मिल गए भगवान : रविवासरीय जनसत्‍ता 29 जुलाई 2012 में प्रकाशित


बिना चश्‍मा पहने भगवान जी से मुलाकात के लिए यहां पर क्लिक कीजिएगा।


सृष्टि पर कण कण में भगवान की मौजूदगी है। फिर भी इंसान सिर्फ एक कण खोज कर ही बावला हुआ जा रहा है। कण जिसके गुण संभावित हैं, अभी साबित नहीं हुए हैं। साबित तो तब होंगे, जब परख लिए जाएंगे। पर इंसान की खुशी का पारावार नहीं है। हतप्रभ है, विस्मित है, उसे अपनी इस एक कण की खोज पर भरोसा नहीं हो रहा है। इसे वह नायाब मान चुका है। उसका कहना है कि उसने भगवान को पहचान लिया है बल्कि यूं कह सकते हैं कि वह भगवान से गले मिलने का सुख लूट चुका है। यह वही सुख है जो ‘मुन्‍नाभाई एमबीबीएस’ में संजय दत्‍त जफ्फी पाकर और देकर बेरहमी से लूटता रहा है। इसे देखकर ही उस समय दीवानों की खुशी की सीमा नहीं रही थी। तब रेखा भी संसद में नहीं पहुंची थी न सचिन ने संसद में कब्‍जा जमाया था।

उलझन में हैं आम आदमी। उसे सब मिलकर उलझाते ही रहते हैं। नेता क्‍या कम पड़ रहे थे जो अब वैज्ञानिकों ने भी उलझाना शुरू कर दिया है। सोच रहा है कि यह कैसी कविता है जो सृष्टि के जन्‍म की कथा बतला रही है। चिंतित है कि आम आदमी पर सब अपने-अपने डोरे डालने को आतुर हैं। आम आदमी सब जान जाए, चाहे जान से ही चला जाए। पर आम आदमी को पूरी जानकारी से लबालब होना चाहिए। चाहे पीने को बूंद भर पानी न मिले।

अब गॉड पार्टिकल की खोज कर ली है वैज्ञानिकों ने। मतलब कण कण में है भगवान। अब अगर भगवान हर कण में मौजूद है तो आम आदमी क्‍या करे, क्‍या अब आम आदमी को सस्‍ती बिजली, स्‍वच्‍छ पानी, साफ हवा के लिए चिंतित नहीं होना होगा। आम आदमी को सब चिता पर लिटाने को आतुर हैं और वह सोच रहा है कि क्‍या भगवान के एक कण की खोज करने से उसकी बिजली, पानी और हवा की समस्‍या जड़ से खत्‍म हो जाएगी।

गॉड पार्टिकल का रहस्‍य जानने के बाद नेता ईमानदार हो जाएंगे, घोटाले-घपलेबाज सुधर जाएंगे और क्‍या सचमुच में ऐसा सतयुग आएगा जिससे सबके अंतर्मन में राम राज्‍य की स्‍थापना हो जाएगी। अगर ऐसा नहीं होना है तो कण मिले या मिले पूरा भगवान – आम पब्लिक को क्‍या लेना-देना है। शैतान भी मिलेगा तो वह भी चलेगा। आम आदमी को गॉड पार्टिकल मिलने से कोई असर नहीं पड़ता है। गरीब आदमी क्‍या इस दिव्‍य पार्टिकल के मिलने से 28 रुपये में संतोषी जीवन जी सकेगा।

क्‍या सब्जियां सस्‍तीं, दालें पौष्टिक, फल बिना डायरेक्‍ट पेड़ से, मसाले बिना मिलावट के, अराजकता की समाप्ति बेईमानी दुर्लभ हो जाएगी। फिर तो गॉड पार्टिकल रूपी नायाब आर्टिकल मिलने की खुशी, मुझे सबसे पहले है। परंतु आम आदमी जानता है कि गॉड पार्टिकल खोजना कितना आसान – किंतु समस्‍याओं से निजात पाना दीगर बात है। भला आम आदमी क्‍या वैज्ञानिक भी नहीं सकते ऐसी करामात। फिर काहे की उपलब्धि और किसलिए निकालें खुशियों की बारात। सफलता पाने पर उल्‍लास मचा रहे हैं, मानो कण नहीं पूरा भगवान का पहाड़ पा लिया हो। जहां पर तैंतीस करोड़ देवी देवता मौजूद हैं। जहां आम आदमी समस्‍याओं के हलाहल रूपी कोलाहल में धंसा-फंसा हुआ हो और इनसे बचने का कोई रास्‍ता, कोई वैज्ञानिक नहीं खोज पा रहे हैं।

आम आदमी का सफर चिंतन से शुरू होकर चिंता तक पहुंचने के लिए अभिशप्‍त है और खास आदमी की यात्रा, बिना किसी रुकावट की मात्रा के चिंतन से चिंतन पर स्‍थाई तौर पर जमा रहता है, उनके चिंतन से उपजे स्‍वर आम आदमी की चिता तक पहुंचने का रास्‍ता सरल बनाते हैं बल्कि चिता तक पहंचाने में खासा असरकारी रोल निबाहते हैं।

ब्रह्मांड की उत्‍पत्ति का रहस्‍य खोजने पर इंसान के लालच की गुत्‍थी कभी खोल पाओगे कि खूब धन और सुविधाधारक के पास इन्‍हें और ... और पाने की लालसा क्‍यों  बलवती बनी रहती है। इंसान पर लालच का जहर क्‍यों पल पल चढ़ता जाता है, महंगाई के मानिंद क्‍यों बढ़ता जाता है। फिर भी संतोष होता है यह जानकर कि विज्ञान के इस ज्ञान से लाईलाज असाध्‍य बीमारियों की चिकित्‍सा भी संभव हो पाएगी। तब तो मुझे लगता है यह बहुत सलोना है। दुख गायब होगा, सुख का साम्राज्‍य फैलेगा – ऐसा होना भी मुझे रोमांचित करता है। जब सिर्फ ईश्‍वर का सिर्फ एक कण खोजकर ही मानव इतना प्रफुल्लित है तो पूरे ईश्‍वर को जिस दिन अपने सामने खड़ा कर पाने में सफल होगा, तब तो खुशी से बौरा ही जाएगा, कुछ तो इतनी खुशी झेल नहीं पाएंगे और मर जाएंगे। लेकिन क्‍या मानव मरने में सहायक खुशी पाने का रोमांच अनुभव कर पाएगा।
एक कण ही तो मिला है और वह भी मिला है कि नहीं। क्‍या मिलने पर उसने बतलाया है कि ‘मैं वही गॉड पार्टिकल हूं पृथ्‍वीवासियों, जिसे तुम पूरी शिद्दत से खोज रहे हो।‘ विज्ञान की खोज में तो ऐसी तस्‍दीक जरूरी है जबकि दुनिया खुशी से बावली हुई जा रही है। इससे अधिक खुशी तो पानी की बूंद की एक झलक पाने भर से हो जाती है। वह भी तो आम पब्लिक के लिए गॉड पार्टिकल ही है। फिर क्‍यों दीवाने मानव, दीवानों की तरह मस्‍ती में चहक रहे हैं। इंसान अब भगवान बनने की ओर बढ़ रहा है। आपको क्‍या लगता है कि यह एक एक सीढ़ी चढ़ रहा है या रॉकेट की तरह तीव्र गति से विकास की लिफ्ट में यात्रा कर रहा है।

जीवंतता से जीने का कारगर मंतर : दैनिक देशबंधु 29 जुलाई 2012 में प्रकाशित


पब्लिक खुश है क्‍योंकि ... : जनसंदेश टाइम्‍स 28 जुलाई 2012 'उलटबांसी' स्‍तंभ में प्रकाशित



पीएम मौन हैं। बाकी सब चिल्‍ला रहे हैं। जब सब चिल्‍ला रहे हों तो एक का तो मौन रहना बनता है। जब कोई किसी की नहीं सुन रहा है और जो चिल्‍ल-पों मच रही है, उसकी चमक निहारने वाला भी कोई महत्‍वूर्ण शख्‍स होना चाहिए। वह पीएम के सिवाय और कौन हो सकता है। महामहिम शपथ लेने वाले हैं। पर अभी से यह कहना कि वे बहुत बातूनी है, उनकी प्रवृत्ति के साथ अन्‍याय होगा। हो सकता है कि वे पहले बातूनी रहे हों परंतु राष्‍ट्रपति पद संभालने के साथ ही उनकी बोलती बंद हो जाए। वे भी सबकी चिल्‍ल-पों सिर्फ सुनें ही, खुद चिल्‍लाने का जोखिम न लें। जोखिम मोल लेना इसलिए नहीं कहा जा सकता है क्‍योंकि वे महामहिम हैं इसलिए उन्‍हें मोल लेने की कोनो जरूरत नाही।
जैसे एक लंबे जमाने से चुप्‍पी साधे पीएम ने अपना मौन तोड़ दिया है और उन्‍होंने महंगाई के लिए मानसून को जिम्‍मेदार ठहरा दिया है। इस बात में आश्‍चर्य की बात यह है कि इस देश में जांच होती है और जांच ही होती रहती है। उसके परिणाम नहीं आते। फिर बिना जांच के मानसून को जिम्‍मेदार ठहराना चल रही नीतियों के अनुसार न्‍यायसंगत नहीं लगता। यह भी हो सकता है कि पब्लिक की चीख-पुकार सुनने के बाद पीएम की बोलती खुल गई हो और वे मानसून को इस कदर डांट बैठे हैं। जबकि आम जिंदगी में पब्लिक को जिससे काम हो उससे पंगा लेना उचित नहीं है। न जाने वह कितना बिफर जाए कि समेटने में न आए और न मनाने से माने ही। वह पीएम की डांट को भी अमान्‍य कर सकता है।
मानसून यह भी सोच सकता है कि जिस पीएम को कभी बोलते न सुना, वह कैसे उसे डांट सकते हैं और उनकी डांट पर इस गलतफहमी के कारण तवज्‍जो ही न दी जाए। बादलों के पास पानी से भरे हुए मटके तैयार हों किंतु इन्‍द्रदेव ‘एक्‍शन’ न कहें और उन मटकों का जल सूर्य के भीषण ताप के कारण भाप बनकर ऐसा उड़े कि पृथ्‍वी पर न आए और पूरा ऊपर के ऊपर ही जल जाए। अब यह जल अगर पानी वाला होता तो खूब बरसता। बरसता नहीं तो रिसता। पर जमीन पर तो एक बूंद तक नहीं टपकी। अगर टपक जाती तो पीएम सोचते कि उनकी डांट के कारण वह टसुए बहा रहा है।
इन्‍द्रदेव अब न मान रहा है और न सुन रहा है। ऐसा लगता है कि वह अब खुद को पीएम समझने लग गया है। पब्लिक सूखे से सूखती रहे लेकिन उसकी आंखों में तनिक सा पानी न दिखाई दे। कहना ही होगा कि जो न माने और न सुने, वही है मानसून। कितनी ही गुहार लगाई जा रही है पर इन्‍द्रदेव न मान रहा है और न सुन रहा है। यह भी हो सकता है कि वह यह सोच रहा हो कि अगर मैं बरसूंगा तब भी पब्लिक सड़कों पर पानी भरने, गड्ढों के गायब होने, नाले और नालियों में पानी ठहरने से वाहनों के नीचे के आधे हिस्‍से के न दिखाई देने के कारण दुखी होगी, इसलिए उसे तरस आ गया हो। अब इस तरस का रस पब्लिक को तो पसंद नहीं है। पीएम ने मानसून की डांट लगाकर बतला दिया है कि उन्‍हें भी यह रस पसंद नहीं है। जब सबको मिलावट ही पसंद है इसलिए मानसून पीएम की डांट रूपी सलाह पर विचार कर रहा है और अब बरसने ही वाला है।
इस बरसात में जो मतवाला होना चाहता है, वह मतवाला हो ले। महंगी सब्‍जी बेचने का मौका पाने वाले भी मना रहे हैं कि बारिश दो चार दिन और न हो तो वे भी अपनी पॉकेटों को माल से फुल कर लें, यह माल चाहे लूट का ही है पर इसे कोई लूट का इसलिए नहीं मानता क्‍योंकि बरसात के न होने वाले बदअसर को हर कोई है स्‍वीकारता। वैसे पब्लिक खुश है कि पीएम ने न बोलने के रिकार्ड को तोड़ा है तो अवश्‍य ही अब वे और कुछ भी बोलेंगे और अब लग रहा है कि पब्लिक ‘उम्‍मीद’ से है।

