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कसाब काटू मच्‍छर से मुन्‍नाभाई की फेसबुक पर चैटिंग : दैनिक पंजाब केसरी 20 नवम्‍बर 2012 को प्रकाशित

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कसाब को काटने वाला मच्‍छर ऑनलाईन था। वह फेसबुक पर मेरे साथ चैटिंग में आया। लीजिए आप भी होइए मच्‍छर से चैटिंग के बहाने कई हकीकतों से रूबरू :

मच्‍छर : मुन्‍नाभाई सलाम
मुन्‍नाभाई : मैं सबका हो सकता हूं किंतु मच्‍छर का भाई होना मुझे गवारा नहीं है।
मच्‍छर : किंतु मैंने तो उसको काटा है जिसने मुंबई में आतंकी वारदात करके समूचे देश को हिला दिया था।
मुन्‍नाभाई : देश को कोई नहीं हिला सकता, इतना मजबूत देश है मेरा। इसे आजतक घपले और घोटालों में संलिप्‍त नेता तक नहीं हिला पाए तो उस आतंकी कसाब की क्‍या मजाल ?
मच्‍छर : हिलाने से मेरा मतलब नुकसान पहुंचाने से था।
मुन्‍नाभाई : नुकसान तो इंसान को और पूरी मानवजाति को तुम पहुंचा रहे हो । तुम्‍हारा क्‍या बिगाड़ा है जो सदियों से तुम उसके खून के प्‍यासे बने हुए हो और नई नई तरह की बीमारियों के वायस बन रहे हो।
मच्‍छर : खून तो मेरी खुराक है।
मुन्‍नाभाई : खून आजकल के सत्‍ताधारी नेताओं की भी खुराक है। जबकि वे मच्‍छर नहीं हैं। जबकि वे जनता के वोट चूसने के लिए फेमस हैं।
मच्‍छर : मैंने देखा कि सरकार कसाब को फांसी पर लटकाने में बे-वजह की टालमटोल कर रही है इसलिए मैंने उसे काटने का फौरी एक्‍शन लिया।
मुन्‍नाभाई : फौरी तो तुम ऐसे कह रहे हो, मानो बीते कल उसने वारदात की और अगले दिन तुमने उसे काट लिया। कसाब तो जेल में रहकर खूब मौज ले रहा है।
मच्‍छर : मेरा काटा मौज ले ही नहीं सकता। उसे तो अपनी जान तक के लाले पड़ जाते हैं। बुरी तरह से उसकी खून के प्‍लेटलेट्स गिर जाते हैं।
मुन्‍नाभाई : लेकिन कसाब की गर्दन तो तुम्‍हारे काटने से भी नहीं कटी।
मच्‍छर : क्‍योंकि खबर बनाकर तुम्‍हारे भाईयों ने फिर से उसकी जान बचाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया है
मुन्‍नाभाई : इस सृष्टि पर भाई ही तो भाई का सगा दुश्‍मन है।
मच्‍छर : लेकिन मच्‍छर मच्‍छर का दुश्‍मन नहीं, हितैषी होता है। काश, इंसान मच्‍छरों से यह गुण सीख पाता। सामूहिक स्‍वर में मच्‍छर गान गाता।
मुन्‍नाभाई : सीखने के लिए जब बुराईयां प्रचुर मात्रा में उपलब्‍ध हैं तो कोई क्‍यों अच्‍छाइयों और सच्‍चाइयों का बोरिंग पाठ पढ़े और सीखे।
मच्‍छर : मच्‍छर प्रजाति की लोकप्रियता में अभिनेता नाना पाटेकर के संवादात्‍मक योगदान को कोई मच्‍छर कभी नहीं भूल सकता।
मुन्‍नाभाई : सो तो है उस पर तुर्रा यह भी है कि न तो किसी इंसान ने और न किसी हिजड़े ने ही नाना पाटेकर के संवाद का विरोध किया।
मच्‍छर : वह दिन और आज का दिन है, हमारी रातें फिर गर्इ हैं और हमारे जलवे निराले हैं, आजकल हम दिन में रक्‍त चूसने का शगल कर रहे हैं।
मुन्‍नाभाई : किस मुगालते में जी रहे हो तुम मच्‍छर महाशय। इंसान तुम्‍हारी प्रजाति के खात्‍मे के लिए सदैव युद्धस्‍तर पर लगा रहेगा।
मच्‍छर : लेकिन हमें नष्‍ट करना, दुष्‍ट मानव के बस का नहीं है। अगर ऐसा होता तो आज मैं जिंदा न होता।
मुन्‍नाभाई : इसका मतलब मच्‍छर और कसाब को किसी परिचय की जरूरत नहीं है। दोनों ही अपने कारनामों के कारण बुरी तरह लोकप्रिय हैं।
मच्‍छर : अपनी अपनी किस्‍मत है।
मुन्‍नाभाई : क्‍या खाक किस्‍मत है, मेरा भी तो खूब नाम है। मेरे कारनामे सबको मोहित करते हैं। तुम्‍हें भी किया है इसलिए तो तुम मुझसे चैटिंग करने फेसबुक पर नमूदार हुए हो।
मच्‍छर : यह मैं स्‍वीकारता हूं।
मुन्‍नाभाई : किंतु मूर्ख मच्‍छर, कसाब को तो किसी सामान्‍य मच्‍छर ने ही काटा था। फिर उसे डेंगू कैसे हो सकता है ?
