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फांसी का शून्‍यकाल टूट गया : दैनिक जनवाणी 12 फरवरी 2013 स्‍तंभ तीखी नजर में प्रकाशित



फांसी के हौसले इस कदर बुलंद हुए कि गरदनें बुरी तरह दहशतजदा हो गई हैं। वे सोच रही हैं कि सभी कारनामों को दिमाग ने अंजाम तक पहुंचाया था। समझावन लाल ने भी भरपूर समझाया था पर दिमाग की समझ में नहीं आना था, सो नहीं आया।  मामला गरदनों से रस्सियों की सौदेबाजी का सामने आया है। मीडिया ने अपनी आदत के मुताबिक इसे मिलीभगत का नाम दिया है, कोई सांठ गांठ बतला रहा है। मीडिया इसलिए मजबूर है क्‍योंकि इसी से टीआरपी में इजाफा होता है।  फांसी सुर्खियों में है जबकि रस्सियों के इतिहास खंगाले जा रहे हैं। किसी भी रस्‍सी को सुर्ख लाल नहीं पाया गया है। कातिल रस्सी है पर दोष जल्‍लाद के सिर मढ़ा गया है। वही सजाधारक के पैर छूता और माफी मांगता पाया गया है और रस्सियां किसी शातिर नेता के माफिक साफ बच निकलती हैं क्‍योंकि वे आरी की तरह गरदन नहीं कतरती हैं।
संगत का असर किस तरह दुर्गति करता है, दिखाई दे रहा है। इसी वजह से कहा गया है कि पुलिस की न दोस्‍ती भली और न दुश्‍मनी। वह किसी पर कभी भी अपने डंडों से कहर का जहर बरपा देती है। पुलिस मनी के लालच और डंडे की ताकत के वशीभूत हो अपने खुद के मन को बिसरा बैठी है। जिस पर बीतती नहीं है, वह क्‍यों याद करेगा। इसलिए सब चुप हैं। गलों को भय का ग्रहण लग गया है। गलों के बाहर रस्‍सी का डर इतना व्‍यापक असर डाल रहा है कि गले के भीतर खराश होनी लगी है और डर रिस रिस कर बाहर आ, सबको डरा रहा है। यह खिचखिच किसी गोली के चूसने से भी नहीं खींची जा सकी है। मौत के भय को यूं ही हल्‍के में लेकर भला आज तक कोई खारिज कर सका है। उपनामों और नामों में निडर, निर्भय, निर्भीक, बहादुर जैसी उपमाओं को जोड़कर भी खौफ का आलम मिटाए नहीं मिट रहा है।
रस्‍सी का इतिहास कुंए से भी अधिक पुराना है, बाल्‍टी से इसका पुराना याराना है। पहले पानी निकलाने के लिए रस्‍सी सहारा बनती रही है। रस्‍सी पर लटक कर बाल्‍टी कुंए में बेखौफ उतर जाती है और भरी बाल्‍टी से इंसान अपनी ताकत और बुद्धि के बल पर पानी पा लेता है, नाम बाल्‍टी का और उस पानी से इंसान नहा लेता है, पी लेता है, प्‍याऊ लगाकर परोपकार भी करता है। बाल्‍टी पर डर का महल नहीं बनता है, कुंए के पानी को भी कई बार लगता है डर कि कहीं बाल्‍टी गिर गई तो उसका सिर न फूट जाए। कुछ अधिक बुद्धिमान लोगों को खुदकुशी के लिए पानी में कूदते देखा गया है। ऐसे लोग पानी लाने के लिए कूदते हैं किंतु उन्‍हें कुंए से बाहर निकालने के लिए भी रस्‍सी ही संबल बनती है। होली के दिनों में कितने ही भंगेड़ी कुंए में भांग तलाशने के लिए उतर जाते हैं। वे कुंए में भांग को मुहावरा नहीं, सच्‍चाई मान लेते हैं। रस्‍सी की ताकत को इग्‍नोर करना न तब अच्‍छा था और न अब भला है। रस्‍सी का जबकि रेस में कोई योगदान नहीं रहता है पर रेप में वह कई बार रंगी हुई पकड़ी गई है। रस्‍सी की सरंचना और उसके गठन की अद्भुत कारीगरी की उपमा सिर्फ लकडि़यों के उस गट्ठर से दी जा सकती है,  जिनका गट्ठर बनाकर तोड़ना एक अकेले के बूते में नहीं होता। पानी जरूर पानी पानी कर देता है पर रस्‍सी कभी रस्‍सी रस्‍सी नहीं कर पाती है।
नेता लोगों आजकल अपने बयानों को गुनगुनाते हैं जबकि पब्लिक और मीडिया उन्‍हें भुनभुनाहट मानता है। यह आहट निराली होती है जबकि जब गरदनों में रस्‍सी का फंदा डाला जाता है तो न कोई आहट होती है और न तनिक सी सरसराहट सुनाई देती है। इसका अर्थ कानों के खराब होने अथवा कानों में दीवार होने से न लगाया जाए। यह माहौल की जरूरत को रेखांकित करने का अनोखा सरकारी अंकन है। फांसी से बचता सरकारी खर्चा है इसलिए रोज उसे ही दिए जाने की गर्मागर्म चर्चा है। 

वोट की फसल का मौसम : दैनिक जनवाणी स्‍तंभ 'तीखी नजर' 8 जनवरी 2013 में प्रकाशित


चश्‍मे के बिना यहां भी पढ़ सकते हैं 


आज दोपहर में जब मैं हजारीलाल के पास हजामत करवाने पहुंचा तो ऐसा लग रहा था मानो सर्दी ने भी दुष्‍कर्म की पीडि़ता के मामले पर अपने रौद्र रूप में उपस्थित होकर विरोध दर्ज करा दिया है। दुकान में घुसते ही मुझे ठिठकना पड़ा क्‍योंकि हजारीलाल बुक्‍का फाड़कर हंसने लगा। उसकी इस हरकत से दुकान में मौजूद सभी ग्राहक और कर्मचारी फैसला नहीं ले पा रहे थे कि वे मुझे देखें या हजारीलाल के हंसने को। बेकाबू होकर वे मुस्‍कराएऔर हैरानी से उसे और मुझे बारी-बारी से देखते रहे कि उसे हंसने का भयंकर दौरा क्‍यों पड़ा है। मुझे अपने पर शक हुआ और जैकेट से नीचे देखने पर पैंट को यथास्‍थान पाया तो मुझे राहत मिली,  फिर लगे हाथ पैंट के नीचे पहनी गर्म पजामी को भी चैक कर लिया और तिरछी निगाह से नीचे देखने पर दोनों जूतों जुराबों को भी एक रंग और डिजाइन का ही पाया। मैंने अपनी आखि‍री तसल्‍ली मूंछों पर हाथ फेरकर कर ली,तब मेरी जान में जान आई। 
हजारीलाल बोलामुन्‍नाभाईआपने भी अखबार की हैडलाईनें पढ़ी होंगी कि महिलाओं को सुरक्षा दे सरकारें। फिर उस पर त्‍वरित टिप्‍पणी भी कर डाली कि जो सरकारें खुद ही सुरक्षित नहीं हैं और बीते दिनों उन्‍होंने महिलाओं पर पुलिस से डंडा चलवाकर अपनी सुरक्षा को मजबूत करने की कोशिश की है। वे महिलाओं को पिटवाएं या उन्‍हें सुरक्षा दिलवाने में अहम रोल अदा करें।  मैंने हजारी लाल को चेताया कि तुम्‍हारा दिमाग फिर गया हैजानते नहीं हो कि यह नोटिस सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया है,  जिसमें केन्‍द्र और राज्‍य सरकारों से इस बारे में चार सप्‍ताह में जवाब मांगा है और तुम हंसकर कोर्ट की तौहीन कर रहे होबुरे फंसोगे।
हजारीलाल ने कहा कि मेरी क्‍या मजाल कि मैं सुप्रीम कोर्ट की शान में गुस्‍ताखी करूं। मैं सरकारों के बेहूदा चाल-चलन के बारे में बतला रहा हूं क्‍योंकि उसे चलाने वाले दुष्‍कर्मी हैं। जो आधार कार्ड के बहाने गरीबों के खातों में सब्सिडी के नाम पर नकद ताकत जमा कर रहे हैं। मेरे खाते में भी 600 रुपए जमा मिले हैं ताकि मैं सीधे-सीधे अपने परिवार के पांच वोट उनके पक्ष में समर्पित कर दूं और उनकी सरकार की सुरक्षा सुनिश्चित हो जाए। सरकारें पब्लिक को मूर्ख समझ चरित्रहीन बनाने पर आमादा हैं।
जो खुद कुकर्मी हैं वे महिलाओं की सुरक्षा की गारंटी क्‍यों देंगे। हजारीलाल की बात में दम है  क्‍योंकि‍ हज्‍जाम वह शौकिया नहींनौकरी न मिलने की मजबूरी से बना है। और इससे इस बात की भी पुष्टि होती है कि उसे अपनी और अपने परिवार के सभी सदस्‍यों की दाल-रोटी की चिंता है। वह सिर्फ अपने शौक पूरे करके अपने बच्‍चों को भूखा मारने के पक्ष में नहीं है। उसने पॉलिटिकल साईंस में ऑनर्स कर रखा है। उसने यह भी बताया कि यह संज्ञान सुप्रीम कोर्ट ने स्‍वयं नहींएक वकील की याचिका पर सुनवाई के अनुरोध पर मंजूरी देते हुए लिया हैइसलिए इसमें सुप्रीम कोर्ट की अवमानना वाला मामला नहीं बनता है। फिर दिल्‍ली की सीएम इस मुद्दे पर जनवरी’ माह में पैदल मार्च’ कर रही हैं। जबकि काफी कड़े फैसले वे स्‍वयं लेने और लागू करवाने में सक्षम हैं। पर वे ऐसा करेंगी तो वोटों की खेती करने की अपनी जिम्‍मेदारी को कैसे पूरा करेंगी। आप तो जानते ही हैं मुन्नाभाईयह मौसम वोटों की खेती के लिए कितना अनुकूल है। इस समय भरपूर फसल काटी जा सकती है। मानवाधिकार आयोग की नींद भी महिलाओं के सुरक्षा मसले पर उचट गई है परन्‍तु क्‍या गारंटी है कि वह दोबारा से गहरी नींद में नहीं सो जाएगा।
आज फिर मैं हजारीलाल के तर्क के आगे मैं बेबस था। बस’ में सफर करने में वैसे भी खतरे बढ़ चुके हैं।