मैं भी ओलम्पिक देखने जाऊंगा : डीएलए 24 जुलाई 2012 में प्रकाशित




ओलंपिक पदकों का पिंक सिटी। एक गुलाबी शहर। जहां पदक मिलने की आशा हो, उसकी रंगत गुलाबी आभा ही बिखेरती है। फिर भी फूलों के बगीचे में कांटे घुसने को हरदम तैयार। कांटे भी गुलाबी हैं। कांटों की झाड़ी, कलमाड़ी, टिकट बनवा ली, कटवाने वाले तैयार। कांटे चुभो रहे हैं। पर वे चिल्‍ला तो रहे हैं लेकिन कदम पीछे नहीं हटा रहे हैं। माकन सुनकर ऐसा लगता है जैसे जिक्र हो रहा हो मकान का। मकान है तो कमरे भी होंगे। किचन और टॉयलेट भी होंगे। भुतहा रास्‍ते भी हैं। पर यह तो तय है कि अगर टॉयलेट के लिए पदक मिले तो भारत को ही मिेलेंगे। इसलिए कलमाडी जा रहे हैं परंतु माकन समझ नहीं पा रहे हैं। आगे और आगे और भी आगे बढ़ते चले जा रहे हैं।
ध्‍यान से बढ़ना कलमाडी, यही बाजू वाली है झाड़ी। जहां चल रही है ओलंपिक की मुनादी। बहुत अधिक आगे बढ़ जाओगे तो जब तक वापिस आओगे, तब न पदक और न पदक देने और लेने वालों को ढूंढ पाओगे। वहां राज तुम्‍हारा नहीं है। वैसे भी तुम खतरों के खिलाड़ी नहीं, न खेलों के खिलाड़ी हो, तुम निरे घपलों से उपले बनाते हो। घोटालों को पालते हो।  गोबर सानते हो, उसे घोटाला मानते हो। सनसनी बन जाते हो, फिर सनसनाते हो। ओलंपिक खेलों की तरफ भी जीभ लपलपा रहे हो, लार टपका रहे हो। यह जान लो कि लपलपाने से लार अधिक बहती है। इससे सब जान जाते हैं कि हजूर खेलने के नहीं, खाने के शौकीन है।
पदक पाने के लिए लार नहीं टपकानी जरूरी नहीं है। यूं तो लार में पचाने के गुण मौजूद रहते हैं। । लार को पौष्टिक बनाने के लिए गुण कण होते हैं और कण में भगवान वास करते हैं जिससे वह पचाने में कारगर रहे। गोलियों के तौर पर पाचन रस चूस चूस कर फेंका जाता है। कभी परिणाम सकारात्‍मक आते हैं और कभी डकारें आना बंद नहीं होतीं। जिन्‍हें खट्टारात्‍मक परिणाम माना जा सकता है।
बिना पलक झपकाए लपके जाओ फिर भी लपकने की चाहत कम न हो। लपकन ग्रंथि फ्री हो जाए, कोई रुकावट नहीं, कोई थकावट नहीं और बनावट का तो नामोनिशां ही नहीं। लपकने की चाहत लार का अनवरत सोता ओपन करती है। सब रोते रहते हैं परंतु लार टपकती ही रहती है। मानो सब कुछ लार में चिपटा लेगी। ओलंपिक में कोई ध्‍वजावाहक बन कर शामिल हो जाता है। सच बतलाऊं, तमन्‍ना मेरी भी है कि और कुछ न सही, एक बार ध्‍वजाविलोकक बनने का मौका मिल जाए और ओलंपिक खेलों में घूम आऊं मैं। सुन रहे हो न कलमाडी, सुन रहे हो माकन। कर दो दोनों मिलकर मेरे ओलंपिक जाने का सत्‍यापन। इसे ही साबित कर दूंगा मैं सच्‍चापन। नहीं तो सस्‍तापन साबित करने में भी देर नहीं करूंगा। एक बार जरूर ध्‍वजा अपनी आंखों से विलोक कर भारत का नाम करूंगा। ओलंपिक में जाने से किसी का विरोध मत करो, जिसको मौका मिले – बढ़े चलो, बढ़े चलो।
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मैया मेरी मैं भी ओलंपिक जाऊंगा : जनवाणी 24 जुलाई 2012 तीखी नजर स्‍तंभ में प्रकाशित


नाक बचाओ, चश्‍मा न चढ़ाओ और लिंक पर क्लिक करके पूरी रचना से मिल लें। 




भारत मेरी माता है, आज मालूम हुआ है कि ओलंपिक इवेंट में लंदन जाने के लिए क्‍या-क्‍या योग्‍यताएं होनी चाहिएं। लंदन ओलंपिक पदकों का पिंक सिटी है। पदकों का गुलाबी शहर, स्‍वर्ण से  बनाए जाते हैं पदक, स्‍वर्ण है प्रति पदक चार सौ ग्राम। आप दनदनाते हुए लंदन पहुंचिए। जैसे फूलों के बगीचे में कांटे घुसने को हरदम तैयार। कांटों की झाड़ी कलमाडी, टिकट बनवा लीकटवाने वाले तैयार। कांटे चुभो रहे हैं। वे चिल्‍ला तो रहे हैं लेकिन कदम पीछे नहीं हटा रहे हैं। माकन सुनकर ऐसा लगता है जैसे जिक्र हो रहा हो मकान का। मकान है तो कमरे भी होंगे। किचन और टॉयलेट भी होंगे। भुतहा रास्‍ते भी हैं। पर यह तो तय है कि अगर टॉयलेट के लिए पदक मिले तो भारत को ही मिेलेंगे। इसलिए कलमाडी की कुल्‍हाड़ी सक्रिय है, धार पैनी है। माकन समझ नहीं पा रहे हैं तेज धार से किसे काटेंगे। लंदन, लंदन है भारत मैया नहीं है कि कपूत को सपूत समझ घपले-घोटालों में माफी मिल जाए।
ध्‍यान से बढ़ना कलमाडीयही बाजू वाली है झाड़ी। जहां चल रही है ओलंपिक की मुनादी। बहुत अधिक आगे बढ़ जाओगे तो जब तक वापिस आओगेतब न पदक और न पदक देने और लेने वालों को ढूंढ पाओगे। वहां राज तुम्‍हारा नहीं है। वैसे भी तुम खतरों के खिलाड़ी नहींन खेलों के खिलाड़ी होतुम निरे घपलों से उपले बनाते हो। गोबर ही सानते होउसे ही घोटाला मानते हो। सनसनी बन जाते होफिर सनसनाते हो। ओलंपिक खेलों की तरफ भी जीभ लपलपा रहे होलार टपका रहे हो। यह जान लो कि लपलपाने से लार अधिक बहती है। इससे सब जान जाते हैं कि हजूर खेलने के नहींखाने के शौकीन है। पदक पाने के लिए लार नहीं टपकानी पड़ती। यूं तो लार में पचाने के गुण मौजूद रहते हैं। गुण कण होते हैं और कण में भगवान वास करते हैं। लार को पौष्टिक बनाने के लिए पौष्टिक लार को पेट में बतौर पाचन रस फेंका जाता है। कभी परिणाम सकारात्‍मक आते हैं और कभी डकारें आना बंद नहीं होतीं, इन्‍हें खट्टारात्‍मक परिणाम माना जा सकता है।
पदकों की पोल जान लोउन्‍हें अच्‍छे से पहचान लो। पदक मिलें तो ठीकन मिलें तो भी ठीक। यही पदकों की पोल का खुलासा है। खिलाडि़यों के ओलंपिक में जाने की भारी अभिलाषा है। जीते तो पदक हमारेहारे तो फूलों के हार हमारे। किंतु हार पब्लिक के पैसे की। जिसके बल पर गएओलंपिक की भूमि पर धमाल मचायाखूब माल गंवाया। फिर भी मज़ा खूब आया। इसी मजे को पाने के लिए हसरत है कि एक बार फिर लंदन हो आएं।

सबके अपने-अपने तर्क हैं, इधर व्‍यंग्‍यकार भी सतर्क है। वह भी जाना चाहता हैआप पदक पाने या हारने जा रहे हैं। कोई झंडा फहराने जा रहा है। अब झंडा फहराने को देखने के लिए भी तो कोई चाहिएवह कोई व्‍यंग्‍यकार क्‍यों नहीं हो सकता है। बाकी सब तो अपने-अपने जरूरी कामोंजुगाड़बाजी में रत् रहेंगे। एक मैं ही होऊंगा जो सिर्फ झंडा फरफराहट समारोह को देखकर ही सब्र कर लूंगा।
बिना पलक झपकाए लपके जाओ फिर भी लपकने की चाहत कम न हो। लपकन ग्रंथि फ्री हो जाएकोई रुकावट नहींकोई थकावट नहीं और बनावट का तो नामोनिशां ही नहीं। लपकने की चाहत लार का अनवरत सोता ओपन करती है। सब रोते रहते हैं परंतु लार टपकती ही रहती है। ओलंपिक में कोई ध्‍वजावाहक बन कर शामिल हो जाता है। मैंने ऊपर बिल्‍कुल सच बतलाया है मेरी तमन्‍ना है कि और कुछ न सहीएक बार ध्‍वजाविलोकक’ बनने का मौका मिल जाए और ओलंपिक खेलों में घूम आऊं मैं।
सुन रहे हो न कलमाडीसुन रहे हो माकन। कर दो दोनों जन मिल मेरे जाने का सत्‍यापन। इसे ही साबित कर दूंगा मैं सच्‍चापन। एक बार जरूर जीवंत ध्‍वजा अपनी आंखों से विलोक कर भारत का नाम ऊंचा करूंगा। अपनी आंखों की मिसाल कायम करूंगा। किसी-न-किसी वर्ल्‍ड रिकार्ड में दर्ज हो जाऊंगा। ओलंपिक के मर्ज से बाहर आऊंगा। जो वहीं जमे रहने का फर्ज निभाते हैंवे खेल के मुरीद नहींमरीज हो जाते हैं। ओलंपिक जैसे समारोहों में शामिल होने से देश पर कर्ज चढ़ता है। इसी कर्ज के कारण रुपया डॉलर का मुकाबला करते हुए धड़-धड़-धड़ाम गिरता है और हर बार पब्लिक का सिर फूटता है। किसी का विरोध मत करोओलंपिक में जाने का जिसको मौका मिले बढ़े चलोबढ़े चलो। मुझे दिखलाओ और चाहो तो अपने भाईयोंबहनोंफेसबुक मित्रो को भी ओलपिंक का झंडा फहरते हुए देखने का आलौकिक अवसर प्रदान करो। प्रदान का दान भी मंजूर है मुझको। पासपोर्ट है तो चलो मेरे साथ लंदन खिसको, वहां मिल करेंगे सब डिस्‍को।

