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पीएम पद की मिठाई खाने की लालसा : दैनिक जनवाणी 26 फरवरी 2013 स्तंभ 'तीखी नज़र' में प्रकाशित
चोर पुलिस का खेल चल रहा है। एक बच्चे ने जिद की है कि वह तो पुलिस बनेगा। चोर बनकर तो अपनी सारी कलाबाजियां दिखला चुका है। अब उसे पुलिस बनकर भाग्य आजमाने दो। वह पुलिस बन जाता है और खूब कहर ढाता है। सारे चोर यानी चोर बने बच्चे बिखर जाते हैं, खेल बंद हो जाता है। अब खेल के खेल में हालत यह हो गई है कि सब पुलिस ही बनना चाहते हैं, चोर तलाशने से भी नहीं मिल रहे हैं। जबकि सारे चोर हैं और मुखौटों का वर्चस्व है।
पीएम की कुर्सी खाली नहीं है, कोई शख्स उस पर चुपचाप कब्जा जमाए बैठा है। वह मन में लड्डू फोड़ रहा है कि इस बार पीएम बनने का मौका एक जवान को दूंगा। जवान मन ही मन मान बैठा है कि वही भविष्य का पीएम बन सकता है। दूसरे काम करते हुए भी उसकी निगाहें कुर्सी पर हैं। वह कुर्सी पर बैठने के चक्कर में घोड़ी पर भी नहीं बैठ रहा है। कहीं इधर वह घोड़ी पर बैठा, उधर कुर्सी पर कोई और बैठ गया तो ? घोड़ी पर बिना सवारी किए घूमने का आनंद लिया जा सकता है, पर एक बार कुर्सी न मिली तो सारा खेल बिखर जाएगा। वह कुर्सी को अपने लिए हकीकत मान आत्ममुग्ध है, उसकी आत्ममुग्धता परवान पर है।
चोर पुलिस का खेल नेपथ्य में पहुंच गया है। अब पीएम की कुर्सी के चारों ओर गहमागहमी मच चुकी है। जिनसे अपने घर की कुर्सियां भी छीन ली गई हैं, वह भी घर से बाहर निकल आए हैं। वे सब चिल्ला रहे हैं,चीख पुकार मची हुई है। यह चीख पुकार आतंक की नहीं है। पर उनके पीएम बनते ही जरूर आतंक फैलेगा। पब्लिक इससे परिचित है पर वह मजबूर है .मजबूर पब्लिक मजदूर के माफिक है। वह उनके हित में अपने वोट को हिट करेगी, इसे सब जानते हैं। बिना वोट के पीएम की कुर्सी पर बैठने की कवायद तेज है।
कुर्सी के खेल में कोई गोदी से उतर आता है, कोई अपनी माया दिखलाता है, कोई यूं ही डींगें हांक रहा है,मतलब सब एक कुर्सी को अपनी पूरी ताकत से अपनी ओर खींचने में जुट गए हैं। देश यह देखने में इतना बिजी हो गया है कि देश के शरीर में कहीं पीड़ा हो रही है, पीड़ा उन जख्मों में है जो उसे अभी ताजा-ताजा लगे हैं। जख्म मौसमी हैं पर उनके लिए बजट तैयार किया जा रहा है। इस बीच नींद आनी स्वाभाविक है। माया से अभिभूत एक नेत्री नींद में है। दिन में सोते हुए सपनों में निमग्न हैं। नींद में वह बड़बड़ा भी रही है। उनका बड़बड़ाना लालकिले पर पीएम के भाषण के माफिक है। नींद में दिए गए भाषण और उसकी नींद पूरी तरह से सुर्खियों में है। गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड्स वाले इस घटना को शामिल करने की औपचारिकताएं पूरी कर रहे हैं। यह देख समझकर वे खूब खुश हैं, देश भी खुश है, उनके मातहत भी खुश हैं। चारों ओर से खुशी फूट-फूट कर रिसायमान है।
कोई नहीं चाह रहा है कि यह मायावी तिलिस्म टूटे। इसे सपनों की पीएम बने रहने दो। सपनों में ही लालकिले पर भाषण करने दो। उधर कोई पीएम की गोदी में उचककर बैठने को आतुर है। कयास लग रहे हैं कि पीएम तो वही बनेंगे पर पीएम की कुर्सी पहले खाली तो हो !
