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जीवन में पागल खाना जरूरी है : published in Bollywood Cine Reporter 20 - 26 June 2014 on editorial page



यह  दुनिया  पागल  खाना।  खाने  के  अद्भुत व्‍यंजन  है पर  फिर  भी  सामने किसी  पागल  को  देखकर खाने  को मचलता  है  दिल। भूल जाता है इंसान कि  वह तो शाकाहारी है पर फिर भी पागल  खाने की  लाचारी  है। चारा खाएगा तब भी पागल बन जाएगा।  मन कहता है कि जो पागल  खाएगा, वह अक्‍लमंद कहलाएगा। अक्‍लमंद कहलाना अक्‍ल की मंदी नहीं, बुद्धिमानी कहलाती है, शिखर पर पहुंचाती है। पागल  खाने  में  मिलता  है  आनंद।  पर खाना हम  कम  चाहते  हैं  कि  किसी  को  भेज  दें पागल  खाने में। वह  वहां  पर  पेट  भर  भर  कर  खाए,  मजे उड़ाए  और  मांसाहारी  हो  जाए। 

भारत  वह देश  है  जहां  पर  अंडों को भी  आलू  माना जाता है,  अंडा  खाना खिलाना  शाकाहारी और  आप पागल  खा - चबा लो तब भी शाकाहारी।  यह कैसा विरोधाभास  है, मेरी समझ  में  नहीं आता है। इसलिए मैं खुद  को  और दूसरे  मुझे  पागल  मानते  हैं और मैं उनकी  इस  सोच  से  इत्‍तेफाक  रखता  हूं।  स्‍वयं को पागल  स्‍वीकारना और इत्‍तेफाक  रखना  गलत इसलिए नहीं  है क्‍योंकि इससे कई प्रख्‍यात सम्‍मान जुड़े हुए हैं। कुछ हर साल होली पर रंग के माफिक बरसते हैं।

मेरा मानना है  कि  किसी  को  पागल  बतलाना,  मानना अवश्‍य ही दूषित वृत्ति का  परिचायक  है।  यह  वृत्ति इतनी खतरनाक हो चुकी  है कि  नाम  लो  आगरा का और कानों  में  पागल  शब्‍द  गूंजने  लगता  है। ताजमहल का ताज भी पागल में तब्दील दिखाई देने लगता है।  जो  इस गूंज  को  मन  के भीतर  तक  शिद्दत से महसूस करते हैं, मालूम नहीं उन्‍हें  सचमुच में पागल माना जाए या नहीं। मांसाहारी या शाकाहारी होने से पागल होने अथवा न होने का  कोई अंर्तसंबंध  नहीं  है।  वैसे  संबंध तो  है इसे  आप लिव-इन-रिलेशनशिप मान  सकते हैं।  शिप  मतलब  पानी में तैरने वाला जहाज। 

जहाज  के  बारे में यह आम  धारणा  है कि वह हवा में  उड़ता है।  सिर्फ जहाज ही नहीं उड़ता अपने  साथ  सैंकड़ों  यात्रियों  को लेकर उड़ता है।  इन सैकड़ों में कितने तो  कौतूहलवश पहली बार जहाज में बैठ कर उड़ रहे होते हैं, कितने ही  सैकड़ों  बार उड़ चुके होते हैं और  जहाज कई हजार बार।  इसे ही संबंधों  का आपसी अटूट बंध माना जाता है। अनेक सफरियों का यह सफर अंतिम बन जाता है।  मतलब  अंत  का  आरंभ  शुरूआत से!

अब तो आसमान  में फिर  भी जहाजों का  यातायात दिखलाई  देता है पर पहले ऐसा नहीं था। बहुत  कोशिश करने  पर आसमान में  दो  चार घंटे में  एक  जहाज  उडता नजर आता  था। जब हम बच्‍चे थे तब आकाश की ओर नजरें गड़ाए ध्‍यान में मग्‍न रहते थे और शर्त लगाते थे कि इस बार पूर्व दिशा से विमान आता दिखाई देगा या पश्चिम अथवा उत्‍तर या दक्षिण से। इसका मतलब यह नहीं कि जहाज कम थे या यह आपकी नजरों का दोष है।  इसे जहाज के  यात्रियों या क्रू - मेंबर्स का रोष भी नहीं कहा जाएगा।  रोष यानी गुस्‍से में कभी चालक यानी पायलट को भी नहीं होना चाहिए। क्रोध में अ‍थवा मद्यपान करके ड्राइविंग सदा नुकसानदेह होती है। गुस्‍से के बिना  यूं तो जीवन सिर्फ संतों का होता है, पर मन में उनके गुस्‍सा उपजता है जिसे वह भीतर ही भीतर पी जाते हैं और फेस को इससे मुक्‍त दिखलाते हैं।

जीवन को जीवंत रखने  के  लिए उष्‍ण तापमान चाहिए। जिसके लिए संतुलन जरूरी है, वही कामयाबी का सूत्र है, बिना संतुलन के कुछ भी नहीं टिकाऊ नहीं है। संतुलन की कमी हो तो हम सब जमीन पर लेटे दिखाई दें। पृथ्‍वी और ग्रहों को अंतरिक्ष में टिके रहने के लिए  संतुलन वाली साधना का घनघोर महत्‍व है। यही साधना जीवन को साधती है। पर साधना नाम होने पर भी इस ओर आकर्षण कम ही होता है। इस ओर खिंचाव सदा जीवन के लिए फायदेमंद रहता है। अब फायदा मंद हो या तीव्र, नफा तो नफा ही है। सब नफे के गुलाम हैं। जीवन की एक तय मियाद है, गिनती की सांसें हैं, इन सांसों को उपयोग में लाकर समाज का कल्‍याण किया जा सकता है। पर इसके लिए अपने स्‍वार्थीपन, लालचमन से बाहर आना होगा और इसी से बाहर आने में तथाकथित इंसान को दिक्‍कत महसूस होती है और मन के इस चंचल सफर को पागलपन ही कहा जाएगा कि पागल खाने की बात मन को साधने पर आकर विराम ले रही है। यह वृत्ति रचनाकारों में पाई जाती है जिसे लेखकीय गुण कहा गया है। इसे ही कल्‍पना के साथ संजो कर रचनात्‍मकता में रचा जाता है। यह रचना सचमुच में बहुत ही अद्भुत है। तब इसे पागलखाना नहीं, विचारों की कलात्‍मक साधना माना गया है।  आप भी इसे मन के भीतर के किसी कोने में पूरी उष्‍णता से स्‍वीकार करते हैं न।