मैं भी ओल‍ंपिक देखने जाऊंगा : हरिभूमि 24 जुलाई 2012 में व्‍यंग्‍य प्रकाशित


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ओलंपिक पदकों का पिंक सिटी। एक गुलाबी शहर। जहां पदक मिलने की आशा हो, उसकी रंगत गुलाबी आभा ही बिखेरती है। फिर भी फूलों के बगीचे में कांटे घुसने को हरदम तैयार। कांटे भी गुलाबी हैं। कांटों की झाड़ी, कलमाड़ी, टिकट बनवा ली, कटवाने वाले तैयार। कांटे चुभो रहे हैं। पर वे चिल्‍ला तो रहे हैं लेकिन कदम पीछे नहीं हटा रहे हैं। माकन सुनकर ऐसा लगता है जैसे जिक्र हो रहा हो मकान का। मकान है तो कमरे भी होंगे। किचन और टॉयलेट भी होंगे। भुतहा रास्‍ते भी हैं। पर यह तो तय है कि अगर टॉयलेट के लिए पदक मिले तो भारत को ही मिेलेंगे। इसलिए कलमाडी जा रहे हैं परंतु माकन समझ नहीं पा रहे हैं। आगे और आगे और भी आगे बढ़ते चले जा रहे हैं।
ध्‍यान से बढ़ना कलमाडी, यही बाजू वाली है झाड़ी। जहां चल रही है ओलंपिक की मुनादी। बहुत अधिक आगे बढ़ जाओगे तो जब तक वापिस आओगे, तब न पदक और न पदक देने और लेने वालों को ढूंढ पाओगे। वहां राज तुम्‍हारा नहीं है। वैसे भी तुम खतरों के खिलाड़ी नहीं, न खेलों के खिलाड़ी हो, तुम निरे घपलों से उपले बनाते हो। घोटालों को पालते हो।  गोबर सानते हो, उसे घोटाला मानते हो। सनसनी बन जाते हो, फिर सनसनाते हो। ओलंपिक खेलों की तरफ भी जीभ लपलपा रहे हो, लार टपका रहे हो। यह जान लो कि लपलपाने से लार अधिक बहती है। इससे सब जान जाते हैं कि हजूर खेलने के नहीं, खाने के शौकीन है।
पदक पाने के लिए लार नहीं टपकानी जरूरी नहीं है। यूं तो लार में पचाने के गुण मौजूद रहते हैं। । लार को पौष्टिक बनाने के लिए गुण कण होते हैं और कण में भगवान वास करते हैं जिससे वह पचाने में कारगर रहे। गोलियों के तौर पर पाचन रस चूस चूस कर फेंका जाता है। कभी परिणाम सकारात्‍मक आते हैं और कभी डकारें आना बंद नहीं होतीं। जिन्‍हें खट्टारात्‍मक परिणाम माना जा सकता है।
बिना पलक झपकाए लपके जाओ फिर भी लपकने की चाहत कम न हो। लपकन ग्रंथि फ्री हो जाए, कोई रुकावट नहीं, कोई थकावट नहीं और बनावट का तो नामोनिशां ही नहीं। लपकने की चाहत लार का अनवरत सोता ओपन करती है। सब रोते रहते हैं परंतु लार टपकती ही रहती है। मानो सब कुछ लार में चिपटा लेगी। ओलंपिक में कोई ध्‍वजावाहक बन कर शामिल हो जाता है। सच बतलाऊं, तमन्‍ना मेरी भी है कि और कुछ न सही, एक बार ध्‍वजाविलोकक बनने का मौका मिल जाए और ओलंपिक खेलों में घूम आऊं मैं। सुन रहे हो न कलमाडी, सुन रहे हो माकन। कर दो दोनों मिलकर मेरे ओलंपिक जाने का सत्‍यापन। इसे ही साबित कर दूंगा मैं सच्‍चापन। नहीं तो सस्‍तापन साबित करने में भी देर नहीं करूंगा। एक बार जरूर ध्‍वजा अपनी आंखों से विलोक कर भारत का नाम करूंगा। ओलंपिक में जाने से किसी का विरोध मत करो, जिसको मौका मिले – बढ़े चलो, बढ़े चलो।

नेताजी के बयान ! : दैनिक हिंदी ट्रिब्‍यून 21 जुलाई 2012 के 'हास-परिहास' पेज पर प्रकाशित



असली नेता वह जो विवादास्‍पद बयान देकर सुर्खियों में बना रहे, मेरे इस कथन की पुष्टि नेताओं के हालिया बयान कर रहे हैं। बयान आजकल बयान कम, मनोरंजन का साधन अधिक हो गए हैं। इससे चैनलों और प्रिंट मीडिया का पेट भरा रहता है। वरना तो खूब खाने मतलब प्रसारित और प्रकाशित होने के बाद भी सब कुछ खाली-खाली सा लगता है, मानो डायबि‍टीज हो गई हो, जितना भी जितनी भी बार भकोस लो, एक खालीपन का अहसास सदा बना रहेगा।
आजकल बयानों का मानसून आ गया लगता है, मानसून का एक अर्थ बाढ़ भी है । मानसून आए और सूखा टिका रहे, इसे दुर्भाग्‍य कह सकते हैं। एक नेतानी के बयान ने हड़कंप मचा दिया कि नेताओं के रीढ़ नहीं होती है। जबकि मेरा मानना है कि वे सांप भी नहीं होते। सांप उनसे बेहतर माने गए हैं। आज रीढ़विहीन नेता का मतलब बेपेंदी के लोटे से लगाया जा सकता है और उसे थाली का बैंगन कहे जाने पर भी आम पब्लिक को कतई एतराज नहीं होगा क्‍योंकि बैंगन और लोटे में तला नहीं, रीढ़विहीन नेता की उपमा केंचुए, सांप इत्‍यादि से ही दी जाएगी, चाहे उन्‍हें यानी नेताओं को नागवार गुजरे। केंचुए और सांपों तो इस बारे में कुछ कहने से रहे। कोई नेता ही अपने बयान में इसकी तस्‍दीक करेगा, । नेता प्रण नहीं करता और बैंगन में प्राण नहीं होते हैं। बैंगन की सब्‍जी बनाने के लिए काटने, भरता बनाने पर तलने, भूनने से किसी शाकाहारी को भी कभी एतराज नहीं रहा है। किसी व्‍यंग्‍यकार ने कोशिश की तो उसके अभिव्‍यक्ति  के अधिकारों पर ही तुरंत रोक लगाई जाने की संभावना बनती है।  तो दूसरे ही पल दूसरे नेताजी ने पुष्टि कर दी कि पार्टी का चाल चलन ठीक नहीं है, मैं जिस पार्टी में शामिल हूं, वह भली नहीं है। इसका मतलब भले आप भी नहीं हैं। जबकि इसी पार्टी में वह बरसों से डेरा जमाए हुए हैं। तीसरे नेता मंत्री क्‍यों पीछे रहते, कह बैठे कि मध्‍यवर्ग 20 रुपये की आइसक्रीम और 15 रुपये के पानी की बोतल तो खरीद कर पीने के लिए तैयार है और जब एक रुपये की बढ़ोतरी गेहूं या चावल के रेट में की जाती है तो इस मध्‍यवर्ग के पेट में जोरों का दर्द उठने लगता है। गरीबी की सीमा 28 और मनवाने में जुटे हैं कि वह हर रोज 20 रुपये की आइसक्रीम और 15 रुपये का बोतल का पानी पीता है। वे सिर्फ शहरियों की ही गिनती करते हैं, गांवों में कोई गिनती नहीं की जाती। मॉल्‍स ही दिखाई देते हैं इनको, माला भी उन्‍हें ही पहनाते हैं।
नेताओं की एक दल से दूसरे दल में आने-जाने की ‘आया राम गया राम’ प्रवृति भी रीढ़ विहीनता को ही जाहिर करती है। रीढ़ होगी तो उसकी सुरक्षा करनी होगी, इसलिए रीढ़ का न होना ही नेतागिरी के धंधे के लिए उपयोगी है। नेताकर्म को अगर एक धर्म माना जाए, तो रीढ़ उसका मर्मस्‍थल है, इसे तो छिपाकर ही रखना हितकर होगा। नेताओं को संवेदनशील नहीं, चतुर और हाजिरजवाब होना चाहिए। संवेदना के बिना ही नेतागिरी धर्म माना जा सकता है। इसमें अंधविश्‍वास चाहिए और जितना अंधविश्‍वास धर्म के मसले में होता है, उतना अन्‍य किसी मुआमले में आज तक सिद्ध नहीं किया जा सका है।  
इधर एक नेता ने गेहूं, चावलों के दाम बढ़ाने के लिए आइसक्रीम खाने के मौसम को मुफीद बतलाया है। उनका कहने का आशय मुझे तो यही समझ में आया है कि मध्‍यमवर्गीय या गरीब आदमी जब भी 20 रुपये की आइसक्रीम खाता है तो वह सरकार को दैनिक जरूरत की चीजों पर भी एक रुपया बढ़ोतरी का हक सौंप रहा होता है। अब पब्लिक को या तो आइसक्रीम छिपकर खानी होगी या 15 रुपये से कम कीमत की खानी होगी, वह 14 रुपये की हो सकती है। 14 रुपये की आइसक्रीम पर यह शर्त लागू नहीं होगी। वैसे इससे आइसक्रीम निर्माता अब आइसक्रीम की कीमत 14 रुपये तक सीमित करने पर विचार कर रहे हैं, तो क्‍या गलत है ?
14 रुपये की आइसक्रीम खाओ और गेहूं, चावल को महंगा होने से बचाओ। ऐसे मनोरंजनपूर्ण वक्‍तव्‍यों के लिए कथित नेता कई बार व्‍यंग्‍यकारों की सुर्खियों में रह चुके हैं। आइसक्रीम 12 महीने खाई जाती है, ठंडी होने पर भी उसकी तासीर गर्म होती है। यह मंत्री जी के बयान ने साबित कर दिया है।
बारहमासी यह व्‍यंजन अब जन की निंदा का सेतु बनेगा, ऐसा अहसास होने लगा है। उम्‍मीद है कि अब एक और मंत्री कुल्‍फी का जिक्र करेंगे कि 25 रुपये की कुल्‍फी खाओगे तो बिजली पानी के रेट बढ़ने से कैसे रोक पाओगे। इन बदलावों का क्‍या अर्थ लगाया जाए। आइसक्रीम विलासिता की सूची में शामिल कर दी गई है। जबकि मोबाइल आवश्‍यकताओं की लिस्‍ट में। अभी तो समाज में कितने ही प्रतिमान रोजाना बदलने हैं। इसका श्रेय काबिल मंत्री और नेता लेने से कैसे चूक सकते हैं।
मैंने मध्‍यवर्ग का मजाक नहीं उड़ाया, कहकर मंत्री जी ने फिर एक बयान दिया कि उनके बयान को मीडिया ने धो-निचोड़कर पेश किया गया है। हम लोग तो चाहते हैं कि मध्‍यमवर्ग को समूचा ही उड़ा दिया जाए। महसूस होने लगा कि नेता और मंत्री को कुछ भी बोलने और किसी पर भी तोहमत लगाने का संविधानसम्‍मत संपूर्ण अधिकार मिल चुका है, क्‍या आपको भी ऐसा ही  दुखद अहसास हो रहा है ?

मेरे देश के चूहे सबसे मस्‍त : मिलाप दैनिक 20 जुलाई 2012 स्‍तंभ 'बैठे ठाले' में प्रकाशित



