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केले की गिरी बनाम दामादगिरी : दैनिक ट्रिब्‍यून स्‍तंभ 'गागर में सागर' 24 अक्‍टूबर 2012 अंक में प्रकाशित



राजनीति में दामादगिरी जोरों की कयामत ढा रही है जिसकी वजह से केला और आम चर्चित हो गए हैं। वैसे आम उत्‍सव के मौके पर आम की कई किस्‍मों के दाम बादाम को भी मात कर देते हैं आंधियों के कारण आम का असमय गिरना भी उसके दामों में इजाफे के लिए दोषी होता है।  केले कभी आंधियों से नहीं गिरतेकेलों को तहस-नहस करने का श्रेय सदा से हाथियों और बंदरों के नाम रहा है। हाथी और बंदर का स्‍वभाव नेताओं में नहीं पाया जातावे सदा आम चूसना ही पसंद करते हैं और कॉमनमैन को आम की तरह चटकारे लेकर चूसते ही पाए जाते हैं।
पब्लिक को केला बनाना जितना आसान है उतना ही आम को चूसना। पब्लिक को केला बनाकर छिलका छीलकर कहीं भी फेंक दो और केले की लचीली गिरी उदरस्‍थ कर लो,पब्लिक फिसल जाएगीफिर खूब हंस लोठहाके लगा लो और लाफ्टर चैलेंज के शो में बढ़त बना लो। केले के छिलके पर पब्लिक फिसलेतुरत जुर्माना लगा दो। पब्लिक वह आम है जो सदा चूसी जाती हैपब्लिक केले के छिलके पर फिसलती है और नेता पब्लिक पर। फिसलता भी है और पब्लिक को घसीटता भी है। यही युगीन सत्‍य है। आम का पापड़पापड़ होते हुए भी उसके अवगुणों से मुक्‍त रहता है। आम का पापड़ खाते हुए कड़ तड़ पड़ की आवाज नहीं करता, यह चबाए जाने पर भी मौन रहता है। इस पापड़ को युगों युगों से चटकारे लेकर चाटा जाता रहा है और चाटा ही जाता रहेगा। यह आम की खासियत हैऐसा समझ रहे हैं तो आप मुगालते में हैं क्‍योंकि आम का मुरब्‍बा भी बनता हैजैसे नेता पब्लिक का स्‍वादिष्‍ट मुरब्‍बा बनाती है। पब्लिक को जानवर (गधा) या पक्षी (उल्‍लू) भी बनाया जाता है।
वो मुरब्‍बा ही क्‍या जिसके खाने पर अब्‍बा की याद नहीं आई और अब्‍बा की याद के पीछे अम्‍मा न दौड़ी चली आई।  देश की पब्लिक केले के छिलके पर रोजाना फिसल रही है। उस पर तुर्रा यह कि नियम बना दिया गया है कि केले के छिलके पर फिसलने पर चालान जरूर होगा। आम चूसने पर दामादगिरी का मसला होने पर भी चर्चा नहीं होती। आम फल पर सामान्‍यत:न बंदर और न हाथी की नीयत डोलती है। हाथी और बंदर गन्‍ना और केला देखकर डोलते हैं और मन के रंजन के लिए केले के बागों को उजाड़ते भी रहते हैं। जबकि  लोकतंत्र में हाथी आम पर ललचायी नजरें गड़ाए रखते हैं।
हाथी का मोह गन्‍ने से भंग हो चुका है। बंदर गन्‍ना नहीं खाता है। बंदर गन्‍ना हाथ में लेकर डांस कर सकता हैहाथी के बस का यह नहीं है। हाथी को सांकल डालकर बंदर के माफिक डांस नहीं कराया जा सकता। जरूरत भी नहीं है क्‍योंकि पब्लिक भिन्‍न-भिन्‍न प्रकार के डांस करने में मशगूल रहती है।
हाथी को नचाना पब्लिक और नेता के बस का नहीं है इसलिए वे खतरा सामने देखकर हाथी को ढककर काम चलाते हैं। हाथी को अक्‍ल से बड़ा मान लिया गया हैभैंस इस मामले में पिछड़ गई है। इसी से देश के चहुंमुखी विकास की जानकारी मिलती है। जिनके हाथ नहीं होतेउनके हाथी होते हैं और जिनके हाथ होते हैंउनके ही हाथों में हथियार होते हैंवे महावत को भी बांधकर रखते हैं, अब समझ रहे हैं आप कि देश का महावत क्‍यों मौन है ?