पीएम न बनने के दुख पर सब चुप हैं, कोई दुखी नहीं होना चाहता। पीएम बनने के सुख सबकी आंखों में स्वप्न की चमक को निखार रहे हैं। इस कुर्सी को हथियाने के लिए न जाने कितना सहना पड़ता है, सहकर भी चुप रहना पड़ता है, पर पीएम बनने की भूख है कि मिटती नहीं । पीएम का पद पकवान सरीखा है जबकि यह वह जलेबी नहीं है जो सीधी हो। सीधी जलेबियां राजनीति में तो मिलती नहीं हैं। सब खीर खाना चाहते हैं, एक साथ टूट भी पड़ते हैं पर जिस बरतन पर वे एक साथ भूखों की तरह लारातुर हैं, वह रसमलाई है। खीर पर एक चौकस बिल्ली की नजर है, वह उसे अपने जवान होते बच्चे को खिलाएगी। उसने सारे जोड़-तोड़ और जुगाड़ बिठा लिए हैं।
सुरक्षा का सरकारी रिक्शा : दैनिक जनवाणी 15 जनवरी 2013 स्तंभ 'तीखी नज़र' में प्रकाशित
सरकारी सुरक्षा पाना सब चाहते हैं परंतु रिक्शे पर बैठकर उसे चलाने वाले के श्रम की उचित कीमत कोई नहीं देना चाहता है। वैसे देखा जाए तो सबसे सुरक्षित सवारी रिक्शा है, न तो वह तेज भागता है और न सवार उसकी कैद में ऐसा फंसता है कि उसके गिरने पर उसी में उलझ कर रह जाए। इधर सरकार महिलाओं की सुरक्षा के लिए अन्य सभी टोटके तो कर रही है परंतु रिक्शों को चलने न देकर सभी को, मटकों में भरने में जुटी हुई है। जबकि सभी जानते हैं कि टोटकों से मटकों का भरना संभव नहीं है। किसी तरह भरने में सफलता मिल भी गई तो क्या गारंटी है कि मिट्टी का घड़ा सदा साबुत ही रहेगा, टूटेगा नहीं। खुद नहीं टूटा तो किसी के द्वारा फोड़ डाला जाएगा। मटके को फोड़ने के सबके अपने-अपने निहितार्थ हैं। वैसे भी अगर मटके फूटें न तो मटके बनाने और बेचने वालों के पेट भरने की एक ऐसी समस्या और सामने आ जाएगी, जिसके कारण सरकार की फजीहत होना अवश्यंभावी है। जबकि वह सरकार ही क्या जो फजीहतों में न फंसी हो। मेरा मानना है कि रिक्शे पर सवारी को हेलमेट पहनना अनिवार्य करने का उचित समय अब आ गया है।
सब जानते हैं कि घर में जितनी अधिक सुरक्षा है उतनी सुरक्षा किसी भी कीमत पर घर से बाहर नहीं मिल सकती। सरकारी जैड, एक्स, वाई और जैड एक्स सुरक्षाओं का होना तब तक बेमानी है जब तक महिलाओं के लिए चाक-चौबंद व्यवस्था नहीं कर ली जाती। आदमी भूखा रहकर तो जिंदा बच सकता है किंतु असुरक्षित होगा तो जरूर मरेगा। फिर भी यह मरने का जोखिम जरूर लेगा, इतना लालची हो गया है इंसान कि सुरक्षा भूल जाता है और घर से या तो मनोरंजन के लालच में बाहर निकल आता है या फिर नोट बटोरने का लालच उसे जिंदगी को जोखिम में डालने के लिए मजबूर कर देता है। बेबस होकर भी काली फिल्म लगी प्राइवेट बसों में सफर करता है, मेट्रो में चढ़ जाता है, टैक्सी में लद जाता है – यह सब फ्री नहीं है, इसके लिए वह पैसे चुकाता है और बलि भी चढ़ जाता है। अब भला ऐसा सफर किसलिए करना। जिसमें जान का जोखिम रहे और पैसे भी चुकाने पड़ें।