खादी वाला सफेदपोश गुंडा : दैनिक जनवाणी स्‍तंभ 'तीखी नजर' 27 नवम्‍बर 2012 के अंक में प्रकाशित

दैनिक जनवाणी पेज 10


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जयशंकर प्रसाद की कहानी ‘गुंडा’ और उसका मुख्‍य किरदार ‘नन्‍हकू’ खूब फेमस हुआ। गुंडागिरी, लंपटता, चोरी, डकैती में कमाई की भरपूर संभावनाएं रही हैं जबकि इनके विकल्‍प के तौर पर आजकल राजनीति जरायमपेशाओं के लिए काफी मुफीद हो गई है। चोरी करना वह काम है जो छिपकर और बचते बचाते और मुंह छिपाते किया जाता है किंतु जब इसे निर्लज्‍ज, बेशर्म या दबंग होकर ढीठता से अंजाम तक पहुंचाया जाए तो वही डकैती हो जाती है। चोरी और डकैती के भिन्‍न अर्थों का यह सामान्‍यीकरण है।  
समाज में गुंडई और दबंगई के नए-नए प्रयोग किए जा रहे हैं, इससे गुंडों की रुचि-संपन्‍नता का पता चलता है। नेता वही जो गुंडई करें और इन्‍हीं के कारनामों से गुंडई के निहितार्थों को पब्लिक बेहतर तरीके से जानने और समझने लग गई है। इसमें रोजाना हो रहे बदलावों से आम पब्लिक रूबरू हो रही है।
फिल्‍मों में सभी प्रकार के गुंडों का वर्चस्‍व रहा है और वे पब्लिक को भाते हैं। फिल्‍मों का सबसे मनपसंद गुंडा शोले के गब्‍बर सिंह को माना जा सकता है जिसने गुंडा-सह-डाकू के कॉम्‍बो किरदार में जीवन के अनूठे रंग भरकर विलेनत्‍व को भरपूर ऊंचाइयां दीं। कितने डाकू और विलेन आए परंतु कोई गब्‍बर की महानता को छू भी नहीं पाए। गब्‍बर‍ सिंह की ऐसी शख्सियत से प्रभावित होकर नेता भी गुंडई पर उतर आएं है तो इसमें हैरान होने की बात नहीं है, यह समय की पुकार है। नेता यूं तो सभी कारनामों पर अपना अवैध कब्‍जा कर चुके हैं परन्‍तु जिम्‍मेदारी लेने से सदा पीछे रहे हैं। कुछ कहें और शोर मच जाए तो डर कर तुरंत मुकर जाते हैं। गुंडईकर्म की पहचान आजकल नेताधर्म से होने लगी है। नेताओं के इस क्षेत्र में धाक जमाने से गुंडई में निर्भीकता का बोलबाला बढ़ गया है।
गुंडाकर्म जिसे मवालीगिरी कहा जाता है, को भरपूर प्रतिष्‍ठा मिली है। यह गर्व का सूचकांक बन गया है। इसके विरोध में चाहे मीडिया कितना ही चीखे चिल्‍लाए, पब्लिक सोशल साइटों पर कमेंट करेलाइक करे या जमकर हल्‍ला–गुल्‍ला करे। फिल्‍मों में चोर खुद शोर मचाते रहे हैं। शशिकपूर अभिनीत फिल्‍म ‘चोर मचाए शोर’ का नाम बेसाख्‍ता आपके जहन में कौंध गया होगा। वही शोर मचाने का जिम्‍मा आजकल आम आदमी’ ने संभाल लिया है।  इसी के परिणामस्‍वरूप शोर मचाने को वैधानिक मान्‍यता दिलाने के लिए आम आदमी’ नामक एक दल रूपी दलदल की स्‍थापना हो चुकी है। जल्‍दी ही आप शोरगुलनामक पार्टी को चुपचाप राजनीति में घुसता देखेंगे।  
‘आम आदमी’ जब चर्चा में है तो ‘आम औरत’ क्‍यों न चर्चित होना चाहेगी। उनके मन में भी  ‘आम आदमी’ के कंधा से कंधा मिलाकर कंधा मिलाने का सुख लूटने की हसरत पलती होगी।  बस मेरी आपसे इतनी गुजारिश है कि आप लूटने को लेटना मत समझ लीजिएगा। चर्चा  गुंडई के विभिन्‍न रूपों की हो रही थीं कि लूटना से लेटना तक भटक गई जबकि विमर्श गुंडई पर केन्द्रित हो गया। दरअसल, इसके लिए दोषी व्‍यंग्‍य लेखक नहीं है। यह सब चीजें आपस में इतनी रली मिली हैं कि इनमें मिलावट होने का भ्रम होने लगता है। एक की चर्चा हो रही हो तो दूसरी भी उसमें कूद पड़ती है और मानव मन इनकी कूदन--कला से मुग्‍ध हुए बिना नहीं रहता। जो सहज अपनी गति से चल रहा है,वह परदे के पीछे छिप जाता है।
‘वर्दीवाला गुंडा’ फिल्‍म हिट हुई और इसका उपन्‍यास खूब बिका। यह गुंडों की शराफत है वरना वे बे-वर्दी वाला गुंडई कर्म निबाहने में पीछे नहीं रहते हैंबलात्‍कार इसी को तो कहते हैं। गुंडे का क्‍या है विवस्‍त्र होकर भी कूद सकता है। वर्दी खाकी भी हो सकती है और खाली भी, सेना की भी और खादी की भी। सुर्खियों में आने के लिए एक चिकित्‍सा मंत्री ने अपना ही इलाज कर डालाइसे कहते हैं ‘अपना इलाज बवाले जान’। मंत्री ने खुद को ‘खादीवाला सफेदपोश गुंडा’ कहकर हल्‍की सर्दी के माहौल में गजब की गरमाहट ला दी है। इससे उनकी मल्‍टीटास्किंग प्रतिभा का परिचय बखूबी मिल जाता है। खादी को प्रतिष्‍ठा और सम्‍मान दिलाने के लिए महात्मा गांधी जी चरखा काता। उसी को कुख्‍याति और अपमान का सूचक सिद्ध करने में मंत्री ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। खादी की साख को राख करने के लिए नेताओं ने सफेद खाकी में खूब कारनामे किए हैं परंतु अ‍ब खुले आम स्‍वीकार करके अपनी नेकनीयत को जाहिर  कर दिया है। देश का खूब तेजी से विकास हो रहा है इसलिए उन्‍होंने खुद को खादीवाला गुंडा कहकर परोक्ष तौर पर गांधीगिरी को दोबारा से जीवंत कर दिया है और खादी की इज्‍जत को सरेआम मिट्टी में सान करके लूट लिया है। गुंडों का खादी पहनना मुझे तो अचंभित नहीं कर रहाकहिए कैसी रही ?

फोटू खींचने वाले सावधान : दैनिक जनवाणी स्‍तंभ 'तीखी नजर' 20 नवम्‍बर 2012 अंक में प्रकाशित


