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नववर्ष पर 'ठीक है' : दैनिक हरिभूमि 2 जनवरी 2013 में प्रकाशित व्यंग्य
हजारीलाल
हज्जाम रोजाना की तरह मेरी हजामत बना रहा है। ठीक उसी समय टीवी पर पीएम का पैगाम
‘ठीक है’ प्रसारित हुआ और उससे ठीक पहले संसद में आवाज आई – ‘इमरजेंसी जैसे हालात’ और संसद गुलजार हो गई।
हजारीलाल
कह रहा है ‘एक प्रख्यात फिल्मी गीत में कितने ही सवालों के जवाब में अभिनेत्री ‘हां
हां’ कह फुदक रही है’, तभी बीच में अभिनेता राजेश खन्ना पूछते हैं – ‘तुमको मुझसे प्यार है’ और अभिनेत्री शर्मिला
‘हां है’ कहकर सार्वजनिक रूप से हामी भर देती है लेकिन फिर कहती है ‘न न न .....’
लेकिन ‘काका’ की खुशी फेस पर झलक दिखला रही है। वैसी ही खुशी आज पीएम और सोनिया जी
के चेहरों पर नमूदार है। सबने महसूस किया कि पीएम देश को संबोधित करने के बाद
सोनिया से पूछ रहे हैं – ठीक
है ?
मैं हजारी से कहता हूं ‘अभिनेत्री प्यार में जैसे इतरा रही है वैसे ही हमारे पीएम। न्यू मीडिया पर पीएम के ‘ठीक है’ बीते बरस की घटना, इस साल तक खिंची आई है। बहरहाल, पब्लिक जो खास है या आम – सबने रट लिया है। एक सर्वेक्षण बतला रहा है, ‘ठीक है’ का प्रयोग उनके बाद 77 लाख 36 हजार और 5 सौ 53 बार किया गया और नववर्ष पर तीव्रगति से इजाफा हो रहा है।
हज्जाम
कह रहा है ‘सब गलत है किंतु उसे भी ‘ठीक है’ का
प्रमाण देने से, आशय ‘ठीक
नहीं है’ निकल कर आ रहा है।‘ तस्दीक
करता हूं ‘शब्द किस तेजी से अपना अर्थ बदल किस प्रकार हमारी जिंदगी में रच बस जाते हैं, यह मिसाल इसका सबसे जीवंत प्रमाण। मेरे बोलने से
नाई का उस्तरा मेरे गाल पर चुटकी लेता है और खून की बूंद छलछला आती है। ‘ठीक है’
पूरा गाल नहीं कटा, मैं संतोष जाहिर करता हूं।
हजारी यह कहकर मेरे अल्पज्ञान को विस्तृत करता है ‘इससे पहले विज्ञापन के
संसार के जादू भरे वाक्य जनमानस में गहरी पैठ बनाते रहे हैं यथा ‘टेढ़ा है पर मेरा है’, ‘ तेरी कमीज मेरी कमीज से सफेद कैसे’, ‘ ठंडा मतलब कोका कोला’। नाई ने गालों के साथ ही मेरे मनमानस
पर अपनी मजबूत पकड़ बनाई है।
हजारी
रहस्य खोलता है कि ‘ठीक
नहीं है’ उसे पुलिस से कहकर ‘ठीक है’ करवाया जाता है, देश के सीएम अथवा पीएम के
लिए यह कतई मुश्किल नहीं है। अचरज होता है जब सरकार को लगे हाथ ‘ठीक है’ का तमगा देकर सम्मानित किया जाता है।
पुलिस ‘ठीक नहीं है’ फिर भी ठोक कर ठीक
करने में माहिर है।
देश में गुंडे, बलात्कारियों
का होना ‘ठीक है’ ठहरा दिया गया है। भ्रष्टाचार में लिप्त देश और काले
धन को ले जाने वाले ‘वे’
भी ‘ठीक है’ हो गए हैं।
‘ठीक
है’ के गहराते असर पर शोध जारी है कि ‘ठीक
नहीं है’, ‘ठीक है’ में तब्दील हो गया है। साधारण दो शब्दों
ने भरपूर तंज समेट लिया है। व्यंग्यकार इसके पीछे पड़ गए हैं। हजामत पूरी बनने पर चलते-चलते हजारीलाल से पूछ
लेता हूं ‘ठीक है’ और वह आदतन ‘ठीक है’ कहता है। मैं स्वयं
को सर्वोत्तम
व्यंग्यकार मानने के मुगालते में डूबने-उतराने लगा हूं।
नोट चिंतन : दैनिक हरिभूमि 12 जुलाई 2012 में प्रकाशित
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नहर में लाल पीले नोट। नोटों के आसपास मंडराते लोग। जहां नोट
हैं, वहां लोग हैं। जहां लोग
हैं, वहां लुगाई हैं। लोग
लुगाई और लाल पीले नोट। नहर में पानी। पानी में नहाते नोट। गर्मी मिटाते नोट।
नोटों के पीछे कूदते नोट। नोटों के पीछे कूदते लोग, तैरते लोग, नोट बटोरते लोग। गीले नोटों को सुखाते नोट। कई लोग गीले नोट ही
घर ले जाते हैं। न मालूम कब सुर्खियां बन जाएं और पुलिस आ जाए। फिर सूखों की कौन
कहे, गीले नोटों के सुख से भी
