अन्‍नागिरी से बादामगिरी तक ! : दैनिक ट्रिब्‍यून 9 अगस्‍त 2012 स्‍तंभ 'सागर में गागर' में प्रकाशित


अन्‍ना राजनीति में, राजनीति गन्‍ना है, गंडेरी नहीं, गौर कीजिएगा। गंडेरी सीधे दांतों में चबाकर उसके रस का आनंद लिया जा सकता है जबकि गन्‍ने के सख्‍त छिलके को पहले छीलना पड़ता है। इस छीलन-प्रक्रिया में दांत जख्‍मी हो सकते हैं। गन्‍ना कभी जख्‍मी नहीं हुआ करता। उसे तो यूं ही उठाकर डण्‍डे के माफिक भी मारा जा सकता है। इसमें खाने वाले को (गौर कीजिएगा चबाने वाले को नहीं) चोट लगेगी, मारने में गन्‍ना टूट सकता है लेकिन फिर भी उसकी उपयोगिता कम नहीं होती। गन्‍ने का रस निचोड़ कर वैसे मज़ा लिया जाता है, न निचोड़ पाएं तो उसे चलती मशीन में दबाकर पीसने की युक्ति कारगर रहती है। पूरा रस निकल जाता है। मीठे रस से भरपूर गन्‍ना बे-रस हो जाता है किंतु राजनीति कभी बरसती नहीं, नीरस भी नहीं होती, उसमें संभावनाएं सदा जिंदा रहती हैं।

आप चाहे पक्ष में हों या विपक्ष में, पशु हों या पक्षी, राजनीति की कुशल नीतियां सबका भला करती हैं। सबका भला करे भगवान, राजनीति भी सबका भला ही करती है। लाभ लेने वाला प्रवीण होना चाहिए। लाभ लेने का सबसे सरल तरीका भ्रष्‍टाचार, जिसे देश में रोजाना त्‍यौहार की तरह मनाया जाता है। सरकारी महकमों से जुड़े अधिकांश अधिकारी और कर्मचारी इसे मनाने का मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहते। इसके विपरीत नेताओं को ऐसे मौके तोहफे में प्रदान किए जाते हैं, जिससे वे घपले और घोटालों को अंजाम देते हैं। फंसने पर उन्‍हें बचने के गुर सिखलाए जाते हैं। इसमें जांच होती है। जांच का जांचना ही फंसावट से सुरक्षित बाहर निकाल मुक्ति प्रदान करता है।

अन्‍ना राजनीति में आ रहे हैं। पहले वे भ्रष्‍टाचार के पीछे बिना भूख प्‍यास की चिंता किए दौड़े जा रहे थे, अब उन्‍हें घोड़े की तरह राजनीति के पीछे पेट भर के दौड़ने की चुनौती दी गई है। अन्‍ना ने ना नहीं की और चुनौती स्‍वीकार कर ली। अन्‍ना को यह बोध हुआ है कि जिसका खात्‍मा करना हो, उसे नज़दीक से जानना बहुत जरूरी होता है। जैसे रावण को जानने-मारने के लिए राम ने विभीषण का सहारा लिया। राजनीति में सब एकदूसरे को सहारा देते हैं। चाहे पक्ष हो या विपक्ष हो। सियासत में लूटकार्य मिल कर ही संपन्‍न किए जाते हैं। जो तेरा है वह मेरा है, जो मेरा है वह तेरा है, जो तेरा है वह तेरा है, जो मेरा है वह मेरा है। इस तेरे मेरे की उलझन में कोई नहीं मरा है। इस तेरे मेरे ने ही सबको राम बना दिया है। सब जीवंत हो उठे हैं।

अन्‍ना गन्‍ना चूसेंगे तो पब्लिक क्‍या करेगी, पब्लिक उस गन्‍ने को छीलेगी। पब्लिक हर कार्य करने के लिए तैयार रहती है, वह नहीं विचार कर पाती कि इस कार्य से उसे नफा होगा या नुकसान। नेता उसे नफे की निराली दुनिया दिखाते रहते हैं। पब्लिक देखते हुए गन्‍ने के छिलके छीनने में जुटी रहती है। राजनीति के गन्‍ने ने अन्‍ना को मोह लियो है, अब वे भी गन्‍ने को छीलने में जुटने वाले हैं, चाहे घाव दांतों में ही हो जाएं। गन्‍ना सख्‍त है तो क्‍या हुआ, अन्‍ना भी तो भ्रष्‍टाचार को लेकर पूरे सख्‍त हैं। क्‍या हुआ जो अपनी टीम के सदस्‍यों को उस सख्‍ती का अहसास अन्‍ना ने नहीं कराया है। अब करायेंगे, जब राजनीति में आए हैं तो उस सख्‍ती को भी जरूर दिखलाएंगे। अब देखना यह महत्‍वपूर्ण है कि अन्‍ना राजनीति में कौन से मीठे गुल खिलवाते हैं, लोकपाल को लागू करवाते हैं या पहले की तरह ही लोक को पागल बनना होगा।

पब्लिक पागल हो जाए तो कई संकट अपने आप छू मंतर हो जाएंगे। पागल बनकर पब्लिक जंतर मंतर पर इकट्ठा होना छोड़ देगी। बवाल मचाना छोड़ देगी। पागलपन की धुन बहुत मस्‍त होती है। पब्लिक पागलपन की पूरी मस्‍ती में है। अन्‍ना में राजनीति या राजनीति में अन्‍ना – यह तराना बहुतों को लुभा रहा है।  मलाई-राबड़ी चाटने के सपने दिखलाई दे रहे हैं। रात-दिन सुनहरे होने वाले हैं। विशिष्‍ट व्‍यक्तियों का पर्यावरण यूं ही हरा नहीं होता, उसमें हरियाली लाने के प्रयत्‍न करने पड़ते हैं। जंतर पर भीड़ लगाकर मंतर बहुत जोर से फूंका जाता है।

अन्‍ना पर फूंका गया मंतर मिशन इलेक्‍शन है। इस मंतर के प्रभाव से कई मंत्री बनेंगे, कितने ही संतरियों के दिन फिरेंगे। आज गन्‍ने का रस निकाला जा रहा है। गन्‍ने के मजबूत छिलके छीलने के बाद ही, संतरों के मुलायम छिलकों को छीलने के अवसर मिलते हैं। आप छिलकों की उपयोगिता से परिचित हैं कि नहीं। बादाम के दाम यूं ही नहीं बढ़ते हैं। छिलके वाले साबुत बादाम के दाम सबसे कम, छिलके रहित बादाम के दाम अधिक और बादामगिरी के दाम आसमान छूते हैं। राजनीति भी बादामगिरी ही है। पर पब्लिक इसे अन्‍नागिरी और गन्‍नागिरी तक ही पहचानती है। मालूम नहीं क्‍यों फिल्‍म 'रोटी' का यह लोकप्रिय गीत राजनीति में ऐसे गठबंधनों की पोल खोलता दिखाई देता है।गीत के बोल हैं - ‘ये जो पब्लिक है सब जानती है, भीतर क्‍या है बाहर क्‍या है, यह सब पहचानती है’। अगर पब्लिक सब जानती-पहचानती होती तो अन्‍ना की गन्‍नागिरी के फेर में न उलझकर, नेताओं की बादामगिरी की अहमियत पर सवाल न उठाती ? पाठकों,आप तो बादामगिरी के सफर को पहचान चुके हैं न।

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