आजादी की मनमानी : दैनिक जनवाणी 4 सितम्‍बर 2012 'तीखी नजर' स्‍तंभ में प्रकाशित



इमेज अभी लोड नहीं हो रही है इसलिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ लीजिए।


मानती नहीं है आज़ादी जबकि पिछले 66 बरस से बिना नागा हम सब भारतवासी उसे मनाने की पुरजोर कोशिशें कर रहे हैं। अधिकाधिक मोर्चों पर सफल रहने वाले हम इस मोर्चे पर बुरी तरह विफल हो जाते हैं। मुझे लगता यह रहा है कि आज़ादी नेताओं के बयानों से नाराज़ हो जाती होगी और इसलिए नहीं मान रही है। इसके उपाय स्‍वरूप हमने मिलकर ऐसे गुणीजन को पीएम बनाया जो बोलने में कम और विचारने में अधिक यकीन रखता है। लेकिन इस टोटके को आजमाते हुए भी 9 बरस बीत गए परंतु नामाकूल आज़ादी ने खूब मनाए जाने पर भी मानने से इशारों-इशारों में साफ इंकार कर दिया।
वैसे हमें रावण से सबक लेना चाहिए क्‍योंकि उसे तो हम काफी लंबे अर्से से फूंक रहे हैं और उसे फुंकने की ऐसी लत पड़ गई है जैसी आजकल सबको फेसबुक की और वह हर साल फूंक खाने के लिए हाजि़र हो जाता है। फूंक से ही उसे जीवन मिल रहा है और यह सच भी है कि जिस दिन हम रावण को फूंकना बंद कर देंगे, सचमुच में उसकी फूंक निकल जाएगी।
इधर हम आज़ादी को मनाने में बिजी रहते हैं उधर आज़ादी हमारी आंखों के सामने निर्लज्‍ज होकर महंगाई से नैन-मटक्का करती रहती है, वहां से फुरसत पाती है तो नेताओं के पहलू में जा बैठती है। आजादी एक 66 वर्षीया बिगड़ैल कन्‍या का नाम हो गई है। एक व्‍यंग्‍यकार की क्‍या मजाल कि 66 बरस की होने पर भी आजादी को बुढि़या कहने का रिस्‍क मोल ले। जोखिम से बचने के लिए नेता भी इसे जवान मानते आए हैं।  उन पर पड़ा आजादी की कुसंगति का असर पब्लिक की आजादी छीनने का सबब बन गया है।
लगता तो यह भी है कि आजादी बहुत अच्‍छी ‘चॉकलेट’ है जिसका स्‍वाद जरूर लेना चाहिए परंतु जिसने एक बार इसका स्‍वाद चख लिया, समझ लो, वह उसका मुरीद होकर ईद मनाने में बिजी हो गया। आजादी के प्रति इस दीवानेपन ने सबका भरपूर नुकसान ही किया है। इसेलिए इसे समाज से भरपूर गालियां तो मिल सकती हैं, आलोचना भी हो सकती है किंतु आजादी किसी भी कीमत पर नहीं मिल सकती।
आजादी के संग साथ ने भारतीय समाज को विकृत करके संसार के सामने पेश किया है। जो भी आजाद है, समझ लीजिए, उससे जुड़ा हर शख्‍स बरबाद है। इस बरबादी से बचने का कोई यत्‍न इसलिए कारगर नहीं है क्‍योंकि सभी महापुरुषों, ऋषि मुनियों, साधु संतों इत्‍यादि ने आजादी पाने की पैरवी की है और इसी कारण समाज का बेड़ा गर्क हो रहा है। मैंने आजादी के असली स्‍वरूप को पहचान लिया है इसलिए इस अज्ञान से मुक्ति पाने का रास्‍ता भी अब मैं ही आपको बतलाऊंगा किंतु आगामी 26 जनवरी के दिन।
जबकि सब इसकी जफ्फी पाने के लिए वासना की हद तक लालायित हैं। मेरा अपना अनुभव है कि अंग्रेजों से आजादी पाकर देश का नुकसान ही हुआ है। इसी आजादी के असर के चलते समाज के प्रत्‍येक तबके के जीवन-मूल्‍यों में भारी गिरावट आ गई है। युवक युवतियां उच्‍श्रंखल हो चुके हैं। वे मां बाप से आजादी चाहते हैं। सब विवाह करते हैं किंतु पत्‍नी से भी सबको आजादी ही चाहिए। प्रेमिका भी बनाएंगे किंतु उससे भी आजादी ही चाहेंगे। .... मानो आजादी से मिलने वाला मौज मजा ही जीवन का परम धर्म बन गया है।
इस आजादी ने सबका बहुत नुकसान किया है परंतु फिर भी सब 24 घंटे आजादी की चाहत करते हैं और इसे पाने की कामना करते नहीं अघाते हैं। आजादी पाने का सीधा साफ अर्थ निरंकुश हो जाना है और जिस पर अंकुश नहीं है, वह सदा दूसरों की कीमत पर खुश रहता है। आप कम से कम दूसरों की आजादी की ताकत पर खुश तो मत रहिए। आजादी के मोहपाश से बचने के यत्‍न इसके गुलाम बनकर करते रहिए।
कर्मचारी चाहे सरकारी हों अथवा अ-सरकारी उनके मन में कामना रहती है कि काम न करने और रिश्‍वत लेने की आजादी बरकरार रहे। अखबार और पत्र-पत्रिकाओं के मालिकों ने तो व्‍यंग्यकारों-साहित्‍यकारों से जबरन आजादी छीनी हुई है, वे रचनाएं प्रकाशित करते हैं किंतु पारिश्रमिक के उजाले से वंचित रखते हैं। यही हाल लेखकों के साथ पुस्‍तक प्रकाशकों ने कर रखा है। आजादी का यह घिनौना आख्‍यान कितना विशद हो सकता है, इसने समाज का कितना नुकसान कर दिया है। मेरा बस चले तो आजादी का साफ्टवेयर ही नागरिकों के हित में रिमूव कर दूं। किंतु नहीं कर सकता क्‍योंकि मुझे इसकी आजादी नहीं मिली हे। आजादी को आजादी का वायरस कहना समीचीन होगा, जो  हमारी बाकी बची संस्‍कृति, नैतिकता, ईमानदारी को डिलीट करने में सफल हो रहा है। इसलिए हमें ‘आजादी’ शब्‍द को प्रत्‍येक स्‍थान से ‘परमानेंट डिलीट’ कर देना चाहिए, आप मेरे इस निर्णय से सहमत हैं न। अगर हैं तो क्‍यों न अपनी आजादी वापिस अंग्रेजों अथवा मुगलों को वापिस लौटाकर चैन की सांस लें।

