चूहे फुल फ्लेज्‍ड खुंदक में हैं : डेली न्‍यूज एक्टिविस्‍ट में 12 जून 2012 अंक में प्रकाशित


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चूहे फुल फ्लेज्‍ड खुंदक में हैं। खुदंक चुहियों को भी आ रही है। वैसे खुश भी हैं चुहियाएं कि उनके चूहेदेवों को करोड़ों का अनाज खाने के तमगे से सम्‍मानित किया गया है। चूहे करोड़पति हुए न, सुन लो बिग बी। चूहे भी बन गए हैं करोड़पति, चाहे करोड़ों का अन्‍न खाकर ही, जरूरी थोड़े ही है कि सवालों के जवाब देकर ही, वह भी दर्शकों की राय, दोस्‍तों को फोन करके या जोखिम लेकर सवालों के जवाब देकर ही असली करोड़पति बना जा सकता है। मोबाइल फोन हो तो एसएमएस भेजकर लखपति बना जा सकता है। चूहे अनाज खाकर, चाहे बित्‍ता भर ही पेट है उनका, डकार लेने के हकदार साबित हुए हैं। डकार लेना और डकारना कोई इत्‍ता आसान नहीं है। पर चूहे सीख गए हैं नौकरशाहों से और नेताओं से, यह साबित किया जा रहा है।
जब से साक्षरता अभियान का लाभ चूहों को मिलना शुरू हुआ है। यह तो इंसानों का उन पर किया गया एक्‍सपेरीमेंट ही था जो एक्‍सपायर नहीं हुआ, हंड्रेड परसेंट विक्‍ट्री मिली। नहीं ऑस्‍कर या दादा साहेब फाल्‍के मिला तो क्‍या हुआ, सफलता पुरस्कारों से नहीं, कारनामों से मिलती है, कारगुजारियों के कर गुजरने से मिलती है। चूहे जान गए हैं कि उनको बकरा बनाकर, शातिर इंसान जब चाहे उनकी बलि दे देता है। जबकि कहां चूहा और कहां बकरा, किसमें अधिक गोश्‍त है सब जानते हैं। इंसान ने शैतान को भी मात अपनी इन करारी मातों से ही दी है और रोजाना इसमें बढ़ोतरी हो रही है। इंसान करतूतों को कारनामा बनाने की कूबत रखता है।
अनाज बेच गया इंसान, फंस गया चूहा नन्‍ही सी जान। मढ़ दिया आरोप कि चूहे डकार गए जबकि डकारने के लिए तोंद की अनिवार्यता से इंकार नहीं किया जा सकता है। एक, दो, हजार, पांच, दस हजार, पचास लाख का नहीं, करोड़ों का अन्‍न, कितना बड़ा बतलाया है इंसान ने चूहे का मन। इंसान की उदारता है कि इत्‍ती बिग चोरी होने के बाद भी सब कुछ कर गुजरने में सक्षम इंसान, निरुपाय, निस्‍सहाय भाव से महसूसता रहा। चूहे जो इस आरोप को हज़म नहीं कर पा रहे हैं, वे करोड़ों का अनाज कैसे डकार गए, तो इतने महाशक्तिशाली हैं, सुपरचूहे हैं हम। जबकि चूहे का बित्‍ता भर पेट थोड़ा कुतरने भर से ही, अनाज की खुशबू से ही अफारा मारने लगता है और तुरंत किसी मेडिकल स्‍टोर में जाकर पुदीन हरा सूंघकर अपना इलाज खुद करने को मजबूर हो जाता है। तोंदियल तक गले भरने के बाद भी डकार नहीं लेते हैं। फिर चूहे और डकार – कित्‍ता बड़ा विरोधाभास है।
चूहों ने जब से चैनलों पर खबर को देखा-सुना और अखबारों को कुतरते हुए जानकारी ली है कि वे इंसान का करोड़ों का अनाज खा गए हैं। उन्‍हें पेड न्‍यूज में सच्‍चाई नजर आने लगी है। अब उन्‍हें कुछ भी कुतरना रुचिकर नहीं लग रहा है। कुतरने से उनका मोह भंग हो रहा है। चूहे खुद को इंसान की कुतरने की शक्ति के आगे शर्मिन्‍दा महसूस कर रहे हैं। पर चूहे हैं न, नेता तो हैं नहीं, जो प्रेस कांफ्रेंस कर डालें। कोशिश भी करेंगे तो बेहद चालाक इंसान बिल्लियों और कुत्‍तों के रूप में रिपोर्टर बनकर उनकी प्रेस कांफ्रेंस को शुरू होने से पहले ही तितर-बितर कर देगा। इंसानों के और उनके स्‍वामी श्रीगणेशजी का नाम प्रत्‍येक अच्‍छे काम के शुरू करने को श्रीगणेश करना कहा जाता है तो उनका बित्‍ते भर के पेट में मौजूद जीरा के आकार का कलेजा यान जिगर जल भुन जाता है।