-    अविनाश वाचस्‍पति

खादी वाला सफेदपोश गुंडा : देशबंधु 1 दिसम्‍बर 2012 के संपादकीय पेज पर प्रकाशित

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देशबंधु पर घूम रहा था
मैंने देखा और अपने
प्रिय पाठकों लिए
पकड़ लाया हूं।


जयशंकर प्रसाद की कहानी ‘गुंडा’ और उसका मुख्‍य किरदार ‘नन्‍हकू’ खूब फेमस हुआ। गुंडागिरी, लंपटता, चोरी, डकैती में कमाई की भरपूर संभावनाएं रही हैं जबकि इनके विकल्‍प के तौर पर आजकल राजनीति जरायमपेशाओं के लिए काफी मुफीद हो गई है। चोरी करना वह काम है जो छिपकर और बचते बचाते और मुंह छिपाते किया जाता है किंतु जब इसे निर्लज्‍ज, बेशर्म या दबंग होकर ढीठता से अंजाम तक पहुंचाया जाए तो वही डकैती हो जाती है। चोरी और डकैती के भिन्‍न अर्थों का यह सामान्‍यीकरण है।  
समाज में गुंडई और दबंगई के नए-नए प्रयोग किए जा रहे हैं, इससे गुंडों की रुचि-संपन्‍नता का पता चलता है। नेता वही जो गुंडई करें और इन्‍हीं के कारनामों से गुंडई के निहितार्थों को पब्लिक बेहतर तरीके से जानने और समझने लग गई है। इसमें रोजाना हो रहे बदलावों से आम पब्लिक रूबरू हो रही है।
फिल्‍मों में सभी प्रकार के गुंडों का वर्चस्‍व रहा है और वे पब्लिक को भाते हैं। फिल्‍मों का सबसे मनपसंद गुंडा शोले के गब्‍बर सिंह को माना जा सकता है जिसने गुंडा-सह-डाकू के कॉम्‍बो किरदार में जीवन के अनूठे रंग भरकर विलेनत्‍व को भरपूर ऊंचाइयां दीं। कितने डाकू और विलेन आए परंतु कोई गब्‍बर की महानता को छू भी नहीं पाए। गब्‍बर‍ सिंह की ऐसी शख्सियत से प्रभावित होकर नेता भी गुंडई पर उतर आएं है तो इसमें हैरान होने की बात नहीं है, यह समय की पुकार है। नेता यूं तो सभी कारनामों पर अपना अवैध कब्‍जा कर चुके हैं परन्‍तु जिम्‍मेदारी लेने से सदा पीछे रहे हैं। कुछ कहें और शोर मच जाए तो डर कर तुरंत मुकर जाते हैं। गुंडईकर्म की पहचान आजकल नेताधर्म से होने लगी है। नेताओं के इस क्षेत्र में धाक जमाने से गुंडई में निर्भीकता का बोलबाला बढ़ गया है।
गुंडाकर्म जिसे मवालीगिरी कहा जाता है, को भरपूर प्रतिष्‍ठा मिली है। यह गर्व का सूचकांक बन गया है। इसके विरोध में चाहे मीडिया कितना ही चीखे चिल्‍लाए, पब्लिक सोशल साइटों पर कमेंट करे, लाइक करे या जमकर हल्‍ला–गुल्‍ला करे। फिल्‍मों में चोर खुद शोर मचाते रहे हैं। शशिकपूर अभिनीत फिल्‍म ‘चोर मचाए शोर’ का नाम बेसाख्‍ता आपके जहन में कौंध गया होगा। वही शोर मचाने का जिम्‍मा आजकल ‘आम आदमी’ ने संभाल लिया है।  इसी के परिणामस्‍वरूप शोर मचाने को वैधानिक मान्‍यता दिलाने के लिए ‘आम आदमी’ नामक एक दल रूपी दलदल की स्‍थापना हो चुकी है। जल्‍दी ही आप ‘शोरगुल’नामक पार्टी को चुपचाप राजनीति में घुसता देखेंगे।  
‘आम आदमी’ जब चर्चा में है तो ‘आम औरत’ क्‍यों न चर्चित होना चाहेगी। उनके मन में भी  ‘आम आदमी’ के कंधा से कंधा मिलाकर कंधा मिलाने का सुख लूटने की हसरत पलती होगी।  बस मेरी आपसे इतनी गुजारिश है कि आप लूटने को लेटना मत समझ लीजिएगा। चर्चा  गुंडई के विभिन्‍न रूपों की हो रही थीं कि लूटना से लेटना तक भटक गई जबकि विमर्श गुंडई पर केन्द्रित हो गया। दरअसल, इसके लिए दोषी व्‍यंग्‍य लेखक नहीं है। यह सब चीजें आपस में इतनी रली मिली हैं कि इनमें मिलावट होने का भ्रम होने लगता है। एक की चर्चा हो रही हो तो दूसरी भी उसमें कूद पड़ती है और मानव मन इनकी कूदन--कला से मुग्‍ध हुए बिना नहीं रहता। जो सहज अपनी गति से चल रहा है,वह परदे के पीछे छिप जाता है।
‘वर्दीवाला गुंडा’ फिल्‍म हिट हुई और इसका उपन्‍यास खूब बिका। यह गुंडों की शराफत है वरना वे बे-वर्दी वाला गुंडई कर्म निबाहने में पीछे नहीं रहते हैं, बलात्‍कार इसी को तो कहते हैं। गुंडे का क्‍या है विवस्‍त्र होकर भी कूद सकता है। वर्दी खाकी भी हो सकती है और खाली भी, सेना की भी और खादी की भी। सुर्खियों में आने के लिए एक चिकित्‍सा मंत्री ने अपना ही इलाज कर डाला, इसे कहते हैं ‘अपना इलाज बवाले जान’। मंत्री ने खुद को ‘खादीवाला सफेदपोश गुंडा’ कहकर हल्‍की सर्दी के माहौल में गजब की गरमाहट ला दी है। इससे उनकी मल्‍टीटास्किंग प्रतिभा का परिचय बखूबी मिल जाता है। खादी को प्रतिष्‍ठा और सम्‍मान दिलाने के लिए महात्मा गांधी जी चरखा काता। उसी को कुख्‍याति और अपमान का सूचक सिद्ध करने में मंत्री ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। खादी की साख को राख करने के लिए नेताओं ने सफेद खाकी में खूब कारनामे किए हैं परंतु अ‍ब खुले आम स्‍वीकार करके अपनी नेकनीयत को जाहिर  कर दिया है। देश का खूब तेजी से विकास हो रहा है इसलिए उन्‍होंने खुद को खादीवाला गुंडा कहकर परोक्ष तौर पर गांधीगिरी को दोबारा से जीवंत कर दिया है और खादी की इज्‍जत को सरेआम मिट्टी में सान करके लूट लिया है। गुंडों का खादी पहनना मुझे तो अचंभित नहीं कर रहा, कहिए कैसी रही ?