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मंत्री के कहे का मंतर नहीं है। काटे का जंतर नहीं है। अनशन कैसे करे उसके लिए रामलीला मैदान नहीं है। नहीं से मतलब अवेलेबल है किंतु डरकर देते नहीं हैं, कोई अनशनकारी कब्‍जा न जमा ले। बीते दिनों एक मंत्री ने कैमरों को धमकाया था और इस बार मंत्री का फोटू खींचना जुर्म हो गया। फोटू खींचने वाले को खींचा और जेल में डाल दिया। जरूरी नहीं है कि फोटो किसी अभिनेत्री की हो। वे कुछ भी कहते हैं, फर्क नहीं पड़ता। जब वे कहे से मुकरते हैंतब मानना पड़ता है। ट्विटर पर लिखते हैं और सरकाय लेते हैं। सरकना सिर्फ मंत्री ही नहीं जानते हैंसरकना विषधर का स्‍थायी गुण हैवे आस्‍तीनों में निवास करते हैं। आजकल हालत इतनी पतली हो गई है कि कोई चलता हैकोई मचलता है और कोई मचल-मचल कर चलता है। इनमें कई क्रियाएं तो खूब गजब ढाती हैं। मचल-मचल कर चलना, उछलना-कूदना नहीं है जबकि कई अर्थों में इस्‍तेमाल किया जाता है।
पुरुष मचल-मटक कर चले तो शक होता है कि वह पुरुष हैगे तो नहीं। जबकि गे होना उसकी अदाएं जाहिर कर देती हैं। कन्‍या मचले तो देखने वालों के दिल बिखर जाते हैं। दिल के मचलने में चलने की जरूरत नहीं होती है। दिल का तेजी से धड़कना भी मचलना ही है। दिल धड़कना और मचलना बहुत जरूरी है इससे ही मालूम होता है कि दिल गतिशील है। किसी कन्‍या के मचलने को देखकर मचले तो प्रगतिशील है। शरीर में दिल के सिवाय कुछ और गतिमान हो जाए, तो बवंडर हो जाता है। आंखों की क्रियाएं खतरनाक कही गई हैंकर्म पलक का और लक खराब आंखों का। दोनों पलक एक ही स्‍पीड में झपकें तो ठीक वरना तो पल भर का अंतर कितने ही चमत्‍कार दिखला देता है। तेजी से झपके तो भी गंडागोल। यह पलक झपकाना यानी एक आंख बंददूसरी खुली और दिमाग चाहे क्‍लोज होकोई फरक नहीं अलबत्‍ता। कैमरे को क्लिक करने के लिए एक पलक को बंद कर लिया जाता है। कैमरा बीच में न हो तो यही अपराध हो जाता है। दंगे हो जाते हैं ऐसा कारनामा नीयत के नए प्रतिमान स्‍थापित कर देता है। बीच में कैमरा भी हो और पलक झपकाई की रस्‍म चल रही हो, यकायक फ्लैश दमक उठे तो भी खतरा बरकरार रहता है।
न जाने कब किस भेस में मंतरी मिल जाएंआपने क्लिक किया और उनके हिमायतियों ने क्विक एक्‍शन लिया और क्षण भर में आप जेल में। हिमायती बारातियों से भी खूंखार होते हैं। आपके जेल में जाने से जेल भरती नहीं है किंतु आपका जीना खाली कर देती हैं। आपकी कल्‍पनाओं का महल भरभराकर ढह जाता है। आपने सोचा था कि मित्रों कोनाते रिश्‍तेदारों को दिखलाएंगे कि वे मंत्री जो खूब बयान झाड़ते हैंगरीबों की चादर अपने बयानों में खींच-खींच कर उघाड़ते हैं और उन्‍हें गरीब नहीं मानते, आपने उनकी खींच ली है। मंत्री चाहते हैं कि उनकी खूब फोटुएं खिंचे। अभिनेता चाहते हैं कि उनकी ही खिंचें और उनकी अभिनीत फिल्‍मों के टिकट खिड़की पर खूब बिकें। चाहत सबकी पूरी होती है किंतु एक फोटू खींचने वाले पर आफत आ गई। हिमायतियों को लगा कि उनके मंतरी की धोती पर खतरा है,  धोती खींचना यूं तो अपराध नहीं है क्‍योंकि दुकानदार जब धोतियों को बेचता है तो खींच-खींच कर बेरहमी से शो केस से बाहर निकालकर संभावित खरीददार के सामने पटक कर उसकी नुमायश लगा देता है। फोटू खींचने वाले की हसरतों पर जेल चल गई। कहां तो सोचा था कि बीवी पर रौब गालिब करूंगा कि मैंने मंत्री को देखाउसकी फोटू खींची किंतु वे अरमां ही क्‍या हुए जो आंसुओं में न बह जाएं। कैमरे का मालूम नहींकहां पर किस अवस्‍था में बिसूर रहा होगाहो सकता है कि मिल्कियत ही बदल गई होन जाने किसने कैमरे की याददाश्‍त को खंगाल कर उसका पोस्‍टमार्टम कर दिया हो।
फोटू खींचने पर जेल जाने से एक नई परंपरा की शुरूआत हुई है। इससे पहले कार्टून बनाने कार्टूनकार को जेल भेजा गया था। हे हिंदी ब्‍लॉगरोंफेसबुक के गिरधारियोंट्विटर उड़ाने वालों और सोशल मीडिया पर अभिव्‍यक्ति की आजादी का नारा बुलंद करने वालों,अब सावधान हो जाओ। कभी भी किसी का भी नाड़ा खोला जा सकता है और पायजामा सरकने पर कितनी थू-थू होती हैइतना तो तय है कि आप पायजामा सरकने से सेलीब्रिटी बनने से रहे। अपने नाड़े को किसी मॉडल के ब्रॉ का हुक मत समझ लेना जो रैम्‍प पर बेवफा हो गया तो उसका जीवंत प्रसारण हो रहा होगा। नाड़ा कब फांसी का फंदा बन जाएगाइसे जान नहीं पाओगे। पूरी उम्‍मीद है कि अगली बार आप फोटू खींचते या कार्टून बनाते नहीं पाए जाओगे।

मच्‍छर बड़ा दिलदार निकला : दैनिक जनवाणी 13 नवम्‍बर 2012 स्‍तंभ 'तीखी नजर' में प्रकाशित

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 ‘मैं डेंगू मच्‍छर हू’ जल्‍दी ही आप ओपनमैन की सभाओं में, टीवी चैनलों की फिजाओं में, अखबारों की कालिमा में मतलब चहुं ओर ऐसे टोपीधारक पाएंगे। जो मच्‍छर मच्‍छर चिल्‍लाएंगे, किंतु काट किसी को नहीं पाएंगे। मैं भी मच्‍छर, तू भी मच्‍छर, ये भी मच्‍छर, वे भी मच्‍छर हैं। नेता कहते पाए जा रहे हैं कि मच्‍छरों तंग मत करो। आजकल ऐसे बयान थोक दरों पर उपलब्‍ध हैं। इन बयानों से आपको हैरानी हो सकती है किंतु टोपियों से परेशानी नहीं। टोपी पहनने और पहनाने का चलन फिर से जोरों पर हैं। जिस प्रकार वाहनों के पीछे शेर लिखे जाते हैं, उसी प्रकार आजकल टोपियों पर पंच लाईन मढ़ी जा रही है। आम आदमी चलता फिरता वाहन नजर आ रहा है। टोपी पहनकर अपनी स्‍पीड बढ़ा रहा है। बीते जमाने में रिक्‍शे पर फिल्‍मी पोस्‍टर लगाकर आने वाली और चल रही फिल्‍म की मुनादी रिक्‍शे के आगे ढोल पीट रहे ढोलचियों के जरिए कराई जाती थी और उससे फिल्‍म के व्‍यवसाय में इजाफा होता था। 

आजकल उन ढोलकों को आप गले के फंदे के तौर पर कसा हुआ देख रहे हैं। इससे ढोलकों की पौ बारह और तबलचियों की पौ सत्‍तर हो गई है।  आज वह शुभ कार्य तबलचियों के जिम्‍मे आ पड़ा है और वह उसे पूरी शिद्दत से निबाह रहा है। इनमें वे लोग हैं एक तो वे जो ओपनमैन के मुरीद हैं और दूसरे खुद ओपनमैन डेंगू मच्‍छरों के फैन है। किंग खान वाला किस्‍सा फिजा को संगीन यादों से रंगीन कर रहा है।

लोग सीधी ऊंगली से घी नहीं निकालते हैं क्‍योंकि कम निकलता है।  ऊंगली टेढ़ी करने या घुमाने फिराने से भी मनमाफिक नतीजा नहीं मिलता है। सो आज सीधी ऊंगली से बरतन को टेढ़ा किया जाता है। टेढ़ा बरतन तुरंत उलटता है और घी की मनचाही मात्रा हासिल हो जाती है।  सीधी ऊंगली से घी के बरतन को टेढ़ा करना कामयाबी की नई मिसाल है। मच्‍छर को सबसे पहली सुर्खी नाना पाटेकर के संवाद की देन है और दूसरी अब ओपनमैन की। एक अभिनेता है और दूसरा अभी-अभी नेता बना है। मच्‍छर की किस्‍मत बुलंदी के शिखर पर है, वह आम आदमी के सिर पर टोपी बनकर छाने वाला है। मच्‍छर अगर फेसबुक खाता खोल ले या ट्विटर एकाउंट बना ले तो शर्तिया सोशल मीडिया के शहंशाहों को बुरी तरह पछाड़ देगा। आखिर पिछले हफ्ते ही उसने कसाब को काटा है। कसाब डेंगू मच्‍छर के जहर से भी जहरीला निकला इसलिए बच गया और जिस मच्‍छर ने काटा, वह मर गया।

मच्‍छर निरक्षर लिखे हुए को पढ़ना नहीं जानता किंतु कसाब को पहचानता है। जरूर किसी खुफिया विभाग में रहा होगा या किसी खुफिया अधिकारी को खुफिया तरीके से काटा होगा। कसाब को काटना उसने ओपनीय रखा है गोपनीय नहीं। पंखा चलाओ तो मच्‍छर भाग जाते हैं। मच्‍छर का मंडराना जब मन को दिखाई नहीं देगा। मच्‍छर गूंज गूंज कर, मंडरा मंडरा कर आम आदमी के मन को डराने में मशगूल है ओपनमैन के माफिक। यह मच्‍छर का प्रिय शगल है।

मच्‍छर जब खून का स्‍वाद ले चुका होता है और अपनी सुई आम आदमी की त्‍वचा से बाहर निकालता है, तब टीस जरूर होती है किंतु तब तलक बहुत देर हो जाती है, मच्‍छर खून पी चुका होता है। आप टीस वाली जगह पर ताली बजाते हैं और मच्‍छर चुपके से खिसक जाता है। आप थोड़ी देर से प्रतिक्रिया करते तो आपके खून के नशे में अलमस्‍त वह अवश्‍य शिकार बनता। ‘मच्‍छर का पट्ठा’ बड़ा दिलदार निकला। उड़ कर बचने वालों का सरदार निकला। वे कह रहे हैं कि मच्‍छर का काम भुनभुनाना है और ओपनमैन यही कर रहा है। ओपनमैन मच्‍छर की तरह गजब नहीं ढा पाएगा। कसरत जो मच्‍छर करते हैं, वह उसके बस की नहीं है, फिर कैसे साबित करेगा कि ‘मैं डेंगू मच्‍छर हूं।‘ जिस जिसको उसने काटा है, चूमा है अथवा चाटा है, वे सब सुरक्षित हैं।  
तुम मच्‍छर हो, विषधर होते तो तनिक चिंतित हम होते, सोचते, किंतु सत्‍ता रूपी धरा के विषधर हम हैं। विषधरों की मंडली से नाहक ले रहो हो पंगे, पानी से पलते हो किंतु पानी ही तुम्‍हारी मौत का सबब बन सकता है, नहीं जानते इसलिए बचा नहीं पाओगे खुद को, कर देंगे पानी से ही इतने घाव।

फेरबदल नहीं है चोरी : दैनिक जनवाणी स्‍तंभ 'तीखी नज़र' 30 अक्‍टूबर 2012 में प्रकाशित