मच्‍छर : जानता हूं, इस खबर को उड़ाने में भी किसी धूर्त नेता का ही हाथ है जो इस खेल में भी घपला करके नोट कमाने में जुटा हुआ है।
मुन्‍नाभाई : तुम मच्‍छर हो या किसी खुफिया एजेंसी के एजेंट अथवा खुलासामैन की तर्ज पर खुलासामच्‍छर।
मच्‍छर : जो चाहे मान लो। पर यह भी जान लो कि अभी तक मच्‍छरों के किसी गैंग ने इस कारनामे की जिम्‍मेदारी नहीं ली है। फिर भी उसके सुरक्षा बंदोवस्‍तों से इस मामले में घोटालों का संदेह जरूर जाहिर हुआ है।
मुननाभाई : तुम्‍हें क्‍या लगा था कि कसाब के रक्‍त की जानलेवा चुसाई करने पर तुम्‍हें देशभक्‍त मान लिया जाएगा अथवा किसी राष्‍ट्रीय उपाधि यथा पद्ममच्‍छरश्री, पद्ममच्‍छरविभूषण, पद्ममच्‍छरशिरोमणि इत्‍यादि से नवाजा जाएगा। जब आज तक शहीद भगतसिंह तक को कई ऐरे गैरे स्‍वयंभू संगठन शहीद और देशभक्‍त नहीं मानते हैं तो तुम्‍हें कौन तवज्‍जो देगा ?
मच्‍छर : यह तो मैं भी जानता हूं कि कसाब को जिंदा रखने के पीछे देशी-विदेशी राजनीतिक सौदेबाजियां हैं। उसे जानबूझकर जिंदा रखा गया है। उसके जिंदा रखने से कई मलाई कूट रहे हैं।
फिर भी एक आखरी कोशिश मैंने की है। क्‍या मच्‍छर जन जन और देशहित के अच्‍छे कार्य करने की कोशिश नहीं कर सकते, आखिर वे भी इस देश की हवा में सांस लेते हैं। यहां की जनता का रक्‍त चूसते हैं। उन्‍हीं से हमारी रोजी रोटी मतलब खून की प्‍यास बुझती है।
मुन्‍नाभाई : इस तथ्‍य से परिचित होने पर भी तुमने कसाब को मारने की जुर्रत की ?
मच्‍छर : मैं यह भी जानता हूं कि किसी को भी मारना किसी भी राज्‍य की पुलिस के लिए सबसे आसान कार्य है। वह किसी को भी निरपराध और मासूमों को मौत के घाट उतार सकती है। फिर वह उस खूनी घाट के आसपास न तो दिखाई देगी और अगर दिखाई देगी तो कह देगी कि उसे तो खून होता दिखाई नहीं दिया है। कई बार तो मरने वाले का अता पता ही नहीं मिलता और पुलिस तो वहां से लापता हो जाती है। आप इसे अता पता लापता फिल्‍म की कहानी मत समझ लीजिएगा।
मुन्‍नाभाई : अता पता लापता मतलब तुम फिल्‍मों के भी ग़ज़ब के शौकीन हो ?