मौसम है बिग बॉसियाना : दैनिक हरिभूमि 12 अक्‍टूबर 2012 में प्रकाशित



मौसम पार्टी पार्टी हो रहा है, सुनकर यह मुगालता मत पाल लीजिएगा कि किसी फाइव या सेवन स्‍टार होटल में विदेशी शराब और मांसाहारी व्‍यंजनों की बाबत चर्चा हो रही है और इसमें शामिल होने का निमंत्रण बस मिलने ही वाला है। यह वो वाली पार्टी नहीं है। इस पार्टी का कनैक्‍शन सरकार से है, बिजली से चाहे न हो किंतु करेंट से जरूर है। यह जरूरी भी है बिना करेंट के मौसम कैसा भी हो, गर्मियों के आसपास उमस हो ही जाती है। इस बार यह उमस सत्‍ता पक्ष के लिए है। इस उमस में 2 जी से लेकर दमदार दामाद जी तक दमदमा रहे हैं। कह सकते हैं कि राजनीति में दमादम मस्‍त कलंदर के जमाने बीतते महसूस हो रहे हैं जबकि ऐसा बिल्‍कुल नहीं है। ताकतों की कटाई यूं ही नहीं हो जाती है, काफी अरसे तक कताई बुनाई का सिलसिला चलता रहता है,सो चल रहा है।
पक्ष और विपक्ष के जानवर और पक्षी सक्रिय हैं। विपक्ष भी भिन्‍न भिन्‍न प्रकार के पक्षियों से भरा है और पक्ष में पक्षियों के अतिरिक्‍त जानवर भी सक्रिय हैं। जानवर सिर्फ पशुबल से ही ओत प्रोत नहीं हैं अपितु धनबल पाकर धन्‍य धन्‍य हो रहे हैं। मंदिर और टॉयलेट खूब विवादों में हैं। प्राकृतिक आपदाओं से डटकर मुकाबला किया जा रहा है। पहले मंदिरों की मायावी दुनिया पर खूब विमर्श होता रहा है। कभी मस्जिद के साथ, कभी इंसानों के साथ। पिछले दिनों एक बदलाव आया है। जबसे योजना आयोग ने लाखों के टॉयलेट्स बनवाए हैं, तभी से टॉयलेट्स उपेक्षा नहीं, अपेक्षा से भर उठे हैं। उनके प्रति उपेक्षा अब अपेक्षा में बदल चुकी है। खर्च हो रहे हैं और करोड़ों मिल रहे हैं। इसका जिक्र तक नहीं किया जाता था किंतु अब इनके जिक्र के बिना मंदिरों में घंटियां तक नहीं बज रही हैं।
मौसम बिग बॉस का भी नगाड़े बजा रहा है। एंटरटेनमेंट मिंट के सुखद अहसास से भर गया लगता है। सिद्धू को उनके अपने बाहर से ही डांट-फटकारने में मशगूल हैं। जानते हैं कि वे जहां पर हैं, वहां पर इनकी धुन नहीं पहुंच रही है किंतु ये भुनभुना रहे हैं। कसमसा रहे हैं। मसमसा रहे हैं। इनको जप ही भाता है, सो जप रहे हैं, जपा रहे हैं। सलमान इतने पसंद किए जा रहे हैं, सक्रिय नजर आ रहे हैं।  इनकी बजाय अगर खूबसूरत सलमा भी मैदान में उतर आएं तब भी इतनी ख्‍याति हासिल न कर सकें। आजकल बलमा शक्तिपुंज हैं, सलमा प्रेमपुंज शुरू से ही रही हैं। सलमा और बलमा या बलमा और सलमा – गुड़ खा रहे हैं, गुलगुलों का स्‍वाद भी ले रहे हैं। जो प्राण पहले सलमा पर निछावर किए जाते रहे हैं अब यह जान की बाजी, दामादजी के लिए लगा दी गई है। कितने ही आतुर हैं – लगता है जग से भय का नामोनिशान मिट चुका है। 50 लाख से 300 करोड़ बनाने का गोपनीय धंधा ओपनीय हो चुका है। इसके फार्मूले की तलाश में सब जुट गए हैं। यह जुटान ही दरअसल लुटान है। सब लूटने को ठाने बैठे हैं। आम पब्लिक के भाग्‍य में तो लुटना ही लिख दिया गया है, भाग्‍य से भागने में ही भलाई है।
बात पार्टी की हो रही थी। पार्टी पर होने वाले खर्चे की हो रही थी। परंतु तकनीक इतनी तेज हो गई है कि पार्टी टिकटें बेचकर कमाई कर रही हैं। सोच रहा हूं कि एक पार्टी मैं भी बना लूं, चुनाव न लडूं, चुनाव के लिए टिकट बेचकर ही नोट कमा लूं। टिकटें खरीदने वाले खूब सारे नोट लेकर तैयार रहते हैं, वो नोट मैं समेट लूं वैसे भी मुझे सत्‍ता में आने पर ताकत नहीं नोट बटोरने का ही शौक है। नोट आने के बाद खुदबखुद मैं ताकतवर हो ही जाऊंगा। धनोबल अब मनोबल में खूब इजाफा करता है। इसे सब पहचानने लग गए हैं। आप तो इससे अपरिचित नहीं हैं न ?