कर्म और फैसले इसमें सब हमारे होते हैं परंतु इसकी जिम्मेदार हम सरकार को बताते हैं। मानो सरकार से परमीशन लेकर हम घर से बाहर निकले हों या अपने सिर पर सीसीटीवी कैमरे लगवा रखे हों, जिनका सीधा प्रसारण पुलिस के कंट्रोल रूम में जारी हो और अति-सक्रियता के साथ मोटर साइकिल और पीसीआर जिप्सियां लेकर सिर्फ आपकी सुरक्षा के लिए दौड़ने के इंतजार में हो। आपको मालूम है कि घर से बाहर सब जगह रिस्क है फिर क्यों महिलाएं घर के भीतर बैठकर सब दरवाजे, खिड़कियां बंद करके क्यों नहीं चैन की नींद सोती है आम पब्लिक बनकर। अब यह तो कोई तर्क नहीं हुआ कि पुलिस की नौकरी तभी तक बची हुई है जब तक आप जोखिम-जोखिम खेल रहे हैं।
फिर कहते हैं कि सरकार कुछ कर नहीं रही है। अब सरकार नेताओं को, वीवीआईपी जनों को सुरक्षा मुहैया कराए कि आपकी बीवियों, मित्रों के चारों ओर बॉडीगार्ड बनकर हाथ खोलकर सदा चौकस रहे। सरकार के पास सिर्फ यही काम रह गया है कि सब अपराधियों के हाथ पकड़ने और जकड़ने में लगी रहे। हर हाथ को पकड़ना क्या इतना आसान है। हर हाथ पर निगाह रखना भी आसान नहीं है। जब तक मानसिकता नहीं बदलोगे, न तो सुरक्षा मिलेगी और न ही किसी को सुरक्षा दे पाओगे। कितने ही पिसी मिर्ची के पैकेट अपने पर्स में संभाल लो, अपने गैजेट्स को कितना ही अधुनातन प्रोग्राम्स से लबालब कर दो, कितने ही हैल्प लाईन नंबर मुहैया करवा दो, लेकिन यह कड़वा सत्य है कि किसी भी तरह से एक सौ प्रतिशत सुरक्षा नहीं मिलने वाली है। मिर्ची में भी रखे-रखे कीड़े लग जाया करते हैं। स्थिति अराजक और विस्फोटक ही बनी रहेगी। पुलिस की हैल्पलाइन का एक सौ नंबर रखना इसी सौ फीसदी की याद दिलाता रहता है।
जान लो कि सुरक्षा का रिक्शा सदैव एक सुर में नहीं चलाया जा सकता। जब वीवीआईपी हो तो सुरक्षा का सुर अलग तरह से बजता है। सुरक्षा के रिक्शे पर बैठने के लिए हर कोई तैयार रहता है। यही वह रिक्शा है जिसे पिछले दिनों बुरी तरह राजधानी दिल्ली में आम पब्लिक ने बुरी तरह घसीटा। जबकि इस रिक्शे को आम पब्लिक नहीं, पुलिस चलाती है। पुलिस की भूमिका वैसे भी सभी मोर्चों पर तनिक भी असंदिग्ध नहीं रही है। रिक्शा चलाने के लिए सरकार तो सरकार, उनकी मासूम पुलिस भी सुरक्षा चाहने वालों से वसूली में विश्वास रखती है। सुरक्षा का सरकारी रिक्शा गति पकड़े और पब्लिक को सुरसुरी भी न महसूस होवे, तो भला काहे की सुरक्षा हुई ?
कहो, कैसी रही ? : जनवाणी स्तंभ 'तीखी नज़र' में 4 दिसम्बर 2012 को प्रकाशित
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चारों की चौकड़ी आज स्पेशल सुविधाओं के तहत स्वर्ग में धूम मचा रही है। जबकि उन्होंने जिन कारनामों को अंजाम दिया था, उसके अनुसार उनकी नर्क में सजा पाने की ग्राह्यता बनती थी। ठाकरे भगवान के सैनिकों का गठन करके उनकी दबंगई के बल पर वहां मौजूद थे। कसाब को यमराज के कार्यों में हस्तक्षेप के चलते तुरंत बुलाया गया था, मच्छर ने यमराज के काम को आसान किया था जिससे यम मंत्रालय का टीए/डीए और यमराज को अलॉट किए जाने वाले विशेष भत्तों में इकानॉमी लाने के कारण और दारू किंग पोंटी चड्ढा को अपरोक्ष तौर पर यम मंत्रालय के कामकाज में सहयोगी पाया गया था।