मौन रहके कोई कितना मुखर हो सकता है,मौनी बाबा से बेहतर मिसाल नहीं मिलेगी। उनके कुनबे में फेरबदल होती है तो शतरंज की तरह मोहरे बदले जाते हैं और मुखिया खुद मोहरा बन जाता है। ऐसी हेराफेरी निःशब्द होती है और मीडिया प्रायोजित रूप से स्तब्ध रह जाता है। यह सब पूरी ईमानदारी के साथ होता है और जनता को काटने के लिए हथियार बदल दिए जाते हैं। जनता को नए सपने देखने का संकेत किया जाता है और इस बहाने कई फूटे-अधूरे सपने पूरे कर लिए जाते हैं। मलाई खाने वाले अघाकर एक ओर हो जाते हैं तो नई पारी के लिए दूसरे अपनी जीभ तैयार करने लगते हैं। मलाई खाकर देशसेवा का बोनस मिलता है, सो अलग मन को मोह लेता है।
ईमानदार को यह अधिकार है कि वह ईमानदारी पर डटा रहेसो जमा हुआ है अंगद के पांव के माफिक। फिर उसे हिलाने वाले कैसे कामयाब हो रहे हैंइसे जानने के लिए हालातों पर गहराई से गौर करना निहायत अनिवार्य है। बजाय इसके देश और इसके नागरिक फीलपांव का सुंदर अहसास कर रहे हैं क्‍योंकि उनके सामने परिस्थितियां ही ऐसी पेश की जा रही हैं। पब्लिक वही देखने के लिए मजबूर है जो उसे सत्‍ता पक्ष दिखलाना चाहता है। इससे अलग अहसास पब्लिक कैसे करेइसके लिए नया मीडिया आज अपने पूरे रुतबे के साथ मौजूद है। इसी से आत्‍मबल डगमग है। जिसकी डगमगाहट मुखिया के निर्णय में देखी जा रही है। पूरा मोहल्‍ला तो नहीं बदलाहल्‍का सा फेरबदल ही किया है। कौन कह रहा है कि हेराफेरी का बाजार जमा लिया है। अंत भला सो सब भला। सब भले रहेंचंगे रहेंचाहे पब्लिक के सामने नंगे रहें। किंतु वस्‍त्रों का अहसास होना ही काफी समझा जा रहा हैउन्‍हें पहनें अथवा नहीं पहनें। इसकी वजह में जाना सामाजिक दृष्टि से उचित नहीं है।
पंगे सिर्फ पब्लिक से ही लिए जाते हैं। टीम के मुखिया ने भूल कर दी तो कौन सा पहाड़ टूट कर आ गिरा, चुनाव आने पर उसकी पीठ पर हाथ फिरा देंगे। वह तसल्‍ली पाएगा,उनके चुनने का जुगाड़ सध जाएगा। एकाध नुक्‍कड़ वाले से ही तो बदला लिया है। कैप्‍टेन वही है जो चुप रहता हैचुप सहता है। जब विचारों की बाढ़ आती हैटीम सारी जुट जाती है। जिसका नाम टीम में नहीं हैजो सिर्फ दर्शक की हैसियत से शुमार हुआ था। फेरबदल को हेराफेरी की तर्ज पर बिठाकर इंतहा तक पहुंचाया, अहसास यह किया कि इसको पीठ पर लादे चल रहे हैं। इसे ही कहते हैं कि आजकल गधों के ही नहींघोड़ों के भी सींग निखर रहे हैं। एक को सींग मारादूसरे से सींग पर पालिश करवाकर चमकवाया। सींग पर भरपूर चमक आई जिससे पब्लिक समेत विपक्ष चौंधिया गया। इसको टीम से निकालाउसको टीम में घुसेड़ा। दो चार को रुसवा किया। पब्लिक को हंसने के तोहफे दिए। एक दो ने भड़ास निकाली। डेढ़ ढाई की आस पूरी हुई। टीम में परिवर्तन से कामयाबी में तेजी की उम्‍मीद बंधी है किंतु इसके सिवाय कोई और निष्‍कपट रास्‍ता ही नहीं था। आपका सोचना भी सही है कि रास्‍ता नहीं था तो हवाई मार्ग से जाना चाहिए था। रेल की पटरियों को आजमाना चाहिए था किंतु क्‍या करें इतना सब्र होता तो अगले चुनाव होने तक इंतजार नहीं करते।
मंत्रियों को आप सिर्फ लोकल मंतर मारने वाला ही मत मान लीजिएगा। वे अपने खेल और मैदान के माहिर खिलाड़ी हैं। यह अकेले खेलने वाला खेल हैइसमें विजय पक्‍की होती है। उनकी जीत पर सिर्फ टिप्‍पणियां ही कर सकते हैं यहजबकि इनकी टिप्‍पणियों को कोई गंभीरता से लेता नहीं है। न सत्‍ता पक्ष और न आम जनता यानी पब्लिक। क्रिकेट टीम में फेरबदल और मंत्रिमंडल में यह फेरबदल हेराफेरी के पर्याय के तौर पर जाने जाते हैं। यह फेरबदल तो ऐसा है कि जो अभी तक साईकिल चलाता रहा हैउसको कार थमा दी गई है कि इस पर खूब सारी एवरेज निकालिएचाहे हादसे होते रहें। रेल और कार से दुर्घटनाएं करने के बाद भी हवाई जहाज उड़ाने को थमा दिया जाता है। देश के मौजूदा कानूनों से खिलवाड़ करने की योग्‍यता हासिल करने के बाद इन्‍हें विदेश तक जाने का लाईसेंस थमा दिया गया है। देश में मधुर संबंधों की जरूरत नहीं है किंतु विदेशों से नाते रिश्‍तों को मधुर बनाने के ठेके इन्‍हें सौंप दिए गए हैं।

धमकाने की कानूनी मान्‍यता : दैनिक जनवाणी 23 अक्‍टूबर 2012 स्‍तंभ 'तीखी नजर' में प्रकाशित


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निहायत ही शरीफ कानून मंत्री का सड़कछाप आम आदमी को धमकाना जायज ठहरता है क्‍योंकि इस समय वे अपने पूरे रुआब और शबाब पर हैं, वैसे भी आम आदमी की मजाल कैसे हुई कि उसने अपनी सड़क की करतूतों को अखबार की खबरों और चैनल की फिल्‍मों में जारी करवाने की हिमाकत की। ऐसे में कोई भी ऐरा-गैरा अगर उनको आईना दिखाता है तो वे आईन को ताक पर रखने में तनिक भी गुरेज़ नहीं करेंगे। माननीय मंत्री ने इसी दिन के लिए कई साल पढाई की थी क्‍या, कि कोई भी आकर उन्‍हें पढ़ा जाए। दमदार हैसियत के मालिक होकर न धमकाना और अपने तर्क पेश करनातभी पॉसीबल होता है जब सामने रुतबे के बराबर योग्‍य व्‍यक्तित्‍व हो।
पोल खोल कर अपने व्‍यक्तित्‍व का निर्माण इस संसार में कोई चिरकुट किस्‍म का जासूस भी कर सकता है। अब जो उनकी पोल खोलना चाह रहा है या उन्‍हें धमका रहा हैवह सिर्फ विकलांगों का शेर बनकर सामने आया हैउससे मुकाबले के लिए उनकी फौज (पुलिस) ही काफी है। वैसे उनके पास पुलिस से इतर खतरनाक टाइप के बन्‍दे भी बहुतायत में हैं परन्‍तु वे धमकाने में नहीं,खुला फर्रुखाबादी खेल खेलने या ऐसे दुष्‍टों को निपटाने में ही यकीन रखते हैं। इस प्रकार धमकाना वे स्‍वयंहित में नहीं कर रहे हैं बल्कि ऐसा कदम उन्‍होंने देशहित में उठाया है। अब क्‍योंकि वे हर प्रकार से समर्थ हैं और कानूनों का भरपूर ज्ञान ही नहीं रखते बल्कि उन्‍हें परिस्थिति के अनुरूप ढालने की योग्‍यता भी रखते हैं। ऐसा करके उन्‍होंने धमकाने को कानूनी मान्‍यता प्रदान कर दी है।
फिर तुलसी बाबा इसी दिन के लिए कह गए हैं कि ‘समरथ को नहीं दोष गुंसाईं। वे देशहित में आपको अरुचिकर रखने वाले कतिपय कदम उठा रहे हैं तो इसके लिए दोषी आप और उन्‍हें ऐसा करने के लिए मजबूर करने वाले ही हुए। उनके साथ सभी वोटरों की शक्ति है जिन्‍होंने वोट नहीं दिया था उनकी भीक्‍योंकि ऐसे फैसलों में नेगेटिव मार्किंग का नियम लागू होता है। हारने वाला हार चुका है इसलिए सभी वोट कानून के अनुसार जीतने वाले के वोटों में ही जुड़े क्‍योंकि हारने वाले को अलग से हारत्‍व की शक्तियां नहीं मिलतीं।
जो लोग मंत्री के इस कारनामे को सीनाजोरी की संज्ञा दे रहे हैंउनसे कानून मंत्री इसलिए इत्‍तेफाक रखते हैं क्‍योंकि जिसके पास सीना होगावही तो सीनाजोरी करेगा। कितनी ही हसीन महिलाएं विशाल सीने की स्‍वामिनी होते हुए भी न तो जोर जबरदस्‍ती करती हैं और न करवाती हैं। जिसको सीना नहीं आतावह क्‍या खाक तो शब्‍दों की सिलाई-बुनाई करेगा और क्‍या किसी का पसीना निकालेगा। मैं आपका ध्‍यान उस ओर भी दिलाना चाहूंगा जिसमें मंत्री ने आरोपी को ‘गटर का कीड़ा’ कहा है। अब गटर के कीड़ों को वही तो पहचानेगाजिसने अपनी पूरी उम्र गटर में रहकर गुजारी हो और अब भी गटर पर उसका आशियाना हो, अब कोई उन्‍हें ‘गटर कीड़ा विशेषज्ञ’ नहीं मान रहा है तो इसमें भी दोष उन कीड़ों का ही है।  मिल्कियत का यह दंभ गटर में रहकर ही आता है और इसे हम संसद कहते हैं। जिसके भीतर से बाहर वाले गटरवासी ही दिखते हैं।
जीवन मूल्‍यों का इस तेजी से पतन हुआ है कि कुटिया या गरीबखाने की संज्ञा चलन में नहीं है। ताजा हालात के मुतल्लिक दोष सिर्फ एक मंत्री का ही नहीं है अपितु उन सभी मंत्रियों का सामूहिक तौर पर बनता है जो मंत्रियों के मुखिया के तौर पर फेमस हैं और सदैव एक के ही गुणगान करते मिलते हैं। वैसे मेरी समझ में यह भी नहीं आ रहा है किलौटना मुश्किल’ को धमकीस्‍वरूप क्‍यों लिया जा रहा हैआप बात पूरी होने से पहले ही चिंघाड़ने लगे हैं। लौटना इसलिए मुश्किल है क्‍योंकि फर्रुखाबाद में उस दिन इस मसले पर परिवहन की हड़ताल हो सकती है। अंत मेंकानून मंत्री का यह मानना कि सारी दुनिया में सबकी खिल्‍ली उड़ रही है तो सोचा कि हम भी थोड़ी सी खिल्‍ली उड़वा कर लोकप्रियता के नए पायदानों पर काबिज हो जाएंभी नाजायज नहीं ठहरता है।