अन्‍ना का मिशन इलेक्‍शन : नवभारत दैनिक 9 अगस्‍त 2012 में प्रकाशित


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राजनीति गन्‍ना है, गंडेरी नहीं, अन्‍ना जी गौर कीजिएगा कि गंडेरी सीधे दांतों में कुचलकर उसके रस का आनंद लिया जाता है। जबकि गन्‍ने के सख्‍त छिलके को पहले छीलना पड़ता है। गन्‍ने को यूं ही उठाकर डण्‍डे के माफिक भी मारा जा सकता है। इसमें खाने वाले को (चबाने वाले को नहीं) चोट लगेगी, मारने में गन्‍ना टूटने पर भी उपयोगिता कम नहीं होती। उसी तरह राजनीति में संभावनाएं सदा जिंदा रहती हैं।
आप चाहे पक्ष के पक्षी हों या विपक्ष के पशु, राजनीति की नीतियां सबका भला करती हैं। लाभ लेने का सबसे सरल तरीका भ्रष्‍टाचार, जिसे देश में रोजाना त्‍यौहार की तरह मनाया जाता है। नेताओं को ऐसे मौके तोहफे में प्रदान किए जाते हैं, जिससे वे घपले और घोटालों को अंजाम देते हैं।
अन्‍ना पहले भ्रष्‍टाचार के पीछे बिना भूख प्‍यास की चिंता किए दौड़े जा रहे थे, उन्‍हें घोड़े की तरह राजनीति के पीछे पेट भर के दौड़ने की चुनौती दी गई है। अन्‍ना को बोध हुआ कि जिसका खात्‍मा करना हो, उसे नज़दीक से जानना बहुत जरूरी होता है। रावण को जानने-मारने के लिए राम ने विभीषण का सहारा लिया।
अब देखना यह महत्‍वपूर्ण है कि अन्‍ना राजनीति में कौन से मीठे गुल खिलवाते हैं,लोकपाल को लागू करवाते हैं या पहले की तरह ही लोक को पागल बनना होगा। पागल बनकर पब्लिक जंतर मंतर पर इकट्ठा होना छोड़ देगी। अन्‍ना में राजनीति या राजनीति में अन्‍ना – यह तराना बहुतों को लुभा रहा है।  मलाई-राबड़ी चाटने के सपने दिखलाई दे रहे हैं।
अन्‍ना पर फूंका गया मंतर मिशन इलेक्‍शन है। इस मंतर के प्रभाव से कई मंत्री बनेंगे, कितने ही संतरियों के दिन फिरेंगे। गन्‍ने के मजबूत छिलके छीलने के बाद ही, संतरों के मुलायम छिलकों को छीलने के अवसर मिलते हैं। बादाम के दाम यूं ही नहीं बढ़ते हैं। छिलके वाले साबुत बादाम के दाम सबसे कम, छिलके रहित बादाम के दाम अधिक और बादामगिरी के दाम आसमान छूते हैं। राजनीति बादामगिरी है। मालूम नहीं क्‍यों फिल्‍म 'रोटी' का यह लोकप्रिय गीत राजनीति में ऐसे गठबंधनों की पोल खोलता दिखाई देता है। गीत के बोल हैं - ‘ये जो पब्लिक है सब जानती है, भीतर क्‍या है बाहर क्‍या है, यह सब पहचानती है’। अगर पब्लिक सब जानती होती तो नेताओं की बादामगिरी की अहमियत पर सवाल न उठाती ? पाठकों, आप तो बादामगिरी के सफर को पहचान चुके हैं न। जो प्‍याजगिरी तक पहुंच रहा है क्‍योंकि इसके छिलके उतरते जा रहे हैं।