1 टिप्पणी:


  1. अगर चलता रहा ये सब बगावत रुक नहीं सकती
    अगर जनता उठी तो जान लो वह झुक नहीं सकती
    लगाओ आग मत इतनी जलोगे तुम भी उसमें भी
    लगी जो आग तो समझो अभी वो बुझ नहीं सकती
    अरे 'जम्हूरियत' (लोकतंत्र) का पाठ क्यों भूले है ये कुरसी
    मिटाने से कभी भी चेतना ये मिट नहीं सकती
    जो तानाशाह बन बैठे वही ये भी भूल बैठे हैं
    कोई भी कौम जिंदा जुल्म ज्यादा सह नहीं सकती
    उठो, आगे बढ़ो, कांटे हटाओ वक्त आया है
    जहां नामर्द हो पीढ़ी गुलामी हट नहीं सकती

    उत्तर देंहटाएं

ऐसी कोई मंशा नहीं है कि आपकी क्रियाए-प्रतिक्रियाएं न मिलें परंतु न मालूम कैसे शब्‍द पुष्टिकरण word verification सक्रिय रह गया। दोष मेरा है लेकिन अब शब्‍द पुष्टिकरण को निष्क्रिय कर दिया है। टिप्‍पणी में सच और बेबाक कहने के लिए सबका सदैव स्‍वागत है।