मचाते रहते हैं, मानो संसद एक बस है और उसे बेबस करना इनकी जिम्‍मेदारी। संसद गोल है और शून्‍य भी गोल, इसलिए गोल संसद में गोल दिमाग वाले कतिपय सांसदों का पाया जाना कतई अजीब नहीं लगता। संसद और शून्‍य की गोलमोलता पर यह उपयोगी जानकारी, कहो कैसी रही ?

कसाब को फांसी देख-देख आवत हांसी : जनसंदेश टाइम्‍स स्‍तंभ 'उलटबांसी' 27 नवम्‍बर 2012 अंक में प्रकाशित





कसाब को एकाएक फांसी दिया जाना चाहे कितने ही राजनीतिक अर्थ रखता हो किंतु घाटे की ओर बढ़ती अर्थव्‍यवस्‍था के लिए इसे एक लाभकारी कदम के तौर पर बरसों तक याद किया जाएगा, इसकी मिसालें दी जाती रहेंगी। यह समृद्ध भारतीय परंपरा रही है कि जिस चीज से  नुकसान हो रहा है या भविष्‍य में होने की संभावना हो, उसका टेंटुआ दबा दो और निजात पा  लो। जब गर्भ में लड़का है या लड़की की जानकारी पाने के लिए विज्ञान के साधन इंसान नहीं खोज पाया था, तब नवजात कन्‍या का टेंटुआ मसक कर ही इससे पार पाया करता था। जबकि  देवी स्‍वरूपा, शक्ति पुंज और लक्ष्‍मी के तौर पर कन्‍या को हमने ही मान्‍यता प्रदान की थी।   जन्‍म लेते ही टेंटुआ मसकने की इस युक्ति ने खूब प्रगति की और इसमें कारगर भूमिका परिवारजनों ने तो निबाही ही, कन्‍या की मां ने भी इसमें सक्रिय भागीदारी की। इससे पीडि़त जनों को भरपूर मुक्ति मिली। साहित्‍य में इस रिवाज की मौजूदगी और अपनाने की परंपराएं और रीति रिवाज इसके जीवंत गवाह हैं। यह युक्ति अब भी चोरी छिपे प्रयोग में लाई जाती है। इसे अपनाने के कानून अब कड़े कर दिए गए हैं। मां के गर्भ की जांच करवाने के साधनों की वैज्ञानिक खोज के बाद आजकल टेंटुआ मसकने की घटनाओं की संख्‍या में काफी गिरावट आई है जबकि यह खुशी का सबब नहीं, गर्भपात का सरल रास्‍ता खोजने का सबक है। अब गर्भपात करवाकर निजात पाने की संख्‍या में रिकार्ड इजाफा हो चुका है। घटती कन्‍या संख्‍या दर इसका उदाहरण है। डॉक्‍टरों और इससे जुड़े लोगों की कमाई में घनघोर इजाफा इस पर कानूनी रोक लगाने से ही संभव हो सका है।
फर्क नहीं पड़ता चाहे गर्भपात पर रोक लगाने के कितने ही कानून बना लिए जाएं क्‍योंकि कानून डाल डाल तो तोड़ने वाले पात पात मौजूद रहते हैं। किसी भी पेड़ में डाल कितनी भी घनी हों परंतु वे संख्‍या में पत्‍तों से कम ही होती हें बशर्ते पतझड़ का मौसम न हो। पतझड़ में तो डालों की नंगई देखते ही बनती है। कसाब को फांसी देकर सरकार ने आतंकवादियों से पंगा ले लिया है। देश के हित के लिए लिया गया यह जोखिम आर्थिक मोर्चे पर विजय का प्रतीक भी है। यह वह आर्थिक सफलता है जिसकी चर्चा तो हुई है किंतु किसी भी विमर्श का यह मूल तत्‍व नहीं है। जबकि कसाब को फांसी पर लटकाकर मिलने वाले आर्थिक लाभ की कतई अनदेखी नहीं की जा सकती है।

अब रुपये-पैसे के लिए मानव रिस्‍क तो ले ही लेता है, सो सरकार ने भी ले ही लिया। जबकि यह कसाब की आड़ में किए जा रहे घोटालों, घपलों और कमीशनबाजों की जेब पर किया गया प्रहार भी है। न जाने कितने दलालों ने इसके कारण कितने ही मनीमाइंडिड सपने बुन रखे थे और कितना ही माल खा रहे थे, जो कसाब को फांसी मिलते ही कसाब के शरीर के माफिक दफन हो गए हैं। पल भर में वे हसीन ख्‍वाब उस खाक में तब्‍दील हो गए हैं जो जीवन भर पीड़ा ही देते रहेंगे। कसाब की फांसी के बहाने यह आर्थिक चिंतन,कहो कैसी रही ?

व्‍यंग्‍य का शून्‍यकाल : पुस्‍तक परिचय - दैनिक पंजाब केसरी 27 नवम्‍बर 2012 के अंक में प्रकाशित


खादी वाला सफेदपोश गुंडा : दैनिक जनवाणी स्‍तंभ 'तीखी नजर' 27 नवम्‍बर 2012 के अंक में प्रकाशित