स्वर्ग में काफी लंबे अरसे से रह रहे शहीद, महान पुरुष, बलिदानी, परोपकारी, दा नवीर, शुभ कर्मों के प्रणेता और इंसानियत के पैरोकारों की इनके स्वर्ग में बंगलों के अलॉटमेंट पर कानाफूसी जारी थी। जिस स्वर्ग का माहौल सदैव आनंददायक रहा है और कश्मीर से जिसकी तुलना की जाती है,आज वहां भी मौसम काफी गर्म बना हुआ है। यमसत्ता के शीर्ष में बैठे विशिष्टगण ही जानते थे कि अगर इन चारों में से किसी को भी विशेष सुविधाएं न दी गईं तो स्वर्ग और नरक की सत्ता की वे ईंट से ईंट बजा देंगे। इस शुभ कार्य के लिए उन्हें ईंटें भी पृथ्वी अथवा नर्क से मंगवा कर देनी होंगी।
चारों चर्चा कर रहे हैं कि स्वर्ग में आगे की रणनीति क्या हो। इन्हें पैंतीस-पैंतीस लाख के टॉयलेट्स, अत्याधुनिक गैजेट्स इत्यादि सभी प्रकार की विलासिता श्रेणी की उच्चस्तरीय सुविधाएं दी गई हैं। बजट कहां से आ रहा है, इस बारे में धरती की तरह स्वर्ग में चिंता नहीं की जाती है। स्वर्ग में गरीबों के झांकने पर भी प्रतिबंध है। स्मार्ट फोन, टेबलेट्स तो उपलब्ध कराए ही गए हैं।
ठाकरे दहाड़ते हुए कसाब को बतला रहे हैं कि मैं पृथ्वी पर रहा, तब तक तुम्हें फांसी नहीं लगने दी। यह मेरा ही प्रताप है क्योंकि मैं ही भगवान के सैनिकों का बिग बास हूं। वैसे महाराष्ट्र में तो मैं सबका ही बिग बास हूं।
मेरे आने के तुरंत बाद सरकार मनमानी पर उतर आई है और उन्होंने तुम्हारा गला भी काट दिया है। इस घटना को यूं तो इस डेंगू मच्छर ने अंजाम दिया है। मेरे परिवारजन और सरकारी अमले ने मेरी देह से प्रेम के चलते मेरे दिवंगत होने की प्रामाणिक घोषणा भी तीन दिन बाद ही जारी की। यह सब उस राज की बदमाशी है, वरना तो मेरा बेटा उद्धव तो बहुत मासूम है और उसी दिन से गुमसुम है। राज ने सबको सैट कर लिया। उधर मैंने पृथ्वी छोड़ी, मेरे पीछे यूपी हरियाणा के दारू किंग पोंटी चड्ढा को उसके भाई के साथ मेरे पीछे रवाना कर दिया। उसका भाई तो स्वर्ग पहुंचने से पहले ही हिंदी फिल्मों की तरह कहीं बिछड़ गया।
मीडिया में मुझे ही सुर्खी मिलनी थी लेकिन पोंटी चड्ढा और उसके भाई की मौत के कारण मेरे स्पेस पर कब्जा कर लिया गया। अब मेरे से जुड़े किसी मामले को तूल न मिले इसके लिए सरकार ने तेरी गर्दन को कस के मसक दिया। सरकार जानती थी कि कसाब की अंतिम और पहली इच्छा भारत में सदा आतंक फैलाने की रही है। दूसरी और अंतिम इच्छा 'जब तक रहा मेहमान' फिल्म में लीड रोल करने की थी।
मच्छर ने बतलाया कि मैं उनके सामने था किंतु किसी ने मुझे मारने की कोशिश नहीं की। वे चाहते थे कि मैं कसाब को काटूं, तभी मुझे प्राणदान मिलेगा, इसलिए मुझे मजबूरन कसाब को काटना पड़ा। अब ऐसी सरकार पर मैं क्या भरोसा करूं।
अभी यह चर्चा चल ही रही थी कि तभी घोषणा की गई कि स्वर्ग में इन चारों की गतिविधियों के जीवंत प्रसारण के लिए ‘बिग बॉस’ ने ठेका ले लिया है और जल्दी ही चारों तरफ से स्वर्ग को घेर लिया गया है और आधुनिक गैजेट्स की फिटिंग करवाई जा रही है ताकि पृथ्वी के टीवी चैनलों में इसका सीधा प्रसारण करके टीआरपी बटोरी जा सके। नरक की ग्राह्यता धारक इन महानुभावों के स्वर्ग में कब्जे और वहां पर इनके कारनामों का सीधा प्रसारण, कहो कैसी रही ?
