श्‍मशान घाट का इंडेक्‍स यमराज के हवाले : दैनिक लोकसत्‍य 9 मई 2011 में पेज 6 पर प्रकाशित

है तो पुराना
यहां है नया
मृत्‍यु से लगता है डर
सदा रहता है नया
जब तक जीते हैं
भय में जीते हैं।

मैं सीडी हूं, औकात बता दूंगी : दैनिक जनसंदेश टाइम्‍स 9 मई 2011 के अंक में स्‍तंभ उलटबांसी में प्रकाशित

सीडी और पेनड्राइव
हैं भाई-बहन
आपको शक क्‍यूं
हो रहा है
पढ़ लीजिए

सूना-सूना सा जहां : आई नेक्‍स्‍ट 5 मई 2011 के अंक में स्‍तंभ खूब कही


लादेन कहां चले गए तुम? क्यों चले गए तुम? अब आतंकवाद डरा सहमा सा रहेगा. आतंक तो होगा पर आतंक का वो जलवा नहीं होगा, जिसने अमेरिका में बलवा मचाया था. पाकिस्तान के लिए तो वो असीम ऊर्जा थी. अब नहीं रही. लादेन के जाने से अमेरिका अब उसे वो सब कुछ देने से मना कर देगा, जो अब तक वो उसे देता रहा है. आप सब जानते हैं कि इस लेन-देन के किस्से का खुलासा करने का कोई लाभ नहीं है. अमेरिका उसे मारकर भी दुखी है. लादेन वो था, जब तक जिंदा था, तब तक उसने अमेरिका को जिंदा रखा. अब लादेन के गुजरने के बाद से अमेरिका में आलस का साम्राज्य हो जाएगा. अमेरिकावासी अब चैन की नींद सोया करेंगे, मतलब सोयेंगे तो गले में चैन बांधकर चैन का अहसास करेंगे. बहुत दिन, बल्कि कई सालों से पूरी नींद नहीं ले सके थे. कौन सोच सकता है कि इस अनिद्रा का कारण सिर्फ और सिर्फ लादेन ही रहा है. वैसे अमेरिका का विचार है कि लादेन की लाश का सौदा कर लिया जाए या सार्वजनिक तौर पर नीलाम कर दिया जाये. हर चीज में बाजार की तलाश करने वाला अमेरिका यह मौका गंवाना नहीं चाहता. पर देखते हैं कि अब अमेरिका और पाकिस्तान में गुपचुप क्या डील होती है. उस सौदे के तहत फायदा तो दोनों को होगा. वैसे वैज्ञानिक सोच रहे हैं कि उसकी लाश को हासिल करके उस पर शोध कर लिया जाये, उस पर शोध करना, आतंक पर शोध करने के समान होगा. आतंक पर शोध करने वाले का तो सम्मान ही होगा. लादेन मरकर भी कितने ही चैनलों की कमाई करवा गया, टीआरपी बढ़वा गया. अमेरिका का बस चलता तो वो इस खबर के प्रसारण के अधिकार बेचकर भी करोड़ों-अरबों कमा लेता. पर चूक गया. कई बार बहुत अधिक खुशी भी नुकसान कर देती है. इस मामले में यही हुआ है. आतंकवाद के सुप्रीमो का काम तमाम करने के चक्कर में अमेरिका इतना खुश है कि.. जितनी खुशी मरकर लादेन को नहीं हुई होगी. लादेन कोई वसीयत नहीं करके गया है, जिससे जाहिर है कि वो यहीं मौजूद है और सबके मन में तो आतंक के रूप में मौजूद है ही, क्या है कोई ऐसा देश या उसका बाशिंदा जो लादेन के आतंक से निजात पा सके. हैरत मत कीजिएगा कि कल लादेन की वेबकास्टिंग स्वर्ग अथवा नरक से सीधे धरती पर की जा रही हो, और आप सोच रहे हों कि लादेन तो मरा नहीं है, वैसे आप मेरी बात मान लीजिए कि जब हम रावण को इतने अरसे से नहीं मार पाए हैं, जबकि उसके खूब सारे पुतले जलाए हैं, तो लादेन को क्या मार पायेंगे, जबकि फर्जी लादेन भी मौजूद हैं. लादेन के यूं एकाएक चले जाने से आतंक की दुनिया एकदम सूनी-सूनी सी हो गई है.