चूहे दोबारा से से चर्चा में हैं जबकि‍ इनसे अधिक चर्चा में रेलवे में सक्रिय वे दलाल हैं जो कि रोजाना टिकट बुकिंग में धांधली का धंधा करते हैं और अपने गालों की लालिमा बरकरार रखते हैं। तत्‍काल टिकट बुकिंग को लेकर आजमाए जा रहे नुस्‍खों को रोजाना दलाल धता बता रहे हैं। इसके अलावा भी वे टिकट बुकिंग के धंधे में धांधलियां करके हजारों कमा रहे हैं। माना कि वे चूहे नहीं हैं पर यात्रियों का चैन और मेहनत की कमाई को पैसों को कुतरने में कोई कोताही नहीं बरत रहे हैं। दलालों के  कारनामों पर रोक लगाना रेलवे के लिए रेलें समय पर चलाने से अधिक कठिन काम हो गया है। वैसे पहले यह तय हो जाना चाहिए कि रेलवे में दलाल चूहे हैं या चूहे दलाल हैं। यूं तो चूहों का बोलबाला किचन से लेकर प्रत्‍येक नामचीन के घर तक निर्बाध रूप से है। पिछले दिनों तो चूहे हवाई जहाज में भी यात्रा करते पाए गए हैं। वह चूहा ही क्‍या जो सब जगह से हा हा हा करता न गुजर जाए और जहां से गुजरे वहां सबके लिए गुजारा करने के संसाधन मुहैया करवा दे। अपनी गुजर-बसर तो उसकी प्राथमिकता सूची में पहले से ही होती है। चूहों की खासियत है कि वे चहचहाते नहीं हैं लेकिन किटकिटाते जरूर हैं। जिसे आप सुनते हुए भी नहीं सुन पाते हैं। चूहे चने नहीं चबाते, अगर चूहों ने चार चने चबा लिए होते तो चने के खेत में आपको चूहे ही चूहे मिलते। चने वहां से फुर्र हो गए होते। चना चबैना कुर्र ... । चूहे चाचा नहीं होते हैं फिर भी किसी को मामा नहीं बनाते हैं।
अब एकदम ताज़गी भरी खबर आई है कि चूहों से मुक्ति के लिए रेलवे ने 14 लाख का ठेका दिया है, यह युक्ति यूं तो कारगर लगती है क्‍योंकि 7 से 8 हजार चूहों को मारने में सफलता भी मिल गई है पर इस रेट से एक चूहे की कीमत की गणना की जाए तो चौंकाती है। फिर भी देश जब महंगाई और नेताओं की अंगड़ाई से नहीं चौंकता तो एक अदद चूहे के रेट से भला क्‍यों चौंकने लगा। अब सवाल यह उठता है कि क्‍या इस संबंध में मेनका गांधी से स्‍वीकृति ले ली गई थी। जैसे दलालों से निजात पाने के लिए जो ठेका पुलिस को दिया जाना चाहिए था, उसकी जगह खुद ही अफसरों ने अपना दिमाग मारना शुरू कर दिया। दलालों के चेहरे लाल इसी वजह से दिखाई दे रहे हैं और इसी कारण स्थिति पहले से बदतर हुई है। जिसे बेहतरीन बनाने के प्रयास जारी हैं। आश्‍चर्य मत कीजिएगा अगर रेलवे दलालों से निजात पाने के लिए चर्चित दलालों से ही सौदेबाजी शुरू कर दे, इससे दलाल भूखे भी नहीं मरेंगे और टिकटों में हेराफेरी भी नहीं होगी।  इसे कहते हैं ‘सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे’ जबकि इस देश में पुलिस की लाठी का प्रयोग दलालों पर न करके ‘योगगुरुओं’ पर किया जाता है।
जब चूहों से निजात पाने की 14 लाख वाली कोशिशें विफल हो जाएंगी तब यह पता लगवाया जाएगा कि कहीं गलती से चूहों को मारने की सुपारी चूहों को ही तो नहीं दे दी गई थी। इस बाबत जिन चूहों को जानकारी मिल गई है, वे अपनी-अपनी जानबचाऊ याचिकाएं लेकर महामहिम के पास पहुंच गए हैं। इतनी सारी याचिकाएं देखकर महामहिम हतप्रभ होते हुए भी प्रसन्‍न हैं कि इतनी अधिक जान बचाने का श्रेय उन्‍हें मिलने वाला है और बचने और बचाने वालों का नाम विश्‍व कीर्तिमानों में शामिल हो सकता है। आखिर लाखों-करोड़ों चूहों को जीवनदान देना कोई कम साहस का काम नहीं है। जान बचने से चूहे जब खुश हो जाएंगे तो क्‍या मालूम वे कुतरने के लिए राष्‍ट्रपति भवन में ही डेरा जमा लें। आखिर वे चूहे हैं। फिर भी उन्‍हें मालूम है कि इतने बड़े भवन में बिल्‍ली नहीं होंगी और अगर होंगी भी तो उनके छिपने के लिए खूब सारी जगह है, वे उन्‍हें कहां तलाश पाएंगी। गले पर बन आई तो बाहर मुगल गार्डेन में अपने बिल बनाकर उनमें घुस-छिप जाएंगे।
चूहे कह रहे हैं कि कभी सरकार का कोई विभाग उन पर करोड़ों का अनाज खाने का आरोप लगा देता है और फिर रेल प्रशासन उन्‍हें मारने का साढ़े चौदह लाख का ठेका उठा देता है। चाहते तो सभी हमें हैं परंतु कोई मारना और कोई हमारे बहाने तरना। लगता है कि चूहे काला धन बनाने की मशीन बनकर रह गए हैं। चूहे के बहाने काला धन बनाना इतना आसान हो जाएगा, इस रहस्‍य से तो चूहे भी परिचित नहीं थे। चूहे यूं तो अन्‍य बहुत सारी विधियों से भी परिचित नहीं हैं पर वे चूहे हैं इसलिए संतुष्‍ट हैं। कुछ खाने-कुतरने को न मिले तब भी वे दांत किटकिटाकर अपना काम चला लेते हैं। अब दांत किटकिटाते वक्‍त क्‍या वे जुगाली कर रहे होते हैं या दांतों को पैना कर रहे होते हैं, इस बारे में जानकारी जुटाई जा रही है। गाय-भैंसें भी चूहों के द्वारा जुगाली करने की खबरों की सत्‍यता जांचना चाह रही हैं। पर भैंस के लिए तो काला अक्षर उसके अपने बराबर ही है इसलिए वह अखबार की खबरों पर नजर नहीं रख पा रही है और गाय तो गाय है, वह अखबार पढ़ने या चैनल देखने लग जाए, तो फिर काहे की गाय। गाय एफ एम चैनलों पर डीजे बनने और चैनलों पर एंकर बनने की फिराक में है।
चूहे सदा चर्चा में बने रहते हैं। चूहे अपने बिलों में भी बने रहते हैं। चूहे नालियों में कीचड़ में भी सने रहते हैं। चूहे अछूत होते भी हैं और नहीं भी। चूहे प्‍लेग फैलाते भी हैं और नहीं भी। चूहे आज भ्रष्‍टाचार के फैलने में सहायक बन रहे हैं। इसलिए चूहे शर्मसार हैं क्‍योंकि वे इंसान नहीं है, वे नेता नहीं हैं। आज उनका शर्मसार होना या शर्म से अपने बिलों में गड़ना दिखाई दे रहा है। जबकि उन्‍हें मारने का ठेका उठाने वाले कह रहे हैं कि वे अपने-अपने संकरे बिलों में जाकर छिप गए हैं।  छोटे-छोटे छिपे रुस्‍तम हैं चूहे। फिर भी आप उन्‍हें ‘देव’ अथवा ‘दारा’ मत समझ बैठना।

चलो, ईश्‍वर को भारत का राष्‍ट्रपति बनाऍं : नई दुनिया 18 जुलाई 2012 के 'अधबीच' स्‍तंभ में प्रकाशित




हे ईश्‍वर, जब तू मिल गया है। तो तुझसे अच्‍छा कौन है, इसलिए सबने मिलकर तय किया है कि इस बार तुझे ही भारत का राष्‍ट्रपति बनायेंगे। इतना सुनहरा मौका भला क्‍यों कर गंवायेंगे। वरना तो इस अवसर को कोई भी अन्‍य देश कैश कर लेगा और हम फिर उधार हो जायेंगे। प्रत्‍येक भारतीय का मन गद्दा-गद्दा हो रहा है। गद्दे की क्‍वालिटी में किसी तरह का समझौता नहीं। आखिर ईश्‍वर को बरामद कर लिया गया है। ईश्‍वर की यह बरामदगी पुलिस ने नहीं, वैज्ञानिकों की टीम ने की है। इंसान पहले तो बहुत बड़ी-बड़ी खाईयों, अनंत आकाश, विशाल क्षितिज, गहरे समुद्रों, काले बादलों में अपने परमप्रिय ईश्‍वर को खोजता रहा। इसके साथ ही भारतीय ऋषि, मुनि, तपस्‍वी, साधु, संन्‍यासी ईश्‍वर की खोज में हिमालय की गुफाओं, कंदराओं, पर्वत शिखरों की खुदाई करते रहे।
ईश्‍वर वहां होता तो मिलता, वह तो एक चालाक बच्‍चे की तरह छोटे से कण में छिपकर बैठा रहा और उस कण की तरफ किसी आस्तिक का ध्‍यान ही नहीं गया। वो तो भला हो नास्तिकों के विश्‍वव्‍यापी समूह वैज्ञानिकों का कि उन सबने मिलकर आखिर ईश्‍वर का पता ढूंढ ही निकाला। बस अब उस पते पर उसे दबोचना ही शेष है। फिर तो इंसान विशेष और ईश्‍वर साधारण हो जाएगा।  ईश्‍वर एक छोटे से कण बहुत शांति से रह रहा था कि इंसान ने उसकी शांति में सेंध लगा डाली। आस्तिक इंसान ईश्‍वर को अपने बनाये बड़े-बड़े मंदिरों में कैद करके रखने का दंभ  पालता रहा।
ईश्‍वर है तो छोटे से कण में भला क्‍या रहेगा, वह तो विशालकाय दिव्‍य भव्‍य देशी-विदेशी मंदिरों में रहता होगा। सब यही सोचते रहे कि ईश्‍वर तो मेरे मंदिर में कैद है लेकिन मन रूपी छोटे से कण की ओर किसी का ध्‍यान नहीं गया। ईश्‍वर इतना गरीब थोड़े ही है कि किसी कण में झुग्‍गी डालकर रह रहा होगा, सब यही मानते रहे। यहीं पर आस्तिकों की हार हुई। वे ईश्‍वर को खोज नहीं पाए और वैज्ञानिकों ने मिलकर उस लघु किंतु दिव्‍य भव्‍य कण को संसार के सामने पेश करके कीर्तिमान बना लिया।
इंसान उस कण को इग्‍नोर करता रहा और ईश्‍वर से इंसान की दूरी बनी रही। खैर ... बकरे की अम्‍मा कब तक खैर मनाती, सो ईश्‍वर इंसान के चंगुल में आने से बच न सका। इंसान वह चेला है जो शक्‍कर हो जाता है और गुरु यानी ईश्‍वर गुड़। अब चाहे कोई कितना ही कुढ़ता रहे – इंसान का साम्राज्‍य यूं ही तेजी से बढ़ता रहेगा। ईश्‍वर तुम भी चाहो तो चुनौती स्‍वीकार कर लो और रोक सको तो रोक लो लेकिन हम सच्‍चे इंसान यानी भारतीय तुम्‍हें देश का राष्‍ट्रपति बनाने का मौका हथियाने से कतई नहीं चूकने वाले।

राष्‍ट्रपति बनाकर मानेंगे तुझे ईश्‍वर : जनवाणी दैनिक 18 जुलाई 2012 में 'तीखी नज़र' स्‍तंभ में प्रकाशित





हे ईश्‍वर, जब तू मिल गया है। तो तुझसे अच्‍छा कौन है, म्‍हारा पीएम तो मौन है, इसलिए भारत में सबने मिलकर तय किया है कि इस बार तुझे ही भारत का राष्‍ट्रपति बनायेंगे। इतना सुनहरा मौका भला क्‍यों कर गंवायेंगे। वरना तो इस अवसर को कोई भी अन्‍य देश कैश कर लेगा और हम फिर उधार हो जायेंगे। प्रत्‍येक भारतीय का मन गद्दा-गद्दा हो रहा है। गद्दे की क्‍वालिटी में किसी तरह का समझौता नहीं किया गया है इसलिए मन समेत तन सबका उछलकूद कर रहा है। उछलकूद से ऊर्जा जाती है तो आती भी है। न उछलो, न कूदो तो आलस ही हावी रहेगा और सारे काम भुला दिए जाएंगे।
बहरहाल, सृष्टि की सबसे बड़ी खबर यह है कि ईश्‍वर को बरामद कर लिया गया है। ईश्‍वर की यह बरामदगी पुलिस या फौज ने नहीं, होनहार विश्‍व-वैज्ञानिकों की टीम ने की है। टीमवर्क की यह बेहतरीन मिसाल है। टीमवर्क से ही किए जाते सब कमाल हैं। टीम न हो तो टीमटॉम यानी चमक-धमक का टोटा पड़ जाता है। लोटा भर सुर्खियों के लिए भी वर्ल्‍ड रिकार्ड बनाने वाला तरस जाता है।  ईश्‍वर की खोज में इंसान अपने आने से पहले जुटा हुआ है। आने से पहले सक्रिय होना अग्रिम रवानगी है। इंसान पहले तो बहुत बड़ी-बड़ी खाईयों की खाक छानता रहा, अनंत आकाश में अब बादलों और क्षितिज को खंगाल रहा है, गहरे समुद्रों में भी पनडुब्बियों को लेकर चहल-कदमी करता रहा है, काले बादलों में अपने परमप्रिय ईश्‍वर को खोजने से इंसान ने अपने तलाशनामे का श्रीगणेश किया था। सब निष्‍फल रहा। कुछ फल हाथ आए भी तो वे खुश होने के नहीं, पेट भरने के काम आए, जिनमें आम, अमरूद, अनार, अन्‍नानास, आलू बुखारे, खरबूज, तरबूज रहे। मतलब ईश्‍वर का करिश्‍मा प्रत्‍येक पग पर चमत्‍कृत करता रहा परंतु सच्‍ची-मुच्‍ची का ईश्‍वर न जाने कहां छिप बैठकर अपने कारनामों को अंजाम देता रहा। एडीशनल वर्क के तौर पर भारतीय ऋषि, मुनि, तपस्‍वी, साधु, संन्‍यासी ईश्‍वर की खोज में हिमालय की गुफाओं, कंदराओं, पर्वत शिखरों की खुदाई करते रहे। पर किसी कण में किसी ने झांकने की नहीं सोची। यह सोची-समझी साजिश भी मानी जा सकती है। इंसान साजिशों का पर्याय है।
ईश्‍वर, इंसान से चालाक और चतुर, जहां ढूंढ रहे थे, वहां होता तो मिलता। वह एक मासूम और नादान बच्‍चे की तरह छोटे से कण में छिपकर बैठा रहा और उस कण की तरफ किसी आस्तिक का ध्‍यान ही नहीं गया। वो तो भला हो नास्तिकों के विश्‍वव्‍यापी समूह वैज्ञानिकों का कि सबने मिलकर आखिर ईश्‍वर का पता ढूंढ ही निकाला। मेरा मानना है कि जरूर तलाशने वालों ने कम्‍प्‍यूटर पर कंट्रोल प्‍लस एफ की, की दबाकर इस घटना को अंजाम दिया होगा। बस, अब उस पते पर ही ईश्‍वर को दबोचना शेष है। फिर तो इंसान विशेष और ईश्‍वर साधारण हो जाएगा।  ईश्‍वर एक छोटे से कण में बहुत शांति से रह रहा था कि इंसान ने उसकी शांति में सेंध लगा डाली। आस्तिक इंसान ईश्‍वर को अपने बनाये बड़े-बड़े मंदिरों में कैद करके रखने का दंभ  पालता रहा।