खादी वाला सफेदपोश गुंडा : दैनिक जनवाणी स्तंभ 'तीखी नजर' 27 नवम्बर 2012 के अंक में प्रकाशित
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जयशंकर प्रसाद की कहानी ‘गुंडा’ और उसका मुख्य किरदार ‘नन्हकू’ खूब फेमस हुआ। गुंडागिरी, लंपटता, चोरी, डकैती में कमाई की भरपूर संभावनाएं रही हैं जबकि इनके विकल्प के तौर पर आजकल राजनीति जरायमपेशाओं के लिए काफी मुफीद हो गई है। चोरी करना वह काम है जो छिपकर और बचते बचाते और मुंह छिपाते किया जाता है किंतु जब इसे निर्लज्ज, बेशर्म या दबंग होकर ढीठता से अंजाम तक पहुंचाया जाए तो वही डकैती हो जाती है। चोरी और डकैती के भिन्न अर्थों का यह सामान्यीकरण है।
समाज में गुंडई और दबंगई के नए-नए प्रयोग किए जा रहे हैं, इससे गुंडों की रुचि-संपन्नता का पता चलता है। नेता वही जो गुंडई करें और इन्हीं के कारनामों से गुंडई के निहितार्थों को पब्लिक बेहतर तरीके से जानने और समझने लग गई है। इसमें रोजाना हो रहे बदलावों से आम पब्लिक रूबरू हो रही है।
फिल्मों में सभी प्रकार के गुंडों का वर्चस्व रहा है और वे पब्लिक को भाते हैं। फिल्मों का सबसे मनपसंद गुंडा शोले के गब्बर सिंह को माना जा सकता है जिसने गुंडा-सह-डाकू के कॉम्बो किरदार में जीवन के अनूठे रंग भरकर विलेनत्व को भरपूर ऊंचाइयां दीं। कितने डाकू और विलेन आए परंतु कोई गब्बर की महानता को छू भी नहीं पाए। गब्बर सिंह की ऐसी शख्सियत से प्रभावित होकर नेता भी गुंडई पर उतर आएं है तो इसमें हैरान होने की बात नहीं है, यह समय की पुकार है। नेता यूं तो सभी कारनामों पर अपना अवैध कब्जा कर चुके हैं परन्तु जिम्मेदारी लेने से सदा पीछे रहे हैं। कुछ कहें और शोर मच जाए तो डर कर तुरंत मुकर जाते हैं। गुंडईकर्म की पहचान आजकल नेताधर्म से होने लगी है। नेताओं के इस क्षेत्र में धाक जमाने से गुंडई में निर्भीकता का बोलबाला बढ़ गया है।
गुंडाकर्म जिसे मवालीगिरी कहा जाता है, को भरपूर प्रतिष्ठा मिली है। यह गर्व का सूचकांक बन गया है। इसके विरोध में चाहे मीडिया कितना ही चीखे चिल्लाए, पब्लिक सोशल साइटों पर कमेंट करे, लाइक करे या जमकर हल्ला–गुल्ला करे। फिल्मों में चोर खुद शोर मचाते रहे हैं। शशिकपूर अभिनीत फिल्म ‘चोर मचाए शोर’ का नाम बेसाख्ता आपके जहन में कौंध गया होगा। वही शोर मचाने का जिम्मा आजकल ‘आम आदमी’ ने संभाल लिया है। इसी के परिणामस्वरूप शोर मचाने को वैधानिक मान्यता दिलाने के लिए ‘आम आदमी’ नामक एक दल रूपी दलदल की स्थापना हो चुकी है। जल्दी ही आप ‘शोरगुल’नामक पार्टी को चुपचाप राजनीति में घुसता देखेंगे।
‘आम आदमी’ जब चर्चा में है तो ‘आम औरत’ क्यों न चर्चित होना चाहेगी। उनके मन में भी ‘आम आदमी’ के कंधा से कंधा मिलाकर कंधा मिलाने का सुख लूटने की हसरत पलती होगी। बस मेरी आपसे इतनी गुजारिश है कि आप लूटने को लेटना मत समझ लीजिएगा। चर्चा गुंडई के विभिन्न रूपों की हो रही थीं कि लूटना से लेटना तक भटक गई जबकि विमर्श गुंडई पर केन्द्रित हो गया। दरअसल, इसके लिए दोषी व्यंग्य लेखक नहीं है। यह सब चीजें आपस में इतनी रली मिली हैं कि इनमें मिलावट होने का भ्रम होने लगता है। एक की चर्चा हो रही हो तो दूसरी भी उसमें कूद पड़ती है और मानव मन इनकी कूदन--कला से मुग्ध हुए बिना नहीं रहता। जो सहज अपनी गति से चल रहा है,वह परदे के पीछे छिप जाता है।