दैनिक जनवाणी पेज 10


चश्‍मारहित पाठन के लिए लिंक की प्रतीक्षा करें, उपलब्‍ध होते ही जोड़ लिया जाएगा। 

जयशंकर प्रसाद की कहानी ‘गुंडा’ और उसका मुख्‍य किरदार ‘नन्‍हकू’ खूब फेमस हुआ। गुंडागिरी, लंपटता, चोरी, डकैती में कमाई की भरपूर संभावनाएं रही हैं जबकि इनके विकल्‍प के तौर पर आजकल राजनीति जरायमपेशाओं के लिए काफी मुफीद हो गई है। चोरी करना वह काम है जो छिपकर और बचते बचाते और मुंह छिपाते किया जाता है किंतु जब इसे निर्लज्‍ज, बेशर्म या दबंग होकर ढीठता से अंजाम तक पहुंचाया जाए तो वही डकैती हो जाती है। चोरी और डकैती के भिन्‍न अर्थों का यह सामान्‍यीकरण है।  
समाज में गुंडई और दबंगई के नए-नए प्रयोग किए जा रहे हैं, इससे गुंडों की रुचि-संपन्‍नता का पता चलता है। नेता वही जो गुंडई करें और इन्‍हीं के कारनामों से गुंडई के निहितार्थों को पब्लिक बेहतर तरीके से जानने और समझने लग गई है। इसमें रोजाना हो रहे बदलावों से आम पब्लिक रूबरू हो रही है।
फिल्‍मों में सभी प्रकार के गुंडों का वर्चस्‍व रहा है और वे पब्लिक को भाते हैं। फिल्‍मों का सबसे मनपसंद गुंडा शोले के गब्‍बर सिंह को माना जा सकता है जिसने गुंडा-सह-डाकू के कॉम्‍बो किरदार में जीवन के अनूठे रंग भरकर विलेनत्‍व को भरपूर ऊंचाइयां दीं। कितने डाकू और विलेन आए परंतु कोई गब्‍बर की महानता को छू भी नहीं पाए। गब्‍बर‍ सिंह की ऐसी शख्सियत से प्रभावित होकर नेता भी गुंडई पर उतर आएं है तो इसमें हैरान होने की बात नहीं है, यह समय की पुकार है। नेता यूं तो सभी कारनामों पर अपना अवैध कब्‍जा कर चुके हैं परन्‍तु जिम्‍मेदारी लेने से सदा पीछे रहे हैं। कुछ कहें और शोर मच जाए तो डर कर तुरंत मुकर जाते हैं। गुंडईकर्म की पहचान आजकल नेताधर्म से होने लगी है। नेताओं के इस क्षेत्र में धाक जमाने से गुंडई में निर्भीकता का बोलबाला बढ़ गया है।
गुंडाकर्म जिसे मवालीगिरी कहा जाता है, को भरपूर प्रतिष्‍ठा मिली है। यह गर्व का सूचकांक बन गया है। इसके विरोध में चाहे मीडिया कितना ही चीखे चिल्‍लाए, पब्लिक सोशल साइटों पर कमेंट करे, लाइक करे या जमकर हल्‍ला–गुल्‍ला करे। फिल्‍मों में चोर खुद शोर मचाते रहे हैं। शशिकपूर अभिनीत फिल्‍म ‘चोर मचाए शोर’ का नाम बेसाख्‍ता आपके जहन में कौंध गया होगा। वही शोर मचाने का जिम्‍मा आजकल ‘आम आदमी’ ने संभाल लिया है।  इसी के परिणामस्‍वरूप शोर मचाने को वैधानिक मान्‍यता दिलाने के लिए ‘आम आदमी’ नामक एक दल रूपी दलदल की स्‍थापना हो चुकी है। जल्‍दी ही आप ‘शोरगुल’नामक पार्टी को चुपचाप राजनीति में घुसता देखेंगे।  
‘आम आदमी’ जब चर्चा में है तो ‘आम औरत’ क्‍यों न चर्चित होना चाहेगी। उनके मन में भी  ‘आम आदमी’ के कंधा से कंधा मिलाकर कंधा मिलाने का सुख लूटने की हसरत पलती होगी।  बस मेरी आपसे इतनी गुजारिश है कि आप लूटने को लेटना मत समझ लीजिएगा। चर्चा  गुंडई के विभिन्‍न रूपों की हो रही थीं कि लूटना से लेटना तक भटक गई जबकि विमर्श गुंडई पर केन्द्रित हो गया। दरअसल, इसके लिए दोषी व्‍यंग्‍य लेखक नहीं है। यह सब चीजें आपस में इतनी रली मिली हैं कि इनमें मिलावट होने का भ्रम होने लगता है। एक की चर्चा हो रही हो तो दूसरी भी उसमें कूद पड़ती है और मानव मन इनकी कूदन--कला से मुग्‍ध हुए बिना नहीं रहता। जो सहज अपनी गति से चल रहा है,वह परदे के पीछे छिप जाता है।
‘वर्दीवाला गुंडा’ फिल्‍म हिट हुई और इसका उपन्‍यास खूब बिका। यह गुंडों की शराफत है वरना वे बे-वर्दी वाला गुंडई कर्म निबाहने में पीछे नहीं रहते हैं, बलात्‍कार इसी को तो कहते हैं। गुंडे का क्‍या है विवस्‍त्र होकर भी कूद सकता है। वर्दी खाकी भी हो सकती है और खाली भी, सेना की भी और खादी की भी। सुर्खियों में आने के लिए एक चिकित्‍सा मंत्री ने अपना ही इलाज कर डाला, इसे कहते हैं ‘अपना इलाज बवाले जान’। मंत्री ने खुद को ‘खादीवाला सफेदपोश गुंडा’ कहकर हल्‍की सर्दी के माहौल में गजब की गरमाहट ला दी है। इससे उनकी मल्‍टीटास्किंग प्रतिभा का परिचय बखूबी मिल जाता है। खादी को प्रतिष्‍ठा और सम्‍मान दिलाने के लिए महात्मा गांधी जी चरखा काता। उसी को कुख्‍याति और अपमान का सूचक सिद्ध करने में मंत्री ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। खादी की साख को राख करने के लिए नेताओं ने सफेद खाकी में खूब कारनामे किए हैं परंतु अ‍ब खुले आम स्‍वीकार करके अपनी नेकनीयत को जाहिर  कर दिया है। देश का खूब तेजी से विकास हो रहा है इसलिए उन्‍होंने खुद को खादीवाला गुंडा कहकर परोक्ष तौर पर गांधीगिरी को दोबारा से जीवंत कर दिया है और खादी की इज्‍जत को सरेआम मिट्टी में सान करके लूट लिया है। गुंडों का खादी पहनना मुझे तो अचंभित नहीं कर रहा, कहिए कैसी रही ?