ईश्‍वर है, तो छोटे से कण में भला क्‍या रहेगा, वह तो विशालकाय दिव्‍य भव्‍य देशी-विदेशी मंदिरों में रहता होगा। चकाचौंध करते बाजारों, भीड़ भरे एयरकंडीशन्‍ड मॉल्‍स में सैर करता होगा और आस्तिक सोचते रहे कि ईश्‍वर तो मेरे मंदिर में कैद है लेकिन मन रूपी छोटे से कण की ओर किसी का ध्‍यान नहीं गया। ईश्‍वर इतना गरीब थोड़े ही है कि किसी कण में झुग्‍गी डालकर रह रहा होगा, सब यही मानते रहे। यहीं पर आस्तिकों की हार हुई। वे ईश्‍वर को खोज नहीं पाए और वैज्ञानिकों ने कम्‍प्‍यूटर की मदद लेकर उस लघु किंतु दिव्‍य-भव्‍य कण को संसार के सामने पेश करके कीर्तिमान बना लिया। बस अब उस कण को ओपनिंग सेरेमनी ही बाकी है, तनिक पासवर्ड तो मिल जाए।
इंसान उस कण को इग्‍नोर करता रहा और ईश्‍वर से इंसान की दूरी बनी रही। खैर ... बकरे की अम्‍मा कब तक खैर मनाती, सो ईश्‍वर इंसान के चंगुल में आने से बच न सका। इंसान वह चेला है जो शक्‍कर हो जाता है और गुरु यानी ईश्‍वर गुड़। अब चाहे कोई कितना ही कुढ़ता रहे – इंसान का साम्राज्‍य यूं ही तेजी से बढ़ता रहेगा। ईश्‍वर तुम भी चाहो तो चुनौती स्‍वीकार कर लो और रोक सको तो रोक लो लेकिन हम सच्‍चे इंसान यानी भारतीय तुम्‍हें देश का राष्‍ट्रपति बनाने का मौका हथियाने से कतई नहीं चूकने वाले। तो तैयार रहना, डर कर कहीं कण से निकल, किसी पत्‍थर में मत रहने लगना।

कण-कण में ईश्‍वर समाया है : आई नेक्‍स्‍ट 17 जुलाई 2012 स्‍तंभ 'खूब कही' में प्रकाशित



सृष्टि पर कण कण में भगवान की मौजूदगी है। फिर भी इंसान सिर्फ एक कण खोज कर ही बावला हुआ जा रहा है। कण जिसके गुण संभावित हैं, साबित होंगे, परख लिए जाएंगे। पर इंसान की खुशी का पारावार नहीं है। विस्मित है, उसे अपनी इस एक कण की नायाब खोज पर भरोसा नहीं हो रहा है। कहता है कि उसने भगवान को पहचान लिया है बल्कि यूं कह सकते हैं कि वह भगवान से गले मिलने का सुख लूट चुका है। यह वही सुख है जो ‘मुन्‍नाभाई एमबीबीएस’ में संजय दत्‍त जफ्फी पाकर और देकर बेरहमी से लूटता रहा है। इसे देखकर ही उस समय दीवानों की खुशी की सीमा नहीं रही थी। तब रेखा भी संसद में नहीं पहुंची थी न सचिन ने संसद में कब्‍जा जमाया था।
उलझन में हैं आम आदमी। उसे सब मिलकर उलझाते ही रहते हैं। नेता क्‍या कम पड़ रहे थे जो अब वैज्ञानिकों ने भी उलझाना शुरू कर दिया है। सोच रहा है कि यह कैसी कविता है जो सृष्टि के जन्‍म की कथा बतला रही है। चिंतित है कि आम आदमी पर सब अपने-अपने डोरे डालने को आतुर हैं। आम आदमी सब जान जाए, चाहे जान से ही चला जाए। पर आम आदमी को पूरी जानकारी से लबालब होना चाहिए। चाहे पीने को बूंद भर पानी न मिले।
गॉड पार्टिकल की खोज मतलब कण कण में भगवान। तो आम आदमी क्‍या करे, अब आम आदमी को सस्‍ती बिजली, स्‍वच्‍छ पानी, साफ हवा के लिए चिंतित नहीं होना होगा। उसे सब चिता पर लिटाने को आतुर हैं और वह सोच रहा है कि क्‍या भगवान के एक कण की खोज करने से उसकी समस्‍याएं जड़ से खत्‍म हो जाएगीं।
गॉड पार्टिकल का रहस्‍य जानने के बाद नेता ईमानदार हो जाएंगे, घोटाले-घपलेबाज सुधर जाएंगे और सचमुच में ऐसा सतयुग आएगा जिससे अंतर्मन में राम राज्‍य की स्‍थापना होगी। अगर ऐसा नहीं होना है तो कण मिले या मिले पूरा भगवान – आम पब्लिक को क्‍या लेना-देना है। शैतान भी मिलेगा तो भी चलेगा। आम आदमी को गॉड पार्टिकल मिलने से कोई असर नहीं पड़ता है। गरीब आदमी क्‍या इस दिव्‍य पार्टिकल के मिलने से 28 रुपये में संतोषी जीवन जी सकेगा।
गॉड पार्टिकल खोजना कितना आसान – किंतु समस्‍याओं से निजात पाना दीगर बात। भला आम आदमी क्‍या वैज्ञानिक भी नहीं सकते ऐसी करामात। फिर काहे की उपलब्धि और किसलिए निकालें खुशियों की बारात। सफलता पाने पर उल्‍लास मचा रहे हैं, मानो कण नहीं पूरा भगवान का पहाड़ पा लिया हो। जहां पर तैंतीस करोड़ देवी देवता मौजूद हैं। जहां आम आदमी समस्‍याओं के हलाहल रूपी कोलाहल में धंसा-फंसा हुआ हो और इनसे बचने का कोई रास्‍ता, कोई वैज्ञानिक नहीं खोज पा रहे हैं।
ब्रह्मांड की उत्‍पत्ति का रहस्‍य खोजने पर इंसान के लालच की गुत्‍थी कभी खोल पाओगे कि खूब धन और सुविधाधारक के पास इन्‍हें और ... और पाने की लालसा क्‍यों  बलवती बनी रहती है। क्‍या उसने बतलाया है कि ‘मैं वही गॉड पार्टिकल हूं पृथ्‍वीवासियों, जिसे तुम पूरी शिद्दत से खोज रहे हो।‘ इससे अधिक खुशी तो पानी की बूंद की एक झलक पाने भर से हो जाती है। आम पब्लिक के लिए वही गॉड पार्टिकल ही है। इंसान भगवान बनने की ओर बढ़ रहा है। आपको क्‍या लगता है कि यह एक एक सीढ़ी चढ़ रहा है या रॉकेट की तरह तीव्र गति से विकास की लिफ्ट में यात्रा कर रहा है।

लोटे ने बनाया कीर्तिमान : नेशनल दुनिया 17 जुलाई 2012 स्‍तंभ 'चिकोटी' में प्रकाशित




दिल्‍ली के आनंद विहार में एक लोटा चोरी की एफआईदर्ज हो गई। इससे कितने ही बरतन भांडे दुखी  हैं। लगता है इस एफआईआर के दर्ज होने से उनका आनंद लूट लिया गया है। दिल, दुपट्टा तो खूब चोरी होते रहे हैं, उनकी एफआईआर न सही, लेकिन फिल्‍मी गीतों ने उनकी चोरी को बार बार गा बजाकर सुर्खियों में ला दिया। ताजा सुर्खियां इसलिए हैं क्‍योंकि चोरी गया लोटा इंकम टैक्‍स डिपार्टमेंट के रिटायर्ड अधिकारी का था। जहां पुलिस वाले मोबाइल, पर्स चोरी के एफआईआर तक लिखने में आनाकानी करते हैं। बल्कि साफ कहूं कि लिखते ही नहीं है, ऐसे में लोटा चोरी की एफआईआर दर्ज होना सुकून से भर देता है।
एफआईआर के बाद से तश्‍तरी, चम्‍मच, कटोरी, गिलास का तो दुख से बहुत बुरा हाल है। इनमें चम्‍मच इतना रो रही है कि लगता है जब तक उसकी चोरी की एफआईआर दर्ज नहीं की जाएगी, वह चुप ही नहीं होएगी। यह भी हो सकता है कि वह जंतर-मंतर पर अनशन और प्रदर्शन कर डाले। सबसे ज्‍यादा मुझे ही चुराया जाता है और जिसके यहां से चुराया जाता है, उसके आने पर छिपाया जाता है। कितनी आसानी से मेरी चोरी कर ली जाती है। जरा सा ऊंगलियों में दबाया और जेब में सरका लिया और मैं पीएम की तरह मौन न इशारा कर पाती हूं, न बोल पाती हूं। कभी मौका पाकर जेब में पहुंचने से पहले सरक कर फर्श पर जोर से खनखनाती हूं तो मेरा कथित चोर यह कहकर ‘सॉरी, चम्‍मच गिर गई, कहकर अपनी चोरी पर तम्‍बू तान लेता है और बच निकलता है। कोई भी चम्‍मच चोर साधारण नहीं होता, हमेशा बहुत बड़ी हैसियत का मालिक होता है।
क्‍या होटल, क्‍या घर, क्‍या पार्टी मुझे कहीं से भी किसी के द्वारा चुरा लिया जाता है और यहां तो सिर्फ एक लोटा ही चोरी हुआ है जबकि यह भी नहीं मालूम कि वह पेंदी वाला था या बेपेंदी वाला। फिर भी एफआईआर लिखवाने में सफल। सचमुच में देश में कानून और व्‍यवस्‍था का पुरसा हाल है, अपनी पीड़ा बतला रही है चम्‍मच। आज तक चम्‍मच चोरी की एफआईआर कभी किसी पुलिस थाने में दर्ज नहीं हुई है। जैसे ही हम चार बरतन इकट्ठे होंगे, मैं खनखनाहट मचाकर बवाला मचा दूंगी, चुप नहीं रहूंगी। मुझ निरीह चम्‍मच पर इतना घनघोर अत्‍याचार। इतिहास में जिक्र होना चाहिए था चम्‍मच चोरी की एफआईआर का और उसे भी लुटेरा लोटा लूटकर ले गया। आज ज्ञान हुआ है कि जहां चार बरतन होते हैं, वे खड़कते क्‍यों हैं, वे खड़कें न तो क्‍या करें, क्‍या पीएम की तरह मौन रह कर अपनी इज्‍जत रूपी दौलत को गंवा दें। बरतन तो दो ही खड़कने पर सुनामी ला सकते हैं। पर चार हों तो खड़कने का सच्‍चा सुर सध जाता है।
इधर गिलास का भी रो रोकर बुरा हाल है। आंसुओं से गिलास खुद ही भर चुका है। कटोरी लबालब भरने के बाद पहले से बही जा रही है जिससे आसपास का फर्श पूरी तरह गीला हो चुका है। उसमें डूबी हुई तश्‍तरी तो कुछ कह ही नहीं पा रही है, जिसका सांस लेना भी दूभर हो रहा है, सोच रही है कि गिलास, कटोरी रोना बंद करें तो वह बाहर निकलकर अपनी दुख-तकलीफों का बयान कर सके। जिन बरतनों का यहां जिक्र नहीं है, वे सोच रहे हैं कि इस मसले पर अपनी प्रतिक्रिया किन शब्‍दों में जाहिर करें ?