मच्‍छर : फिल्‍म हाल के अंधेरे में भी हमें कई शिकार मिलते हैं। इस बहाने हम फिल्‍में भी देख लेते हैं।
मुननाभाई : फिर तुमने सबसे सुरक्षित जेल में सेंध लगाकर शिकार ढूंढने की गुस्‍ताखी क्‍यों की, जबकि इस शांतिप्रय देश में किसी अपराधी का जिंदा रहना कोई मुश्किल काम नहीं है। तुमने कसाब को काटकर यूं ही जान का जोखिम लिया है मच्‍छर। उसने वह तुम्‍हारे चपत मारने में सफल हो गया होता तो शहीद हो गए होते और तुम्‍हारा कोई नामलेवा भी नहीं मिलता। तुम्‍हारे इस कारनामे से न तो देशी और न ही विदेशी मच्‍छर समुदाय का कोई भला होने वाला है।
मच्‍छर : लेकिन जो मैं जानता हूं उसे तुम नहीं जानते मुननाभाई। शुद्ध पानी से जीवन पाने वाले लोकप्रिय डेंगू मच्‍छर का जनता को डर दिखला दिखला कर नगर निगम के कर्मचारी अवैध वसूली करने में इस हद तक लिप्‍त हैं कि तुम्‍हें आश्‍चर्य होगा ?  निगम इस बात के लिए कटिबद्ध है कि कहीं पर भी साफ पानी खुला नहीं दिखाई देना चाहिएनहीं तो हमें पनपने के लिए माहौल मिल जाता है। इस तथ्‍य की आड़ में निगम के जांच दस्‍ते किसी की भी रसोई भी घुस जाते हैं और जहां उन्‍हें पीने का साफ पानी अनढका मिल जाता हैया किसी गिलास में पिए पानी की बची हुई एक बूंद भी दिखलाई दे जाती है तो वे उसका चालान काटने के लिए कमर कस लेते हैं और कुछ दक्षिणा हासिल करके छोड़ देते हैं निगम के कर्मचारी इस बहाने लोगों से अपनी पुरानी दुश्‍मनी का बदला भी ले रहे हैं। उनकी इस ज्‍यादती की कहीं अपील भी नहीं सुनी जा रही है।
मुन्‍नाभाई : यह इस मुल्‍क की विडंबना है कि जिस कसाब को तुमने मारना चाहा सरकार ने उसके चारों और डॉक्‍टरों की फौज तैनात कर दी। अब इसमें भी डॉक्‍टरों और दवाईयों के लाखों के बिल एडजस्‍ट किए जाएंगे और घोटाला प्रधान भारत देश में घपले संपन्‍न होते रहेंगे। अगर तुम आम आदमी को काटते रहो तो सरकार को इस बहाने घोटाले करने की आजादी मिली रहेगी।
मच्‍छर : लेकिन मुझे कोई सम्‍मान ...
मुन्‍नाभाई : अगर तुम्‍हारे मन में सचमुच किसी राष्‍ट्रीय सम्‍मान को पाने की आकांक्षा जोर मार रही है तो आम आदमी के हिमायती खुलासामैन को काट लोतुम्‍हें निश्चित तौर पर सम्‍मानित कर दिया जाएगा। इस सम्‍मान समारोह के लिए सरकार गणतंत्र दिवस का इंतजार भी नहीं करेगी और दीपावली पर्व पर ही तुम्‍हें सम्‍मानित कर आतिशबाजी चलाने को अपराध घोषित कर देगी। जिससे तुम्‍हारी मच्‍छर प्रजाति उस दिन पटाखेबाजी से पैदा होने वाले धुंए के असर से सुरक्षित रहे।
मच्‍छर : बात तो तुम्‍हारी दमदार है।
मुन्‍नाभाई : पिछले दिनों एक कानूनप्रिय मंत्री पर तुम्‍हारी खून चूसने की आदत का असर देखा गया और उसने खुलासामैन को उसका लहू पी जाने का डर दिखलाकर डराने की पुरजोर कोशिश की। मुझे नहीं लगता कि उस वारदात में तुम्‍हारा कोई संगी साथी अथवा नाते रिश्‍तेदार मंत्री के साथ मिला हुआ होगा। परंतु विश्‍वास न सही तुम्‍हारे ऊपर मंत्री के साथ मिलीभगत का संदेह तो किया ही जा सकता है। तुमने कसाब को काटकर सबूत मिटाने की धृष्‍टता की है जिसके लिए पड़ोसी देश चाहे तुम्‍हें शहीद का दर्जा दे दे किंतु अपना देश तुम्‍हारे इस कुकृत्‍य की निंदा ही करेगा।
मच्‍छर : ऐसा क्‍या ?