महरूम हो जाएं। जीवन यापन में मलहम बनते नोट, कोई नहीं चाहता इनसे महरूम रहे। बस मेरे रूम में ही रहें नोट।
नोटों को न ले कोई विलोक। नहर में नोट। नोटों के साथ तैरते लोग। यह दौर इंदौर में
आया था। लोगों को खूब भाया था परंतु ऐसा दौर दोबारा से आने की कोई उम्मीद नहीं
है। नोट पहले सड़कों पर उड़ते रहे हैं। पानी में भीगते पहली बार मिले हैं। नोट
जलते हुए भी मिले हैं। बुझे हुए नोट पहली बार मिले हैं। ऐसा लगता है कि आत्महत्या
की है नोटों ने। फिर जांच एजेंसियों का यह शक पुख्ता हो चला है कि नोटों को मारने
की कोशिश की गई है लेकिन वे मरने से पहले बचाने वालों, उनके चाहने वालों द्वारा बचा लिए गए हैं। क्या
हुआ जो गीले हैं, नोट
तो हर हाल में लगते रसीले हैं। दूसरों के पास हों तो आदमी ढीला महसूस करता है और
अपने पास हों तो मजबूती का दमदार अहसास। ऐसे होते हैं नोट खास। बंधी रहती है सबकी
आस।
नोट के न होने की चोट से कोई नहीं बच सका है। नोट प्रत्येक
प्रकार की चोट से बचाव करती है। नोट नेताओं के लिए वोट पाने का सबब बनते हैं।
जिसके पास न हों नोट वे नोट पाने के लिए जीवन भर सिर धुनते हैं। धुन सिर्फ वही कि
कैसे पाएं नोट। कैसे रिझाएं नोट। नोट नकली हों तब भी चल जाते हैं। बार बार न सही,
काठ की हांडी के मानिंद एक बार तो चल ही जाते हैं। नोट एक नाम अनेक। कहीं डॉलर,
कहीं पौंड, कहीं दीनार, कहीं यूरो – पर सब चाहते हैं कि उससे न दूर हों। काले भी
हों परंतु अपने नाम के स्विस खाते में भरे हों। चाहे रिश्वत में चरे हों, चाहे
घोटाले घपले में भरे पड़े हों। नोट की महिमा अपरंपार। सारे कारज इसी से होते पूरे।
बिना नोट के सब कुछ लगता है घूरा। और नोट मिलें तो घूरा भी लगता है बूरा।
नोटों की ताल। नोटों की तलैया। सब लेते हैं नोटों की
ही बलैयां। नोट हो तो सब लगते हैं सैयां। बिना नोट के सैयां भी लगें ज्यूं ततैया।
न काटे फिर भी डंक का अहसास दें। नोट हों पास तो उड़ जाती है भूख प्यास। नोटों का
करें इलाज तो नहीं आती कोई महामारी पास। महामारी मतलब गरीबी। हमारा देश भी धन्य
हो गया है। योजना आयोग टॉयलेट में 35 लाख लगाकर चिंतन कर रहा है। जरूर 35 लाख वाले
में मोबाइल चार्जर भी लगे होंगे। आने वाले के लिए बतौर गिफ्ट मोबाइल फोन ले जाने
के लिए धरे होंगे। जिससे आगामी बार आने की बुकिंग पहले से ही की जा सके। सब नोटों का ही कमाल है। नोट ही सब जगह मचाते
फिर रहे धमाल हैं। इसे मत समझो रूमाल। यह चादर है जिससे पैर कभी बाहर नहीं जाते,
इसमें सब समाते हैं।ई मेल, वीमेल के दौर में चिट्ठियां : दैनिक हरिभूमि 3 जुलाई 2012 अंक में प्रकाशित
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गांधी जी की चिट्ठियों की इतनी अधिक बढ़ती डिमांड और ई मेल का कोई मूल्य नहीं, सरासर नाइंसाफी
है। जब तकनीक विकास कर रही है फिर चिट्ठियों के मुकाबले ई मेल के प्रति इतनी
बेरुखी क्यों। ई मेल की नीलामी भी होनी चाहिए। यह क्या कि कभी गांधी जी का चरखा,कभी गांधी जी का चश्मा, कभी गांधी जी का पंखा, कलम, कागज तक की बोली लगाई जाए और ऊंची कीमत पाई
जाए और इधर हम ई मेल पर ई मेल धड़ाधड़ भेजे जा रहे हैं और कोई बोलीदाता इसमें
दिलचस्पी नहीं ले रहा। चिट्ठियां जो पहले बहुत दुखी थीं। कई कई दिन, महीने, बरसों तक सफर में जाया कर देती थीं, अब सुख महसूस कर रही हैं और फिल्मी गीत
गुनगुना रही हैं ‘दुख भरे दिन
बीते रे भैया, अब सुख आयो रे ... मज़ा चिट्ठी पढ़ने का अब
आयो रे ...’! ई मेल दुखी हैं।
पहले की चिट्ठियां अब चिट्ठे बनकर तहलका मचा रही हैं,सरकारों को हिला रही हैं, गिरा रही हैं, उनकी पेशानी पर बल ला रही हैं, सूनामी ला रही हैं। चिट्ठे आजकल मजबूत पट्ठे
बनकर इंटरनेट पर अपना वर्चस्व कायम कर चुके हैं। उधर पुरानी चिठ्ठियों के दिन