‘वर्दीवाला गुंडा’ फिल्म हिट हुई और इसका उपन्यास खूब बिका। यह गुंडों की शराफत है वरना वे बे-वर्दी वाला गुंडई कर्म निबाहने में पीछे नहीं रहते हैं, बलात्कार इसी को तो कहते हैं। गुंडे का क्या है विवस्त्र होकर भी कूद सकता है। वर्दी खाकी भी हो सकती है और खाली भी, सेना की भी और खादी की भी। सुर्खियों में आने के लिए एक चिकित्सा मंत्री ने अपना ही इलाज कर डाला, इसे कहते हैं ‘अपना इलाज बवाले जान’। मंत्री ने खुद को ‘खादीवाला सफेदपोश गुंडा’ कहकर हल्की सर्दी के माहौल में गजब की गरमाहट ला दी है। इससे उनकी मल्टीटास्किंग प्रतिभा का परिचय बखूबी मिल जाता है। खादी को प्रतिष्ठा और सम्मान दिलाने के लिए महात्मा गांधी जी चरखा काता। उसी को कुख्याति और अपमान का सूचक सिद्ध करने में मंत्री ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। खादी की साख को राख करने के लिए नेताओं ने सफेद खाकी में खूब कारनामे किए हैं परंतु अब खुले आम स्वीकार करके अपनी नेकनीयत को जाहिर कर दिया है। देश का खूब तेजी से विकास हो रहा है इसलिए उन्होंने खुद को खादीवाला गुंडा कहकर परोक्ष तौर पर गांधीगिरी को दोबारा से जीवंत कर दिया है और खादी की इज्जत को सरेआम मिट्टी में सान करके लूट लिया है। गुंडों का खादी पहनना मुझे तो अचंभित नहीं कर रहा, कहिए कैसी रही ?
फोटू खींचने वाले सावधान : दैनिक जनवाणी स्तंभ 'तीखी नजर' 20 नवम्बर 2012 अंक में प्रकाशित
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मंत्री के कहे का मंतर नहीं है। काटे का जंतर नहीं है। अनशन कैसे करे उसके लिए रामलीला मैदान नहीं है। नहीं से मतलब अवेलेबल है किंतु डरकर देते नहीं हैं, कोई अनशनकारी कब्जा न जमा ले। बीते दिनों एक मंत्री ने कैमरों को धमकाया था और इस बार मंत्री का फोटू खींचना जुर्म हो गया। फोटू खींचने वाले को खींचा और जेल में डाल दिया। जरूरी नहीं है कि फोटो किसी अभिनेत्री की हो। वे कुछ भी कहते हैं, फर्क नहीं पड़ता। जब वे कहे से मुकरते हैं, तब मानना पड़ता है। ट्विटर पर लिखते हैं और सरकाय लेते हैं। सरकना सिर्फ मंत्री ही नहीं जानते हैं, सरकना विषधर का स्थायी गुण है, वे आस्तीनों में निवास करते हैं। आजकल हालत इतनी पतली हो गई है कि कोई चलता है, कोई मचलता है और कोई मचल-मचल कर चलता है। इनमें कई क्रियाएं तो खूब गजब ढाती हैं। मचल-मचल कर चलना, उछलना-कूदना नहीं है जबकि कई अर्थों में इस्तेमाल किया जाता है।
पुरुष मचल-मटक कर चले तो शक होता है कि वह पुरुष है, गे तो नहीं। जबकि गे होना उसकी अदाएं जाहिर कर देती हैं। कन्या मचले तो देखने वालों के दिल बिखर जाते हैं। दिल के मचलने में चलने की जरूरत नहीं होती है। दिल का तेजी से धड़कना भी मचलना ही है। दिल धड़कना और मचलना बहुत जरूरी है इससे ही मालूम होता है कि दिल गतिशील है। किसी कन्या के मचलने को देखकर मचले तो प्रगतिशील है। शरीर में दिल के सिवाय कुछ और गतिमान हो जाए, तो बवंडर हो जाता है। आंखों की क्रियाएं खतरनाक कही गई हैं, कर्म पलक का और लक खराब आंखों का। दोनों पलक एक ही स्पीड में झपकें तो ठीक वरना तो पल भर का अंतर कितने ही चमत्कार दिखला देता है। तेजी से झपके तो भी गंडागोल। यह पलक झपकाना यानी एक आंख बंद, दूसरी खुली और दिमाग चाहे क्लोज हो, कोई फरक नहीं अलबत्ता। कैमरे को क्लिक करने के लिए एक पलक को बंद कर लिया जाता है। कैमरा बीच में न हो तो यही अपराध हो जाता है। दंगे हो जाते हैं ऐसा कारनामा नीयत के नए प्रतिमान स्थापित कर देता है। बीच में कैमरा भी हो और पलक झपकाई की रस्म चल रही हो, यकायक फ्लैश दमक उठे तो भी खतरा बरकरार रहता है।