मुन्‍नाभाई : तुम जानते तो हो कि आम आदमी तुम्‍हें देखकर ताली भी बजाता है तो तुम्‍हारा स्‍वागत करने के लिए नहीं, अपितु तुम्‍हें जान से मारने के लिएचाहे तुम यह सोचकर आनंदित होते रहो कि वह तुम्‍हारी इस कथित वीरता पर ताली बजाकर खुशी जाहिर कर रहा है।
मच्‍छर : मैं सोच रहा था कि आतंकवादी के खून का स्‍वाद का जायके अलग होता होगा। मैंने इसलिए भी यह रिस्‍क मोल लिया है।
मुननाभाई : मच्‍छर, यह तुम्‍हारी सोच नहीं, गलतफहमी है जिससे ग्रसित तुम अकेले ही नहीं हो। आजकल गलतफहमियों का दौर है, तुम भी उसके शिकार हो गए हो तो इसके दोषी तुम नहीं, आजकल मौसम ही ऐसा है। मुन्‍नाभाईयों को इस देश में हाशिए पर रख दिया गया है, जिसके कारण देश की यह दुर्गति हुई है लेकिन हमारी बहुमूल्‍य सलाहों को मानता कौन है ?

फेसबुक को फेकबुक बनने से बचाना होगा : दैनिक प्रभात 23 मई 2012 में प्रकाशित आलेख


पढ़ने में कठिनाई हो तो आसानी पेश है।


फेसबुकजिसका न सच्‍चा फेस है और न जो किसी तरह से अच्‍छी बुक है। फेस चालाकी से घिरा हुआ है,जानकारी अधिकतर झूठी है। ऐसा लगता है कि शिकारियों के लिए एक जाल बना दिया हैजिसमें आपने एक झूठा और आकर्षक चेहरा चस्‍पां करना है,लुभाने वाली जानकारी भरनी है। कहीं कोई ऐसी अनिवार्यता नहीं है कि आपने ठीक जानकारी नहीं दी तो आप फेसबुक पर सक्रिय नहीं हो पायेंगे या खाता नहीं बना पायेंगे। शुरू से अंत तक झूठ का आडंबर। कोई भी हैं आपकितनी भी उम्र हैस्‍त्री या पुरुष होना भी मायने नहीं रखता – आप फेसबुक के जरिए पूरे अंतर्जाल जगत पर अपना जाल फेंक कर उसमें फांसने के लिए स्‍वतंत्र हैं। फेसबुक को आधुनिक तिलिस्‍म कहा जाए तो कोई अतिश्‍योक्ति नहीं है। जिस प्रकार अच्‍छाईयों के प्रचार और प्रसार के खूब सारी मेहनत करनी होती हैतब कहीं थोड़ी बहुत अच्‍छाई किसी को पसंद आती है जबकि इसके उलट बुराईयों को फैलाने के लिए किसी प्रकार की मेहनत की जरूरत नहीं होती। इसका मोहपाश बहुत शक्तिशाली होता है। यह बिना फैलाए पूरी तरह फैल जाती है और इतना फैलती है कि किसी के समेटने में नहीं आती और अच्‍छाई को डुबाकर मारने के लिए इसे लुढ़काने में योगदान करता रहता है।
मैंने बतलाया है कि इसमें कोई बाध्‍यता नहीं है कि आप इसमें अपना असली फेस ही लगाएं। आप किसी भी चित्रकिसी भी नामकिसी भी उम्र और किसी भी ई मेल पते से इसे शुरू कर सकते हैं और इसे अपने झूठ से लबालब कर सकते हैं। फिर बुक तो यह है ही नहीं,बुक मतलब आप उसमें मौजूद किसी भी जानकारी को क्रम में पेज नंबर देखकर तुरंत निकाल सकें। जबकि यहां पर एक गहरा अंधा कुंआ हैजिसमें आपने स्‍वयं जानकारी डाली हैउसे आप भी दोबारा से देख पाएंगे,संभव नहीं है। फिर यह पुस्‍तक (बुक) कहां से हुई जो उसतक भी नहीं पहुंच सकतीजिसने उसकी रचना की है।