लोटा चोरी की एफआईआर : जनसंदेश टाइम्‍स में 14 जुलाई 2012 में उलटबांसी में प्रकाशित



दिल्‍ली के आनंद विहार में एक लोटा चोरी की एफआईदर्ज हो गई। इससे कितने ही बरतन भांडे दुखी  हैं। लगता है इस एफआईआर के दर्ज होने से उनका आनंद लूट लिया गया है। दिल, दुपट्टा तो खूब चोरी होते रहे हैं, उनकी एफआईआर न सही, लेकिन फिल्‍मी गीतों ने उनकी चोरी को बार बार गा बजाकर सुर्खियों में ला दिया। ताजा सुर्खियां इसलिए हैं क्‍योंकि चोरी गया लोटा इंकम टैक्‍स डिपार्टमेंट के रिटायर्ड अधिकारी का था। जहां पुलिस वाले मोबाइल, पर्स चोरी के एफआईआर तक लिखने में आनाकानी करते हैं। बल्कि साफ कहूं कि लिखते ही नहीं है, ऐसे में लोटा चोरी की एफआईआर दर्ज होना सुकून से भर देता है।
एफआईआर के बाद से तश्‍तरी, चम्‍मच, कटोरी, गिलास का तो दुख से बहुत बुरा हाल है। इनमें चम्‍मच इतना रो रही है कि लगता है जब तक उसकी चोरी की एफआईआर दर्ज नहीं की जाएगी, वह चुप ही नहीं होएगी। यह भी हो सकता है कि वह जंतर-मंतर पर अनशन और प्रदर्शन कर डाले। सबसे ज्‍यादा मुझे ही चुराया जाता है और जिसके यहां से चुराया जाता है, उसके आने पर छिपाया जाता है। कितनी आसानी से मेरी चोरी कर ली जाती है। जरा सा ऊंगलियों में दबाया और जेब में सरका लिया और मैं पीएम की तरह मौन न इशारा कर पाती हूं, न बोल पाती हूं। कभी मौका पाकर जेब में पहुंचने से पहले सरक कर फर्श पर जोर से खनखनाती हूं तो मेरा कथित चोर यह कहकर ‘सॉरी, चम्‍मच गिर गई, कहकर अपनी चोरी पर तम्‍बू तान लेता है और बच निकलता है। कोई भी चम्‍मच चोर साधारण नहीं होता, हमेशा बहुत बड़ी हैसियत का मालिक होता है।
क्‍या होटल, क्‍या घर, क्‍या पार्टी मुझे कहीं से भी किसी के द्वारा चुरा लिया जाता है और यहां तो सिर्फ एक लोटा ही चोरी हुआ है जबकि यह भी नहीं मालूम कि वह पेंदी वाला था या बेपेंदी वाला। फिर भी एफआईआर लिखवाने में सफल। सचमुच में देश में कानून और व्‍यवस्‍था का पुरसा हाल है, अपनी पीड़ा बतला रही है चम्‍मच। आज तक चम्‍मच चोरी की एफआईआर कभी किसी पुलिस थाने में दर्ज नहीं हुई है। जैसे ही हम चार बरतन इकट्ठे होंगे, मैं खनखनाहट मचाकर बवाला मचा दूंगी, चुप नहीं रहूंगी। मुझ निरीह चम्‍मच पर इतना घनघोर अत्‍याचार। इतिहास में जिक्र होना चाहिए था चम्‍मच चोरी की एफआईआर का और उसे भी लुटेरा लोटा लूटकर ले गया। आज ज्ञान हुआ है कि जहां चार बरतन होते हैं, वे खड़कते क्‍यों हैं, वे खड़कें न तो क्‍या करें, क्‍या पीएम की तरह मौन रह कर अपनी इज्‍जत रूपी दौलत को गंवा दें। बरतन तो दो ही खड़कने पर सुनामी ला सकते हैं। पर चार हों तो खड़कने का सच्‍चा सुर सध जाता है।
इधर गिलास का भी रो रोकर बुरा हाल है। आंसुओं से गिलास खुद ही भर चुका है। कटोरी लबालब भरने के बाद पहले से बही जा रही है जिससे आसपास का फर्श पूरी तरह गीला हो चुका है। उसमें डूबी हुई तश्‍तरी तो कुछ कह ही नहीं पा रही है, जिसका सांस लेना भी दूभर हो रहा है, सोच रही है कि गिलास, कटोरी रोना बंद करें तो वह बाहर निकलकर अपनी दुख-तकलीफों का बयान कर सके। जिन बरतनों का यहां जिक्र नहीं है, वे सोच रहे हैं कि इस मसले पर अपनी प्रतिक्रिया किन शब्‍दों में जाहिर करें ?

नेताजी के बयानों का मानसून : दैनिक जनवाणी 14 जुलाई 2012 में 'तीखी नज़र' स्‍तंभ में प्रकाशित


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आजकल बयानों का मानसून आया है। मानसून आए और सूखा टिका रहे, इसे दुर्भाग्य कह सकते हैं। एक नेतानी के बयान ने हड़कंप मचा दिया कि नेताओं के रीढ़ नहीं होती है। जबकि मेरा मानना है कि वे सांप भी नहीं होते। सांप उनसे बेहतर माने गए हैं। रीढ़विहीन नेता का मतलब बेपेंदी के लोटा है, उसे थाली का बैंगन कहने पर भी पब्लिक को एतराज नहीं, क्योंकि बैंगन और लोटे में तला नहीं होता। रीढ़विहीन नेता की उपमा पर केंचुए और सांप तो कुछ कहने से रहे। नेता प्रण नहीं करता और बैंगन में प्राण नहीं होते हैं। बैंगन की सब्जी बनाने के लिए काटने, भरता बनाने पर तलने, भूनने से किसी शाकाहारी को भी एतराज नहीं है। किसी व्यंग्यकार ने कोशिश की तो उसके अभिव्यक्ति के अधिकार पर तुरंत रोक लगाने की आशंका बनती है। दूसरे ही पल दूसरे नेताजी ने पुष्टि कर दी कि पार्टी का चाल-चलन ठीक नहीं है। मैं जिस पार्टी में शामिल हूं, वह भली नहीं है। इसका मतलब भले आप भी नहीं हैं। जो इसी पार्टी में बरसों से डेरा जमाए हैं। तीसरे नेता मंत्री क्यों पीछे रहते, कह बैठे कि मध्यवर्ग 20 रुपये की आइसक्रीम और 15 रुपये के पानी की बोतल खरीदने को तैयार है, और जब एक रुपये की बढ़ोतरी गेहूं-चावल में की जाती है, तो पेट में दर्द उठने लगता है। नेता गरीबी की सीमा 28 और 32 मनवाने में जुटे हैं, जबकि जनता हर रोज 20 रुपये की आइसक्रीम और 15 रुपये का बोतल का पानी पीती है। वे सिर्फ शहरियों की ही गिनती करते हैं, गांवों में कोई गिनती नहीं की जाती। मॉल्स ही दिखाई देते हैं इनको।

नेताओं की एक दल से दूसरे दल में आने-जाने की प्रवृति भी रीढ़ विहीनता को ही जाहिर करती है। रीढ़ होगी तो उसकी सुरक्षा करनी होगी। इसलिए रीढ़ का न होना ही नेतागीरी में उपयोगी है। नेताकर्म को अगर धर्म माना जाए, तो रीढ़ उसका र्ममस्थल है। इसे छिपाकर रखना हितकर होगा। नेताओं को संवेदनशील नहीं, चतुर और हाजिरजवाब होना चाहिए। संवेदना के बिना ही नेतागीरी धर्म माना जा सकता है। इसमें अंधविश्वास चाहिए और जितना अंधविश्वास धर्म के मसले में होता है, उतना अन्य किसी मुआमले में आज तक सिद्ध नहीं किया जा सका है। 

इधर एक नेता ने गेहूं-चावल के दाम बढ़ाने के लिए आइसक्रीम का मौसम मुफीद बताया है। उनका आशय मुझे यही समझ में आया है कि मध्यमवर्गीय या गरीब आदमी जब भी 20 रुपये की आइसक्रीम खाता है, तो वह सरकार को दैनिक जरूरत की चीज पर एक रुपया बढ़ोतरी का हक सौंप रहा होता है। अब पब्लिक को आइसक्रीम छिपकर खानी होगी। आइसक्रीम मत खाओ और गेहूं-चावल महंगा होने से बचाओ। ऐसे मनोरंजनपूर्ण वक्तव्यों के लिए कथित नेता कई बार व्यंग्यकारों की सुर्खियों में रह चुके हैं। आइसक्रीम 12 महीने खाई जाती है, ठंडी होने पर भी उसकी तासीर गर्म होती है। मंत्री जी के बयान ने यह साबित किया है।

बारहमासी यह व्यंजन अब जन की निंदा का सेतु बनेगा, ऐसा अहसास होने लगा है। उम्मीद है कि अब एक और मंत्री कुल्फी का जिक्र करेंगे कि 25 रुपये की कुल्फी खाओगे, तो बिजली पानी के रेट बढ़ने से कैसे रोक पाओगे। इन बदलावों का क्या अर्थ लगाया जाए। आइसक्रीम विलासिता की सूची में शामिल कर दी गई है। जबकि मोबाइल आवश्यकताओं की लिस्ट में। अभी तो समाज में कितने ही प्रतिमान रोजाना बदलने हैं। इसका र्शेय काबिल मंत्री और नेता लेने से कैसे चूक सकते हैं।

मैंने मध्यवर्ग का मजाक नहीं उड़ाया, कहकर मंत्री जी ने फिर एक बयान दिया कि उनके बयान को मीडिया ने धो-निचोड़कर पेश किया गया है। हम लोग तो चाहते हैं कि मध्यमवर्ग को समूचा ही उड़ा दिया जाए। महसूस होने लगा कि नेता और मंत्री को कुछ भी बोलने और किसी पर भी तोहमत लगाने का संविधानसम्मत संपूर्ण अधिकार मिल चुका है, क्या आपको भी ऐसा ही दुखद अहसास हो रहा है ?

नोट चिंतन : दैनिक हरिभूमि 12 जुलाई 2012 में प्रकाशित


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नहर में लाल पीले नोट। नोटों के आसपास मंडराते लोग। जहां नोट हैं, वहां लोग हैं। जहां लोग हैं, वहां लुगाई हैं। लोग लुगाई और लाल पीले नोट। नहर में पानी। पानी में नहाते नोट। गर्मी मिटाते नोट। नोटों के पीछे कूदते नोट। नोटों के पीछे कूदते लोग, तैरते लोग, नोट बटोरते लोग। गीले नोटों को सुखाते नोट। कई लोग गीले नोट ही घर ले जाते हैं। न मालूम कब सुर्खियां बन जाएं और पुलिस आ जाए। फिर सूखों की कौन कहे, गीले नोटों के सुख से भी महरूम हो जाएं। जीवन यापन में मलहम बनते नोट, कोई नहीं चाहता इनसे महरूम रहे। बस मेरे रूम में ही रहें नोट। नोटों को न ले कोई विलोक। नहर में नोट। नोटों के साथ तैरते लोग। यह दौर इंदौर में आया था। लोगों को खूब भाया था परंतु ऐसा दौर दोबारा से आने की कोई उम्‍मीद नहीं है। नोट पहले सड़कों पर उड़ते रहे हैं। पानी में भीगते पहली बार मिले हैं। नोट जलते हुए भी मिले हैं। बुझे हुए नोट पहली बार मिले हैं। ऐसा लगता है कि आत्‍महत्‍या की है नोटों ने। फिर जांच एजेंसियों का यह शक पुख्‍ता हो चला है कि नोटों को मारने की कोशिश की गई है लेकिन वे मरने से पहले बचाने वालों, उनके चाहने वालों द्वारा बचा लिए गए हैं। क्‍या हुआ जो गीले हैं, नोट तो हर हाल में लगते रसीले हैं। दूसरों के पास हों तो आदमी ढीला महसूस करता है और अपने पास हों तो मजबूती का दमदार अहसास। ऐसे होते हैं नोट खास। बंधी रहती है सबकी आस।
नोट के न होने की चोट से कोई नहीं बच सका है। नोट प्रत्‍येक प्रकार की चोट से बचाव करती है। नोट नेताओं के लिए वोट पाने का सबब बनते हैं। जिसके पास न हों नोट वे नोट पाने के लिए जीवन भर सिर धुनते हैं। धुन सिर्फ वही कि कैसे पाएं नोट। कैसे रिझाएं नोट। नोट नकली हों तब भी चल जाते हैं। बार बार न सही, काठ की हांडी के मानिंद एक बार तो चल ही जाते हैं। नोट एक नाम अनेक। कहीं डॉलर, कहीं पौंड, कहीं दीनार, कहीं यूरो – पर सब चाहते हैं कि उससे न दूर हों। काले भी हों परंतु अपने नाम के स्विस खाते में भरे हों। चाहे रिश्‍वत में चरे हों, चाहे घोटाले घपले में भरे पड़े हों। नोट की महिमा अपरंपार। सारे कारज इसी से होते पूरे। बिना नोट के सब कुछ लगता है घूरा। और नोट मिलें तो घूरा भी लगता है बूरा।
नोटों की ताल। नोटों की तलैया। सब लेते हैं नोटों की ही बलैयां। नोट हो तो सब लगते हैं सैयां। बिना नोट के सैयां भी लगें ज्‍यूं ततैया। न काटे फिर भी डंक का अहसास दें। नोट हों पास तो उड़ जाती है भूख प्‍यास। नोटों का करें इलाज तो नहीं आती कोई महामारी पास। महामारी मतलब गरीबी। हमारा देश भी धन्‍य हो गया है। योजना आयोग टॉयलेट में 35 लाख लगाकर चिंतन कर रहा है। जरूर 35 लाख वाले में मोबाइल चार्जर भी लगे होंगे। आने वाले के लिए बतौर गिफ्ट मोबाइल फोन ले जाने के लिए धरे होंगे। जिससे आगामी बार आने की बुकिंग पहले से ही की जा सके।  सब नोटों का ही कमाल है। नोट ही सब जगह मचाते फिर रहे धमाल हैं। इसे मत समझो रूमाल। यह चादर है जिससे पैर कभी बाहर नहीं जाते, इसमें सब समाते हैं।