पब्लिक उम्‍मीद से है : डीएलए 2 अगस्‍त 2012 में प्रकाशित



पीएम मौन हैं। बाकी सब चिल्‍ला रहे हैं। जब सब चिल्‍ला रहे हों तो एक का तो मौन रहना बनता है। जब कोई किसी की नहीं सुन रहा है और जो चिल्‍ल-पों मच रही है, उसकी चमक निहारने वाला भी कोई महत्‍वूर्ण शख्‍स होना चाहिए। वह पीएम के सिवाय और कौन हो सकता है। महामहिम शपथ लेने वाले हैं। पर अभी से यह कहना कि वे बहुत बातूनी है, उनकी प्रवृत्ति के साथ अन्‍याय होगा। हो सकता है कि वे पहले बातूनी रहे हों परंतु राष्‍ट्रपति पद संभालने के साथ ही उनकी बोलती बंद हो जाए। वे भी सबकी चिल्‍ल-पों सिर्फ सुनें ही, खुद चिल्‍लाने का जोखिम न लें। जोखिम मोल लेना इसलिए नहीं कहा जा सकता है क्‍योंकि वे महामहिम हैं इसलिए उन्‍हें मोल लेने की कोनो जरूरत नाही।
जैसे एक लंबे जमाने से चुप्‍पी साधे पीएम ने अपना मौन तोड़ दिया है और उन्‍होंने महंगाई के लिए मानसून को जिम्‍मेदार ठहरा दिया है। इस बात में आश्‍चर्य की बात यह है कि इस देश में जांच होती है और जांच ही होती रहती है। उसके परिणाम नहीं आते। फिर बिना जांच के मानसून को जिम्‍मेदार ठहराना चल रही नीतियों के अनुसार न्‍यायसंगत नहीं लगता। यह भी हो सकता है कि पब्लिक की चीख-पुकार सुनने के बाद पीएम की बोलती खुल गई हो और वे मानसून को इस कदर डांट बैठे हैं। जबकि आम जिंदगी में पब्लिक को जिससे काम हो उससे पंगा लेना उचित नहीं है। न जाने वह कितना बिफर जाए कि समेटने में न आए और न मनाने से माने ही। वह पीएम की डांट को भी अमान्‍य कर सकता है।
मानसून यह भी सोच सकता है कि जिस पीएम को कभी बोलते न सुना, वह कैसे उसे डांट सकते हैं और उनकी डांट पर इस गलतफहमी के कारण तवज्‍जो ही न दी जाए। बादलों के पास पानी से भरे हुए मटके तैयार हों किंतु इन्‍द्रदेव ‘एक्‍शन’ न कहें और उन मटकों का जल सूर्य के भीषण ताप के कारण भाप बनकर ऐसा उड़े कि पृथ्‍वी पर न आए और पूरा ऊपर के ऊपर ही जल जाए। अब यह जल अगर पानी वाला होता तो खूब बरसता। बरसता नहीं तो रिसता। पर जमीन पर तो एक बूंद तक नहीं टपकी। अगर टपक जाती तो पीएम सोचते कि उनकी डांट के कारण वह टसुए बहा रहा है।
इन्‍द्रदेव अब न मान रहा है और न सुन रहा है। ऐसा लगता है कि वह अब खुद को पीएम समझने लग गया है। पब्लिक सूखे से सूखती रहे लेकिन उसकी आंखों में तनिक सा पानी न दिखाई दे। कहना ही होगा कि जो न माने और न सुने, वही है मानसून। कितनी ही गुहार लगाई जा रही है पर इन्‍द्रदेव न मान रहा है और न सुन रहा है। यह भी हो सकता है कि वह यह सोच रहा हो कि अगर मैं बरसूंगा तब भी पब्लिक सड़कों पर पानी भरने, गड्ढों के गायब होने, नाले और नालियों में पानी ठहरने से वाहनों के नीचे के आधे हिस्‍से के न दिखाई देने के कारण दुखी होगी, इसलिए उसे तरस आ गया हो। अब इस तरस का रस पब्लिक को तो पसंद नहीं है। पीएम ने मानसून की डांट लगाकर बतला दिया है कि उन्‍हें भी यह रस पसंद नहीं है। जब सबको मिलावट ही पसंद है इसलिए मानसून पीएम की डांट रूपी सलाह पर विचार कर रहा है और अब बरसने ही वाला है।
इस बरसात में जो मतवाला होना चाहता है, वह मतवाला हो ले। महंगी सब्‍जी बेचने का मौका पाने वाले भी मना रहे हैं कि बारिश दो चार दिन और न हो तो वे भी अपनी पॉकेटों को माल से फुल कर लें, यह माल चाहे लूट का ही है पर इसे कोई लूट का इसलिए नहीं मानता क्‍योंकि बरसात के न होने वाले बदअसर को हर कोई है स्‍वीकारता। वैसे पब्लिक खुश है कि पीएम ने न बोलने के रिकार्ड को तोड़ा है तो अवश्‍य ही अब वे और कुछ भी बोलेंगे और अब लग रहा है कि पब्लिक ‘उम्‍मीद’ से है।

मिल गए भगवान : रविवासरीय जनसत्‍ता 29 जुलाई 2012 में प्रकाशित


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सृष्टि पर कण कण में भगवान की मौजूदगी है। फिर भी इंसान सिर्फ एक कण खोज कर ही बावला हुआ जा रहा है। कण जिसके गुण संभावित हैं, अभी साबित नहीं हुए हैं। साबित तो तब होंगे, जब परख लिए जाएंगे। पर इंसान की खुशी का पारावार नहीं है। हतप्रभ है, विस्मित है, उसे अपनी इस एक कण की खोज पर भरोसा नहीं हो रहा है। इसे वह नायाब मान चुका है। उसका कहना है कि उसने भगवान को पहचान लिया है बल्कि यूं कह सकते हैं कि वह भगवान से गले मिलने का सुख लूट चुका है। यह वही सुख है जो ‘मुन्‍नाभाई एमबीबीएस’ में संजय दत्‍त जफ्फी पाकर और देकर बेरहमी से लूटता रहा है। इसे देखकर ही उस समय दीवानों की खुशी की सीमा नहीं रही थी। तब रेखा भी संसद में नहीं पहुंची थी न सचिन ने संसद में कब्‍जा जमाया था।

उलझन में हैं आम आदमी। उसे सब मिलकर उलझाते ही रहते हैं। नेता क्‍या कम पड़ रहे थे जो अब वैज्ञानिकों ने भी उलझाना शुरू कर दिया है। सोच रहा है कि यह कैसी कविता है जो सृष्टि के जन्‍म की कथा बतला रही है। चिंतित है कि आम आदमी पर सब अपने-अपने डोरे डालने को आतुर हैं। आम आदमी सब जान जाए, चाहे जान से ही चला जाए। पर आम आदमी को पूरी जानकारी से लबालब होना चाहिए। चाहे पीने को बूंद भर पानी न मिले।

अब गॉड पार्टिकल की खोज कर ली है वैज्ञानिकों ने। मतलब कण कण में है भगवान। अब अगर भगवान हर कण में मौजूद है तो आम आदमी क्‍या करे, क्‍या अब आम आदमी को सस्‍ती बिजली, स्‍वच्‍छ पानी, साफ हवा के लिए चिंतित नहीं होना होगा। आम आदमी को सब चिता पर लिटाने को आतुर हैं और वह सोच रहा है कि क्‍या भगवान के एक कण की खोज करने से उसकी बिजली, पानी और हवा की समस्‍या जड़ से खत्‍म हो जाएगी।

गॉड पार्टिकल का रहस्‍य जानने के बाद नेता ईमानदार हो जाएंगे, घोटाले-घपलेबाज सुधर जाएंगे और क्‍या सचमुच में ऐसा सतयुग आएगा जिससे सबके अंतर्मन में राम राज्‍य की स्‍थापना हो जाएगी। अगर ऐसा नहीं होना है तो कण मिले या मिले पूरा भगवान – आम पब्लिक को क्‍या लेना-देना है। शैतान भी मिलेगा तो वह भी चलेगा। आम आदमी को गॉड पार्टिकल मिलने से कोई असर नहीं पड़ता है। गरीब आदमी क्‍या इस दिव्‍य पार्टिकल के मिलने से 28 रुपये में संतोषी जीवन जी सकेगा।