न जाने कब किस भेस में मंतरी मिल जाएं, आपने क्लिक किया और उनके हिमायतियों ने क्विक एक्शन लिया और क्षण भर में आप जेल में। हिमायती बारातियों से भी खूंखार होते हैं। आपके जेल में जाने से जेल भरती नहीं है किंतु आपका जीना खाली कर देती हैं। आपकी कल्पनाओं का महल भरभराकर ढह जाता है। आपने सोचा था कि मित्रों को, नाते रिश्तेदारों को दिखलाएंगे कि वे मंत्री जो खूब बयान झाड़ते हैं, गरीबों की चादर अपने बयानों में खींच-खींच कर उघाड़ते हैं और उन्हें गरीब नहीं मानते, आपने उनकी खींच ली है। मंत्री चाहते हैं कि उनकी खूब फोटुएं खिंचे। अभिनेता चाहते हैं कि उनकी ही खिंचें और उनकी अभिनीत फिल्मों के टिकट खिड़की पर खूब बिकें। चाहत सबकी पूरी होती है किंतु एक फोटू खींचने वाले पर आफत आ गई। हिमायतियों को लगा कि उनके मंतरी की धोती पर खतरा है, धोती खींचना यूं तो अपराध नहीं है क्योंकि दुकानदार जब धोतियों को बेचता है तो खींच-खींच कर बेरहमी से शो केस से बाहर निकालकर संभावित खरीददार के सामने पटक कर उसकी नुमायश लगा देता है। फोटू खींचने वाले की हसरतों पर जेल चल गई। कहां तो सोचा था कि बीवी पर रौब गालिब करूंगा कि मैंने मंत्री को देखा, उसकी फोटू खींची किंतु वे अरमां ही क्या हुए जो आंसुओं में न बह जाएं। कैमरे का मालूम नहीं, कहां पर किस अवस्था में बिसूर रहा होगा, हो सकता है कि मिल्कियत ही बदल गई हो, न जाने किसने कैमरे की याददाश्त को खंगाल कर उसका पोस्टमार्टम कर दिया हो।
फोटू खींचने पर जेल जाने से एक नई परंपरा की शुरूआत हुई है। इससे पहले कार्टून बनाने कार्टूनकार को जेल भेजा गया था। हे हिंदी ब्लॉगरों, फेसबुक के गिरधारियों, ट्विटर उड़ाने वालों और सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की आजादी का नारा बुलंद करने वालों,अब सावधान हो जाओ। कभी भी किसी का भी नाड़ा खोला जा सकता है और पायजामा सरकने पर कितनी थू-थू होती है, इतना तो तय है कि आप पायजामा सरकने से सेलीब्रिटी बनने से रहे। अपने नाड़े को किसी मॉडल के ब्रॉ का हुक मत समझ लेना जो रैम्प पर बेवफा हो गया तो उसका जीवंत प्रसारण हो रहा होगा। नाड़ा कब फांसी का फंदा बन जाएगा, इसे जान नहीं पाओगे। पूरी उम्मीद है कि अगली बार आप फोटू खींचते या कार्टून बनाते नहीं पाए जाओगे।
नेताजी के बयानों का मानसून : दैनिक जनवाणी 14 जुलाई 2012 में 'तीखी नज़र' स्तंभ में प्रकाशित
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आजकल बयानों का मानसून आया है। मानसून आए और सूखा टिका रहे, इसे दुर्भाग्य कह सकते हैं। एक नेतानी के बयान ने हड़कंप मचा दिया कि नेताओं के रीढ़ नहीं होती है। जबकि मेरा मानना है कि वे सांप भी नहीं होते। सांप उनसे बेहतर माने गए हैं। रीढ़विहीन नेता का मतलब बेपेंदी के लोटा है, उसे थाली का बैंगन कहने पर भी पब्लिक को एतराज नहीं, क्योंकि बैंगन और लोटे में तला नहीं होता। रीढ़विहीन नेता की उपमा पर केंचुए और सांप तो कुछ कहने