पेड. पर भी उगते है पैसे : दैनिक जनवाणी 25 सितम्‍बर 2012 स्‍तंभ 'तीखी नजर' में प्रकाशित


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पी एम ने कहा कि ‘पेड़ पर नहीं उगते पैसे’, उनके बयान में से इस एक हिस्‍से पर सबने ध्‍यान केन्द्रित किया गया और बवंडर मचाया गया जबकि वे वाक्‍य के अंत में ‘क्‍या’ जोड़ना भूल गए थे। और सब पीएम की फजीहत करने में बुरी तरह सफल हो गए। जब तक पीएम को अपनी चूक समझ में आती, तब तक तीर उनकी जुबान से छूट चुका था। उन्‍होंने सोचा कि मैं पीएम हूं एक तीर चल गया तो कोई बात नहीं, दूसरा तीर प्रयोग कर लूंगा, यही गफलत हो गई और अर्थ का अनर्थ हो गया।
अब वे ‘क्‍या‘ जोड़ना भूल गए, फिर उनसे एक और चूक हो गई क्‍योंकि एक बार गलती हो जाए तो फिर गलतियों का क्रम शुरू हो जाता है। वे इतना किंकर्तव्‍यूविमूढ़ हो गए कि अगली कई बातें कहना औा तथ्‍यों का उल्‍लेख करना  भूल गए। जबकि उन्‍हें भाषण की पूरी तैयारी कराई गई थी, उन्‍होंने इसे रट भी लिया था, कई बार अपने विशेषज्ञों को सुनाया भी। अनेक बार अभ्‍यास भी किया था किंतु चैनलों को सामने देखकर वे ‘सुजान’ न बन सके और ‘जड़मति’ ही रह गए।  
चैनलों की मजबूरी तो समझ में आती है कि उन्‍हें 24 घंटे चैनल चलाने होते हैं इसलिए बात का बतंगड़ बनाना जरूरी है किंतु सरकार पब्लिक के हित के लिए सदा ही पैट्रोल, डीजल, गैस और अन्‍य जीवन चलाने के लिए आवश्‍यक वस्‍तुओं पर सब्सिडी देती रहती है। बतलाने वाले तो इसे वोट पाने का लालच करार देते हैं और संभवत: इसी वजह से महंगाई भी आजकल सरकार से नाराज है। 
पैसे पेड़ पर नहीं उगते क्‍या, पैसे पेड़ पर भी उगा करते हैं। जिस फल का पेड़ होता है उसी के अनुसार पेड़ पर फल लगते हैं। कहा भी गया है कि ‘बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से पाए’।  कोई भी पेड़ अपने फलों को खुद नहीं खाते हैं, इस सच्‍चाई को सभी जानते हैं और यहीं से पेड़ पर पैसे उगने शुरू हो जाते हैं मतलब आप उनके फलों को बेचें और पैसे बनाएं। बाढ़ खेत को खा सकती है, इसके बारे में हम सब जानते हैं। पुलिस को बलात्‍कार में संलिप्‍त पाया जाता है, जिस पुलिस पर पब्लिक की सुरक्षा की जिम्‍मेदारी है, वही पुलिस समय पड़ने पर पब्लिक को डंडों और गालियों से धुन-धुन कर अधमरा कर देती है। मंत्रियों ने भी इसी मार्ग पर चलते हुए खूब घोटाले किए हैं।
आपके स्‍वामित्‍व में जिस फल का पेड़ होगा, आपकी कमाई भी उसी के हिसाब से ज्‍यादा या और भी ज्‍यादा होगी, कम होने का तो सवाल ही नहीं उठता है। बादाम, अखरोट, सेब, आम, पपीते, अमरूद इत्‍यादि  मतलब जितने भी किस्‍म के पेड़ होते हैं और उनके फलों को बेचकर सबसे खूब कमाई की जाती है। कुछ पेड़ बहुत लंबे होते हैं जबकि उनके ऊपर लगे फल संख्‍या में भी कम होते हैं और सस्‍ते भी बिकते हैं। लंबाई से किसी की उपयोगिता का अंदाजा नहीं लगाया जाना चाहिए। नारियल के पेड़ पर लगा नारियल सस्‍ता बिक रहा है जबकि उस लंबे पेड़ पर चढ़कर उसे तोड़कर लाने में काफी सफर तय करना पड़ता है। पेड़ पर चढ़ना फिर एक-एक नारियल को तोड़ पर संभाल कर नीचे लाया जाता है कि कहीं हाथ से छूट न जाए और नारियल टूट न जाए।
पेड़ के बाद उन्‍हें पौधों का जिक्र करना था। जिसमें वे बतलाते कि जिन पेड़ों पर फल नहीं उगा करते, उनकी लकडि़यां बेच कर खूब पैसे कमाए जाते हैं, जिन लकडि़यों से फर्नीचर नहीं बनाया जा सकता। उन्‍हें दाह-संस्‍कार में काम में ले लिया जाता है और वहां पर भी लकड़ी आजकल महंगी बिकती है। इसके बाद उन पौधों का नंबर आता है जिन पर फल नहीं उगते, उनके फूलों को बेचकर धन कमाया जाता है। आजकल फूल और फलों की खेती धन कमाने के लिए ही की जाती है। कोई भी पेड़-पौधों पर उगाए गए फलों और फूलों का फ्री वितरण नहीं करता है।
उस पर तुर्रा यह है कि बाबा रामदेव ने उनके ‘अर्थशास्‍त्री’ होने पर इस तनिक सी चूक के लिए उन्‍हें ‘अनर्थशास्‍त्री’ तक कह दिया जबकि पीएम ने उनके काले धन को लेकर किए गए ऊधम और शरारतों को भी सहजता से ही लिया और कभी अपना आपा नहीं खोया। न ही ‘रामदेव’ को ‘कामदेव’ की संज्ञा दी। जबकि वे चाहते तो ‘कालाधन’ के ‘का’ को वे उनके ‘रामदेव’ के ‘रा’ से रिप्‍लेस कर सकते थे परंतु उन्‍होंने ऐसा करके अपने बड़प्‍पन का परिचय दिया और बाबा ने उन्‍हें ‘अनर्थशास्‍त्री’ कहकर अपने ‘छिछोरेपन’ को ही दर्शाया है।   सोशल मीडिया यानी न्‍यू मीडिया ने भी इस बात पर बेवजह बहुत ही धमाल मचाया है, उनकी ऐसी गैर-जिम्‍मेदाराना हरकतों की वजह से सरकार इस पर रोक लगाना चाहती है तो इसमें क्‍या गलत बात है।
अब आप किस मुंह से कहेंगे कि पैसे पेड़ों पर नहीं उगा करते हैं ?

सड़कों का राग‍ भिड़ासी : दैनिक जनवाणी 18 सितम्‍बर 2012 स्‍तंभ 'तीखी नजर' में प्रकाशित