क्‍या सब्जियां सस्‍तीं, दालें पौष्टिक, फल बिना डायरेक्‍ट पेड़ से, मसाले बिना मिलावट के, अराजकता की समाप्ति बेईमानी दुर्लभ हो जाएगी। फिर तो गॉड पार्टिकल रूपी नायाब आर्टिकल मिलने की खुशी, मुझे सबसे पहले है। परंतु आम आदमी जानता है कि गॉड पार्टिकल खोजना कितना आसान – किंतु समस्‍याओं से निजात पाना दीगर बात है। भला आम आदमी क्‍या वैज्ञानिक भी नहीं सकते ऐसी करामात। फिर काहे की उपलब्धि और किसलिए निकालें खुशियों की बारात। सफलता पाने पर उल्‍लास मचा रहे हैं, मानो कण नहीं पूरा भगवान का पहाड़ पा लिया हो। जहां पर तैंतीस करोड़ देवी देवता मौजूद हैं। जहां आम आदमी समस्‍याओं के हलाहल रूपी कोलाहल में धंसा-फंसा हुआ हो और इनसे बचने का कोई रास्‍ता, कोई वैज्ञानिक नहीं खोज पा रहे हैं।

आम आदमी का सफर चिंतन से शुरू होकर चिंता तक पहुंचने के लिए अभिशप्‍त है और खास आदमी की यात्रा, बिना किसी रुकावट की मात्रा के चिंतन से चिंतन पर स्‍थाई तौर पर जमा रहता है, उनके चिंतन से उपजे स्‍वर आम आदमी की चिता तक पहुंचने का रास्‍ता सरल बनाते हैं बल्कि चिता तक पहंचाने में खासा असरकारी रोल निबाहते हैं।

ब्रह्मांड की उत्‍पत्ति का रहस्‍य खोजने पर इंसान के लालच की गुत्‍थी कभी खोल पाओगे कि खूब धन और सुविधाधारक के पास इन्‍हें और ... और पाने की लालसा क्‍यों  बलवती बनी रहती है। इंसान पर लालच का जहर क्‍यों पल पल चढ़ता जाता है, महंगाई के मानिंद क्‍यों बढ़ता जाता है। फिर भी संतोष होता है यह जानकर कि विज्ञान के इस ज्ञान से लाईलाज असाध्‍य बीमारियों की चिकित्‍सा भी संभव हो पाएगी। तब तो मुझे लगता है यह बहुत सलोना है। दुख गायब होगा, सुख का साम्राज्‍य फैलेगा – ऐसा होना भी मुझे रोमांचित करता है। जब सिर्फ ईश्‍वर का सिर्फ एक कण खोजकर ही मानव इतना प्रफुल्लित है तो पूरे ईश्‍वर को जिस दिन अपने सामने खड़ा कर पाने में सफल होगा, तब तो खुशी से बौरा ही जाएगा, कुछ तो इतनी खुशी झेल नहीं पाएंगे और मर जाएंगे। लेकिन क्‍या मानव मरने में सहायक खुशी पाने का रोमांच अनुभव कर पाएगा।
एक कण ही तो मिला है और वह भी मिला है कि नहीं। क्‍या मिलने पर उसने बतलाया है कि ‘मैं वही गॉड पार्टिकल हूं पृथ्‍वीवासियों, जिसे तुम पूरी शिद्दत से खोज रहे हो।‘ विज्ञान की खोज में तो ऐसी तस्‍दीक जरूरी है जबकि दुनिया खुशी से बावली हुई जा रही है। इससे अधिक खुशी तो पानी की बूंद की एक झलक पाने भर से हो जाती है। वह भी तो आम पब्लिक के लिए गॉड पार्टिकल ही है। फिर क्‍यों दीवाने मानव, दीवानों की तरह मस्‍ती में चहक रहे हैं। इंसान अब भगवान बनने की ओर बढ़ रहा है। आपको क्‍या लगता है कि यह एक एक सीढ़ी चढ़ रहा है या रॉकेट की तरह तीव्र गति से विकास की लिफ्ट में यात्रा कर रहा है।

पेट्रोल की प्रेम पाती : डीएलए 28 मई 2012 में प्रकाशित


पेट्रोल की प्रगति देखकर सब दुखी हैं। यह नहीं देखते कि कितना उपयोगी है, उपयोगी है इसीलिए तो रेट बढ़ रहे हैं। पानी के क्‍या कम बढ़े हैं, पहले प्‍याऊ वगैरह में फ्री में इफरात में मिलता रहा है। अब बोतलों में हाजिर है। कितना जोखिम लेकर जी रहा हूं, तनिक सी चिंगारी स्‍वाह कर देती है मुझे। कोई आह भी नहीं कर पाता और स्‍वाहा हो जाता है। गर्मियों में तनिक सी गर्मी में ये दिमाग पर चढ़ गई तो क्‍या हो गया। पेट्रोल से जब इतना प्‍यार करते हो तो उसकी कीमतें बढ़ने को भीसहो। जिसे प्‍यार किया जाता है उसकी जायज मांगों के साथ, नाजायज मांगों को भी तो खुशी खुशी स्‍वीकारा जाता है। अभी तो साढ़े सात ही बढ़ाया है, एक सौ रुपये तो नहीं पहुंचाया है। पेट्रोल की प्‍यार कथा जारी है। खूब तन्‍मय होकर सुना रहा है।
क्‍या यह सही लगता कि रेट तो वही रहता और लीटर में मिलीलीटर घटाकर 300 कर दिए जाते। उसमें तो तुम्‍हारा ही नुकसान होता। देश की प्रगति का बढ़ता आंकड़ा ही नहीं दिखाई देता। फिर चिल्‍लाते कि नाप तोल कम कर दी है। हल्‍ला मचाते कि मिलीलीटर उतने ही रहने देते। महंगा चाहे बीस रुपये कर लेते। अब साढ़े सात रुपये बढ़ाये हैं, तो नानी याद आ रही है। नानी जब कहानियां सुनाती थीं तो कितना खुश होते थे। पेट्रोल के बहाने नानी और नानी के बहाने कहानी की याद। कितना दिल खुश होता है। जब याद आता है कि एक था राजा, एक थी रानी, दोनों मर गए, खत्‍म कहानी।
लो सुनो, नई कहानी - एक था पेट्रोल, एक था मिट्टी का तेल, एक डीजल भी है जिसमें जल नहीं है – तीनों के बढ़ गए हैं रेट, जाओ खोल दो खुशी के गेट। इसमें रोने की क्‍या बात है। नानी की याद आने वाली है। नानी जो कहानी सुनाती थी। जगते थे तो सुनते सुनते सो जाते थे। रोते थे तो सुनते सुनते सो जाते थे। हंसते थे तो सुनते सुनते हंसते ही रहते थे। नानी की याद कराना कोई हंसी खेल है। इतनी मुश्किलों से तो याद दिला रहेहैं। अभी एक पेट्रोल पम्‍प का ठेका मिल जाए,या मिट्टी के तेल का डिपो – फिर तो चाहोगे कि सरकार रोज ही रेट बढ़ाए या तुम्‍हें बढ़ाने दे। फिर नहीं चिल्‍लाओगे, पूरे मोहल्‍ले भर को मिठाई खिलाओगे। नुक्‍कड़ पर नाचोगे। पल पल पर पेट्रोल,घासलेट के बढ़ते रेटों को बांचोगे। समझ लो पेट्रोल पंप के मालिक हो गए हो। फिर क्‍या गम है,सबमें तुमसे और तुम्‍हारे में सबका दम है। जिस देश में रहते हो उसका ही विकास नहीं देख सकते। डीडीए के फ्लैटों के लिए आवेदन मांगे गए तो कितने सारे भर दिए,तब तो कोई नहीं चिल्‍लाया कि इतने पैसे क्‍यों मांग रहे हो, इतने रेट क्‍यों बढ़ा रहे हो और यहां पर 7.50 रुपये बढ़ने पर पैंट ढीली और गीली दोनों हो गई हैं। 