ओह माई गॉड : राम से पंगा - डीएलए 21 नवम्‍बर 2012 अंक में प्रकाशित



शायद बिना चश्‍मे के पढ़ पाएं ंकिंतु इसके लिए राम में भरोसा होना जरूरी है।


राम बना राम का दुश्‍मन। उसने राम के पतीत्‍व में ही खोट निकाल दिया। वह भी राम, मैं भी राम सब में राम समाया, फिर भी राम का पतीत्‍व उसके हमनाम भाई राम की समझ में नहीं समाया और उसने पंगा ले लिया। राम सहनशील हैं, पंगे को भी सहज भाव से सह जाते हैं, दंगा करना सिर्फ उनके भक्‍तों की फितरत है। वे ऐसे जेठ हैं जो मनाली के गीत गाते-गाते सीता की फेवर में उतर आए हैं। अब अगर दंगा न भड़के तो जरूर हैरानी होगी। जाहिर है कि आजकल भाई अपने सगे भाई का दुश्‍मन है। प्‍यार भी उसी मित्र से होता है जिससे लाभ की उम्‍मीद होती है। मतलब घूम-टहल कर यही निकलता है कि सब नाते-रिश्‍ते स्‍वार्थ के हैं, स्‍वार्थ जरूर सधना चाहिए। आराम शब्‍द में राम बसा है और कवि गोपाल प्रसाद व्‍यास जी कह गए हैं कि छिपा है। सचमुच का राम आज लुकाछिपी खेल रहा है और रावण ढीठ के माफिक सरेआम दंड पेल रहा है, जिम में अपनी बाजुओं की मछलियों को मछली का तेल पिला रहा है, बाहुबलियों और बाउंसर्स के रूप में सर्वत्र नजर आ रहा है।   
राम में भी रावण देखना चाहने के इच्‍छुक इस मौके को कैश करने में जुट गए हैं। चैनल और मीडिया का सक्रिय होना आज खबर नहीं है।  मौका दीपावली का है, घी, सरसों का तेल और मोमबत्‍ती सब महंगाई की लपेट में हैं और राम को चपेट मार दी गई है। आजकल धर्म का अहम् रोल भी गरमागरम बहस का विषय बना लिया गया है और फिल्‍मों में भुना लिया गया है।  राम का पुतला बनाकर फूंकने की नौबत आने वाली है। चाहत है कि राम का पुतला आग से ऑक्‍सीजन सोख ले और आग बुझ जाए। आग के बुझने से पुतला जिंदा रह जाएगा। इसे चमत्‍कार बतला कर ढिंढोरा पीट धन कमाने का मौका नहीं गंवाया जाएगा। दंगा हुआ तो आम आदमी पिट जाएगा। रावण से राम नहीं डरते, लेकिन राम से डरने लगे हैं। भाई भाई से डरता नहीं, उलझता है। बाजारी और धार्मिक शक्तियां न राम को और न रावण को चैन लेने देती हैं, वे अपने हितसाधन में बिजी हैं।
राम अच्‍छे पति नहीं थे, धोबी के कहने को आधार बनाकर राम की गर्दन पर नश्‍तर से वार किया है। अच्‍छे पति की परिभाषाएं तलाशी जाने लगी हैं। सच भी यही है कि बहुत कम पत्नियां अपने पति को अच्‍छा मानती हैं जबकि पतियों द्वारा अपनी पत्नियों को अच्‍छा मानने का औसत इतना भी नहीं है। किसी पत्‍नी को बहादुर पति अच्‍छा लगता है तो किसी पत्‍नी को पत्‍नी से डरने वाला। पिता की मानने वाले और प्रजा से डरने वाले पति आजकल की पत्नियों के भी पसंदीदा नहीं हैं, ऐसे में राम ने किसी धोबी के कहने को ही दिल से लगा लिया है तो इसकी तो निंदा ही की जाएगी।
आप अपना पक्ष जाहिर कीजिए कि राम अच्‍छा लगता है या रावण अथवा आप भय के कारण धोबी के पक्ष में हैं कि उसे कपड़े धुलने को दिए और उसने आपके चरित्र को ही धो पोंछकर जनता में बिखेर दिया तो ... ओह माई गॉड।

फेसबुक, ट्विटर, पिनरेस्‍ट इत्‍यादि सोशल मीडिया पर सक्रिय मित्रगण ध्‍यान दीजिएगा


मेरी रचनाओं के सम्‍मानीय पाठकों, फेसबुक मित्रों, टिवटर साथियों, पिनरेस्‍ट और अन्‍य सोशल मीडिया पर सक्रिय बंधुओं  की गुजारिश थी कि वे मेरी प्रकाशित रचनाओं के हिंदी चिट्ठे मैं आपसे मिलना चाहती हूं  ब्‍लॉग का अनुसरण करना चाहते हैं। कुछ चाह रहे थे कि वे इस ब्‍लॉग की ई मेल सदस्‍यता ग्रहण कर लें। इस प्रकार की सभी समस्‍याओं का निराकरण अब बैसवारी ब्‍लॉग के मॉडरेटर संतोष त्रिवेदी की मदद से करके सारी सुविधाएं मुहैया करवा दी गई हैं। अब आप इस ब्‍लॉग का अनुसरण भी कर सकते हैं और ई मेल सदस्‍यता भी ले सकते हैं। 

अब तक आप सभी को जो असुविधा हुई है, उसके लिए मुझे खेद है।

इस ब्‍लॉग पर टिप्‍पणी देने की सुविधा बहाल कर दी गई है। 

अविनाश वाचस्‍पति 

फोटू खींचने वाले सावधान : दैनिक जनवाणी स्‍तंभ 'तीखी नजर' 20 नवम्‍बर 2012 अंक में प्रकाशित