न फेसन बुक फिर भी कहलाती है फेसबुक। इसे फेकबुक बनने से बचाना होगा और यह जिम्‍मेदारी इसका उपयोग करने वाले मित्रो की है। वैसे यह फेमबुक भी है। आप इसके जरिए न जाने किस किससे जुड़ते चले जाते हैं। अभी तो इसमें कुछ सीमाएं हैंपर वह भी इतनी कारगर नहीं हैं। 5000 मित्रों से अधिक आप अपने मित्र नहीं बना सकते। पर कितने हैं जो 5000 मित्र बना पाते हैं। फिर उन सबसे संपर्क रखनासाधना बहुत कठिन है। किससे कब क्‍या झूठ बोला हैइसका ब्‍यौरा रखना और यह सब कार्य आप अपने जीवन के महत्‍वपूर्ण समय में से जबरन निकालकरअनिवार्य कार्यों को इग्‍नोर करके करते हैं और करते ही रहते हैं। सच्‍ची जिंदगी से भी अधिक मजा देती है यह झूठी जिंदगी।
फेसबुक पर संवाद आपको खूब आनंद देता है और प्रत्‍येक झूठ आनंदित करता है। यह झूठ की कामयाबी की पहली शर्त है। दूसरी शर्त इसके मोहपाश में ऐसा सम्‍मोहन है कि जो इसमें एक बार उलझ गया सो बाहर नहीं निकल पाता और इसी का नशा दिमाग पर काबिज हो जाता है और देह बंधक हो जाती है। ऊंगलियां कीबोर्ड पर नर्तन करती रहती हैं। पर थकावट की कौन कहे,ऐसे ऐसे फेसबुक के नशेड़ी हैं कि चौबीसों घंटे सक्रिय रहते हैं। खाना-पीना तो साथ में चलता रहता है और जरूरी कार्य भी यदि संभव होता तो यहीं पर निपटा लिए जाते।  मोबाइल पर यह सुविधा मिलने से फेसबुक ने लगभग प्रत्‍येक मो‍बाइलधारक को अपना गुलाम बना लिया है। जरा ध्‍यान हटा तो कोई काम कर लिया वरना तो वापिस चले फेसबुक पर सवारी करने। कल्‍पनाओं के घोड़े की उड़ान भरने।
आपको अभी तक मैं फेसबुक की खामियां ही गिनाता रहा हूं और खामियां हैं भी इतनी सारी कि एक पूरा ग्रंथ ही इस पर तैयार हो सकता है। इसके कड़वे अनुभवों को लेकर एक और पुस्‍तक संपादित की जा सकती है। सिर्फ एक ही क्‍यों अनेक। फिर भी ऐसे इंसानों की कमी नहीं है जो इस पर मर्यादित रूप में विवेक के साथ सक्रिय हैं। जिन्‍होंने अपने मानस में फेसबुक की गुलामी स्‍वीकार नहीं की है। इस द्रुतगतिअश्‍व को अपने मानस की विवेकगति के द्वारा संचालित करते हैं।
जो फेसबुक से परिचित हैंवे ब्‍लॉगों और ट्विटर और अन्‍य सोशल मीडिया की भी जानकारी रखते होंगे। ऐसा मैं मानकर चल रहा हूं बल्कि सच्‍चाई यह है कि ब्‍लॉगों से बहुत सारे ब्‍लॉगरों ने कूद कूद कर फेसबुक पर अपने ठिकाने बना लिए हैं या यहां पर खूब कमाई की जा रही होती तो दुकानें सज गई होतीं। इन ठिकानों पर चाक चौबंद रहने में ब्‍लॉगरों को मजा आने लगा है। इस बार लॉगिन कर लिया तो फिर तो बस अपने विचार उंडेलते रहोविचार न हों तो दूसरे के विचारों को पसंद करते रहो। अपना विचार दिया है तो उस