बहुर गए हैं। उन्हें लाखों, करोड़ों की बोली
लगाकर खरीदने, सहेजने वाले मिल रहे हैं। इधर ई मेल खाता
भरने के डर से से हमें निर्ममतापूर्वक डिलीट किया जा रहा हैं। जैसे कन्याओं की
मां की कोख में ही भ्रूण हत्या की जा रही हो। क्या हमारे उद्धार के लिए इंटरनेट
जगत में बन पाएगा कोई आमिर खा और बुंलद आवाज में कहेगा ई मेल जयते।
ई मेल कह रही है कि कितनी तेज गति से चलती हूं। इधर चली और
उधर पहुंची। पैट्रोल, डीजल, गैस या टिकट का खर्चा नहीं, किसी वाहन की
दरकार नहीं। दूरी के कोई मायने नहीं रह गए हैं। पलक झपकने से पहले ही पाने
वाले को मिल जाती हूं। किसी जमाने में टेलेक्स, और तार के मैसेज अब मोबाइल के मैसेज बनकर धूम
मचा रहे हैं। उनके जरिए तो कमाने वाले खूब कमा रहे हैं, मेरी मिट्टी पलीद और पलीत करने में इंसान
रूपी शैतान का ही हाथ है। उस हथेली की ऊंगलियों की यह करामात है। उसने ही मुझे
खोजा है और फिर डिलीट स्पैम जैसे गर्त में ढकेला है।
हंगामा मचाने के लिए चिट्ठी बम नहीं, आजकल सी डी शक्तिमान हो गई है। पॉवरफुल पैन
ड्राइव भी यहां पर फेल है। पर कह रही है कि सीडी मेरी बड़ी दीदी है, उसके होते मैं
पॉवरलैस ही ठीक हूं। सीडी दीदी के राज में ठाठ तो पैन ड्राइव भैया के ही हैं। दीदी
की ताकत से ही पैन ड्राइव आजकल दबंग है। कम्प्यूटर से जुड़ा अति महत्वपूर्ण अंग
है। इसकी ताकत और विशाल रूप देखकर आई टी जगत दंग है। इसी के कारण अब आई टी
का चढ़ता रंग है। यह जिसके संग है, उससे कोई नहीं करता जंग है। एक छोटा कंप्यूटर
भी अब वैज्ञानिक विकसित कर चुके हैं। जी हां, इसी पैन ड्राइव में। आप साइबर कैफे में जाकर
यूएसबी पोर्ट में अपना पैनड्राइव कंप्यूटर लगाकर जोखिमरहित इंटरनेट का मजा लीजिए। आप कुछ भी कर लो
परंतु इंटरनेट के दीवानों तुम यह काम न करो, ई मेल को यूं बदनाम न करो। ट्विटर और फेसबुक
जैसे सोशल मीडिया के सक्रिय होने के बाद भी आपको क्या लग रहा है कि ई मेल सच कह
रही है ?
राष्ट्रपति कदापि नहीं बनूंगा अब मैं : हरिभूमि 28 जून 2012 में प्रकाशित
भारत का प्रथम नागरिक यानी
राष्ट्रपति बनने से अब मेरा मोह भंग हो गया है। अच्छा हुआ कि किसी ने मुझे बना
नहीं दिया। पानी क्यों नहीं है, बिजली क्यों नहीं है, सड़क पर गड्ढे क्यों हैं,
सड़कों पर पानी क्यों भरा है, बारिश तो हुई नहीं, जरूर पानी की पाईप लाईन फट गई
होगी। राष्ट्रपति अगर बनते हैं तो इसकी सबकी कानूनी न सही, हैं या हैं नहीं कि नैतिक
जिम्मेदारी तो राष्ट्रपति की ही बनती है। रास्ता रोककर वीआईपी रूट बनाया गया है
तो बदनामी राष्ट्रपति की ही होती है कि वही आ रहे होंगे, तभी तो जाम है। यह रोजमर्रा
के ट्रैफिक के जाम से बिल्कुल अलग है।
रुटीन जाम में इसमें वाहन रेंगते तो हैं पर सचमुच में लगाए गए जाम की तरह सामने
बिल्कुल खाली सड़कें नजर आती हैं। अच्छा हुआ मैं इस बदनामी से भी बच गया। वैसे
बदनाम होने से भी नाम होता है जबकि मेरी इच्छा नेकनामी में नाम कमाने की है, चाहे
मुझे इसमें सफलता मिले अथवा असफलता।
भला यह भी कोई बात हुई कि
कहीं जहाज क्यों गिरा, कहीं रेल क्यों भिड़ी, जहाज किडनैप क्यों हुआ, संसद में
हंगामा क्यों हुआ, मानसून समय पर नहीं आया, मुंबई में जादा बारिस क्यों हुई,
किसी का मोबाइल कोई लूट कर ले गया, एटीएम में लूट हो गई, एटीएम सुरक्षा गार्ड ने
एटीएम ही लूट लिया, साइबर क्राइम बढ़ रहा है, बेवसाइटों की हैकिंग से राष्ट्र की
सुरक्षा को खतरा है, बाढ़ क्यों आ रही है, धूप क्यों तेज है, बारिश हुई तो ओले
क्यों गिरे – अब भला यह भी कोई बात हुई कि राष्ट्र का पति हूं तो सब जिम्मेदारी
मेरी। मुखिया हूं तो सब मेरी तरफ ही मुंह करके हमला करने को चौकस हूं। किस किसने
