अचिनाश वाचस्‍पति से कैसे सावधान रहें (अचिनाश वाचस्‍पति)

हेपिटाइटिस सी से कैसे सावधान रहें 

लिवर की सत्यकथा : हेपिटाइटिस सी जैसे रोग से पीडि़त अविनाश वाचस्‍पति की स्‍वानुभूति

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  • -    अविनाश वाचस्‍पति
    एक हूं पर मैं कई रूपों में आता जाता हूं, मैं हूं रूप नेक, पर अनेक। जो आत्‍माएं इस तथ्‍य से परिचित हैं कि टीम वर्क की क्‍या महत्‍ता है और परमात्‍मा और आत्‍मा के संचालन में इसकी क्‍या जरूरत है, वो यह भी जानते हैं कि शरीर में लिवर, फिल्‍म निर्माण में टीम वर्क क्‍यों आवश्‍यक है। इसकी जरूरत से सिर्फ वहीं परिचित होगा जो न टीम वर्क, फिल्‍म वर्क और न परमात्‍मा के सुचारू संचालन से अच्‍छी तरह परिचित होगा।
    जिस प्रकार टीम वर्क की हरेक नेक निर्माण में दरकार रहती है, उसी प्रकार लिवर की प्रत्‍येक प्रकार के अच्‍छे निर्माण में जरूरत रहती है। इससे किसी को इंकार न तो होगा और न हो ही सकता है। लिवर की जरूरत जीव और जीवन से जुड़ी सभी वस्‍तुओं से होती है। खिलौनों के लिए लिवर की जरूरत है, इसका अर्थ है कि सभी प्रकार की मशीनरी के लिए लिवर जरूरी है। बिना लिवर के किसी का बनना और चलना संभव नहीं है। जिस प्रकार सभी प्रकार के खिलौनों में लिवर जरूरी है, उसी प्रकार सभी जीवनी वस्‍तुओं में लिवर बहुत जरूरी है। जिस जिस में प्राण है, उसी को सब करते प्रणाम हैं, यही प्रमाण सबको मिले हैं। एक चींटी से लेकर इंसान और जानवर तक की बिना लिवर के संकल्पना नहीं की जा सकती है। प्राणवान वस्‍तुओं में मच्‍छर, पतंगा, कीट, कीड़े, चूहे, बंदर, छछूंदर, हाथी, शेर, चीता, लोमड़ी, बिल्‍ली सबमें लिवर सर्किय रहता है, इनमें किसी प्रकार का लिंग भेद नहीं होता है, चाहे वह औरत हो, हिजड़ा, पुरुष मतलब नर अथवा मादा।  इनमें लिंग भेद की कोई महत्‍ता नहीं है।
    लिवर का जरूरी रोल होते हुए भी बिना टीम वर्क के यह कार्य नहीं कर सकता है। जिस प्रकार लिवर के एक्टिव होने के लिए हर्निया, सांस, गॉल ब्‍लॉडर जरूरी हैं, चाहे इनका किसी भी भाषा में कोई भी नाम हो, उसे अंग्रेजी में लिवर, हिंदी में जिगर, मलयालम में कॉरेल या किसी भी भाषा में कोई भी नाम दो, सबका काम एक ही होता है, बिना इनके कोई किसी का होना चलना संभव नहीं है। फिल्‍म में टीम वर्क में एक्टिव डायरेक्‍टर, एक्‍टर, पटकथालेखक, कहानी लेखक, संवाद लेखन, गीत लेखक, कैमरा संचालक और इसमें निर्जीव में जीवन फूंकने वाले कैमरा तक की मिली जुली सक्रिय भूमिका रहती है। मतलब लिवर का और होना, टीम वर्क का रहना – सबका जरूरी है। इसी प्रकार लिवर जरूरी है और टीम वर्क भी जरूरी है। अगर यह कहा जाए कि दोनों के समन्‍वयन में सृष्टि का संचालन निहित है तो यह एकदम सत्‍य है, सच्‍चाई है और इस सच्‍चाई से कोई इंकार नहीं कर सकता है।