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मंत्री के कहे का मंतर नहीं है। काटे का जंतर नहीं है। अनशन कैसे करे उसके लिए रामलीला मैदान नहीं है। नहीं से मतलब अवेलेबल है किंतु डरकर देते नहीं हैं, कोई अनशनकारी कब्‍जा न जमा ले। बीते दिनों एक मंत्री ने कैमरों को धमकाया था और इस बार मंत्री का फोटू खींचना जुर्म हो गया। फोटू खींचने वाले को खींचा और जेल में डाल दिया। जरूरी नहीं है कि फोटो किसी अभिनेत्री की हो। वे कुछ भी कहते हैं, फर्क नहीं पड़ता। जब वे कहे से मुकरते हैं, तब मानना पड़ता है। ट्विटर पर लिखते हैं और सरकाय लेते हैं। सरकना सिर्फ मंत्री ही नहीं जानते हैं, सरकना विषधर का स्‍थायी गुण है, वे आस्‍तीनों में निवास करते हैं। आजकल हालत इतनी पतली हो गई है कि कोई चलता है, कोई मचलता है और कोई मचल-मचल कर चलता है। इनमें कई क्रियाएं तो खूब गजब ढाती हैं। मचल-मचल कर चलना, उछलना-कूदना नहीं है जबकि कई अर्थों में इस्‍तेमाल किया जाता है।
पुरुष मचल-मटक कर चले तो शक होता है कि वह पुरुष है, गे तो नहीं। जबकि गे होना उसकी अदाएं जाहिर कर देती हैं। कन्‍या मचले तो देखने वालों के दिल बिखर जाते हैं। दिल के मचलने में चलने की जरूरत नहीं होती है। दिल का तेजी से धड़कना भी मचलना ही है। दिल धड़कना और मचलना बहुत जरूरी है इससे ही मालूम होता है कि दिल गतिशील है। किसी कन्‍या के मचलने को देखकर मचले तो प्रगतिशील है। शरीर में दिल के सिवाय कुछ और गतिमान हो जाए, तो बवंडर हो जाता है। आंखों की क्रियाएं खतरनाक कही गई हैं, कर्म पलक का और लक खराब आंखों का। दोनों पलक एक ही स्‍पीड में झपकें तो ठीक वरना तो पल भर का अंतर कितने ही चमत्‍कार दिखला देता है। तेजी से झपके तो भी गंडागोल। यह पलक झपकाना यानी एक आंख बंद, दूसरी खुली और दिमाग चाहे क्‍लोज हो, कोई फरक नहीं अलबत्‍ता। कैमरे को क्लिक करने के लिए एक पलक को बंद कर लिया जाता है। कैमरा बीच में न हो तो यही अपराध हो जाता है। दंगे हो जाते हैं ऐसा कारनामा नीयत के नए प्रतिमान स्‍थापित कर देता है। बीच में कैमरा भी हो और पलक झपकाई की रस्‍म चल रही हो, यकायक फ्लैश दमक उठे तो भी खतरा बरकरार रहता है।
न जाने कब किस भेस में मंतरी मिल जाएं, आपने क्लिक किया और उनके हिमायतियों ने क्विक एक्‍शन लिया और क्षण भर में आप जेल में। हिमायती बारातियों से भी खूंखार होते हैं। आपके जेल में जाने से जेल भरती नहीं है किंतु आपका जीना खाली कर देती हैं। आपकी कल्‍पनाओं का महल भरभराकर ढह जाता है। आपने सोचा था कि मित्रों को, नाते रिश्‍तेदारों को दिखलाएंगे कि वे मंत्री जो खूब बयान झाड़ते हैं, गरीबों की चादर अपने बयानों में खींच-खींच कर उघाड़ते हैं और उन्‍हें गरीब नहीं मानते, आपने उनकी खींच ली है। मंत्री चाहते हैं कि उनकी खूब फोटुएं खिंचे। अभिनेता चाहते हैं कि उनकी ही खिंचें और उनकी अभिनीत फिल्‍मों के टिकट खिड़की पर खूब बिकें। चाहत सबकी पूरी होती है किंतु एक फोटू खींचने वाले पर आफत आ गई। हिमायतियों को लगा कि उनके मंतरी की धोती पर खतरा है,  धोती खींचना यूं तो अपराध नहीं है क्‍योंकि दुकानदार जब धोतियों को बेचता है तो खींच-खींच कर बेरहमी से शो केस से बाहर निकालकर संभावित खरीददार के सामने पटक कर उसकी नुमायश लगा देता है। फोटू खींचने वाले की हसरतों पर जेल चल गई। कहां तो सोचा था कि बीवी पर रौब गालिब करूंगा कि मैंने मंत्री को देखा, उसकी फोटू खींची किंतु वे अरमां ही क्‍या हुए जो आंसुओं में न बह जाएं। कैमरे का मालूम नहीं, कहां पर किस अवस्‍था में बिसूर रहा होगा, हो सकता है कि मिल्कियत ही बदल गई हो, न जाने किसने कैमरे की याददाश्‍त को खंगाल कर उसका पोस्‍टमार्टम कर दिया हो।
फोटू खींचने पर जेल जाने से एक नई परंपरा की शुरूआत हुई है। इससे पहले कार्टून बनाने कार्टूनकार को जेल भेजा गया था। हे हिंदी ब्‍लॉगरों, फेसबुक के गिरधारियों, ट्विटर उड़ाने वालों और सोशल मीडिया पर अभिव्‍यक्ति की आजादी का नारा बुलंद करने वालों,अब सावधान हो जाओ। कभी भी किसी का भी नाड़ा खोला जा सकता है और पायजामा सरकने पर कितनी थू-थू होती है, इतना तो तय है कि आप पायजामा सरकने से सेलीब्रिटी बनने से रहे। अपने नाड़े को किसी मॉडल के ब्रॉ का हुक मत समझ लेना जो रैम्‍प पर बेवफा हो गया तो उसका जीवंत प्रसारण हो रहा होगा। नाड़ा कब फांसी का फंदा बन जाएगा, इसे जान नहीं पाओगे। पूरी उम्‍मीद है कि अगली बार आप फोटू खींचते या कार्टून बनाते नहीं पाए जाओगे।