बचाव करूं, क्या हेलमेट पहनूं, बख्तरबंद गाड़ी में टहलूं, मुझसे यह सब नहीं
होगा।
मेरे बच्चों, नाते
रिश्तेदारों, मित्रों और उनके मित्रों ने न जाने कितनी उम्मीदें मेरे राष्ट्रपति
बनने से बांध ली थीं जो कि अब टूट गई हैं। वे सब मिलकर अब चाहे मेरे फैसले पर मुझे
गोली मार दें, परंतु मैं राष्ट्रपति नहीं बनूंगा। लेकिन मेरी खुली आंखें अब और
अधिक खुल गई हैं। देश में कहीं भी कुछ भी होता है, मतलब पत्ता भी हिलता है या
परिंदा पर मारता है तो इन सब हरकतों की जिम्मेदारी राष्ट्रपति की ही बनती है। कहीं
भी कोई खून, आतंककारी गतिविधि में सजा पाता है तो माफी की गुहार यहीं लगाकर माफी
पाता है, मानो महामहिम से पूछकर हरकत की हो। पीएम तो मौन रहकर इन सबसे बच जाते हैं
लेकिन राष्ट्रपति रबर की मोहर होता है। उस रबर की मोहर का ठप्पा कोई भी उठाकर
कहीं भी लगा देता है। महामहिम मौन नहीं होते हैं। उनके पूरे बत्तीस दांत और एक
जीभ होती है। चाहे वह तोल मोल के ही बोलती है परंतु बोलती जरूर है और जीभ का
दांतों से बचाव करते हुए ही बोलती है।
यह बोलना ही ताकत है। बोलने
वाले का ही नेतागिरी में स्वागत है। वैसे नियम कायदे टूट रहे हैं, मौन रहने वाले
भी पीएम बनने का आनंद लूट रहे हैं। नेतागिरी करनी है तो बयानबाजी करो, पीएम बनना है
तो मौन रहो, राष्ट्रपति बनना है तो पूर्वसंध्या पर जरूर कहो। वैसे मौन रहने वाले
पीएम भी पूर्वसंध्याओं पर बोलने का मोह नहीं त्याग पाते हैं और आजादी दिवस पर तो
सुबह-सुबह लालकिले की प्राचीर से देश का लाल बनकर ढींगे हांकने से बाज नहीं आते
हैं। मुझे एमएलए, सांसद बनना तो मंजूर हैं, मैं सांसद बनकर बंगला भी ले लूंगा पर
राष्ट्रपति कदापि नहीं बनूंगा।
पानी बजा रहा पब्लिक की टूंग-टूंग : दैनिक हरिभूमि 23 जून 2012 में प्रकाशित
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दिल्ली की पब्लिक को पानी
परेशानी के मसले पर सी एम ने, न जाने किस लेटेस्ट तकनीक का उपयोग करने के विचार
का पानी बहा दिया है कि सब उसके कल्पना लोक में भीग-भीग भीषण गर्मी से राहत पाने
में बिजी हो गए हैं। सबको सी एम के इस बयान पर पूरा यकीन हो गया है कि अब प्रत्येक
दिल्लीवासी को डेढ़ घंटे पानी की आपर्ति सुनिश्चित की जा रही है। मासूम दिल्लीवासी
यह सोच नहीं पा रहे हैं कि जैसे नेता वायदों की फसल उगाते हैं, उसी प्रकार आजकल सी
एम पानी बहा रही हैं। इस बहते पानी की मंजिल इससे पैदा होने वाले वोट हैं जिन पर
इनकी नजर टिकी हुई है।
मालूम नहीं चल रहा है कि
उन्होंने कहां से लाकर यह तुर्रा छोड़ दिया है जिसकी टूंग टूंग लाउड बज रही है।
टूंग टूंग बजे टूंग टूंग – वोट खींच मृदंग की तरह दंग कर रही है। सब जानते हैं कि
वे हाल-फिलहाल विदेश तो छोडि़ए, हरियाणा भी होकर नहीं आई हैं क्योंकि वे हरियाणा
के सी एम को फोन मिलाने में बिजी हैं और सी एम फोन न उठाने में बिजी हैं। न मालूम
सी एम इतनी कोशिश और क्यों नहीं कर लेतीं कि अन्य किसी के नंबर से फोन करके उनसे
बात कर लेतीं। पर वे ऐसा करतीं तब तक दो-चार दिन के गैप के बाद हरियाणवी सी एम ने
उनसे फोन पर बात करके उन्हें टरका दिया है। बिल्कुल उसी तरह जिस तरह वोट पाने के
लिए नेता पब्लिक को फुसलाते और वोट पाने के बाद टरकाते रहे हैं। सी एम ने खिसियाकर
फोन बंद किया और एक बयान जारी कर दिया कि अब से दिल्लीवासियों को लगातार डेढ़
घंटे पानी की नियमित आपूर्ति की जाएगी। हरियाणा के सी एम इस घोषणा से तनिक भी चकित
नहीं हुए क्योंकि वे अपने सत्ता में रहने वाले बंधु- बांधवों और बांधवियों के इस
प्रकार के कारनामों से इत्तेफाक रखते हैं, अच्छी तरह जानते हैं कि यह उन्हें