जि़दगी का राग बनता 'राग भिड़ासी' : दैनिक हिंदी ट्रिब्‍यून 19 सितम्‍बर 2012 स्‍तंभ 'सागर में गागर' में प्रकाशित



संगीत के कच्‍चे-पक्‍के और पुख्‍ता रागों की जानकारी यूं तो स‍भी को होती है जिनको नहीं होती वे भी संगीत सुनकर मौज लेते हैं। आजकल समाज में एक नए राग की उत्‍पत्ति हुई है। इस राग का आविर्भाव वाहनों की संख्‍या तेजी से बढ़ने पर सामने आया है। इस राग में कारों के निरंतर बजने वाले हॉर्न और जोर-जोर से आती चिल्‍लाहटों से मधुरता आती है, इसे राग भिड़ासी माना गया है।
राग भिड़ासी से यूं तो सभी परिचित हैं किंतु मेट्रो शहरों में इसके मुक्‍तभोगियों की संख्‍या में तेजी से इजाफा हो रहा है। इसके गाने-बजाने के संबंध में कोई तय समय नहीं है। इसे कभी भी गाया-बजाया जा सकता है। इसका आयोजन स्‍थल आपके घर के सामने उस जगह पर होता है, जो आपकी न होते हुए भी आपकी मानी जाती है। यह सिलसिला रोजाना वहीं शुरू होकर संपन्‍न होता है। शहरों में बढ़ती वाहनों की आबादी इसके होने का सबब बनी है। हम सबके कानों में आवाज आ रही है कि तेरे घर के सामने मैं राग भिड़ासी गाऊंगा। राग भिड़ासी सड़कों पर होने वालेरोडरेज’ से उन्‍न‍त किस्‍म का राग है।
जब दो वाहन टकराते हैं तो आवाज होती है किंतु जब दो राग भिड़ासी वाले इस राग में हिस्‍सेदारी निभाते हैं तो देखने-सुनने वालों का मन इससे मिली प्रसन्‍नता से गदगद हो उठता है। सुनने वालेइसका आनंद लेने वाले इसकी गांभीर्यता को समझते हुए भनक मिलते ही अपने-अपने घरों की बाल‍कनियों में आकर मोर्चा संभाल लेते हैं। यह राग दर्शकों को तुरंत आमंत्रित करता है। दर्शकों को आमंत्रित करने के लिए इसमें कार्ड छपवाकर बंटवाने की औपचारिकता नहीं निभाई जाती। इसे देखने-सुनने वालों के लिए नाश्‍ता अथवा भोज का कोई प्रावधान न होना, मितव्‍‍ययिता की सबसे सुंदर मिसाल है।
घर के सामने वाहनों को खड़े करने का मौन मौलिक अधिकारघर में रहने वालों का होता है। इस अधिकार में दखल राग भिड़ासी की उत्‍पत्ति दिखलाता है। इस संबंध में अभी तक सरकार की ओर कोई दिशा-निर्देश नहीं जारी किए गए हैं किंतु इसमें व्‍यापक संभावनाओं को देखते हुए भारत की राजधानी मेंकर वसूलने’ की शुरुआत अपने दूसरे अथवा तीसरे चरण में है। इसका आनंद हिंदी भाषा में अथवा पंजाबी भाषा अथवा किसी देसी बोली में खुलकर निखरकर आता है। इसमें अंग्रेजी का प्रयोग होते भी अधिकतर देखा गया है। इससे राग भिड़ासी का जलवा देदीप्‍यमान होकर चमक उठता है।
ऐसे आयोजनों को अखबारों की सुर्खियां मिलने लगी हैं। ऐसे में एक बचाव पक्ष भी सक्रिय होता है। जिसे दाल भात में मूसलचंद की संज्ञा इसलिए दी गई है क्‍योंकि वह इस तरह के आयोजनों का सर्वथा विरोध करता है और इन्‍हें रोकने के लिए सदैव तैयार मिलता है। कई बार ऐसे आयोजनों की गाज इन पर इस बुरी तरह गिर जाती है कि इनका नाम शहीदों में शुमार हो जाता है। क्‍लाइमेक्‍स तक पहुंचने पर बोध होता है कि इंसानों की भिड़ंत हो गई है। स्‍त्री, पुरुष और बच्‍चों के लुटे-पिटे चेहरे-मोहरे इसकी गवाही देते हैं। किंतु पुलिस के पहुंचने पर तितर-बितर हो जाते हैं। जिन बालकनियों में कुछ देर पहले चहल-पहल और गहमा-गहमी का मौसम था, वहां पतझड़ कब्‍जा जमा लेती है।  आपने भी अवश्‍य ही ऐसे आयोजनों में हिस्‍सा लिया होगा, मुक्‍तभोगी रहे होंगे, फिर अपने अनुभव हमारे साथ साझा करने में आप देरी क्‍यों कर रहे हैं ?