इंटरनेट है मन की गति : जनसंदेश टाइम्‍स स्‍तंभ 'उलटबांसी' 20 नवम्‍बर 2012 में प्रकाशित




बाजार ने बेजार कर रखा है। बाजा बजा रखा है आम आदमी का।  जब से आम आदमी ने नेताओं का बाजा बजाना शुरू किया है तब से बाजे की आवाज मुग्‍ध करने लगी है। पहले क्रेडिट कार्ड से, मोबाइल से, आर्कुट से, फेसबुक से – सबसे एलर्जी होती थी। अब क्रेडिट कार्ड भी बनवा लिया है। बैंक खाता ऑपरेट करने के लिए एटीएम और डेबिट कार्ड भी मिल गया है। किसी जमाने में महज एक राशनकार्ड और आई कार्ड ही रहा करता था। अधिक हुआ तो डीटीसी का विद्यार्थी यात्रा बस कार्ड मूल्‍य सिर्फ साढ़े बारह रुपये। अब जिसके पास अन्‍य कार्ड नहीं, उसका तो बाजा बज गया समझ लो। राशन कार्ड से आधार कार्ड तक का सफर। सफर में पैन कार्ड ने जो धमकाया तो सबको जरूरी लगा कि इसे नहीं बनवाया तो सरकार की इंकम बढ़ जाएगी। क्रेडिट कार्ड जब नया नया बनवाया था तब उसे प्रयोग करने से बचा जाता था। अब दस बीस या पच्‍चीस हजार रुपये भी खर्च करने हों या 10 रुपये का मोबाइल चार्ज करना हो – उसी का प्रयोग किया जाता है। पहले लैंडलाईन नहीं था, पीपी यानी पड़ोसी फोन जिंदाबाद। अब हाथ में कई मोबाइल हैं। कोई भी मोबाइल साल भर से अधिक साथ रह जाए तो बोरियत होने लगती है।

तकनीक सदा नई आती है, इतना लुभाती है कि लगता है हमारे लिए ही आई है। हमने ही नहीं उपयोग किया तो उसके आने का क्‍या लाभ, दयालु हो उठते हैं और जेब के प्रति निर्दयी। यह उठना बैठे-बैठे होता है और एकाएक उड़ते हैं और जाकर तुरंत खरीद लाते हैं। पहले लैंडलाईन के बजने पर दौड़ पड़ते थे, अब लैंडलाईन पर पहले तो कॉल आती नहीं है, आती है तो कहलवा दिया जाता है कि मोबाइल पर करें। यह गति है या दुर्गति, विकास है या विनाश, पराजय है या विजय, जीत है या हार। हार फूलों का या कि हारने वाला। बहरहाल, सब पर विजय पाने का हथियार बन गई है तकनीक। जब से इंटरनेट आया है तब से मन से मुकाबले की होड़ जारी है। सारा समय सोशल मीडिया ने यूं चुरा लिया है कि सब इसके मुरीद हो गए हैं और यह चोरी या डकैती जीवन के लिए जरूरी हो गई है । इंटरनेट माने तो मन, न माने तो भी मन। अपनामन अपना नहीं रहा।

बाजार ने अपने जादू से आम आदमी को सम्‍मोहित कर रखा है। गरीब अमीर होता जा रहा है और अमीर और अमीर लेकिन भ्रष्‍टता की ओर आतुर फिर भी निर्भय। यह सम्‍मोहन स्‍वीकार्य नहीं होना चाहिए। किंतु है, अमीर भ्रष्‍ट होता जा रहा है यह जानने के लिए प्रत्‍येक अमीर को अपने गिरहबान में झांकना होगा। आम आदमी जब उसे झांकने और आंकने के लिए कहता है तो बुरा लगता है कि मेरे गिरहबान पर नज़र। सच को पहचानना होगा। चीन्‍हता के अभाव में सब बे भाव खो रहा है।

अपनामन भी अपना नहीं रह गया। वह इंटरनेट और पैसे की चकाचौंध तथा ताकत की बलि चढ़ा जा रहा है। बाजार का रूप-स्‍वरूप बिगड़ या है किंतु इंसान शर्म से गड़ने के लिए तैयार नहीं है। उसे शर्मिन्‍दा होना चाहिए हालांकि वह निर्लज्‍ज हो चुका है। कैसे पाएं इससे मुक्ति, बतलाइए आप ही कारगर युक्ति ?  

ओह माय गॉड 'राम' से पंगा : आई नेक्‍स्‍ट स्‍तंभ 'खूब कही' 20 नवम्‍बर 2012 में प्रकाशित