पर अन्‍यों की प्रतिक्रियाएं पढ़कर मुग्‍ध होते रहो। गिनते रहो कि कितनों ने उसे लाइक किया है क्‍योंकि नापसंदगी का कोई विकल्‍प ही नहीं हैनापसंदगी का कोई जोखिम नहीं है लेकिन पसंद करने वालों की संख्‍या में कैसे इजाफा करने में सब डटे रहते हैं। अपने मूल विचार न हों तो दूसरों के विचार अपने नाम से पेश करते रहो और वाह वाही लूटते रहो। कोई पुलिस नहीं हैकोई सजा नहीं है – हर ओर बस आनंद ही आनंद है। चोरों में गिनती न चाहो तो शेयर करने का विकल्‍प है।
फेसबुक के आने के बाद ब्‍लॉगिंग और ब्‍लॉगरों को खतरा हुआ था लेकिन जिन्‍हें खतरा लगा थावे सब खुद ही इस कुंए में कूद पड़े हैं लेकिन मेंढक बनने के लिए नहीं और मेंढक बनने के लिए ही। जो एक बार इसमें कूद जाता हैबहुत कठिनाई से बाहर आ पाता है। इसका आभासी जादू ही है ऐसा। जितना ब्‍लॉगिंग ने नहीं लुभायाउससे अधिक फेसबुक ने अपने जंजाल में फंसाया है। इसका प्रत्‍यक्ष प्रमाण यह है कि ब्‍लॉगिंग के बल पर आज तक शेयर बाजार में एन्‍ट्री करने की सोची तक नहीं गई है और उधर फेसबुक ने अपने शेयर बाजार में उतार दिए हैं और सब इसे लेने को लालायित हैंलेकिन कैसे हासिल करें। कम से कम आवेदन 1000 शेयर और जिनका आवेदित मूल्‍य है 18 से 20 लाख रुपये। उस पर भी मिलें न मिलें परंतु इतने लाख ही कहां से मिलेंअगर यह आंकड़ा ठीक है और मेरी स्‍मृति साथ दे रही है। यह राशि कुछ अधिक भी हो सकती है लेकिन कम नहीं।
फिर भी यह कहना चाहूंगा कि फेसबुक का सार्थक उपयोग करने वाले बहुत सारे अनुभवी मैदान में मौजूद हैं। वह इसके आने से बौरा नहीं गए हैं क्‍योंकि वे जानते हैं इस बौर का आना मीठे रसीले आमों के आगमन की सूचना नहीं है। फिर भी वे इसे सुख में बदलने में जुटे हुए हैं और रोज सफल हो रहे हैं। बिना स्‍वयं को नुकसान पहुंचाए और न ही किसी अन्‍य को हानि पहुंचा रहे हैं। यह फेसबुक ही है जिसने समान रुचि के व्‍यक्तित्‍वों को इकट्ठा किया है लेकिन जज्‍बा होना चाहिए कुछ अच्‍छा करने कातभी सफलता मिलेगी। यह वही विज्ञान है जो आग की खोज से शुरू हुआ थावही पेट्रोल हैजिसका सदुपयोग नई नई राहें खोलता है और दुरुपयोग सब कुछ स्‍वाहा कर देता है।
मैं मानता हूं कि फेसबुक समाज को विकास की ओर गति देने में खूब ताकतवर सिद्ध हो रही है। सरकारें इससे खौफज़दा हैं लेकिन इस ताकत के सिर को कुचलने को लेकर पूरी तरह सावधान रहना होगा। मेरा मानना है कि अच्‍छे अच्‍छे लोगों कामित्रों का चयन करके आगे बढ़ते जाइए फिर चाहे फेसबुक हो या हिंदी ब्‍लॉग हों या अभिव्‍यक्ति का कोई भी नया मीडिया हो,उससे जीवन सुंदर ही बनेगासार्थक रचने की अनूठी चाह विकसित होगी और इसी सोच में बुराईयों से स्‍वत: ही बचाव भी निहित है।