    जिस प्रकार लिवर जरूरी है उसी प्रकार एक नहीं अनेक नेक कार्यों में टीम वर्क जरूरी है। बिना समूह के बहुत से कार्य नहीं किए जा सकते हैं। कोई भी कार्य बिना टीम के संभव नहीं है तो यह एकदम समीचीन है। लेखन कार्य में सिर्फ मानस ही नहीं, उसकी सकारात्‍मक और नकारात्‍मक सोच भी एक्टिव रहती है, उसी प्रकार कलम, कंप्‍यूटर, कॉपी, पैंसिल, ई स्‍लेट भी जरूरी है और बहुत सारी चीजों को तो तो सोच भी नहीं पाते हैं। आखिर सपने क्‍या यूं ही आते हैं। वह भी लेखन में सक्रिय रहते हैं। इस सक्रियता का ताना बाना बुनना आसान नहीं है। इनका सोचना और कागज पर उतारना आसान नहीं है और न ही कंप्‍यूटर पर उकेरना सरल है।
    इसी सहज सच्‍चाई की इस सरलता का इसकी पूर्णता में कोई नहीं पहचान पाया है और न सभी पहचान ही पाएगा। जीवन यूं ही चलता जाएगा, प्रगति की गति के पथ पर सभी प्रकार की दुर्गतियों को पार करते हुए उन्‍नति के पथरीली, उबड़ खावड़ रास्‍तों पर भी आगे ही बढ़ता रहेगा। आप इसे तकनीक भी कह सकते हैं और कहने वाले इसे जादू भी कहते हैं। फिर जादूगर परमात्‍मा भी हुआ और लेखक भी। किसी भी प्रकार के रचयिता या रचनाकार को न तो इग्‍नोर करना पॉसीबल है क्‍यों इसे अपनाना ही बल है, यही सब को सबल बनाता है। सबल बनना मतलब बलवान होना ही है और लिवर और टीम वर्क से बलवान इस सृष्टि पर भला और कौन होगा ?
    #‪#‎HELPBANKACCOUNT‬
    ICICI SAVING BANK ACCOUNT NO, 629401135858/110229017 BANK DETAILS ICICI BANK, SHAKUNTALA APARTMENTS, NEHRU PLACE, NEW DELHI IN THE NAME OF SARVAISH VACHASPATI WIFE OF AVINASH VACHASPATI.
    OR SBI SAVING BANK ACCOUNT NO, 20190460651 NEHRU PLACE BRANCH IN THE NAME OF AVINASH VACHASPATI, 
    MORE THAN FRIENDS NOT EVEN RS.500/- ONE TIME HELP. AVINASH VACHASPATI SABHI KA BAHUT ABHARI HAI.HEPITITIS C KI JANG JEET HI LEGA. MOB. 08570321868
    (लेखक की शीघ्र प्रकाश्‍य पुस्‍तक ‘चैंटिंग विद लिवर’ का एक महत्‍वूपर्ण अंश)

    संपर्क : साहित्‍यकार सदन, 195 पहली मंजिल, सन्‍त नगर, ईस्‍ट ऑफ कैलाश के पास, नई दिल्‍ली 110065 फोन01141707686/08750321868/09868166586 ई मेलnukkadh@gmail.com वेब साइटwwwण्‍nukkladh.com

    अविनाश वाचस्‍पति को हिंदी ब्‍लॉग जगत में बाधा डालने के आरोप में सजाए फांसी

    बात चौंकने की नहीं
    कुत्‍तों के भौंकने की है
    आप सही पढ़ रहे हैं
    जो लिखा है वही
    अविनाश वाचस्‍पति को
    नाम के आगे मुन्‍नाभाई
    चस्‍पां करने का दोषी
    पाया गया है  अतएव
    हिंदी ब्‍लॉग जगत समुदाय
    ने सजाए फांसी का फैसला
    मुकर्रर किया है