राम बना राम का दुश्‍मन। उसने राम के पतीत्‍व में ही खोट निकाल दिया। वह भी राम, मैं भी राम सब में राम समाया, फिर भी राम का पतीत्‍व उसके हमनाम भाई राम की समझ में नहीं समाया और उसने पंगा ले लिया। राम सहनशील हैं, पंगे को भी सहज भाव से सह जाते हैं, दंगा करना सिर्फ उनके भक्‍तों की फितरत है। वे ऐसे जेठ हैं जो मनाली के गीत गाते-गाते सीता की फेवर में उतर आए हैं। अब अगर दंगा न भड़के तो जरूर हैरानी होगी। जाहिर है कि आजकल भाई अपने सगे भाई का दुश्‍मन है। प्‍यार भी उसी मित्र से होता है जिससे लाभ की उम्‍मीद होती है। मतलब घूम-टहल कर यही निकलता है कि सब नाते-रिश्‍ते स्‍वार्थ के हैं, स्‍वार्थ जरूर सधना चाहिए। आराम शब्‍द में राम बसा है और कवि गोपाल प्रसाद व्‍यास जी कह गए हैं कि छिपा है। सचमुच का राम आज लुकाछिपी खेल रहा है और रावण ढीठ के माफिक सरेआम दंड पेल रहा है, जिम में अपनी बाजुओं की मछलियों को मछली का तेल पिला रहा है, बाहुबलियों और बाउंसर्स के रूप में सर्वत्र नजर आ रहा है।   
राम में भी रावण देखना चाहने के इच्‍छुक इस मौके को कैश करने में जुट गए हैं। चैनल और मीडिया का सक्रिय होना आज खबर नहीं है।  मौका दीपावली का है, घी, सरसों का तेल और मोमबत्‍ती सब महंगाई की लपेट में हैं और राम को चपेट मार दी गई है। आजकल धर्म का अहम् रोल भी गरमागरम बहस का विषय बना लिया गया है और फिल्‍मों में भुना लिया गया है।  राम का पुतला बनाकर फूंकने की नौबत आने वाली है। चाहत है कि राम का पुतला आग से ऑक्‍सीजन सोख ले और आग बुझ जाए। आग के बुझने से पुतला जिंदा रह जाएगा। इसे चमत्‍कार बतला कर ढिंढोरा पीट धन कमाने का मौका नहीं गंवाया जाएगा। दंगा हुआ तो आम आदमी पिट जाएगा। रावण से राम नहीं डरते, लेकिन राम से डरने लगे हैं। भाई भाई से डरता नहीं, उलझता है। बाजारी और धार्मिक शक्तियां न राम को और न रावण को चैन लेने देती हैं, वे अपने हितसाधन में बिजी हैं।
राम अच्‍छे पति नहीं थे, धोबी के कहने को आधार बनाकर राम की गर्दन पर नश्‍तर से वार किया है। अच्‍छे पति की परिभाषाएं तलाशी जाने लगी हैं। सच भी यही है कि बहुत कम पत्नियां अपने पति को अच्‍छा मानती हैं जबकि पतियों द्वारा अपनी पत्नियों को अच्‍छा मानने का औसत इतना भी नहीं है। किसी पत्‍नी को बहादुर पति अच्‍छा लगता है तो किसी पत्‍नी को पत्‍नी से डरने वाला। पिता की मानने वाले और प्रजा से डरने वाले पति आजकल की पत्नियों के भी पसंदीदा नहीं हैं, ऐसे में राम ने किसी धोबी के कहने को ही दिल से लगा लिया है तो इसकी तो निंदा ही की जाएगी।
आप अपना पक्ष जाहिर कीजिए कि राम अच्‍छा लगता है या रावण अथवा आप भय के कारण धोबी के पक्ष में हैं कि उसे कपड़े धुलने को दिए और उसने आपके चरित्र को ही धो पोंछकर जनता में बिखेर दिया तो ... ओह माई गॉड।

कसाब काटू मच्‍छर से मुन्‍नाभाई की फेसबुक पर चैटिंग : दैनिक पंजाब केसरी 20 नवम्‍बर 2012 को प्रकाशित

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कसाब को काटने वाला मच्‍छर ऑनलाईन था। वह फेसबुक पर मेरे साथ चैटिंग में आया। लीजिए आप भी होइए मच्‍छर से चैटिंग के बहाने कई हकीकतों से रूबरू :