पेट्रोल की प्रेम पाती : दैनिक हरिभूमि 26 मई 2012 में प्रकाशित


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पेट्रोल की प्रगति देखकर सब दुखी हैं। यह नहीं देखते कि कितना उपयोगी है, उपयोगी है इसीलिए तो रेट बढ़ रहे हैं। पानी के क्‍या कम बढ़े हैं, पहले प्‍याऊ वगैरह में फ्री में इफरात में मिलता रहा है। अब बोतलों में हाजिर है। कितना जोखिम लेकर जी रहा हूं, तनिक सी चिंगारी स्‍वाह कर देती है मुझे। कोई आह भी नहीं कर पाता और स्‍वाहा हो जाता है। गर्मियों में तनिक सी गर्मी में ये दिमाग पर चढ़ गई तो क्‍या हो गया। पेट्रोल से जब इतना प्‍यार करते हो तो उसकी कीमतें बढ़ने को भी सहो। जिसे प्‍यार किया जाता है उसकी जायज मांगों के साथ, नाजायज मांगों को भी तो खुशी खुशी स्‍वीकारा जाता है। अभी तो साढ़े सात ही बढ़ाया है, एक सौ रुपये तो नहीं पहुंचाया है। पेट्रोल की प्‍यार कथा जारी है। खूब तन्‍मय होकर सुना रहा है।
क्‍या यह सही लगता कि रेट तो वही रहता और लीटर में मिलीलीटर घटाकर 300 कर दिए जाते। उसमें तो तुम्‍हारा ही नुकसान होता। देश की प्रगति का बढ़ता आंकड़ा ही नहीं दिखाई देता। फिर चिल्‍लाते कि नाप तोल कम कर दी है। हल्‍ला मचाते कि मिलीलीटर उतने ही रहने देते। महंगा चाहे बीस रुपये कर लेते। अब साढ़े सात रुपये बढ़ाये हैं, तो नानी याद आ रही है। नानी जब कहानियां सुनाती थीं तो कितना खुश होते थे। पेट्रोल के बहाने नानी और नानी के बहाने कहानी की याद। कितना दिल खुश होता है। जब याद आता है कि एक था राजा, एक थी रानी, दोनों मर गए, खत्‍म कहानी।
लो सुनो, नई कहानी - एक था पेट्रोल, एक था मिट्टी का तेल, एक डीजल भी है जिसमें जल नहीं है – तीनों के बढ़ गए हैं रेट, जाओ खोल दो खुशी के गेट। इसमें रोने की क्‍या बात है। नानी की याद आने वाली है। नानी जो कहानी सुनाती थी। जगते थे तो सुनते सुनते सो जाते थे। रोते थे तो सुनते सुनते सो जाते थे। हंसते थे तो सुनते सुनते हंसते ही रहते थे। नानी की याद कराना कोई हंसी खेल है। इतनी मुश्किलों से तो याद दिला रहे हैं। अभी एक पेट्रोल पम्‍प का ठेका मिल जाए,या मिट्टी के तेल का डिपो – फिर तो चाहोगे कि सरकार रोज ही रेट बढ़ाए या तुम्‍हें बढ़ाने दे। फिर नहीं चिल्‍लाओगे, पूरे मोहल्‍ले भर को मिठाई खिलाओगे। नुक्‍कड़ पर नाचोगे। पल पल पर पेट्रोल,घासलेट के बढ़ते रेटों को बांचोगे। समझ लो पेट्रोल पंप के मालिक हो गए हो। फिर क्‍या गम है,सबमें तुमसे और तुम्‍हारे में सबका दम है। जिस देश में रहते हो उसका ही विकास नहीं देख सकते। डीडीए के फ्लैटों के लिए आवेदन मांगे गए तो कितने सारे भर दिए,तब तो कोई नहीं चिल्‍लाया कि इतने पैसे क्‍यों मांग रहे हो, इतने रेट क्‍यों बढ़ा रहे हो और यहां पर 5 रुपये बढ़ने पर पैंट ढीली और गीली दोनों हो गई हैं। 

