भ्रष्‍टाचार में विकास की संभावनाएं : दैनिक जनवाणी स्‍तंभ 'तीखी' नज़र' 6 नवम्‍बर 2012 अंक में प्रकाशित


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भ्रष्‍टाचार करना और मिटाना दोनों आजकल बतौर कैरियर खूब पसंद किए जा रहे हैं। भ्रष्‍टाचार को इस समय सबसे अधिक फुटेज मिल रही है। पिछले कई महीने से उसकी ऊंचाई का ग्राफ बहुत तेजी से ऊपर की ओर गया है लेकिन उससे प्रभावित वे नीचे वाले हो रहे हैं। यह ऐसा धंधा है कि भ्रष्‍टाचार करो तो खूब कमा लो और मुखालफत करो तब भी जेबें लबालब भर लो।  महंगाई इस सच को जान गई है और उसका रो रोकर बहुत बुरा हाल है। वह मन ही मन कुढ़ रही है, सीढि़यां तो वह भी चढ़ रही है किंतु वह इसे इसलिए जाहिर नहीं कर रही है क्‍योंकि ऐसा करने से उसकी जमी हुई साख पिघलकर पानी की तरह बह जाएगी। डॉयन के खिताब से सम्‍मानित होने के बाद भी वह नित नए शिखरों पर चढ़ने की जुगत में सदा सक्रिय रहती है, इसमें उसे सफलता भी मिलती रही है। जब उसके प्रतिद्वंद्वी भ्रष्‍टाचार को इतनी लोकप्रियता नहीं मिली थी, तब तक तो सब ठीक चल रहा था लेकिन एकाएक भ्रष्‍टाचार ने पूरे परदे के आकार में अपने रूप को चौड़ा लिया है। लोकप्रिय होने के नेताओं के रिकार्ड को भी ध्‍वस्‍त करने में उसे घनघोर सफलता मिल चुकी है।
इसे देखकर महंगाई तो महंगाई उसके गठबंधन केर सहयोगी टीम के सक्रिय मेम्‍बर पैट्रोल, डीजल, गैस, सब्जियां और फल तक बेहद गमगीन हैं। उनका ऐसा करना सतही तौर से महंगाई की सहानुभूति प्राप्‍त करना है, वरना तो उन्‍हें तो भ्रष्‍टाचार से जितनी बढ़त मिल रही है, उनका कैरियर जितना विकास पर है, उतनी बढ़त उन्‍हें कभी महंगाई के साथ होने से भी नहीं मिली है।  महंगाई नित नई रणनीतियां बनाती है, उस पर पूरी तरह से अमल भी करती है परंतु रेट्स के बढ़ने से बुरी तरह मात खा रही है, वह ऊंचे रेटों के साथ लोकप्रियता के कॉम्‍बो पैक पर भी कब्‍जा जमाने फेर में है। दरअसल, भ्रष्‍टाचार ने उससे बहुत कम समय में बाजी मार ली है।

भ्रष्‍टाचार के विकास में यूं तो महंगाई की उल्‍लेखनीय भूमिका है और वह चाहती है कि चर्चा के केन्‍द्र में वह खुद बनी रहे। दरअसल, भ्रष्‍टाचार को लोकप्रियता के पायदान पर काबिज होने में महंगाई का भरपूर सहयोग मिला है। भ्रष्‍टाचार को लोकप्रियता की बुलंदियों के शिखर पर पहुंचाने में अन्‍ना और उनकी टीम का भरपूर योगदान रहा है। अब टीम के सदस्‍यों ने अपनी कई टीमें बना ली हैं और चौतरफा लोकप्रियता को भुना रही हैं। भुने हुए में कितना स्‍वाद मिलता है, इसे भुनने वाला नहीं, भुने हुए को खाने वाला ही जानता है। महंगाई के सारे प्रयत्‍न फेल हो रहे हैं और वह भुनभुना रही है। महंगाई के कारण नफा काटने वाले तेज गति से भ्रष्‍टाचार की ओर उन्‍मुख हो रहे हैं, महंगाई महारानी के लिए यह भी चिंता का सबब बन गया है । महारानी की कुर्सी पर रिस्‍क ऐसे समय में बढ़ गया है जबकि चुनाव नजदीक हैं और सरकार डोलायमान है।

गैस के सिलैंडरों की संख्‍या सीमित करने, कनैक्‍शनों पर सख्‍ती बरतने से पब्लिक परेशान हुई, परेशान पब्लिक ने गैस के पुतले भी फूंके लेकिन महंगाई में अब वह ताकत नहीं रही है जिससे उसकी औकात कानी कौड़ी की भी नहीं रही है। आज के माहौल में महंगाई के सारे ही दुख बड़े हैं और उससे मुकाबला करने के‍ लिए खड़े हैं। वैसे अब भी उसमें इतना दम तो बाकी है कि जरा सा जोर मारती है तो बहुत कुछ हासिल कर लेती है। महंगाई महारानी अब चाह रही है कि आजकल सुर्खियों में बने हुए खुलासामैन उसकी बुराईयों और उसकी वजह से समाज को रहे नुकसान की खामियों का भी पर्दाफाश करें ताकि वह अपनी खोई हुई प्रतिष्‍ठा को हासिल करने में सफल हो सके।

जहां देखो वह रोती बिसूरती नजर आ रही है परंतु किसी की भी उसकी खामियों का खुलासा करने में दिलचस्‍पी नहीं रह गई है। ऐसे निराशाजनक दौर में वह कई बार खुदकुशी करने की भी सोच चुकी है। वह ऐसा न करे इसके लिए आप महंगाई को उसकी उन्‍नति के लिए कुछ मौलिक उपाय सुझा सकते हैं क्‍या ?

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