मच्‍छर : मुन्‍नाभाई सलाम
मुन्‍नाभाई : मैं सबका हो सकता हूं किंतु मच्‍छर का भाई होना मुझे गवारा नहीं है।
मच्‍छर : किंतु मैंने तो उसको काटा है जिसने मुंबई में आतंकी वारदात करके समूचे देश को हिला दिया था।
मुन्‍नाभाई : देश को कोई नहीं हिला सकता, इतना मजबूत देश है मेरा। इसे आजतक घपले और घोटालों में संलिप्‍त नेता तक नहीं हिला पाए तो उस आतंकी कसाब की क्‍या मजाल ?
मच्‍छर : हिलाने से मेरा मतलब नुकसान पहुंचाने से था।
मुन्‍नाभाई : नुकसान तो इंसान को और पूरी मानवजाति को तुम पहुंचा रहे हो । तुम्‍हारा क्‍या बिगाड़ा है जो सदियों से तुम उसके खून के प्‍यासे बने हुए हो और नई नई तरह की बीमारियों के वायस बन रहे हो।
मच्‍छर : खून तो मेरी खुराक है।
मुन्‍नाभाई : खून आजकल के सत्‍ताधारी नेताओं की भी खुराक है। जबकि वे मच्‍छर नहीं हैं। जबकि वे जनता के वोट चूसने के लिए फेमस हैं।
मच्‍छर : मैंने देखा कि सरकार कसाब को फांसी पर लटकाने में बे-वजह की टालमटोल कर रही है इसलिए मैंने उसे काटने का फौरी एक्‍शन लिया।
मुन्‍नाभाई : फौरी तो तुम ऐसे कह रहे हो, मानो बीते कल उसने वारदात की और अगले दिन तुमने उसे काट लिया। कसाब तो जेल में रहकर खूब मौज ले रहा है।
मच्‍छर : मेरा काटा मौज ले ही नहीं सकता। उसे तो अपनी जान तक के लाले पड़ जाते हैं। बुरी तरह से उसकी खून के प्‍लेटलेट्स गिर जाते हैं।
मुन्‍नाभाई : लेकिन कसाब की गर्दन तो तुम्‍हारे काटने से भी नहीं कटी।
मच्‍छर : क्‍योंकि खबर बनाकर तुम्‍हारे भाईयों ने फिर से उसकी जान बचाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया है
मुन्‍नाभाई : इस सृष्टि पर भाई ही तो भाई का सगा दुश्‍मन है।
मच्‍छर : लेकिन मच्‍छर मच्‍छर का दुश्‍मन नहीं, हितैषी होता है। काश, इंसान मच्‍छरों से यह गुण सीख पाता। सामूहिक स्‍वर में मच्‍छर गान गाता।
मुन्‍नाभाई : सीखने के लिए जब बुराईयां प्रचुर मात्रा में उपलब्‍ध हैं तो कोई क्‍यों अच्‍छाइयों और सच्‍चाइयों का बोरिंग पाठ पढ़े और सीखे।
मच्‍छर : मच्‍छर प्रजाति की लोकप्रियता में अभिनेता नाना पाटेकर के संवादात्‍मक योगदान को कोई मच्‍छर कभी नहीं भूल सकता।
मुन्‍नाभाई : सो तो है उस पर तुर्रा यह भी है कि न तो किसी इंसान ने और न किसी हिजड़े ने ही नाना पाटेकर के संवाद का विरोध किया।
मच्‍छर : वह दिन और आज का दिन है, हमारी रातें फिर गर्इ हैं और हमारे जलवे निराले हैं, आजकल हम दिन में रक्‍त चूसने का शगल कर रहे हैं।
मुन्‍नाभाई : किस मुगालते में जी रहे हो तुम मच्‍छर महाशय। इंसान तुम्‍हारी प्रजाति के खात्‍मे के लिए सदैव युद्धस्‍तर पर लगा रहेगा।
मच्‍छर : लेकिन हमें नष्‍ट करना, दुष्‍ट मानव के बस का नहीं है। अगर ऐसा होता तो आज मैं जिंदा न होता।
मुन्‍नाभाई : इसका मतलब मच्‍छर और कसाब को किसी परिचय की जरूरत नहीं है। दोनों ही अपने कारनामों के कारण बुरी तरह लोकप्रिय हैं।
मच्‍छर : अपनी अपनी किस्‍मत है।
मुन्‍नाभाई : क्‍या खाक किस्‍मत है, मेरा भी तो खूब नाम है। मेरे कारनामे सबको मोहित करते हैं। तुम्‍हें भी किया है इसलिए तो तुम मुझसे चैटिंग करने फेसबुक पर नमूदार हुए हो।
मच्‍छर : यह मैं स्‍वीकारता हूं।
मुन्‍नाभाई : किंतु मूर्ख मच्‍छर, कसाब को तो किसी सामान्‍य मच्‍छर ने ही काटा था। फिर उसे डेंगू कैसे हो सकता है ?
मच्‍छर : जानता हूं, इस खबर को उड़ाने में भी किसी धूर्त नेता का ही हाथ है जो इस खेल में भी घपला करके नोट कमाने में जुटा हुआ है।
मुन्‍नाभाई : तुम मच्‍छर हो या किसी खुफिया एजेंसी के एजेंट अथवा खुलासामैन की तर्ज पर खुलासामच्‍छर।
मच्‍छर : जो चाहे मान लो। पर यह भी जान लो कि अभी तक मच्‍छरों के किसी गैंग ने इस कारनामे की जिम्‍मेदारी नहीं ली है। फिर भी उसके सुरक्षा बंदोवस्‍तों से इस मामले में घोटालों का संदेह जरूर जाहिर हुआ है।
मुननाभाई : तुम्‍हें क्‍या लगा था कि कसाब के रक्‍त की जानलेवा चुसाई करने पर तुम्‍हें देशभक्‍त मान लिया जाएगा अथवा किसी राष्‍ट्रीय उपाधि यथा पद्ममच्‍छरश्री, पद्ममच्‍छरविभूषण, पद्ममच्‍छरशिरोमणि इत्‍यादि से नवाजा जाएगा। जब आज तक शहीद भगतसिंह तक को कई ऐरे गैरे स्‍वयंभू संगठन शहीद और देशभक्‍त नहीं मानते हैं तो तुम्‍हें कौन तवज्‍जो देगा ?
मच्‍छर : यह तो मैं भी जानता हूं कि कसाब को जिंदा रखने के पीछे देशी-विदेशी राजनीतिक सौदेबाजियां हैं। उसे जानबूझकर जिंदा रखा गया है। उसके जिंदा रखने से कई मलाई कूट रहे हैं।
फिर भी एक आखरी कोशिश मैंने की है। क्‍या मच्‍छर जन जन और देशहित के अच्‍छे कार्य करने की कोशिश नहीं कर सकते, आखिर वे भी इस देश की हवा में सांस लेते हैं। यहां की जनता का रक्‍त चूसते हैं। उन्‍हीं से हमारी रोजी रोटी मतलब खून की प्‍यास बुझती है।