चूहे चीत्‍कार भी करेंगे, चिल्‍लाएंगे भी तो अपने गले में ही खराश करेंगे और उनकी इतनी कोशिश उनकी जान जाने का सबब भी बन सकती है। जबकि इंसान के कानों में मक्‍खी जैसी भिनभिनाहट या मच्‍छर जैसी गुनगुनाहट महसूस नहीं होगी। चूहे उदास जरूर हैं पर मायूस नहीं हैं। चूहे शेर नहीं हैं पर चूहे तो हैं। वे लड़-भिड़ नहीं सकते परंतु दौड़-फुदक तो सकते हैं। उन्‍हें कुछ न सुनाई दे पर वे ‘नीरो की बांसुरी का स्‍वर सुनकर’ मग्‍न हो सकते हैं। वे डिफरेंट कलर में पृथ्‍वी पर मौजूद हैं। इंसान बतलाए कि कौन से रंगों के चूहों ने उनके करोड़ों के अनाज पर अपने दांतों की खुजली मिटाई है। मालूम चलेगा तो वे अपने वीर चूहों के लिए ‘ऑस्‍कर’ की सिफारिश जरूर करेंगे। नहीं तो गिन्‍नीज बुक ऑफ रिकार्ड्स में नाम तो दर्ज करवा ही लेंगे।
चूहे आज पहली बार खुदक में नहीं हैं। वे तब से ही खुंदक में हैं जब से पुलिस वालों ने उन पर दारू की बोतलों के ढक्‍कन कुतर कर सैकड़ों बरामद शराब की पेटियों को पीने का संगीन आरोप लगाया है। चूहे बहुत सह जाते हैं लेकिन अब वे गंभीर रूप से चिंतित हैं। उनका चिंतन उनके लिए जायज, एक ‘जून क्रांति’ का आगाज़ है, फिर भी इंसान के लिए नाजायज है। र्इश्‍वर ने जब सबको भरने के लिए पेट दिया है और भकोसने के लिए अन्‍न। फिर भी त‍थाकथित सभ्‍य लोग पेट में अन्‍न नहीं, विदेशी बैंकों में काले धन को सहेजने में बिजी रहते हैं। इंसान सारे अनाज पर अपना जबरदस्‍ती का अधिकार जतलाकर, उन्‍हें कुतरने से महरूम करने की साजिश रच चुका है। चूहे छोटे जरूर हैं परंतु उनकी यह दलील जोरदार है कि देश की, मानवीयता की समृद्धि के सबसे बड़े दुश्‍मन नेता और नौकरशाह देश को लगातार कुतर रहे हैं।
बाबाओं को भी इस धंधे में स्‍वाद आने लगा है पर किसकी नीयत सच्‍ची है और किसकी बिल्‍कुल कच्‍ची, नाम के निर्मल मन के मैले के तौर पर ख्‍याति अर्जित कर चुके हैं। जानकर भी कोई पुख्‍ता सबूत नहीं पेश कर पा रहा है। उनके द्वारा अनाज को कुतरना भी साबित नहीं होगा लेकिन बहुत बड़ी समस्‍याओं को छोटा करने के लिए, ऐसे बवाल मचाना इंसान की आधुनिक संस्‍कृति का अंश है। डकारना तो उनका भी साबित नहीं होगा बशर्ते सीसीटीवी के कैमरे न लगा दिए जाएं। वैसे चूहे इंसान जितने चालाक नहीं हैं। चूहे चाचा और मामा भी नहीं हैं फिर क्‍यों बिल्लियां उनकी मौसियां बनकर इतरा रही हैं। बादाम वे खा रही हैं और हमें सूखे अनाज पर टरका रही हैं। अब यह मामला ‘भूखों की अदालत’ में है, निर्णय की प्रतीक्षा चूहों को भी है और आम आदमी को भी, तब तक हम भी फैसले का इंतजार करते हैं ?

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