महावत क्‍यों मौन है ? : दैनिक हरिभूमि 23 अक्‍टूबर 2012 अंक में प्रकाशित


क्लिक करके भी पढ़ सकते हैं
राजनीति में दामादगिरी जोरों की कयामत ढा रही है जिसकी वजह से केला और आम चर्चित हो गए हैं। वैसे आम उत्‍सव के मौके पर आम की कई किस्‍मों के दाम बादाम को भी मात कर देते हैं आंधियों के कारण आम का असमय गिरना भी उसके दामों में इजाफे के लिए दोषी होता है।  केले कभी आंधियों से नहीं गिरतेकेलों को तहस-नहस करने का श्रेय सदा से हाथियों और बंदरों के नाम रहा है। हाथी और बंदर का स्‍वभाव नेताओं में नहीं पाया जातावे सदा आम चूसना ही पसंद करते हैं और कॉमनमैन को आम की तरह चटकारे लेकर चूसते ही पाए जाते हैं।
पब्लिक को केला बनाना जितना आसान है उतना ही आम को चूसना। पब्लिक को केला बनाकर छिलका छीलकर कहीं भी फेंक दो और केले की लचीली गिरी उदरस्‍थ कर लो,पब्लिक फिसल जाएगीफिर खूब हंस लोठहाके लगा लो और लाफ्टर चैलेंज के शो में बढ़त बना लो। केले के छिलके पर पब्लिक फिसलेतुरत जुर्माना लगा दो। पब्लिक वह आम है जो सदा चूसी जाती हैपब्लिक केले के छिलके पर फिसलती है और नेता पब्लिक पर। फिसलता भी है और पब्लिक को घसीटता भी है। यही युगीन सत्‍य है। आम का पापड़पापड़ होते हुए भी उसके अवगुणों से मुक्‍त रहता है। आम का पापड़ खाते हुए कड़ तड़ पड़ की आवाज नहीं करतायह चबाए जाने पर भी मौन रहता है। इस पापड़ को युगों युगों से चटकारे लेकर चाटा जाता रहा है और चाटा ही जाता रहेगा। यह आम की खासियत हैऐसा समझ रहे हैं तो आप मुगालते में हैं क्‍योंकि आम का मुरब्‍बा भी बनता हैजैसे नेता पब्लिक का स्‍वादिष्‍ट मुरब्‍बा बनाती है। पब्लिक को जानवर (गधा) या पक्षी (उल्‍लू) भी बनाया जाता है।
वो मुरब्‍बा ही क्‍या जिसके खाने पर अब्‍बा की याद नहीं आई और अब्‍बा की याद के पीछे अम्‍मा न दौड़ी चली आई।  देश की पब्लिक केले के छिलके पर रोजाना फिसल रही है। उस पर तुर्रा यह कि नियम बना दिया गया है कि केले के छिलके पर फिसलने पर चालान जरूर होगा। आम चूसने पर दामादगिरी का मसला होने पर भी चर्चा नहीं होती। आम फल पर सामान्‍यत:न बंदर और न हाथी की नीयत डोलती है। हाथी और बंदर गन्‍ना और केला देखकर डोलते हैं और मन के रंजन के लिए केले के बागों को उजाड़ते भी रहते हैं। जबकि  लोकतंत्र में हाथी आम पर ललचायी नजरें गड़ाए रखते हैं।
हाथी का मोह गन्‍ने से भंग हो चुका है। बंदर गन्‍ना नहीं खाता है। बंदर गन्‍ना हाथ में लेकर डांस कर सकता हैहाथी के बस का यह नहीं है। हाथी को सांकल डालकर बंदर के माफिक डांस नहीं कराया जा सकता। जरूरत भी नहीं है क्‍योंकि पब्लिक भिन्‍न-भिन्‍न प्रकार के डांस करने में मशगूल रहती है।
हाथी को नचाना पब्लिक और नेता के बस का नहीं है इसलिए वे खतरा सामने देखकर हाथी को ढककर काम चलाते हैं। हाथी को अक्‍ल से बड़ा मान लिया गया हैभैंस इस मामले में पिछड़ गई है। इसी से देश के चहुंमुखी विकास की जानकारी मिलती है। जिनके हाथ नहीं होतेउनके हाथी होते हैं और जिनके हाथ होते हैंउनके ही हाथों में हथियार होते हैंवे महावत को भी बांधकर रखते हैंअब समझ रहे हैं आप कि देश का महावत क्‍यों मौन है ?


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

ऐसी कोई मंशा नहीं है कि आपकी क्रियाए-प्रतिक्रियाएं न मिलें परंतु न मालूम कैसे शब्‍द पुष्टिकरण word verification सक्रिय रह गया। दोष मेरा है लेकिन अब शब्‍द पुष्टिकरण को निष्क्रिय कर दिया है। टिप्‍पणी में सच और बेबाक कहने के लिए सबका सदैव स्‍वागत है।