से रहे। नेता प्रण नहीं करता और बैंगन में प्राण नहीं होते हैं। बैंगन की सब्जी बनाने के लिए काटने, भरता बनाने पर तलने, भूनने से किसी शाकाहारी को भी एतराज नहीं है। किसी व्यंग्यकार ने कोशिश की तो उसके अभिव्यक्ति के अधिकार पर तुरंत रोक लगाने की आशंका बनती है। दूसरे ही पल दूसरे नेताजी ने पुष्टि कर दी कि पार्टी का चाल-चलन ठीक नहीं है। मैं जिस पार्टी में शामिल हूं, वह भली नहीं है। इसका मतलब भले आप भी नहीं हैं। जो इसी पार्टी में बरसों से डेरा जमाए हैं। तीसरे नेता मंत्री क्यों पीछे रहते, कह बैठे कि मध्यवर्ग 20 रुपये की आइसक्रीम और 15 रुपये के पानी की बोतल खरीदने को तैयार है, और जब एक रुपये की बढ़ोतरी गेहूं-चावल में की जाती है, तो पेट में दर्द उठने लगता है। नेता गरीबी की सीमा 28 और 32 मनवाने में जुटे हैं, जबकि जनता हर रोज 20 रुपये की आइसक्रीम और 15 रुपये का बोतल का पानी पीती है। वे सिर्फ शहरियों की ही गिनती करते हैं, गांवों में कोई गिनती नहीं की जाती। मॉल्स ही दिखाई देते हैं इनको।
नेताओं की एक दल से दूसरे दल में आने-जाने की प्रवृति भी रीढ़ विहीनता को ही जाहिर करती है। रीढ़ होगी तो उसकी सुरक्षा करनी होगी। इसलिए रीढ़ का न होना ही नेतागीरी में उपयोगी है। नेताकर्म को अगर धर्म माना जाए, तो रीढ़ उसका र्ममस्थल है। इसे छिपाकर रखना हितकर होगा। नेताओं को संवेदनशील नहीं, चतुर और हाजिरजवाब होना चाहिए। संवेदना के बिना ही नेतागीरी धर्म माना जा सकता है। इसमें अंधविश्वास चाहिए और जितना अंधविश्वास धर्म के मसले में होता है, उतना अन्य किसी मुआमले में आज तक सिद्ध नहीं किया जा सका है।
इधर एक नेता ने गेहूं-चावल के दाम बढ़ाने के लिए आइसक्रीम का मौसम मुफीद बताया है। उनका आशय मुझे यही समझ में आया है कि मध्यमवर्गीय या गरीब आदमी जब भी 20 रुपये की आइसक्रीम खाता है, तो वह सरकार को दैनिक जरूरत की चीज पर एक रुपया बढ़ोतरी का हक सौंप रहा होता है। अब पब्लिक को आइसक्रीम छिपकर खानी होगी। आइसक्रीम मत खाओ और गेहूं-चावल महंगा होने से बचाओ। ऐसे मनोरंजनपूर्ण वक्तव्यों के लिए कथित नेता कई बार व्यंग्यकारों की सुर्खियों में रह चुके हैं। आइसक्रीम 12 महीने खाई जाती है, ठंडी होने पर भी उसकी तासीर गर्म होती है। मंत्री जी के बयान ने यह साबित किया है।
बारहमासी यह व्यंजन अब जन की निंदा का सेतु बनेगा, ऐसा अहसास होने लगा है। उम्मीद है कि अब एक और मंत्री कुल्फी का जिक्र करेंगे कि 25 रुपये की कुल्फी खाओगे, तो बिजली पानी के रेट बढ़ने से कैसे रोक पाओगे। इन बदलावों का क्या अर्थ लगाया जाए। आइसक्रीम विलासिता की सूची में शामिल कर दी गई है। जबकि मोबाइल आवश्यकताओं की लिस्ट में। अभी तो समाज में कितने ही प्रतिमान रोजाना बदलने हैं। इसका र्शेय काबिल मंत्री और नेता लेने से कैसे चूक सकते हैं।
मैंने मध्यवर्ग का मजाक नहीं उड़ाया, कहकर मंत्री जी ने फिर एक बयान दिया कि उनके बयान को मीडिया ने धो-निचोड़कर पेश किया गया है। हम लोग तो चाहते हैं कि मध्यमवर्ग को समूचा ही उड़ा दिया जाए। महसूस होने लगा कि नेता और मंत्री को कुछ भी बोलने और किसी पर भी तोहमत लगाने का संविधानसम्मत संपूर्ण अधिकार मिल चुका है, क्या आपको भी ऐसा ही दुखद अहसास हो रहा है ?
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