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संगीत के कच्‍चे-पक्‍के और पुख्‍ता रागों की जानकारी यूं तो स‍भी को होती है जिनको नहीं होती वे भी संगीत सुनकर मौज लेते हैं। मजा लेने वाले इसके असर से बच नहीं पाते हैं। आजकल समाज में एक नए राग की उत्‍पत्ति हुई है। इस राग का आविर्भाव वाहनों की संख्‍या तेजी से बढ़ने पर सामने आया है। इस राग में कारों के निरंतर बजने वाले हॉर्न और जोर-जोर से आती चिल्‍लाहटों से मधुरता आती है, इसे राग भिड़ासी माना गया है।
राग भिड़ासी से यूं तो सभी परिचित हैं किंतु मेट्रो शहरों में इसके मुक्‍तभोगियों की संख्‍या में तेजी से इजाफा हो रहा है। इसके गाने-बजाने के संबंध में कोई तय समय नहीं है। इसे कभी भी गाया-बजाया जा सकता है। इसका आयोजन स्‍थल आपके घर के सामने उस जगह पर होता है, जो आपकी न होते हुए भी आपकी मानी जाती है। यह सिलसिला रोजाना वहीं शुरू होता है। आपके और सामने तथा साथ  रहने वाले पड़ोसियों के घर के सामने होता हैतीसरेचौथेपांचवे के घर के सामने भी होता है। शहरों में बढ़ती वाहनों की आबादी इसके होने का सबब बनती है। हम सबके कानों में आवाज आ रही है कि तेरे घर के सामने मैं राग भिड़ासी गाऊंगा। राग भिड़ासी सड़कों पर होने वाले रोडरेज’ से उन्‍न‍त किस्‍म का राग है। इसे गाने के लिए दो पक्षों की सक्रियता जरूरी है।
जब दो वाहन टकराते हैं तो आवाज होती है किंतु जब दो राग भिड़ासी वाले इस राग में हिस्‍सेदारी निभाते हैं तो देखने-सुनने वालों का मन इससे मिली प्रसन्‍नता से गदगद हो उठता है। सुनने वालेइसका आनंद लेने वाले इसकी गांभीर्यता को समझते हुए भनक मिलते ही अपने-अपने घरों की बाल‍कनियों में आकर मोर्चा संभाल लेते हैं। इसकी शुरुआत कार के लगातार बजते तेज हॉर्न अथवा किसी इंसान की सुमधुर चिल्‍लाहट से होती है। यह दर्शकों को तुरंत आमंत्रित करती है। दर्शकों को आमंत्रित करने के लिए इसमें कार्ड छपवाकर बंटवाने की औपचारिकता नहीं निभाई जाती और न ही इसमें किसी प्रकार का अपव्‍यय किया जाता है। इसे देखने-सुनने वालों के लिए नाश्‍ता अथवा भोज का कोई प्रावधान न होना,  मितव्‍‍ययिता की सबसे सुंदर मिसाल है।
घर के सामने वाहनों को खड़े करने का मौन मौलिक अधिकारघर में रहने वालों का होता है। इस अधिकार में दखल राग भिड़ासी की उत्‍पत्ति दिखलाता है। इस संबंध में अभी तक सरकार की ओर कोई दिशा-निर्देश नहीं जारी किए गए हैं किंतु इसमें व्‍यापक संभावनाओं को देखते हुए भारत की राजधानी मेंकर वसूलने’ की शुरुआत अपने दूसरे अथवा तीसरे चरण में है। इस तरह के कार्यों के कई चरण पाए गए हैं। इसे एकदम अनौपचारिक रूप से बजाया जाता है इसलिए इसका आनंद हिंदी भाषा में अथवा पंजाबी भाषा अथवा किसी देसी बोली में खुलकर निखरकर आता है। इसमें अंग्रेजी का प्रयोग होते भी अधिकतर देखा गया है। इससे राग भिड़ासी का जलवा देदीप्‍यमान होकर चमक उठता है।
ऐसे आयोजनों को अखबारों की सुर्खियां मिलने लगी हैं। ऐसे में एक बचाव पक्ष भी सक्रिय होता है। जिसे दाल भात में मूसलचंद की संज्ञा इसलिए दी गई है क्‍योंकि वह इस तरह के आयोजनों का सर्वथा विरोध करता है और इन्‍हें रोकने के लिए सदैव तैयार मिलता है। कई बार ऐसे आयोजनों की गाज इन पर इस बुरी तरह गिर जाती है कि इनका नाम शहीदों में शुमार हो जाता है। क्‍लाइमेक्‍स तक पहुंचने पर बोध होता है कि इंसानों की भिड़ंत हो गई है। स्‍त्री, पुरुष और बच्‍चों के लुटे-पिटे चेहरे-मोहरे इसकी गवाही देते हैं। किंतु पुलिस के पहुंचने पर वे सब गवाही देने से मुकरते हुए तितर-बितर हो जाते हैं। जिन बालकनियों में कुछ देर पहले चहल-पहल और गहमा-गहमी का मौसम था, वहां पतझड़ कब्‍जा जमा लेती है।  लगता है कि इन बालकनियों में बसंत आता ही नहीं है। आपने भी अवश्‍य ही ऐसे आयोजनों में हिस्‍सा लिया होगा, मुक्‍तभोगी रहे होंगे, फिर अपने अनुभव हमारे साथ साझा करने में आप देरी क्‍यों कर रहे हैं ?

आजादी की मनमानी : दैनिक जनवाणी 4 सितम्‍बर 2012 'तीखी नजर' स्‍तंभ में प्रकाशित



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मानती नहीं है आज़ादी जबकि पिछले 66 बरस से बिना नागा हम सब भारतवासी उसे मनाने की पुरजोर कोशिशें कर रहे हैं। अधिकाधिक मोर्चों पर सफल रहने वाले हम इस मोर्चे पर बुरी तरह विफल हो जाते हैं। मुझे लगता यह रहा है कि आज़ादी नेताओं के बयानों से नाराज़ हो जाती होगी और इसलिए नहीं मान रही है। इसके उपाय स्‍वरूप हमने मिलकर ऐसे गुणीजन को पीएम बनाया जो बोलने में कम और विचारने में अधिक यकीन रखता है। लेकिन इस टोटके को आजमाते हुए भी 9 बरस बीत गए परंतु नामाकूल आज़ादी ने खूब मनाए जाने पर भी मानने से इशारों-इशारों में साफ इंकार कर दिया।
वैसे हमें रावण से सबक लेना चाहिए क्‍योंकि उसे तो हम काफी लंबे अर्से से फूंक रहे हैं और उसे फुंकने की ऐसी लत पड़ गई है जैसी आजकल सबको फेसबुक की और वह हर साल फूंक खाने के लिए हाजि़र हो जाता है। फूंक से ही उसे जीवन मिल रहा है और यह सच भी है कि जिस दिन हम रावण को फूंकना बंद कर देंगे, सचमुच में उसकी फूंक निकल जाएगी।
इधर हम आज़ादी को मनाने में बिजी रहते हैं उधर आज़ादी हमारी आंखों के सामने निर्लज्‍ज होकर महंगाई से नैन-मटक्का करती रहती है, वहां से फुरसत पाती है तो नेताओं के पहलू में जा बैठती है। आजादी एक 66 वर्षीया बिगड़ैल कन्‍या का नाम हो गई है। एक व्‍यंग्‍यकार की क्‍या मजाल कि 66 बरस की होने पर भी आजादी को बुढि़या कहने का रिस्‍क मोल ले। जोखिम से बचने के लिए नेता भी इसे जवान मानते आए हैं।  उन पर पड़ा आजादी की कुसंगति का असर पब्लिक की आजादी छीनने का सबब बन गया है।
लगता तो यह भी है कि आजादी बहुत अच्‍छी ‘चॉकलेट’ है जिसका स्‍वाद जरूर लेना चाहिए परंतु जिसने एक बार इसका स्‍वाद चख लिया, समझ लो, वह उसका मुरीद होकर ईद मनाने में बिजी हो गया। आजादी के प्रति इस दीवानेपन ने सबका भरपूर नुकसान ही किया है। इसेलिए इसे समाज से भरपूर गालियां तो मिल सकती हैं, आलोचना भी हो सकती है किंतु आजादी किसी भी कीमत पर नहीं मिल सकती।
आजादी के संग साथ ने भारतीय समाज को विकृत करके संसार के सामने पेश किया है। जो भी आजाद है, समझ लीजिए, उससे जुड़ा हर शख्‍स बरबाद है। इस बरबादी से बचने का कोई यत्‍न इसलिए कारगर नहीं है क्‍योंकि सभी महापुरुषों, ऋषि मुनियों, साधु संतों इत्‍यादि ने आजादी पाने की पैरवी की है और इसी कारण समाज का बेड़ा गर्क हो रहा है। मैंने आजादी के असली स्‍वरूप को पहचान लिया है इसलिए इस अज्ञान से मुक्ति पाने का रास्‍ता भी अब मैं ही आपको बतलाऊंगा किंतु आगामी 26 जनवरी के दिन।
जबकि सब इसकी जफ्फी पाने के लिए वासना की हद तक लालायित हैं। मेरा अपना अनुभव है कि अंग्रेजों से आजादी पाकर देश का नुकसान ही हुआ है। इसी आजादी के असर के चलते समाज के प्रत्‍येक तबके के जीवन-मूल्‍यों में भारी गिरावट आ गई है। युवक युवतियां उच्‍श्रंखल हो चुके हैं। वे मां बाप से आजादी चाहते हैं। सब विवाह करते हैं किंतु पत्‍नी से भी सबको आजादी ही चाहिए। प्रेमिका भी बनाएंगे किंतु उससे भी आजादी ही चाहेंगे। .... मानो आजादी से मिलने वाला मौज मजा ही जीवन का परम धर्म बन गया है।
इस आजादी ने सबका बहुत नुकसान किया है परंतु फिर भी सब 24 घंटे आजादी की चाहत करते हैं और इसे पाने की कामना करते नहीं अघाते हैं। आजादी पाने का सीधा साफ अर्थ निरंकुश हो जाना है और जिस पर अंकुश नहीं है, वह सदा दूसरों की कीमत पर खुश रहता है। आप कम से कम दूसरों की आजादी की ताकत पर खुश तो मत रहिए। आजादी के मोहपाश से बचने के यत्‍न इसके गुलाम बनकर करते रहिए।
कर्मचारी चाहे सरकारी हों अथवा अ-सरकारी उनके मन में कामना रहती है कि काम न करने और रिश्‍वत लेने की आजादी बरकरार रहे। अखबार और पत्र-पत्रिकाओं के मालिकों ने तो व्‍यंग्यकारों-साहित्‍यकारों से जबरन आजादी छीनी हुई है, वे रचनाएं प्रकाशित करते हैं किंतु पारिश्रमिक के उजाले से वंचित रखते हैं। यही हाल लेखकों के साथ पुस्‍तक प्रकाशकों ने कर रखा है। आजादी का यह घिनौना आख्‍यान कितना विशद हो सकता है, इसने समाज का कितना नुकसान कर दिया है। मेरा बस चले तो आजादी का साफ्टवेयर ही नागरिकों के हित में रिमूव कर दूं। किंतु नहीं कर सकता क्‍योंकि मुझे इसकी आजादी नहीं मिली हे। आजादी को आजादी का वायरस कहना समीचीन होगा, जो  हमारी बाकी बची संस्‍कृति, नैतिकता, ईमानदारी को डिलीट करने में सफल हो रहा है। इसलिए हमें ‘आजादी’ शब्‍द को प्रत्‍येक स्‍थान से ‘परमानेंट डिलीट’ कर देना चाहिए, आप मेरे इस निर्णय से सहमत हैं न। अगर हैं तो क्‍यों न अपनी आजादी वापिस अंग्रेजों अथवा मुगलों को वापिस लौटाकर चैन की सांस लें।

गरीबी का लाभ मुफ्त मोबाइल : दैनिक जनवाणी 22 अगस्‍त 2012 अंक में 'तीखी नजर' स्‍तंभ में प्रकाशित