मुन्‍नाभाई : इस तथ्‍य से परिचित होने पर भी तुमने कसाब को मारने की जुर्रत की ?
मच्‍छर : मैं यह भी जानता हूं कि किसी को भी मारना किसी भी राज्‍य की पुलिस के लिए सबसे आसान कार्य है। वह किसी को भी निरपराध और मासूमों को मौत के घाट उतार सकती है। फिर वह उस खूनी घाट के आसपास न तो दिखाई देगी और अगर दिखाई देगी तो कह देगी कि उसे तो खून होता दिखाई नहीं दिया है। कई बार तो मरने वाले का अता पता ही नहीं मिलता और पुलिस तो वहां से लापता हो जाती है। आप इसे अता पता लापता फिल्‍म की कहानी मत समझ लीजिएगा।
मुन्‍नाभाई : अता पता लापता मतलब तुम फिल्‍मों के भी ग़ज़ब के शौकीन हो ?
मच्‍छर : फिल्‍म हाल के अंधेरे में भी हमें कई शिकार मिलते हैं। इस बहाने हम फिल्‍में भी देख लेते हैं।
मुननाभाई : फिर तुमने सबसे सुरक्षित जेल में सेंध लगाकर शिकार ढूंढने की गुस्‍ताखी क्‍यों की, जबकि इस शांतिप्रय देश में किसी अपराधी का जिंदा रहना कोई मुश्किल काम नहीं है। तुमने कसाब को काटकर यूं ही जान का जोखिम लिया है मच्‍छर। उसने वह तुम्‍हारे चपत मारने में सफल हो गया होता तो शहीद हो गए होते और तुम्‍हारा कोई नामलेवा भी नहीं मिलता। तुम्‍हारे इस कारनामे से न तो देशी और न ही विदेशी मच्‍छर समुदाय का कोई भला होने वाला है।
मच्‍छर : लेकिन जो मैं जानता हूं उसे तुम नहीं जानते मुननाभाई। शुद्ध पानी से जीवन पाने वाले लोकप्रिय डेंगू मच्‍छर का जनता को डर दिखला दिखला कर नगर निगम के कर्मचारी अवैध वसूली करने में इस हद तक लिप्‍त हैं कि तुम्‍हें आश्‍चर्य होगा ?  निगम इस बात के लिए कटिबद्ध है कि कहीं पर भी साफ पानी खुला नहीं दिखाई देना चाहिए, नहीं तो हमें पनपने के लिए माहौल मिल जाता है। इस तथ्‍य की आड़ में निगम के जांच दस्‍ते किसी की भी रसोई भी घुस जाते हैं और जहां उन्‍हें पीने का साफ पानी अनढका मिल जाता है, या किसी गिलास में पिए पानी की बची हुई एक बूंद भी दिखलाई दे जाती है तो वे उसका चालान काटने के लिए कमर कस लेते हैं और कुछ दक्षिणा हासिल करके छोड़ देते हैं निगम के कर्मचारी इस बहाने लोगों से अपनी पुरानी दुश्‍मनी का बदला भी ले रहे हैं। उनकी इस ज्‍यादती की कहीं अपील भी नहीं सुनी जा रही है।
मुन्‍नाभाई : यह इस मुल्‍क की विडंबना है कि जिस कसाब को तुमने मारना चाहा सरकार ने उसके चारों और डॉक्‍टरों की फौज तैनात कर दी। अब इसमें भी डॉक्‍टरों और दवाईयों के लाखों के बिल एडजस्‍ट किए जाएंगे और घोटाला प्रधान भारत देश में घपले संपन्‍न होते रहेंगे। अगर तुम आम आदमी को काटते रहो तो सरकार को इस बहाने घोटाले करने की आजादी मिली रहेगी।
मच्‍छर : लेकिन मुझे कोई सम्‍मान ...
मुन्‍नाभाई : अगर तुम्‍हारे मन में सचमुच किसी राष्‍ट्रीय सम्‍मान को पाने की आकांक्षा जोर मार रही है तो आम आदमी के हिमायती खुलासामैन को काट लो, तुम्‍हें निश्चित तौर पर सम्‍मानित कर दिया जाएगा। इस सम्‍मान समारोह के लिए सरकार गणतंत्र दिवस का इंतजार भी नहीं करेगी और दीपावली पर्व पर ही तुम्‍हें सम्‍मानित कर आतिशबाजी चलाने को अपराध घोषित कर देगी। जिससे तुम्‍हारी मच्‍छर प्रजाति उस दिन पटाखेबाजी से पैदा होने वाले धुंए के असर से सुरक्षित रहे।
मच्‍छर : बात तो तुम्‍हारी दमदार है।
मुन्‍नाभाई : पिछले दिनों एक कानूनप्रिय मंत्री पर तुम्‍हारी खून चूसने की आदत का असर देखा गया और उसने खुलासामैन को उसका लहू पी जाने का डर दिखलाकर डराने की पुरजोर कोशिश की। मुझे नहीं लगता कि उस वारदात में तुम्‍हारा कोई संगी साथी अथवा नाते रिश्‍तेदार मंत्री के साथ मिला हुआ होगा। परंतु विश्‍वास न सही तुम्‍हारे ऊपर मंत्री के साथ मिलीभगत का संदेह तो किया ही जा सकता है। तुमने कसाब को काटकर सबूत मिटाने की धृष्‍टता की है जिसके लिए पड़ोसी देश चाहे तुम्‍हें शहीद का दर्जा दे दे किंतु अपना देश तुम्‍हारे इस कुकृत्‍य की निंदा ही करेगा।
मच्‍छर : ऐसा क्‍या ?
मुन्‍नाभाई : तुम जानते तो हो कि आम आदमी तुम्‍हें देखकर ताली भी बजाता है तो तुम्‍हारा स्‍वागत करने के लिए नहीं, अपितु तुम्‍हें जान से मारने के लिए, चाहे तुम यह सोचकर आनंदित होते रहो कि वह तुम्‍हारी इस कथित वीरता पर ताली बजाकर खुशी जाहिर कर रहा है।
मच्‍छर : मैं सोच रहा था कि आतंकवादी के खून का स्‍वाद का जायके अलग होता होगा। मैंने इसलिए भी यह रिस्‍क मोल लिया है।
मुननाभाई : मच्‍छर, यह तुम्‍हारी सोच नहीं, गलतफहमी है जिससे ग्रसित तुम अकेले ही नहीं हो। आजकल गलतफहमियों का दौर है, तुम भी उसके शिकार हो गए हो तो इसके दोषी तुम नहीं, आजकल मौसम ही ऐसा है। मुन्‍नाभाईयों को इस देश में हाशिए पर रख दिया गया है, जिसके कारण देश की यह दुर्गति हुई है लेकिन हमारी बहुमूल्‍य सलाहों को मानता कौन है ?