अब बाबागीरी से ही आशा है ... ! : मिलाप हिंदी में 24 जनवरी 2013 को स्‍तंभ 'बैठे ठाले' में प्रकाशित



हजारी लाल ने आज अपनी दुकान बंद कर रखी है। बाहर एक टैन्‍ट लगा हुआ है और नीचे बिछे गद्दों पर आठ दस लोग मुंह लटकाए बैठे हैं। मानो किसी का मातम मना रहे हों। मैं किसी अनहोनी की आशंका से स्‍तब्‍ध हूं। क्‍या हुआ हजारीलाल मैं पूरी तरह गंभीरता ओढ़कर पूछता हूं। मुन्‍नाभाई आज मुझे पहली बार अपने हज्‍जाम होने पर दुख हो रहा हैकि क्‍यों मैंने नाई की दुकान खोलीजबकि देश में रोजगार के इतने अधिक अवसर मौजूद हैं। मैंने कहा और वह भी तब जब तुम उच्‍च शिक्षा प्राप्‍त हो तो .... । पढ़ा  लिखा हूं इसलिए ही तो बाल काट रहा हूंउस घड़ी को कोस रहा हूं जिस दिन मैंने हज्‍जाम बनने का फैसला लिया था मुन्‍नाभाई। सीखने में पैसा खर्च किया अलगउसके बाद दुकान किराए पर लेनाउसमें फर्नीचर पर खर्चा – मेरी तो मति मारी गई थी। अब भी दुकान किराए की ही है। उसी का किराया भर रहा हूं।
मुझे लगा कि हजारी लाल दो-तीन महीने से किराया नहीं देने का रोना रोएगा या बिजली के बढ़े बिल का भुगतान नहीं कर पाने से दुखी होगी और बिजली कट गई होगी।  मुझे उससे सहानुभूति हो आईमेरा मन उसके दुख से द्रवित हो उठासोचा इसकी कुछ आर्थिक मदद कर दूं। आख्रिर इंसान ही इंसान के काम आता है। कुछ बताओगे भी हजारी लाल ? दुख साझा करने से ही कम होते हैं। हो सकता है कि मैं तुम्‍हारी कुछ मदद कर सकूंमैंने इंसान बनते हुए कहा। आप कुछ नहीं कर पाओगे मुन्‍नाभाई। मैं सचमुच की कैंची से पब्लिक के बाल कतरता हूँ और वो अपनी जुबान की कैंची से दिमाग को कुतर रहा है। उसने अपने धंधे में पूंजी भी नहीं लगाई और करोड़पति बन बैठा । अब हाल यह है कि करोड़पति और नेता तक उसके दरबार में हाजि‍री बजाने के लिए लालायित रहते हैं।
मैं तुम्‍हारे दुख का सिर-पैर नहीं समझ पा रहा हूँ हजारीलाल। उसने कहा, एक हो तो गिनवाऊं मुन्‍नाभाई और हजारीलाल फूट फूट कर रोने लगा। आगे उसने कहा कि बाबा बनकर नामदाम कमाने और इसे रोजगार बनाने का धंधा आजकल बहुत उपजाऊ है। सिर्फ अनपढ़ ही नहींपढ़े लिखे भी बाबा की मस्‍ती के दीवाने हैं।  सबकी मुंडियां और मुट्ठियां नोटों की कड़ाही में डूबी रहती हैं। अब मुझे हजारीलाल का दुख समझ में आने लगा। मैंने कहा, तुम बिल्‍कुल ठीक कह रहे हो।  ईश्‍वर को भी महसूस हो जाता कि भगवान बनने से अधिक अच्‍छा धंधा तो बाबा बनने में है। नेता तो इनकी बराबरी करने की सोच भी नहीं सकते इसलिए इनके मंचों पर पहुंचकर पब्लिक को संबोधन करने के लिए लालायित रहते हैं। सबकी कमजोरी भीड़ है और भीड़ की कमजोरी बाबा हैं। वोटर में फिर भी कुछ दिमाग होता है और उसे वे इस्‍तेमाल करते हैं जबकि इनका भक्‍त आफताब होता है।
इसलिए मुझे अपने नाई होने पर आज पहली बार शर्म आ रही है मुन्‍नाभाई ।  अगर मैंने अब तक जुबान की कैंची चलाई होती तो न जाने कितनी दौलत पाई होती। जितना धन,समय और श्रम मैंने नाई कर्म की एक्‍सपर्टीज में खर्च किया उससे कम में कई गुना अधिक कमाई तो सिर्फ बाबा कर्म’ में ही मिल जाती। मैं समझ रहा था कि हजारीलाल का व्‍‍यक्तित्‍व बाबाओं के हिसाब से पूरी तरह योग्‍य है इसलिए उसकी चरमपीड़ा  स्‍वाभाविक है। उसने जितनी पूंजी हज्‍जाम के पेशे में लगाईउतने में उसे शुरू में अपने लिए कुछ चेले-चपाटे हायर करने ‘गुरुघंटाल बनना पड़ता।  मैं वर्तमान माहौल को देखकर समझ गया हूं कि हजारीलाल की सोच कोमुंगेरीलाल का हसीन सपना’ कहकर खारिज नहीं किया जा सकता है। 

2 टिप्‍पणियां:

  1. जुबान की कैंची तो अनाु शनाु नाम कमा रही है।

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  2. अच्छा आलेख |जवान की कैची तो चलती रहती है पर मेरा सोच है कि किसी काम में कैसी शर्म |
    आशा

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