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सरकार गरीबों को फ्री में मोबाइल बांटकर उनकी इज्‍जत के सिग्‍नल डाउन करना चाह रही है अथवा उनसे ‘गरीबी’ का रुतबा छीनकर, देश को विश्‍व के समक्ष विकसित देशों के समकक्ष दिखलाने के जुगाड़ में जुट गई है। गेहूं, चावल, किरोसीन और लोन बांटने से तो गरीबों की गरीबी दूर नहीं हो पाई है। इसलिए इस बार मोबाइल बांटने की जुगत भिड़ाई है। अब सवाल यह है कि क्‍या सरकार स्‍मार्ट फोन बांटेगी या आर्डीनरी मोबाइल, जिनसे बात करने में भी गरीबों को खासी परेशानी का सामना करना पड़ेगा। इसे मुफ्त में आफत गले पड़ना कहा जाएगा। अगरचे स्‍मार्ट फोन होगा तो उन्‍हें फेसबुक की लत पड़ जाएगी और वे अपनी दिहाड़ी से भी जाएंगे और जल्‍दी ही अपनी जान गंवाएंगे। फेसबुक कोई ‘फेस’ देखकर रोटी नहीं दे रहा है। आप फेसबुक पर कितना ही श्रम कर लीजिए। चौबीसों घंटे जुटे रहिए, आपको कोई एक गिलास पानी के लिए भी पूछ ले तो कहिएगा। फेसबुक की उपयोगिता समय का खून करने में है, इसका उपयोग करने से बीमारी से बीमार के खून में भी इजाफा हो सकता हैं किंतु अगर आप यह सोच रहे हैं कि कोई आपको दो सूखी रोटी के लिए भी पूछ लेगा, तब आप मुगालते में जी रहे हैं। जबकि फेसबुक पर सभी प्रकार के व्‍यंजनों के मनमोहक चित्रों की भरमार तो मिलेगी लेकिन उन्‍हें देखने से भूख नहीं मिटा करती है।

लगता है सरकार यह सोच रही है कि मैसेज पढ़कर और काल सुनकर भूख और प्‍यास का इंतकाल हो जाएगा और गरीब जान देने से बच जाएगा। अभी यह भी नहीं मालूम कि कौन से बजट से सरकार इनका इंतजाम करेगी। कितने टैक्‍स बढ़ाएगी, कितनी वस्‍तुओं के सेवाकर में बढ़ोतरी करेगी या चालान अथवा टोल टैक्‍स की राशि एकदम से बढ़ा देगी। सरकार बिजली नहीं दे रही है, सिर्फ गरीबों में मोबाइल फोन बांट रही है जबकि सब जानते हैं कि बिना बिजली के इन फोनों की कोई उपयोगिता नहीं है क्‍योंकि निष्‍प्राण फोन पर आने से मिस काल भी कतराती है। यह भी हो सकता है किसी घोटाले और घपलेबाज इन फोनों को स्‍पांसर कर रहे हों ताकि सरकार उनका खास ख्‍याल रख सके और यह भी संभव है कि फोनों को बांटने में खरीदने से लेकर ही घपले तथा घोटाले शुरू हो जाएं। संभावनाएं खूब सारी हैं लेकिन यह तो पक्‍का है गरीब की गरीबी जब गेहूं, चावल और लोन पाकर नहीं मिट सकी है तो मोबाइल फोन पाकर मिट सकेगी, इस बात की तनिक भी संभावना नहीं है।

फिर सरकार और करे भी क्‍या जब वोटों को हथियाने के लिए इस तरह के हथकंडे ही काम में लाए जाते हैं फिर समय के हिसाब से तो बदलना ही होगा। अब कोई भी आसानी से चावल, गेहूं, किरोसीन अथवा राशनकार्ड लेकर के अपने वोट हड़पने नहीं देता है। वोटर भी जान गया है कि आज का युग तकनीकी का है और मोबाइल सारी तकनीक का बाप। जी हां, फादर ही कहा जाएगा मोबाइल को। आजकल यह सभी गुणों से युक्‍त है। इसके जितनी खूबियां अन्‍य किसी उपकरण में नहीं पाई जाती हैं। पीसी लोगे तो फोन नहीं कर पाओगे, प्रिन्‍टर लोगे तो स्‍कैन नहीं कर पाओगे, स्‍कैनर लोगे तो फोटो नहीं खींच पाओगे – यह बतलाने के मायने हैं कि सब एक दूसरे पर अवलंबित हैं। जबकि एक स्‍मार्ट फोन इन और अन्‍य सभी खूबियों में अपने लघुतम स्‍वरूप में समेटे हुए सबको लुभा रहा है।

जिसने स्‍मार्ट फोन ले लिया, समझ लीजिए उसे बिजली के अतिरिक्‍त अन्‍य किसी बाहरी उपकरण की जरूरत नहीं है। बिजली रूपी आत्‍मा मोबाइल रूपी परमात्‍मा से मिलकर प्रत्‍येक इंसान का बेड़ा पार कर रही है। ऐसे में इंसान अगर मोबाइल पाकर खुद को खुदा समझने लग गया है तो इसमें तनिक भी अतिश्‍योक्ति इसलिए नहीं है क्‍योंकि वह सीसीटीवी अपने घर अथवा आफिस में लगवाकर दुनिया की किसी भी जगह से सब पर नजर रख सकता है और यह काम इंसान या तो खुदा की मदद से कर सकता है अथवा ईश्‍वर के साथ मिलकर अपनी हसरतों को खूबसूरत अंज़ाम तक पहुंचा सकता है।
सरकार चाहे गरीबों में मोबाइल फोन बांटे या पीसी, लैपटाप अथवा कैमरे लेकिन इतना तो तय है कि महंगाई की सौत गरीबी का खात्‍मा किसी भी सरकारी दान से नहीं किया जा सकता। हां, ये जरूर संभव है कि इस नेक कार्य से जुड़े अनेक अमीर लोग और अमीर बन जाएं और नेता चुनाव लड़कर मंत्री से पीएम और राष्‍ट्रपति बनने की कवायद में जुट जाएं। यह अमीर होने का नुकसान ही है कि उन्‍हें फ्री के मोबाइल मिलने के लुत्‍फ से वंचित रहना होगा। वैसे भी अमीर होने के तो नुकसान ही नुकसान है और गरीब होने पर खूब सरकारी माल मिला करता है, क्‍या हुआ जो बदले में पांच साल में सिर्फ एक बार अपना वोट देना पड़ता है ?

सभी सांसद चोर-उचक्‍के नहीं हैं : दैनिक जनवाणी में 8 मई 2012 के अंक में प्रकाशित



सभी सांसद चोर उचक्‍के नहीं हैं और मैंने सबको चोर उचक्‍का  कहा भी नहीं है। मीडिया ने हंगामा मचा दिया जिससे सारे सांसद नाराज हो गए। वैसे भी यह तो साफ जाहिर है कि जब सारे बलात्‍कारी नहीं हो सकते तो सारे चोर उचक्‍के कैसे हो सकते हैं। उसी प्रकार सारे बाबा किरपा नहीं बरसाते। कुछ की किरपा तो सदा खुद पर ही बरसती रहती है। देखने वाला सोचता रहता है कि किरपा उस पर बरस रही है जबकि बरस व लौटकर बरसाने वाले पर ही रही होती है। इसी प्रकार सारे साधु, स्‍वादु नहीं कहे जा सकते, एक प्रकार से कहा भी जा सकता है क्‍योंकि सभी साधुओं को चरस, गांजे, भंग में स्‍वाद नहीं आता है जबकि कुछ तो इनके बिना स्‍वाद नहीं आता है। जिनको इनमें स्‍वाद नहीं आता है वह आपको गुटका, पान, तंबाकू, बीड़ी, सिगरेट का सेवन करने देखे जा सकते हैं। ऐसा भी नहीं है कि साधु हैं तो दारू का स्‍वाद नहीं लेंगे। आखिर आनंद की प्राप्ति के लिए साधु चोला धारण किया है और उस चोले में भी मजा नहीं पाया तो किस बात के साधु मतलब स्‍वादु। कितने ही साधुओं को तो भीख मांगने में असीम आनंद आता है। अब अगर उनकी पोल खोली जा रही है तो किसी सांसद को एतराज नहीं है। सांसदों की सच्‍चाई के बारे में जब भी जनता को बतलाने की कोशिश की जाती है तो वह ऐसे हाय तौबा मचाने लगते हैं, मानो दूध पीते बच्‍चे हों और उनके दूध के दांत अभी टूटे नहीं हों। जबकि उनके दूध तो दांत छोडि़ए, चाय के दांत भी नहीं बचे हैं और अब उनके सभी दांत दारू के दांत बनकर आवाम के सामने बहुत ही दुर्गंधयुक्‍त बेशर्मी से खिलखिला रहे हैं। इस पर किसी को तनिक भी एतराज नहीं है।
साधुओं को तो सांसद न जाने कब से स्‍वादु, ढोंगी, कपटी, चरसी और न जाने क्‍या क्‍या कहते रहते हैं, कभी कभार एकाध साधु नारी शक्ति का स्‍वाद लेते हुए पकड़ा जाता है तो उसे पकड़ कर जेल में ठूंस दिया जाता है। जब भगवान के सीधे सच्‍चे प्रतिनिधि साधु के लिए ऐसे नियम सर्वमान्‍य हो सकते हैं तो सांसदों के लिए क्‍यों नहीं, क्‍या वे सृष्टि की परम सत्‍ता से भी ऊपर हैं। संसद को कोई भगवान या देवता तो चला नहीं रहे हैं। फिर सभी सांसदों की गारंटी क्‍यों ली जा रही है, एक को कुछ कहा जाता है, तो मोहल्‍ले के कुत्‍तों के माफिक सब समवेत स्‍वर में गीत गाना शुरू कर देते हैं, बिना यह जाने कि इस प्रकार के गीतों की असलियत से अब जनता पूरी तरह वाकिफ हो चुकी है।
मैं मानता हूं कि मेरे से भूल हो गई है लेकिन अगली दफा मैं इस प्रकार की गलती नहीं करूंगा। मैं भी कोई भगवान तो हूं नहीं, हूं तो आपकी तरह इंसान ही, इंसान से गुरु ही तो बन रहा हूं, गुरुघंटाल तो नहीं बनना चाह रहा हूं। भविष्‍य में सांसदों को चोर-उच्‍क्‍का नहीं कहूंगा बल्कि यह बयान दूंगा कि सभी सांसद चोर उचक्‍के नहीं हैं, तब तो आपमें से किसी को कोई आपत्ति नहीं होगी न। आपकी खुशी का मैं अपने आगामी बयानों में पूरी तरह ध्‍यान रखूंगा। आखिर आप भी ‘सा’ से सांसद हैं और हम भी ‘सा’ से साधु हैं। अब अगर ऐसे में कुछ किरपा बरसाने वाले खुद को खुदा घोषित करके वे अपनी अलग कैटेगिरी ‘बाबा’ की हथिया चुके हैं। वैसे भी ‘बाबा’ शब्‍द के उच्‍चारण से मन निर्मल हो जाता है, एक पारिवारिक अटूट भावना नजर आती है।
अब तो ऐसा महसूस होने लगा है कि हम साधुओं को भी नेताई गुणों का विकास करना होगा। वरना शातिर नेता हमें कहां सामान्‍य वस्‍त्रों में जीने देंगे और हमें बार बार इनसे बचकर लेडीज सूट, साड़ी, सलवार, जींस, टॉप इत्‍यादि पहनकर ही अपनी जान बचानी होगी। वैसे भी मीडिया तो चाहता है कि हम वस्‍त्रविहीन हो जाएं और वह सारी दुनिया को दिखलाकर कमाई करता रहे। सारी दुनिया आपस में उलझती फिरे और वह फिर कभी इस बहाने तो कभी उस बहाने  कमाई करता रहे।  अपनी टीआरपी बढ़ाकर अपने दर्शकों पर कहर ढाता रहे। कभी वे नक्‍सली का मुद्दा उछाल देते हैं, कभी नुपूर तलवार पर वार करते दिखाई देते हैं, कभी निर्मल बाबा को तलाश लेते हैं और जब हर तरफ से निराश हो जाते हैं तब मेरे जैसे सीधे साधे सच्‍चे योगगुरु को अपना चेला बनाने के लिए जाल बिछाने लग जाते हैं। फिर यह तो पुराने घाघ हैं, मैं यह सांसदों को नहीं कह रहा हूं बल्कि मीडिया और चैनल वालों को कह रहा हूं। अब अगर इसको भी चैनल वाले तोड़-मरोड़कर सांसदों के खिलाफ साबित कर देंगे तो मैं साधु क्‍या कर लूंगा, सांसद मेरे बयान पर चिल्‍लाते रहेंगे और मीडिया वाले अपनी टीआरपी बढ़ाने के साथ उन्‍हें बार बार चैनल पर अड़तालीस घंटे दिखलाते रहेंगे।
क्‍या अब भी सांसदों को मेरे से कोई शिकायत है, मैं अपनी गलती मानते हुए फिर से कह रहा हूं कि कि सभी सांसद चोर-उचक्‍के नहीं हैं ?