चिड़ाने के लिए पब्लिक को वायदों का एक पपलू और थमाना है।
आज पानी प्रत्येक प्रदेश
में इतना कम हो गया है कि इसमें डूबकर मरने वाले नेता वेटिंग में हैं। पानी आए तो
उसमें डूब मरें। लोटा भर न सही परंतु चुल्लू भर तो मिले। दिल्ली में डेढ़ घंटे
का मतलब 90 मिनिट पूरा, न 89 मिनिट और न 91 मिनिट। एकदम चुस्त दुरुस्त सटीक व्यवस्था,
किसी को शक करने की गुंजायश नहीं। अब सबको भरोसा करना होगा। दिल्ली के प्रत्येक
परिवार के मुखिया के शरीर पर एक-एक डिटिजल मीटर विद जीपीआरएस सुविधा के साथ फिक्स
कर दिया जाएगा, जैसे आजकल वाहनों में नंबर प्लेट लगाई जा रही हैं, जिन्हें न तो
निकाला जा सकता है और न नंबर में कोई बेईमानी ही की जा सकती है। ऐसा भी नहीं होगा
कि सप्ताह भर का पानी एक दिन में इकट्ठा यानी साढ़े दस घंटे लगातार दिया जाए। ऐसी
एडजस्टमेंट व्यवस्थाएं सरकारी योजनाओं को पानी पिला देती हैं या उसमें डूबकर
मरने को मजबूर कर देती हैं, इसलिए इसमें किसी किस्म की कोताही नहीं बरती जाएगी।
पानी के लिए होने वाले धरने-प्रदर्शन बीते जमाने की यादें हो जाएंगी क्योंकि जो
मुंह खोलेगा, उसको उसके मीटर की ज्योग्राफी सरकारी कंप्यूटर में दिखला दी जाएगी
और एक प्रिंट सिर्फ पचास रुपये के भुगतान पर मुहैया करवा दिया जाएगा।
वैसे विचारणीय मुद्दा यह है
कि जिन्हें पानी बहाने की लत लग चुकी है, वे पानी ही बहाते हैं, उनके दिमाग में
इससे इतर या उतर कोई बहाने नहीं बह पाते हैं। आप यह जानकर हैरान-परेशान मत होइएगा
कि सरकार अब शराब में पानी मिलाने पर भी अतिरिक्त टैक्स लगाने की जुगाड़ में है।
इस टैक्स से बचने के लिए कोल्ड ड्रिंक्स, सोडा वगैरह मिलाने पर छूट की घोषणा की
जा सकती है। अब सरकारी टाइमिंग मीटर सब सच सच खोलकर पब्लिक के झूठ की पोल खोल
देगा। इससे यह सीख मिलती है कि पानी परेशानी के मसले को बहुत प्यार से हैंडल करना
चाहिए अन्यथा ऐसे जोखिम वाले वाले मामले आपका भविष्य ‘डल’ कर सकते हैं।
चूहे फुलफ्लेज्ड खुंदक में हैं : दैनिक हरिभूमि 13 जून 2012 अंक में प्रकाशित
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चू हे फुल फ्लेज्ड खुंदक में हैं। खुंदक चुहियों को भी आ रही है। वैसे खुश भी हैं चुहियाएं कि चूहे अनाज खाकर, चाहे बित्ता भर ही पेट है उनका, डकार लेने के हकदार साबित हुए हैं। डकार लेना और डकारना कोई इत्ता आसान नहीं है। पर चूहे सीख गए हैं नौकरशाहों से और नेताओं से। जब से साक्षरता अभियान का लाभ चूहों को मिलना शुरू हुआ है। चूहे जान गए हैं कि उनको बकरा बनाकर, शातिर इंसान जब चाहे उनकी बलि दे देता है। जबकि कहां चूहा और कहां बकरा, किसमें अधिक गोश्त है सब जानते हैं।
अनाज बेच गया इंसान, फंस गया चूहा नन्ही सी जान। मढ़ दिया आरोप कि चूहे डकार गए जबकि डकारने के लिए तोंद की अनिवार्यता से इंकार नहीं किया जा सकता है। इतने महाशक्तिशाली हैं, सुपरचूहे हैं हम। जबकि चूहे का बित्ता भर पेट थोड़ा कुतरने भर से ही, अनाज की खुशबू से ही अफारा मारने लगता है और तुरंत किसी मेडिकल स्टोर में जाकर पुदीन हरा सूंघकर अपना इलाज खुद करने को मजबूर हो जाता है।
चूहों ने जब से चैनलों पर खबर को देखा-सुना और अखबारों को कुतरते हुए जानकारी ली है कि वे इंसान का करोड़ों का अनाज खा गए हैं। उन्हें पेड न्यूज में सच्चाई नजर आने लगी है। अब उन्हें कुछ भी कुतरना रुचिकर नहीं लग रहा है। कुतरने से उनका मोह भंग हो रहा है। चूहे खुद को इंसान की कुतरने की शक्ति के आगे शर्मिन्दा महसूस कर रहे हैं। पर चूहे हैं न, नेता तो हैं नहीं, जो प्रेस कांफ्रेंस कर डालें। कोशिश भी करेंगे तो बेहद चालाक इंसान बिल्लियों और कुत्ताें के रूप में रिपोर्टर बनकर उनकी प्रेस कांफ्रेंस को शुरू होने से पहले