कण-कण में भगवान : एक कण खोज कर खुश है इंसान - मिलाप हिंदी 9 जुलाई 2012 'बैठे ठाले' स्‍तंभ में प्रकाशित


सृष्टि पर कण कण में भगवान की मौजूदगी है। फिर भी इंसान सिर्फ एक कण खोज कर ही बावला हुआ जा रहा है। कण जिसके गुण संभावित हैं, अभी साबित नहीं हुए हैं। साबित तो तब होंगे, जब परख लिए जाएंगे। पर इंसान की खुशी का पारावार नहीं है। हतप्रभ है, विस्मित है, उसे अपनी इस एक कण की खोज पर भरोसा नहीं हो रहा है। इसे वह नायाब मान चुका है। उसका कहना है कि उसने भगवान को पहचान लिया है बल्कि यूं कह सकते हैं कि वह भगवान से गले मिलने का सुख लूट चुका है। यह वही सुख है जो ‘मुन्‍नाभाई एमबीबीएस’ में संजय दत्‍त जफ्फी पाकर और देकर बेरहमी से लूटता रहा है। इसे देखकर ही उस समय दीवानों की खुशी की सीमा नहीं रही थी। तब रेखा भी संसद में नहीं पहुंची थी न सचिन ने संसद में कब्‍जा जमाया था।
उलझन में हैं आम आदमी। उसे सब मिलकर उलझाते ही रहते हैं। नेता क्‍या कम पड़ रहे थे जो अब वैज्ञानिकों ने भी उलझाना शुरू कर दिया है। सोच रहा है कि यह कैसी कविता है जो सृष्टि के जन्‍म की कथा बतला रही है। चिंतित है कि आम आदमी पर सब अपने-अपने डोरे डालने को आतुर हैं। आम आदमी सब जान जाए, चाहे जान से ही चला जाए। पर आम आदमी को पूरी जानकारी से लबालब होना चाहिए। चाहे पीने को बूंद भर पानी न मिले।
अब गॉड पार्टिकल की खोज कर ली है वैज्ञानिकों ने। मतलब कण कण में है भगवान। अब अगर भगवान हर कण में मौजूद है तो आम आदमी क्‍या करे, क्‍या अब आम आदमी को सस्‍ती बिजली, स्‍वच्‍छ पानी, साफ हवा के लिए चिंतित नहीं होना होगा। आम आदमी को सब चिता पर लिटाने को आतुर हैं और वह सोच रहा है कि क्‍या भगवान के एक कण की खोज करने से उसकी बिजली, पानी और हवा की समस्‍या जड़ से खत्‍म हो जाएगी।
गॉड पार्टिकल का रहस्‍य जानने के बाद नेता ईमानदार हो जाएंगे, घोटाले-घपलेबाज सुधर जाएंगे और क्‍या सचमुच में ऐसा सतयुग आएगा जिससे सबके अंतर्मन में राम राज्‍य की स्‍थापना हो जाएगी। अगर ऐसा नहीं होना है तो कण मिले या मिले पूरा भगवान – आम पब्लिक को क्‍या लेना-देना है। शैतान भी मिलेगा तो वह भी चलेगा। आम आदमी को गॉड पार्टिकल मिलने से कोई असर नहीं पड़ता है। गरीब आदमी क्‍या इस दिव्‍य पार्टिकल के मिलने से 28 रुपये में संतोषी जीवन जी सकेगा।
क्‍या सब्जियां सस्‍तीं, दालें पौष्टिक, फल बिना डायरेक्‍ट पेड़ से, मसाले बिना मिलावट के, अराजकता की समाप्ति बेईमानी दुर्लभ हो जाएगी। फिर तो गॉड पार्टिकल रूपी नायाब आर्टिकल मिलने की खुशी, मुझे सबसे पहले है। परंतु आम आदमी जानता है कि गॉड पार्टिकल खोजना कितना आसान – किंतु समस्‍याओं से निजात पाना दीगर बात है। भला आम आदमी क्‍या वैज्ञानिक भी नहीं सकते ऐसी करामात। फिर काहे की उपलब्धि और किसलिए निकालें खुशियों की बारात। सफलता पाने पर उल्‍लास मचा रहे हैं, मानो कण नहीं पूरा भगवान का पहाड़ पा लिया हो। जहां पर तैंतीस करोड़ देवी देवता मौजूद हैं। जहां आम आदमी समस्‍याओं के हलाहल रूपी कोलाहल में धंसा-फंसा हुआ हो और इनसे बचने का कोई रास्‍ता, कोई वैज्ञानिक नहीं खोज पा रहे हैं।
आम आदमी का सफर चिंतन से शुरू होकर चिंता तक पहुंचने के लिए अभिशप्‍त है और खास आदमी की यात्रा, बिना किसी रुकावट की मात्रा के चिंतन से चिंतन पर स्‍थाई तौर पर जमा रहता है, उनके चिंतन से उपजे स्‍वर आम आदमी की चिता तक पहुंचने का रास्‍ता सरल बनाते हैं बल्कि चिता तक पहंचाने में खासा असरकारी रोल निबाहते हैं।
ब्रह्मांड की उत्‍पत्ति का रहस्‍य खोजने पर इंसान के लालच की गुत्‍थी कभी खोल पाओगे कि खूब धन और सुविधाधारक के पास इन्‍हें और ... और पाने की लालसा क्‍यों  बलवती बनी रहती है। इंसान पर लालच का जहर क्‍यों पल पल चढ़ता जाता है, महंगाई के मानिंद क्‍यों बढ़ता जाता है। फिर भी संतोष होता है यह जानकर कि विज्ञान के इस ज्ञान से लाईलाज असाध्‍य बीमारियों की चिकित्‍सा भी संभव हो पाएगी। तब तो मुझे लगता है यह बहुत सलोना है। दुख गायब होगा, सुख का साम्राज्‍य फैलेगा – ऐसा होना भी मुझे रोमांचित करता है। जब सिर्फ ईश्‍वर का सिर्फ एक कण खोजकर ही मानव इतना प्रफुल्लित है तो पूरे ईश्‍वर को जिस दिन अपने सामने खड़ा कर पाने में सफल होगा, तब तो खुशी से बौरा ही जाएगा, कुछ तो इतनी खुशी झेल नहीं पाएंगे और मर जाएंगे। लेकिन क्‍या मानव मरने में सहायक खुशी पाने का रोमांच अनुभव कर पाएगा।
एक कण ही तो मिला है और वह भी मिला है कि नहीं। क्‍या मिलने पर उसने बतलाया है कि ‘मैं वही गॉड पार्टिकल हूं पृथ्‍वीवासियों, जिसे तुम पूरी शिद्दत से खोज रहे हो।‘ विज्ञान की खोज में तो ऐसी तस्‍दीक जरूरी है जबकि दुनिया खुशी से बावली हुई जा रही है। इससे अधिक खुशी तो पानी की बूंद की एक झलक पाने भर से हो जाती है। वह भी तो आम पब्लिक के लिए गॉड पार्टिकल ही है। फिर क्‍यों दीवाने मानव, दीवानों की तरह मस्‍ती में चहक रहे हैं। इंसान अब भगवान बनने की ओर बढ़ रहा है। आपको क्‍या लगता है कि यह एक एक सीढ़ी चढ़ रहा है या रॉकेट की तरह तीव्र गति से विकास की लिफ्ट में यात्रा कर रहा है।