    जिस किसी को
    हो आपत्ति
    वह अपनी गर्दन
    भी पेश करे
    वरना यूं ही तर्क
    कुतर्क पेश करके
    समय और जाया करे।

    जीवन में पागल खाना जरूरी है : published in Bollywood Cine Reporter 20 - 26 June 2014 on editorial page



    यह  दुनिया  पागल  खाना।  खाने  के  अद्भुत व्‍यंजन  है पर  फिर  भी  सामने किसी  पागल  को  देखकर खाने  को मचलता  है  दिल। भूल जाता है इंसान कि  वह तो शाकाहारी है पर फिर भी पागल  खाने की  लाचारी  है। चारा खाएगा तब भी पागल बन जाएगा।  मन कहता है कि जो पागल  खाएगा, वह अक्‍लमंद कहलाएगा। अक्‍लमंद कहलाना अक्‍ल की मंदी नहीं, बुद्धिमानी कहलाती है, शिखर पर पहुंचाती है। पागल  खाने  में  मिलता  है  आनंद।  पर खाना हम  कम  चाहते  हैं  कि  किसी  को  भेज  दें पागल  खाने में। वह  वहां  पर  पेट  भर  भर  कर  खाए,  मजे उड़ाए  और  मांसाहारी  हो  जाए। 

    भारत  वह देश  है  जहां  पर  अंडों को भी  आलू  माना जाता है,  अंडा  खाना खिलाना  शाकाहारी और  आप पागल  खा - चबा लो तब भी शाकाहारी।  यह कैसा विरोधाभास  है, मेरी समझ  में  नहीं आता है। इसलिए मैं खुद  को  और दूसरे  मुझे  पागल  मानते  हैं और मैं उनकी  इस  सोच  से  इत्‍तेफाक  रखता  हूं।  स्‍वयं को पागल  स्‍वीकारना और इत्‍तेफाक  रखना  गलत इसलिए नहीं  है क्‍योंकि इससे कई प्रख्‍यात सम्‍मान जुड़े हुए हैं। कुछ हर साल होली पर रंग के माफिक बरसते हैं।

    मेरा मानना है  कि  किसी  को  पागल  बतलाना,  मानना अवश्‍य ही दूषित वृत्ति का  परिचायक  है।  यह  वृत्ति इतनी खतरनाक हो चुकी  है कि  नाम  लो  आगरा का और कानों  में  पागल  शब्‍द  गूंजने  लगता  है। ताजमहल का ताज भी पागल में तब्दील दिखाई देने लगता है।  जो  इस गूंज  को  मन  के भीतर  तक  शिद्दत से महसूस करते हैं, मालूम नहीं उन्‍हें  सचमुच में पागल माना जाए या नहीं। मांसाहारी या शाकाहारी होने से पागल होने अथवा न होने का  कोई अंर्तसंबंध  नहीं  है।  वैसे  संबंध तो  है इसे  आप लिव-इन-रिलेशनशिप मान  सकते हैं।  शिप  मतलब  पानी में तैरने वाला जहाज। 

    जहाज  के  बारे में यह आम  धारणा  है कि वह हवा में  उड़ता है।  सिर्फ जहाज ही नहीं उड़ता अपने  साथ  सैंकड़ों  यात्रियों  को लेकर उड़ता है।  इन सैकड़ों में कितने तो  कौतूहलवश पहली बार जहाज में बैठ कर उड़ रहे होते हैं, कितने ही  सैकड़ों  बार उड़ चुके होते हैं और  जहाज कई हजार बार।  इसे ही संबंधों  का आपसी अटूट बंध माना जाता है। अनेक सफरियों का यह सफर अंतिम बन जाता है।  मतलब  अंत  का  आरंभ  शुरूआत से!