ही तितर-बितर कर देगा। चूहे उदास जरूर हैं पर मायूस नहीं हैं। चूहे शेर नहीं हैं पर चूहे तो हैं। वे लड़-भिड़ नहीं सकते परंतु दौड़-फुदक तो सकते हैं। उन्हें कुछ न सुनाई दे पर वे ‘नीरो की बांसुरी का स्वर’ सुनकर मग्न हो सकते हैं। वे डिफरेंट कलर में पृथ्वी पर मौजूद हैं। इंसान बतलाए कि कौन से रंगों के चूहों ने उनके करोड़ों के अनाज पर अपने दांतों की खुजली मिटाई है। मालूम चलेगा तो वे अपने वीर चूहों के लिए ‘ऑस्कर’ की सिफारिश जरूर करेंगे। नहीं तो गिन्नीज बुक ऑफ रिकार्डस में नाम तो दर्ज करवा ही लेंगे।
ईश्वर ने जब सबको भरने के लिए पेट दिया है और भकोसने के लिए अन्न। फिर भी तथाकथित सभ्य लोग पेट में अन्न नहीं, विदेशी बैंकों में काले धन को सहेजने में बिजी रहते हैं। इंसान सारे अनाज पर अपना जबरदस्ती का अधिकार जतलाकर, उन्हें कुतरने से महरूम करने की साजिश रच चुका है। चूहे छोटे जरूर हैं परंतु उनकी यह दलील जोरदार है कि देश की, मानवीयता की समृद्धि के सबसे बड़े दुश्मन नेता और नौकरशाह देश को लगातार कुतर रहे हैं। बाबाओं को भी इस धंधे में स्वाद आने लगा है पर किसकी नीयत सच्ची है और किसकी बिल्कुल कच्ची, नाम के निर्मल मन के मैले के तौर पर ख्याति अर्जित कर चुके हैं। चूहे चाचा और मामा भी नहीं हैं फिर क्यों बिल्लियां उनकी मौसियां बनकर इतरा रही हैं। बादाम वे खा रही हैं और हमें सूखे अनाज पर टरका रही हैं। अब यह मामला ‘भूखों की अदालत’ में है, निर्णय की प्रतीक्षा चूहों को भी है और आम आदमी को भी, तब तक फैसले का इंतजार करते हैं?
पेट्रोल की प्रेम पाती : दैनिक हरिभूमि 26 मई 2012 में प्रकाशित
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पेट्रोल की प्रगति देखकर सब दुखी हैं। यह नहीं देखते कि कितना उपयोगी है, उपयोगी है इसीलिए तो रेट बढ़ रहे हैं। पानी के क्या कम बढ़े हैं, पहले प्याऊ वगैरह में फ्री में इफरात में मिलता रहा है। अब बोतलों में हाजिर
है। कितना जोखिम लेकर जी रहा हूं, तनिक सी चिंगारी स्वाह कर देती है मुझे। कोई आह भी नहीं
कर पाता और स्वाहा हो जाता है। गर्मियों
में तनिक सी गर्मी में ये दिमाग पर चढ़ गई तो क्या हो गया। पेट्रोल से जब इतना प्यार करते हो तो उसकी
कीमतें बढ़ने को भी सहो। जिसे प्यार
किया जाता है उसकी जायज मांगों के साथ, नाजायज मांगों को
भी तो खुशी खुशी स्वीकारा जाता है। अभी तो साढ़े सात ही बढ़ाया है, एक सौ रुपये
तो नहीं पहुंचाया है। पेट्रोल की प्यार कथा जारी है। खूब तन्मय होकर सुना रहा
है।
क्या यह सही लगता कि रेट
तो वही रहता और लीटर में मिलीलीटर घटाकर 300 कर दिए जाते। उसमें तो तुम्हारा ही नुकसान होता। देश की
प्रगति का बढ़ता आंकड़ा ही नहीं दिखाई
देता। फिर चिल्लाते कि नाप तोल कम कर दी है। हल्ला मचाते कि मिलीलीटर उतने ही रहने देते। महंगा चाहे बीस रुपये
कर लेते। अब साढ़े सात रुपये बढ़ाये हैं, तो नानी याद आ रही है। नानी जब कहानियां सुनाती थीं तो
कितना खुश होते थे। पेट्रोल के बहाने
नानी और नानी के बहाने कहानी की याद। कितना दिल खुश होता है। जब याद आता है कि एक था राजा, एक थी रानी, दोनों मर गए, खत्म कहानी।
लो सुनो, नई कहानी - एक था पेट्रोल, एक था मिट्टी का
तेल, एक डीजल भी है जिसमें जल नहीं है – तीनों के बढ़ गए
हैं रेट, जाओ खोल दो खुशी के
गेट। इसमें रोने की क्या बात है। नानी की याद आने वाली है। नानी जो कहानी सुनाती थी। जगते थे तो सुनते सुनते
सो जाते थे। रोते थे तो सुनते सुनते सो
जाते थे। हंसते थे तो सुनते सुनते हंसते ही रहते थे। नानी की याद कराना कोई हंसी खेल है। इतनी मुश्किलों
से तो याद दिला रहे हैं। अभी एक
पेट्रोल पम्प का ठेका मिल जाए,या मिट्टी के तेल