कण कण में भगवान : दैनिक ट्रिब्‍यून 7 जुलाई 2012 'हास परिहास' स्‍तंभ में प्रकाशित




सृष्टि पर कण कण में भगवान की मौजूदगी है। फिर भी इंसान सिर्फ एक कण खोज कर ही बावला हुआ जा रहा है। कण जिसके गुण संभावित हैं, अभी साबित नहीं हुए हैं। साबित तो तब होंगे, जब परख लिए जाएंगे। पर इंसान की खुशी का पारावार नहीं है। हतप्रभ है, विस्मित है, उसे अपनी इस एक कण की खोज पर भरोसा नहीं हो रहा है। इसे वह नायाब मान चुका है। उसका कहना है कि उसने भगवान को पहचान लिया है बल्कि यूं कह सकते हैं कि वह भगवान से गले मिलने का सुख लूट चुका है। यह वही सुख है जो ‘मुन्‍नाभाई एमबीबीएस’ में संजय दत्‍त जफ्फी पाकर और देकर बेरहमी से लूटता रहा है। इसे देखकर ही उस समय दीवानों की खुशी की सीमा नहीं रही थी। तब रेखा भी संसद में नहीं पहुंची थी न सचिन ने संसद में कब्‍जा जमाया था।
उलझन में हैं आम आदमी। उसे सब मिलकर उलझाते ही रहते हैं। नेता क्‍या कम पड़ रहे थे जो अब वैज्ञानिकों ने भी उलझाना शुरू कर दिया है। सोच रहा है कि यह कैसी कविता है जो सृष्टि के जन्‍म की कथा बतला रही है। चिंतित है कि आम आदमी पर सब अपने-अपने डोरे डालने को आतुर हैं। आम आदमी सब जान जाए, चाहे जान से ही चला जाए। पर आम आदमी को पूरी जानकारी से लबालब होना चाहिए। चाहे पीने को बूंद भर पानी न मिले।
अब गॉड पार्टिकल की खोज कर ली है वैज्ञानिकों ने। मतलब कण कण में है भगवान। अब अगर भगवान हर कण में मौजूद है तो आम आदमी क्‍या करे, क्‍या अब आम आदमी को सस्‍ती बिजली, स्‍वच्‍छ पानी, साफ हवा के लिए चिंतित नहीं होना होगा। आम आदमी को सब चिता पर लिटाने को आतुर हैं और वह सोच रहा है कि क्‍या भगवान के एक कण की खोज करने से उसकी बिजली, पानी और हवा की समस्‍या जड़ से खत्‍म हो जाएगी।
गॉड पार्टिकल का रहस्‍य जानने के बाद नेता ईमानदार हो जाएंगे, घोटाले-घपलेबाज सुधर जाएंगे और क्‍या सचमुच में ऐसा सतयुग आएगा जिससे सबके अंतर्मन में राम राज्‍य की स्‍थापना हो जाएगी। अगर ऐसा नहीं होना है तो कण मिले या मिले पूरा भगवान – आम पब्लिक को क्‍या लेना-देना है। शैतान भी मिलेगा तो वह भी चलेगा। आम आदमी को गॉड पार्टिकल मिलने से कोई असर नहीं पड़ता है। गरीब आदमी क्‍या इस दिव्‍य पार्टिकल के मिलने से 28 रुपये में संतोषी जीवन जी सकेगा।
क्‍या सब्जियां सस्‍तीं, दालें पौष्टिक, फल बिना डायरेक्‍ट पेड़ से, मसाले बिना मिलावट के, अराजकता की समाप्ति बेईमानी दुर्लभ हो जाएगी। फिर तो गॉड पार्टिकल रूपी नायाब आर्टिकल मिलने की खुशी, मुझे सबसे पहले है। परंतु आम आदमी जानता है कि गॉड पार्टिकल खोजना कितना आसान – किंतु समस्‍याओं से निजात पाना दीगर बात है। भला आम आदमी क्‍या वैज्ञानिक भी नहीं सकते ऐसी करामात। फिर काहे की उपलब्धि और किसलिए निकालें खुशियों की बारात। सफलता पाने पर उल्‍लास मचा रहे हैं, मानो कण नहीं पूरा भगवान का पहाड़ पा लिया हो। जहां पर तैंतीस करोड़ देवी देवता मौजूद हैं। जहां आम आदमी समस्‍याओं के हलाहल रूपी कोलाहल में धंसा-फंसा हुआ हो और इनसे बचने का कोई रास्‍ता, कोई वैज्ञानिक नहीं खोज पा रहे हैं।
आम आदमी का सफर चिंतन से शुरू होकर चिंता तक पहुंचने के लिए अभिशप्‍त है और खास आदमी की यात्रा, बिना किसी रुकावट की मात्रा के चिंतन से चिंतन पर स्‍थाई तौर पर जमा रहता है, उनके चिंतन से उपजे स्‍वर आम आदमी की चिता तक पहुंचने का रास्‍ता सरल बनाते हैं बल्कि चिता तक पहंचाने में खासा असरकारी रोल निबाहते हैं।
ब्रह्मांड की उत्‍पत्ति का रहस्‍य खोजने पर इंसान के लालच की गुत्‍थी कभी खोल पाओगे कि खूब धन और सुविधाधारक के पास इन्‍हें और ... और पाने की लालसा क्‍यों  बलवती बनी रहती है। इंसान पर लालच का जहर क्‍यों पल पल चढ़ता जाता है, महंगाई के मानिंद क्‍यों बढ़ता जाता है। फिर भी संतोष होता है यह जानकर कि विज्ञान के इस ज्ञान से लाईलाज असाध्‍य बीमारियों की चिकित्‍सा भी संभव हो पाएगी। तब तो मुझे लगता है यह बहुत सलोना है। दुख गायब होगा, सुख का साम्राज्‍य फैलेगा – ऐसा होना भी मुझे रोमांचित करता है। जब सिर्फ ईश्‍वर का सिर्फ एक कण खोजकर ही मानव इतना प्रफुल्लित है तो पूरे ईश्‍वर को जिस दिन अपने सामने खड़ा कर पाने में सफल होगा, तब तो खुशी से बौरा ही जाएगा, कुछ तो इतनी खुशी झेल नहीं पाएंगे और मर जाएंगे। लेकिन क्‍या मानव मरने में सहायक खुशी पाने का रोमांच अनुभव कर पाएगा।
एक कण ही तो मिला है और वह भी मिला है कि नहीं। क्‍या मिलने पर उसने बतलाया है कि ‘मैं वही गॉड पार्टिकल हूं पृथ्‍वीवासियों, जिसे तुम पूरी शिद्दत से खोज रहे हो।‘ विज्ञान की खोज में तो ऐसी तस्‍दीक जरूरी है जबकि दुनिया खुशी से बावली हुई जा रही है। इससे अधिक खुशी तो पानी की बूंद की एक झलक पाने भर से हो जाती है। वह भी तो आम पब्लिक के लिए गॉड पार्टिकल ही है। फिर क्‍यों दीवाने मानव, दीवानों की तरह मस्‍ती में चहक रहे हैं। इंसान अब भगवान बनने की ओर बढ़ रहा है। आपको क्‍या लगता है कि यह एक एक सीढ़ी चढ़ रहा है या रॉकेट की तरह तीव्र गति से विकास की लिफ्ट में यात्रा कर रहा है।

कण कण में ईश्‍वर फिर भी एक मिला : हरिभूमि 7 जुलाई 2012 में प्रकाशित


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सृष्टि पर कण कण में भगवान की मौजूदगी है। फिर भी इंसान सिर्फ एक कण खोज कर ही बावला हुआ जा रहा है। कण जिसके गुण संभावित हैं, साबित होंगे, परख लिए जाएंगे। पर इंसान की खुशी का पारावार नहीं है। विस्मित है, उसे अपनी इस एक कण की नायाब खोज पर भरोसा नहीं हो रहा है। कहता है कि उसने भगवान को पहचान लिया है बल्कि यूं कह सकते हैं कि वह भगवान से गले मिलने का सुख लूट चुका है। यह वही सुख है जो ‘मुन्‍नाभाई एमबीबीएस’ में संजय दत्‍त जफ्फी पाकर और देकर बेरहमी से लूटता रहा है। इसे देखकर ही उस समय दीवानों की खुशी की सीमा नहीं रही थी। तब रेखा भी संसद में नहीं पहुंची थी न सचिन ने संसद में कब्‍जा जमाया था।
उलझन में हैं आम आदमी। उसे सब मिलकर उलझाते ही रहते हैं। नेता क्‍या कम पड़ रहे थे जो अब वैज्ञानिकों ने भी उलझाना शुरू कर दिया है। सोच रहा है कि यह कैसी कविता है जो सृष्टि के जन्‍म की कथा बतला रही है। चिंतित है कि आम आदमी पर सब अपने-अपने डोरे डालने को आतुर हैं। आम आदमी सब जान जाए, चाहे जान से ही चला जाए। पर आम आदमी को पूरी जानकारी से लबालब होना चाहिए। चाहे पीने को बूंद भर पानी न मिले।
गॉड पार्टिकल की खोज मतलब कण कण में भगवान। तो आम आदमी क्‍या करे, अब आम आदमी को सस्‍ती बिजली, स्‍वच्‍छ पानी, साफ हवा के लिए चिंतित नहीं होना होगा। उसे सब चिता पर लिटाने को आतुर हैं और वह सोच रहा है कि क्‍या भगवान के एक कण की खोज करने से उसकी समस्‍याएं जड़ से खत्‍म हो जाएगीं।
गॉड पार्टिकल का रहस्‍य जानने के बाद नेता ईमानदार हो जाएंगे, घोटाले-घपलेबाज सुधर जाएंगे और सचमुच में ऐसा सतयुग आएगा जिससे अंतर्मन में राम राज्‍य की स्‍थापना होगी। अगर ऐसा नहीं होना है तो कण मिले या मिले पूरा भगवान – आम पब्लिक को क्‍या लेना-देना है। शैतान भी मिलेगा तो भी चलेगा। आम आदमी को गॉड पार्टिकल मिलने से कोई असर नहीं पड़ता है। गरीब आदमी क्‍या इस दिव्‍य पार्टिकल के मिलने से 28 रुपये में संतोषी जीवन जी सकेगा।
गॉड पार्टिकल खोजना कितना आसान – किंतु समस्‍याओं से निजात पाना दीगर बात। भला आम आदमी क्‍या वैज्ञानिक भी नहीं सकते ऐसी करामात। फिर काहे की उपलब्धि और किसलिए निकालें खुशियों की बारात। सफलता पाने पर उल्‍लास मचा रहे हैं, मानो कण नहीं पूरा भगवान का पहाड़ पा लिया हो। जहां पर तैंतीस करोड़ देवी देवता मौजूद हैं। जहां आम आदमी समस्‍याओं के हलाहल रूपी कोलाहल में धंसा-फंसा हुआ हो और इनसे बचने का कोई रास्‍ता, कोई वैज्ञानिक नहीं खोज पा रहे हैं।
ब्रह्मांड की उत्‍पत्ति का रहस्‍य खोजने पर इंसान के लालच की गुत्‍थी कभी खोल पाओगे कि खूब धन और सुविधाधारक के पास इन्‍हें और ... और पाने की लालसा क्‍यों  बलवती बनी रहती है। क्‍या उसने बतलाया है कि ‘मैं वही गॉड पार्टिकल हूं पृथ्‍वीवासियों, जिसे तुम पूरी शिद्दत से खोज रहे हो।‘ इससे अधिक खुशी तो पानी की बूंद की एक झलक पाने भर से हो जाती है। आम पब्लिक के लिए वही गॉड पार्टिकल ही है। इंसान भगवान बनने की ओर बढ़ रहा है। आपको क्‍या लगता है कि यह एक एक सीढ़ी चढ़ रहा है या रॉकेट की तरह तीव्र गति से विकास की लिफ्ट में यात्रा कर रहा है। 

नहर में नोट चिंतन : जनसंदेश टाइम्‍स 6 जुलाई 2012 अंक में प्रकाशित




नहर में लाल पीले नोट। नोटों के आसपास मंडराते लोग। जहां नोट हैंवहां लोग हैं। जहां लोग हैंवहां लुगाई हैं। लोग लुगाई और लाल पीले नोट। नहर में पानी। पानी में नहाते नोट। गर्मी मिटाते नोट। नोटों के पीछे कूदते नोट। नोटों के पीछे कूदते लोगतैरते लोगनोट बटोरते लोग। गीले नोटों को सुखाते नोट। कई लोग गीले नोट ही घर ले जाते हैं। न मालूम कब सुर्खियां बन जाएं और पुलिस आ जाए। फिर सूखों की कौन कहेगीले नोटों के सुख से भी महरूम हो जाएं। जीवन यापन में मलहम बनते नोटकोई नहीं चाहता इनसे महरूम रहे। बस मेरे रूम में ही रहें नोट। नोटों को न ले कोई विलोक। नहर में नोट। नोटों के साथ तैरते लोग। यह दौर इंदौर में आया था। लोगों को खूब भाया था परंतु ऐसा दौर दोबारा से आने की कोई उम्‍मीद नहीं है। नोट पहले सड़कों पर उड़ते रहे हैं। पानी में भीगते पहली बार मिले हैं। नोट जलते हुए भी मिले हैं। बुझे हुए नोट पहली बार मिले हैं। ऐसा लगता है कि आत्‍महत्‍या की है नोटों ने। फिर जांच एजेंसियों का यह शक पुख्‍ता हो चला है कि नोटों को मारने की कोशिश की गई है लेकिन वे मरने से पहले बचाने वालोंउनके चाहने वालों द्वारा बचा लिए गए हैं। क्‍या हुआ जो गीले हैंनोट तो हर हाल में लगते रसीले हैं। दूसरों के पास हों तो आदमी ढीला महसूस करता है और अपने पास हों तो मजबूती का दमदार अहसास। ऐसे होते हैं नोट खास। बंधी रहती है सबकी आस।
नोट के न होने की चोट से कोई नहीं बच सका है। नोट प्रत्‍येक प्रकार की चोट से बचाव करती है। नोट नेताओं के लिए वोट पाने का सबब बनते हैं। जिसके पास न हों नोट वे नोट पाने के लिए जीवन भर सिर धुनते हैं। धुन सिर्फ वही कि कैसे पाएं नोट। कैसे रिझाएं नोट। नोट नकली हों तब भी चल जाते हैं। बार बार न सही, काठ की हांडी के मानिंद एक बार तो चल ही जाते हैं। नोट एक नाम अनेक। कहीं डॉलर, कहीं पौंड, कहीं दीनार, कहीं यूरो – पर सब चाहते हैं कि उससे न दूर हों। काले भी हों परंतु अपने नाम के स्विस खाते में भरे हों। चाहे रिश्‍वत में चरे हों, चाहे घोटाले घपले में भरे पड़े हों। नोट की महिमा अपरंपार। सारे कारज इसी से होते पूरे। बिना नोट के सब कुछ लगता है घूरा। और नोट मिलें तो घूरा भी लगता है बूरा।
नोटों की ताल। नोटों की तलैया। सब लेते हैं नोटों की ही बलैयां। नोट हो तो सब लगते हैं सैयां। बिना नोट के सैयां भी लगें ज्‍यूं ततैया। न काटे फिर भी डंक का अहसास दें। नोट हों पास तो उड़ जाती है भूख प्‍यास। नोटों का करें इलाज तो नहीं आती कोई महामारी पास। महामारी मतलब गरीबी। हमारा देश भी धन्‍य हो गया है। योजना आयोग टॉयलेट में 35 लाख लगाकर चिंतन कर रहा है। जरूर 35 लाख वाले में मोबाइल चार्जर भी लगे होंगे। आने वाले के लिए बतौर गिफ्ट मोबाइल फोन ले जाने के लिए धरे होंगे। जिससे आगामी बार आने की बुकिंग पहले से ही की जा सके।  सब नोटों का ही कमाल है। नोट ही सब जगह मचाते फिर रहे धमाल हैं। इसे मत समझो रूमाल। यह चादर है जिससे पैर कभी बाहर नहीं जाते, इसमें सब समाते हैं।