    अब तो आसमान  में फिर  भी जहाजों का  यातायात दिखलाई  देता है पर पहले ऐसा नहीं था। बहुत  कोशिश करने  पर आसमान में  दो  चार घंटे में  एक  जहाज  उडता नजर आता  था। जब हम बच्‍चे थे तब आकाश की ओर नजरें गड़ाए ध्‍यान में मग्‍न रहते थे और शर्त लगाते थे कि इस बार पूर्व दिशा से विमान आता दिखाई देगा या पश्चिम अथवा उत्‍तर या दक्षिण से। इसका मतलब यह नहीं कि जहाज कम थे या यह आपकी नजरों का दोष है।  इसे जहाज के  यात्रियों या क्रू - मेंबर्स का रोष भी नहीं कहा जाएगा।  रोष यानी गुस्‍से में कभी चालक यानी पायलट को भी नहीं होना चाहिए। क्रोध में अ‍थवा मद्यपान करके ड्राइविंग सदा नुकसानदेह होती है। गुस्‍से के बिना  यूं तो जीवन सिर्फ संतों का होता है, पर मन में उनके गुस्‍सा उपजता है जिसे वह भीतर ही भीतर पी जाते हैं और फेस को इससे मुक्‍त दिखलाते हैं।

    जीवन को जीवंत रखने  के  लिए उष्‍ण तापमान चाहिए। जिसके लिए संतुलन जरूरी है, वही कामयाबी का सूत्र है, बिना संतुलन के कुछ भी नहीं टिकाऊ नहीं है। संतुलन की कमी हो तो हम सब जमीन पर लेटे दिखाई दें। पृथ्‍वी और ग्रहों को अंतरिक्ष में टिके रहने के लिए  संतुलन वाली साधना का घनघोर महत्‍व है। यही साधना जीवन को साधती है। पर साधना नाम होने पर भी इस ओर आकर्षण कम ही होता है। इस ओर खिंचाव सदा जीवन के लिए फायदेमंद रहता है। अब फायदा मंद हो या तीव्र, नफा तो नफा ही है। सब नफे के गुलाम हैं। जीवन की एक तय मियाद है, गिनती की सांसें हैं, इन सांसों को उपयोग में लाकर समाज का कल्‍याण किया जा सकता है। पर इसके लिए अपने स्‍वार्थीपन, लालचमन से बाहर आना होगा और इसी से बाहर आने में तथाकथित इंसान को दिक्‍कत महसूस होती है और मन के इस चंचल सफर को पागलपन ही कहा जाएगा कि पागल खाने की बात मन को साधने पर आकर विराम ले रही है। यह वृत्ति रचनाकारों में पाई जाती है जिसे लेखकीय गुण कहा गया है। इसे ही कल्‍पना के साथ संजो कर रचनात्‍मकता में रचा जाता है। यह रचना सचमुच में बहुत ही अद्भुत है। तब इसे पागलखाना नहीं, विचारों की कलात्‍मक साधना माना गया है।  आप भी इसे मन के भीतर के किसी कोने में पूरी उष्‍णता से स्‍वीकार करते हैं न।

    -    अविनाश वाचस्‍पति

    टमाटर का कड़वा रस : डीएलए 19 जुलाई 2013 में प्रकाशित

    टमाटर और सेब दोनों लाल और दोनों आजकल मिल रह हैं बढ़े भाव।  मैं शहंशाह होता तो जरूर ‘टमाटरमहल’ बनवाता क्‍योंकि सेब के भाव बहुधा बढ़े होते हैं। बनिस्‍वत इसके सब्जियों को ऐसे मौके बहुत मुश्किल से मिलते हैं।  गौरतलब यह है कि टमाटर की पौ निन्‍यानवै पहली बार हुई है। सब्जियों में राजनीति की करामात पब्लिक को करारी मात देती रही है। एक बार लौकी के रस को साजिशन कातिल करार दिया जा चुका है। प्‍याज, आलू पब्लिक का रस निचोड़ते रहे हैं।  टमाटर की बढ़ती रूमानियत देखकर सेब का दुखी होना स्‍वाभाविक है।  सेब के चाहने वाले स्‍वास्‍थ्‍य के लिए उपयोगी होने पर भी महंगा होने के कारण उससे नजरें बचाकर निकलने को मजबूर हैं। दुमदार का जमाना है इसलिए आजकल टमाटर की पूछ वाली पूंछ बहुत लंबी हो गई है। टमाटर के लाल गाल वाला रूप आजकल लुभा नहीं, जला रहा है। टमाटर क्रांति का उद्घोष हो चुका है जिसकी वजह से टमाटर की सूरत पर एक्‍स्‍ट्रा एनर्जी वाली चमक दिखाई दे रही है।