का डिपो – फिर तो चाहोगे कि सरकार रोज ही रेट बढ़ाए या तुम्हें
बढ़ाने दे। फिर नहीं चिल्लाओगे, पूरे मोहल्ले भर
को मिठाई खिलाओगे। नुक्कड़ पर नाचोगे। पल पल पर पेट्रोल,घासलेट के बढ़ते रेटों को बांचोगे। समझ लो पेट्रोल पंप के मालिक हो गए हो। फिर
क्या गम है,सबमें तुमसे और तुम्हारे में सबका दम है। जिस देश में रहते हो उसका ही विकास नहीं देख सकते। डीडीए के
फ्लैटों के लिए आवेदन मांगे गए तो कितने
सारे भर दिए,तब तो कोई नहीं चिल्लाया कि इतने पैसे क्यों मांग रहे हो, इतने रेट क्यों बढ़ा रहे हो और यहां पर 5 रुपये बढ़ने पर पैंट ढीली और गीली दोनों हो गई हैं।
सभी सांसद चोर उचक्के नहीं हैं : हरिभूमि 10 मई 2012 अंक में प्रकाशित
बिना चश्मे के यहां पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं।
सभी सांसद चोर उचक्के नहीं हैं और मैंने सबको चोर
उचक्का कहा भी नहीं है। मीडिया ने हंगामा
मचा दिया जिससे सारे सांसद नाराज हो गए। वैसे भी यह तो साफ जाहिर है कि जब सारे
बलात्कारी नहीं हो सकते तो सारे चोर उचक्के कैसे हो सकते हैं। उसी प्रकार सारे
बाबा किरपा नहीं बरसाते। कुछ की किरपा तो सदा खुद पर ही बरसती रहती है। देखने वाला
सोचता रहता है कि किरपा उस पर बरस रही है जबकि बरस व लौटकर बरसाने वाले पर ही रही
होती है। इसी प्रकार सारे साधु, स्वादु नहीं कहे जा सकते, एक प्रकार से कहा भी जा
सकता है क्योंकि सभी साधुओं को चरस, गांजे, भंग में स्वाद नहीं आता है जबकि कुछ
तो इनके बिना स्वाद नहीं आता है। जिनको इनमें स्वाद नहीं आता है वह आपको गुटका,
पान, तंबाकू, बीड़ी, सिगरेट का सेवन करने देखे जा सकते हैं। ऐसा भी नहीं है कि
साधु हैं तो दारू का स्वाद नहीं लेंगे। आखिर आनंद की प्राप्ति के लिए साधु चोला
धारण किया है और उस चोले में भी मजा नहीं पाया तो किस बात के साधु मतलब स्वादु। कितने
ही साधुओं को तो भीख मांगने में असीम आनंद आता है। अब अगर उनकी पोल खोली जा रही है
तो किसी सांसद को एतराज नहीं है। सांसदों की सच्चाई के बारे में जब भी जनता को
बतलाने की कोशिश की जाती है तो वह ऐसे हाय तौबा मचाने लगते हैं, मानो दूध पीते बच्चे
हों और उनके दूध के दांत अभी टूटे नहीं हों। जबकि उनके दूध तो दांत छोडि़ए, चाय के
दांत भी नहीं बचे हैं और अब उनके सभी दांत दारू के दांत बनकर आवाम के सामने बहुत
ही दुर्गंधयुक्त बेशर्मी से खिलखिला रहे हैं। इस पर किसी को तनिक भी एतराज नहीं
है।
फिर सभी सांसदों की गारंटी क्यों ली जा रही है, एक
को कुछ कहा जाता है, तो मोहल्ले के कुत्तों के माफिक सब समवेत स्वर में गीत
गाना शुरू कर देते हैं, बिना यह जाने कि इस प्रकार के गीतों की असलियत से अब जनता पूरी
तरह वाकिफ हो चुकी है।
मैं मानता हूं कि मेरे से भूल हो गई है लेकिन अगली
दफा मैं इस प्रकार की गलती नहीं करूंगा। मैं भी कोई भगवान तो हूं नहीं, हूं तो
आपकी तरह इंसान ही, इंसान से गुरु ही तो बन रहा हूं, गुरुघंटाल तो नहीं बनना चाह
रहा हूं। भविष्य में सांसदों को चोर-उच्क्का नहीं कहूंगा बल्कि यह बयान दूंगा
कि सभी सांसद चोर उचक्के नहीं हैं, तब तो आपमें से किसी को कोई आपत्ति नहीं होगी
न।
अब तो ऐसा महसूस होने लगा है कि हम साधुओं को भी
नेताई गुणों का विकास करना होगा। वरना शातिर नेता हमें कहां सामान्य वस्त्रों
में जीने देंगे और हमें बार बार इनसे बचकर लेडीज सूट, साड़ी, सलवार, जींस, टॉप इत्यादि
पहनकर ही अपनी जान बचानी होगी। वैसे भी मीडिया तो चाहता है कि हम वस्त्रविहीन हो
जाएं और वह सारी दुनिया को दिखलाकर कमाई करता रहे। क्या अब भी सांसदों को मेरे से
कोई शिकायत है, मैं अपनी गलती मानते हुए फिर से कह रहा हूं कि कि सभी सांसद
चोर-उचक्के नहीं हैं ?
