दमादम मस्‍त दामादम : दैनिक जनसंदेश टाइम्‍स 16 अक्‍टूबर 2012 स्‍तंभ 'उलटबांसी' में प्रकाशित

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दामादजी हम तुम्‍हारे साथ हैं, की चिल्‍लाहटें सुर्खियों में हैं। चैनल और प्रिंट मीडिया के नलों की सुर्खियों से प्रचार का रिसना अब भी जारी है। पचास  लाख का भाग्‍य जागा और वे तीन सौ करोड़ हो गए।  दामाद, नोट और प्रचार तीनों एक, दूसरे और तीसरे पर टिके हुए हैं। सिर्फ दामाद कहना अब जुर्म हो गया है इसलिए अब उन्‍हें दामाद जी कह कर  संबोधित किया जा रहा है। वैसे जी लगाने से घोटालों की याद आने लगती है।  शब्‍दों के अर्थ उनके कारनामों से डिसाइड होते हैं। जी अनेक नेक अर्थों से मालामाल है। दो जी के घोटाले तब होते हैं, जब दो को टू कहा जाता है। इसी प्रकार थ्री लगाने से भी घोटाला और फोर लगाने से भी होने वाले घोटाले को टाला नहीं जा सकता। जी को दोहराएंहोता तब जीजी है किंतु बहन और तीन बार जीजीजी बहन के प्रति आदरभाव प्रकट करता है। जी शब्‍द की फजीहत सरकार ने घोटाले-घपलों की ओर से आंख मूंद कर होने दी है। दामाद का दामाद जी होना उसी का असर है। जी कहना अपमानसूचक हो गया है।
दामाद शब्‍द के मध्‍य से ‘मा’ को निकाल दिया जाए, इससे बाकी रह जाती है दाद । कौन रोक सकेगा इसके बदलते अर्थ की जिहाद। दाद के दो मायने लोकप्रिय हैं। एक बीमारी है और  दूसरा कवियों और ग़ज़लकारों के उत्‍साहवर्द्धन के लिए बादाम। इसे जानने के लिए बनाना रि‍पब्लिक को अलग से बनाना नहीं पड़ेगा।
दामाद को उर्दू के माफिक उल्‍टी गिनती की मानिंद पढ़ने पर और हिंदी के पहले अक्षर से पहले एकाएक ब्रेक लगाने पर दमा बचता है। दमा नुकसानदेह है, दमदार का भी दम निकाल देता है। दामाद का दम निकला हुआ है। इतिहास साक्षी है कि दामाद ने सदा बेदम किया है। दामाद का दम बचाने के लिए सरकार के पालतू अपना दम न्‍यौछावर करने के लिए तैयार हैं। जबकि ऐसे कारनामों को खुदकुशी की संज्ञा दी गई है। सरकार दामाद को महिमामंडित करते हुए इसे शहीद बतला रही है। सरकार को दमा हो गया है और सांस फूल रही है। उठापटक पटककर उठाने और फिर से पटकने की कबड्डी जारी है। जान देने की जगह लेने के उपक्रम जोरों पर है, ऐसी सुगबुगाहटें माहौल में हैं।
दामाद का जी नश्‍तर की धार पर है। दामाद चिल्‍लाएं नहीं तो और क्‍या करें  दामाद को जान बचाने के लाले पड़ गए हैं। सरकार के गाल भी लाल हैं। कोई भी लाड लड़ाते हुए चिकोटी काट लेता है। उनकी सम्‍पत्ति और नोटों की मुनादी ने सबको इसी धंधे की ओर खींचा है। सरकार से रिश्‍तेदारी में ऐसा ही होता है। नाते-रिश्‍ते सब फरेब में बदल जाते हैं। दरक-चटक जाते हैं  रिश्‍तों की चमक मंद पड़ जाती है दोस्‍ती बुरी चीज नहीं है। फेसबुक की दोस्‍ती और ट्विटर की चहचहाहट सबसे अधिक सफल है। दोस्‍ती खत्‍म किंतु चहचहाना जारी है। सब कुछ समझ में आ गया किंतु यह नहीं आया है कि फेसबुक से ऑलविदा के नए मायने क्‍या हैं ?

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