आतंकवाद की दुनिया अंधेरी हो गई है : दैनिक हिन्‍दी मिलाप 5 मई 2011 के अंक में पढि़ए

और दुनिया को लगता है
अंधेरे से डर
डरने वाला तो मरने से भी
डरता है
क्‍या करेगा
तख्‍ते-जि़गर
(जिसका जि़गर तख्‍त की तरह सख्‍त हो)
अंधेरे में तो
वो तख्‍त भी
टूट टूट जाएगा।

कुट्टू का कोहराम : आई नेक्‍स्‍ट 12 अप्रैल 2011 के अंक में खूब कही स्‍तंभ में प्रकाशित

भ्रष्‍टाचार के मुंह पर अन्‍ना का जूता - डीएलए में 12 अप्रैल 2011 के अंक में प्रकाशित

कुट्टू का कोहराम कुट्टू के आटे ने कहर बरपा कर डाला. कुछ को जान से मारा और कइयों को घायल कर दिया. कुट्टू के कोहराम की खबरें सुर्खियों में हैं, चैनलों में सनसनी, वारदात जैसे कार्यक्रमों में उसके कारनामों का ढोल पीट-पीट कर टीआरपी बढ़ाई जा रही है. इस समय दो ही खबरें सुर्खियों में हैं जिसने क्रिकेट की कप विजय की खबर को भी करारी मात दे दी है. एक अन्ना दूसरे कुट्टू. विश्वस्त सूत्रों से खबर मिली है कि कुट्टू के आटे को सजा-ए-मौत सुनाई गई है. ऐसा एक सत्ता हथियाए नवोदित नेता ने आनन-फानन में बिना सोचे समझे जारी एक बयान में कहा है. उसने यह भी कहा है कि सभी चैनलों और मीडिया माध्यमों पर मेरे बयान को तुरंत प्रसारित कर दिया जाए, जिससे अन्य आटे सिर न उठा सकें. उसने मीडिया ब्लॉगों पर भी अपना बयान जारी करवाने की असफल कोशिश की है. कुट्टू के आटे को मौत की सजा सुनाए जाने से गेहूं के आटे के नेतृत्व में बाजरे, मकई, सिंघाड़े इत्यादि के आटे एकजुट होने लगे हैं, वे बुरी तरह नाराजगी प्रकट कर रहे हैं. सिंघाड़े के आटे का कहना है कि इंसानी करतूतों के लिए कुट्टू के आटे को सजा सुनाए जाने की इंसानी कूटनीति की निंदा की जाती है. मिलावट इंसान करता है और सजा हम मासूमों को मिलती है, जबकि हम तो सदा से व्रत हो या न हो, सभी दिन समस्त इंसानों के पेट की पूजा सभी रेटों में पवित्र भाव से करते रहे हैं. अनुभवी स्वास्थ्य मंत्री की कोशिश है कि कुट्टू के आटे को बचा लिया जाए क्योंकि इससे स्थिति बिगड़ने की संभावना है और उन्होंने कुट्टू के आटे के सेवन से हुई मौत को हाइपरटेंशन के नाम से जोड़ दिया है. बीमारियां तो पहले से ही इंसान की जान लेने के लिए यूं ही सदा बदनाम रही हैं. इधर कुट्टू का आटा दहशत में है और दुकानों से फरार हो गया है और औचक छापों में भी वो बरामद नहीं किया जा सका. लेकिन इतना तय है कि इस फरारी में अन्य आटों की मिलीभगत नहीं है. इंसान ने ही सबूत मिटाने के लिए इन्हें गायब करवा दिया होगा. होम मिनिस्टर की नाराजगी के कारण पुलिस के आला अधिकारी हरकत में आ गए हैं और ऐसी करामात कर बैठे हैं जिसके लिए वे सदा से ही बदनाम रहे हैं. उन्होंने गेहूं के ब्रांडेड आटों को इस लालच में गैर-कानूनी रूप से धर लिया है कि इससे या तो कुट्टू का आटा खुद ही सरेंडर कर देगा और उसने सरेंडर नहीं किया तो जिन कंपनियों के आटे हैं, उन कंपनियों से वे मोटी वसूली कर पायेंगे. पुलिस की इस कार्रवाई को पेड मीडिया के माध्यम से, नेताओं ने, अपने हालिया बयानों के जरिये एक बेहतरीन कार्रवाई बतलाया है और पुलिस के इस कदम की प्रशंसा के लिए, उस किस्म के पुल बांध दिये हैं जो तुरंत ही ढह भी जायेंगे. पर वे ऐसा करने के लिए इसलिए विवश हैं क्योंकि वे अन्ना हजारे को दिखला देना चाहते हैं कि भ्रष्टाचारी चाहे इंसान हो या आटा किसी को बख्शा नहीं जाएगा.

कुट्टू के आटे को सज़ा-ए-मौत : हिन्‍दी मिलाप 12 अप्रैल 2011 में बैठे ठाले