निर्मल बाबा का निर्मल मन : दैनिक जनवाणी में 12 अप्रैल 2012 अंक में प्रकाशित

निर्मल बाबा, निर्मल है, मैल बाबा नहीं है, घोटाला नहीं है। मैल मिटाने वाला, दुख दर्द हटाने वाला बाबा है। बाबा वही जो बेटे पोतों के मन भाए। अपने साथ सबके मन को हर्षाए। इसमें भी कोई दुख पाए तो पाए, सुख से सूख जाए तो बूंद भर में ही डूब जाए। जनता को सब कुछ सरकार ही दिखता है। जबकि सरकार नाम की है, बेअसर है।  बाबा हमारा तो सरकार है। सरकार है लेकिन उनकी नितांत अपनी सरकार है। वहां वोटिंग नहीं होती, इसलिए वोटिंग संबंधी बुराईयां उसमें नहीं हैं। बाबा की सरकार बे-असर सरकार नहीं है, असरदार सरकार है। बाबा सरदार भी है। असरदार भी है। सरदार का असरदार होना, इतना आसान नहीं है। सरकार में नहीं होता है ऐसा, लेकिन बाबा की सल्‍तनत में हो रहा है। भक्‍तगण खुश हैं। सुखी हैं लेकिन भक्‍तों और बाबा की सुख समृद्धि देख सूखने वाले चाहे कितने बढ़ जाएं परंतु वे दुख से सूखने वालों की तुलना में बहुत अधिक हैं। धन का सही उपयोग हो रहा है। धन से कैसी माया, अगर उससे सुख ही नहीं पाया, मोदक खाकर मोद नहीं मनाया। बाबा के मनोबल का ही प्रताप उनका धनोबल है।
एडंवास जमा करके, एडवांस बुकिंग का नियम है। नियम पक्‍का है उसमें कोई कोताही नहीं। कोताही सरकार में होती है। सरकार में भी घोटालों में कोताही का नियम नहीं है। एक बड़े घोटाले के बाद, दूसरा उससे बड़ा घोटाला सरकार के नुमाइंदों द्वारा खूब आसानी से घोल दिया जाता है। यह घुलना तेल में पानी के घुलने को भी संभव बना देता है। इन घोटालों के चलते कितने ही चमत्‍कार हुए हैं। परंतु निर्मल बाबा वाला चमत्‍कार इन ऑरीजनल है। ऐसा बेसिक घोटाला मतलब अद्भुत मनभावन चमत्‍कार जनता के साथ पहले होता रहा है परंतु इतनी धुरंधरता में नहीं हुआ है। अब इससे चमत्‍कृत सिर्फ श्रद्धालु ही नहीं हैं, उनमें आस्‍था रखने वाले और भक्‍तगण ही नहीं हैं। अंदर की बात बतलाऊं इससे चमत्‍कृत बाबा खुद भी हैं। वे घंटों अपनी इस सफलता पर बिना नहाए आत्‍ममुग्‍ध रहते हैं। उन्‍हें अपनी यह सफलता नागमणि प्रतीत होती है। जिससे वह कुछ भी कर और पा सकते हैं और कर पा रहे हैं, यही कृपा (कर पा) बनकर बाबा पर सबसे अधिक और कुछ कम भक्‍तगणों पर बरस रही है। परंतु भक्‍तगण अथाह हैं इसलिए एक एक बूंद कृपा से भी कृपा का सागर बन हिलोरें मार रहा है। उमड़ घुमड़ कर आई कृपा। बाबा के मन को भायी कृपा। नोटों की बरसात है कृपा। कृपालुओं पर चमत्‍कार है कृपा।
बाबा सबका अतीत, वर्तमान और भविष्‍य संवार रहे हैं और खंगालने वाले उनका अतीत खंगालने में समय जाया कर रहे हैं। मानो, बाबा को नीचा दिखलाकर, अपनी नीचवृत्ति को जाहिर करना ही उनका ध्‍येय हो। इस संसार में सब दूसरों के सुख से सुखी हैं। बाबा के सुख से भी बहुत सारे लोग सूख रहे हैं कि, हाय, बाबा हम ही क्‍यों न हुए ? मैं भी अपनी कोशिशों में सक्रिय हूं। मैं भी उनका अपना ही हूं, बस अभी तक बुकिंग नहीं कराई है और दो हजार की राशि अग्रिम जमा नहीं कराई है। इसलिए मेरे सपने अधूरे हैं। अब अगर बाबा बनकर भी धन का अंबार नहीं लगा पाए तो, कितनी शर्मनाक स्थिति हो जाएगी। जब मंदिरों में और सत्‍य साईं बाबा के खजाने में धन के अंबार लगे हैं, फिर बाबा के पास क्‍यों न लगें, और हम भी बाबा ही क्‍यों न बनें, क्‍या हम भारत देश के सच्‍चे पक्‍के नागरिक नहीं हैं, आप हमारी नागरिकता की जांच कर सकते हैं। जहां डाल डाल पर सोने की चिडि़या करती है बसेरा। बस, क्‍योंकि अब चिडि़याएं खतरे में हैं, प्रदूषण और मोबाइल के सिग्‍नल उनका सफाया कर रहे हैं। फिर बाबा अगर ऐसे में पर्यावरण प्रेमी बन कर सामने आए हैं ....  जहां डाल डाल पर बाबा करते हैं बसेरा, वह भारत देश है मेरा। अब अगर डाल खूब सारी हैं तो बाबा भी खूब सारे ही होंगे न, जैसे चिडि़यां खूब सारी हुआ करती हैं या हुआ करती थीं। अब अगर मैंने बाबा की तुलना चिडि़या से कर दी है तो आप उन्‍हें चिडि़याघर में क्‍यों रखना चाह रहे हैं, चिडि़या भी चाहती हैं कि उनका अपना बनाया बसेरा हो। जिसे तिनका-तिनका जोड़कर बनाया हो। फिर बाबा अगर दो-दो हजार रुपये का तिनका जोड़ कर बसेरा मजबूत करने में जुटे हैं और अपना वर्तमान और भविष्‍य संवार रहे हैं। फिर इसमें आपके दुखी होने की कोई वजह मुझे तो दिखाई नहीं देती है।
धन जो हजारों लाखों की जेबों में बिखरा पड़ा है। वहां से कुछ कम होगा तो भी कुछ फर्क नहीं पड़ेगा लेकिन वही जब बाबा की झोली में आकर गिरेगा और अंबार लगेगा तो धन की असली ताकत का मालूम चलेगा। धन की शक्ति बिखरने में नहीं, इकट्ठे होने में है, इसे सब मानते हैं। अब वह नेताओं के विदेशी खातों में तो इकट्ठा नहीं हो रहा है, यह भी एक संतोष की बात है। बाबाओं के खातों में भक्‍तगणों की कृपा लगातार बरस रही है और उतनी बरस रही है जितनी पूरे देश में कुल मिलाकर बारिश भी नहीं होती है तो इससे तो देश का विकास ही सामने आ रहा है न, इसमें भी आपकी आपत्ति की वजह नहीं समझ पा रहा हूं मैं, कोई समझाएगा मुझे ?