प्यार की पुंगी बजाते चलो : दैनिक हरिभूमि में 25 अप्रैल 2012 अंक में प्रकाशित
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घास चिल्ला चिल्लाकर कह रही है लेकिन कोई गधा नहीं सुन रहा है। सब घास
खाने में तल्लीन हैं। गधे का स्वभाव है कि जो मिल जाए, खाए जाओ और घास हरी हो या
लाल। लाल चाहे बापू का खून हो लेकिन गधा भी तो धोबी का लाल है। लाल वही जो कमाई
करके दे, गधा खूब लाद कर ले जाता है और कमाई होती है। कमाई को लादने की जरूरत नहीं
होती क्योंकि वह तो धोबी की जेब में समा जाती है। धोबी गधे पर लादे कपड़ों की
भरपूर धुलाई करता है, उन्हें चमकदार बनाता है लेकिन गधे को एक दिन भी नहीं नहलाता।
कहता है कि वह तो कपड़ों को भी कूट पीट कर चमकाता है। अगर गधे को चमकदार बनाने की
कोशिश की और वो कुछ ज्यादा ही चमक गया तो जरूर किसी चिकनी चमेली गधी के पीछे हो
लेगा, और उसकी कमाई को दुलत्ती लग जाएगी। यह प्यार की पुंगी बजना है, बजाते चलो।
बाबा बजा रहे हैं, नीलामी करने वाले बजा रहे हैं तो व्यंग्यकार और अखबार वाले भी
इस दौड़ में पीछे क्यों रह जाएं।
गधे की इस दुलत्ती से बचने के लिए धोबी का तर्क मौजूं लगता है लेकिन चिकना
बनाने के चक्कर में ज्यादा कूट पीट दिया या निचोड़ पटक दिया तो उसके खून से भी
घास लाल हो जाएगी। इससे भी बचने के लिए वह गधे को नहलाने से बचता रहा है। वैसे भी
गधा नहाए या बिना नहाया रहे, कमाई तो उतनी ही करेगा। दुलत्ती भी उतनी ही मारेगा
और ढेंचू ढेंचू में भी उसकी कोई फर्क नहीं आएगा। जितना समय गधे को नहलाने में
बरबाद होगा उतने में तो और पचास जोड़ी कपड़े धो पटक लेगा और अपनी कमाई में इजाफा
करेगा।
मामला बापू के खून से सनी घास की नीलामी का है और मैं भटक या अटक गया हूं
धोबी और गधे पर। धोबी की कमाई पर क्योंकि कमाई की जो महत्ता है, वह सर्वोपरि है।
कमाई का मामला हो तो भटकना स्वाभाविक है। आजकल बाबा किरपा कर रहे हैं लेकिन असल
मामला नोटों का है। नोट में लोटने के लिए बाबा बनना सबसे अच्छा बिजनेस है। चाहे
कोई बाबा कहे या गधा कहे, गधा मिट्टी में लोटेगा और बाबा नोटों में, धोबी घाट पर
लेकिन घाट के पत्थर पर लोटना उसकी नियति है, गधा इसलिए धूल में लोट कर खुश हो
लेता है। पत्थर की प्रकृति सख्त होना है। वह मुलायम नहीं हो सकता, उससे भगवान
बना दो या इंसान की मूर्ति लेकिन सख्ती उसमें से गायब नहीं हो सकती है। वही सख्ती
माया या उसके हाथियों की मूर्तियों में से गायब होने की भनक पाकर, माया हनक में
लौट आई है। यह किसने कहा है कि जो हार जाता है, वह हनक नहीं रखता। हारने के बाद क्योंकि
अब उसकी निगाहें केन्द्र पर हैं जो जरूर तो सत्तरवें आसमान पर ही होगा, क्या
आपको इसमें कोई शक है ?
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