    टमाटर के दिन-रात इस कदर फिरे हैं कि ‘मेरा दिन मेरी रात’ है, वाली बात सुर्खियों में है।  वैसे इसे ‘सोशलमीडिया पर टमाटर’ और ‘टमाटर पर सोशलमीडिया’ ज्‍यादा सटीक है। ‘टमाटरमहल’ बनाने की बात पता चली तो टमाटर लाज से तमतमा गया, ‘टमाटरमहल’ क्‍या मुझे मुमताज की तरह बेगम समझ लिया है सबने।  

    टमाटर को शहंशाह मानने वाले रिकमंड करते हैं कि टमाटर बिना शहंशाह हुए सब्जियों का, दालों का गम दूर करता है, उसमें नई निराली चटकारियत भरता है इसलिए उसे बेगम ही कहा जाए। बेगम की खूबी गम को दूर करती है।

    टमाटर की औकात वही पुरानी पर नई पहचान मिली है।  सब्जियों, दालों में घुसकर टमाटर सदा से परोपकार करता रहा है। यह उसका गुप्‍त परोपकार है। परोपकार वाला भाव टमाटर को विरल ऊंचाईयां दे रहा है जिसमें वह अपनी उपयोगिता को दूसरों में निस्‍वार्थ भाव से घुला-मिला रहा है, इसी में उसका बडप्‍पन है और यही जीवन का सच्‍चा सार है। व्‍यायाम करते हुए एक कमजोर से छोटे से पौधे पर टमाटर मजबूती से जमा रहता है और यही उसकी लालिमा का रहस्‍य है। पर आज टमाटर इसलिए दुखी है क्‍योंकि उत्‍तराखंड में आई बाढ़ ने उसका चेहरा पूरी तरह काला कर दिया है और यह इंसान की शैतानी फितरत का काम है, टमाटर को यह मलाल है इसलिए वह शर्म से भी लाल है।  

    नीयत खराब होना आज इंसान होने के नये मायने हैं, जो बाढ़ से बरबाद जिंदा लोगों से उनका माल-असबाब लूटकर सरेआम खाई में धक्‍का दे रहे थे मतलब आज का इंसान बदनियति का संगम है। जो मंदिरों की तिजोरी पर लुटेरा बनकर मौजूद है, वही तथाकथित इंसान टमाटर को महंगा बेच रहा है, पीडि़तों के दुख में उसका सुख और लाभ छिपा हुआ है। टमाटर जानता है कि लुटेरों के चेहरों पर छाई रक्‍त की घिनौनी लालिमा है जो सामने वाले के शरीर से रक्‍त का हेमोग्‍लोबिन का लेबल कम कर रही है।

    टमाटर महसूस कर रहा था कि उसे सुर्खियों में देखकर आलू, प्‍याज, बैंगन, घिया, तोरई, सीताफल जैसी सब्जियां ईर्ष्‍या से जल-भुनकर खूब महंगी हो रही हैं। जबकि यह सब इंसानी लालच की बानगी है। इंसान किसी मौके का फायदा उठाने से नहीं चूकता। टमाटर का मिले दिव्‍य ज्ञान के बावजूद कि सब्जियों का कोई दोष नहीं है,  फिर भी आज सच का टमाटर कड़वा लगने लगा है।