सभी सांसद चोर उचक्‍के नहीं हैं : हरिभूमि 10 मई 2012 अंक में प्रकाशित


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सभी सांसद चोर उचक्‍के नहीं हैं और मैंने सबको चोर उचक्‍का  कहा भी नहीं है। मीडिया ने हंगामा मचा दिया जिससे सारे सांसद नाराज हो गए। वैसे भी यह तो साफ जाहिर है कि जब सारे बलात्‍कारी नहीं हो सकते तो सारे चोर उचक्‍के कैसे हो सकते हैं। उसी प्रकार सारे बाबा किरपा नहीं बरसाते। कुछ की किरपा तो सदा खुद पर ही बरसती रहती है। देखने वाला सोचता रहता है कि किरपा उस पर बरस रही है जबकि बरस व लौटकर बरसाने वाले पर ही रही होती है। इसी प्रकार सारे साधु, स्‍वादु नहीं कहे जा सकते, एक प्रकार से कहा भी जा सकता है क्‍योंकि सभी साधुओं को चरस, गांजे, भंग में स्‍वाद नहीं आता है जबकि कुछ तो इनके बिना स्‍वाद नहीं आता है। जिनको इनमें स्‍वाद नहीं आता है वह आपको गुटका, पान, तंबाकू, बीड़ी, सिगरेट का सेवन करने देखे जा सकते हैं। ऐसा भी नहीं है कि साधु हैं तो दारू का स्‍वाद नहीं लेंगे। आखिर आनंद की प्राप्ति के लिए साधु चोला धारण किया है और उस चोले में भी मजा नहीं पाया तो किस बात के साधु मतलब स्‍वादु। कितने ही साधुओं को तो भीख मांगने में असीम आनंद आता है। अब अगर उनकी पोल खोली जा रही है तो किसी सांसद को एतराज नहीं है। सांसदों की सच्‍चाई के बारे में जब भी जनता को बतलाने की कोशिश की जाती है तो वह ऐसे हाय तौबा मचाने लगते हैं, मानो दूध पीते बच्‍चे हों और उनके दूध के दांत अभी टूटे नहीं हों। जबकि उनके दूध तो दांत छोडि़ए, चाय के दांत भी नहीं बचे हैं और अब उनके सभी दांत दारू के दांत बनकर आवाम के सामने बहुत ही दुर्गंधयुक्‍त बेशर्मी से खिलखिला रहे हैं। इस पर किसी को तनिक भी एतराज नहीं है।
फिर सभी सांसदों की गारंटी क्‍यों ली जा रही है, एक को कुछ कहा जाता है, तो मोहल्‍ले के कुत्‍तों के माफिक सब समवेत स्‍वर में गीत गाना शुरू कर देते हैं, बिना यह जाने कि इस प्रकार के गीतों की असलियत से अब जनता पूरी तरह वाकिफ हो चुकी है।
मैं मानता हूं कि मेरे से भूल हो गई है लेकिन अगली दफा मैं इस प्रकार की गलती नहीं करूंगा। मैं भी कोई भगवान तो हूं नहीं, हूं तो आपकी तरह इंसान ही, इंसान से गुरु ही तो बन रहा हूं, गुरुघंटाल तो नहीं बनना चाह रहा हूं। भविष्‍य में सांसदों को चोर-उच्‍क्‍का नहीं कहूंगा बल्कि यह बयान दूंगा कि सभी सांसद चोर उचक्‍के नहीं हैं, तब तो आपमें से किसी को कोई आपत्ति नहीं होगी न।
अब तो ऐसा महसूस होने लगा है कि हम साधुओं को भी नेताई गुणों का विकास करना होगा। वरना शातिर नेता हमें कहां सामान्‍य वस्‍त्रों में जीने देंगे और हमें बार बार इनसे बचकर लेडीज सूट, साड़ी, सलवार, जींस, टॉप इत्‍यादि पहनकर ही अपनी जान बचानी होगी। वैसे भी मीडिया तो चाहता है कि हम वस्‍त्रविहीन हो जाएं और वह सारी दुनिया को दिखलाकर कमाई करता रहे। क्‍या अब भी सांसदों को मेरे से कोई शिकायत है, मैं अपनी गलती मानते हुए फिर से कह रहा हूं कि कि सभी सांसद चोर-उचक्‍के नहीं हैं ?

प्‍यार की पुंगी बजाते चलो : दैनिक हरिभूमि में 25 अप्रैल 2012 अंक में प्रकाशित

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घास चिल्‍ला चिल्‍लाकर कह रही है लेकिन कोई गधा नहीं सुन रहा है। सब घास खाने में तल्‍लीन हैं। गधे का स्‍वभाव है कि जो मिल जाए, खाए जाओ और घास हरी हो या लाल। लाल चाहे बापू का खून हो लेकिन गधा भी तो धोबी का लाल है। लाल वही जो कमाई करके दे, गधा खूब लाद कर ले जाता है और कमाई होती है। कमाई को लादने की जरूरत नहीं होती क्‍योंकि वह तो धोबी की जेब में समा जाती है। धोबी गधे पर लादे कपड़ों की भरपूर धुलाई करता है, उन्‍हें चमकदार बनाता है लेकिन गधे को एक दिन भी नहीं नहलाता। कहता है कि वह तो कपड़ों को भी कूट पीट कर चमकाता है। अगर गधे को चमकदार बनाने की कोशिश की और वो कुछ ज्‍यादा ही चमक गया तो जरूर किसी चिकनी चमेली गधी के पीछे हो लेगा, और उसकी कमाई को दुलत्‍ती लग जाएगी। यह प्‍यार की पुंगी बजना है, बजाते चलो। बाबा बजा रहे हैं, नीलामी करने वाले बजा रहे हैं तो व्‍यंग्‍यकार और अखबार वाले भी इस दौड़ में पीछे क्‍यों रह जाएं।
गधे की इस दुलत्‍ती से बचने के लिए धोबी का तर्क मौजूं लगता है लेकिन चिकना बनाने के चक्‍कर में ज्‍यादा कूट पीट दिया या निचोड़ पटक दिया तो उसके खून से भी घास लाल हो जाएगी। इससे भी बचने के लिए वह गधे को नहलाने से बचता रहा है। वैसे भी गधा नहाए या बिना नहाया रहे, कमाई तो उतनी ही करेगा। दुलत्‍ती भी उतनी ही मारेगा और ढेंचू ढेंचू में भी उसकी कोई फर्क नहीं आएगा। जितना समय गधे को नहलाने में बरबाद होगा उतने में तो और पचास जोड़ी कपड़े धो पटक लेगा और अपनी कमाई में इजाफा करेगा।
मामला बापू के खून से सनी घास की नीलामी का है और मैं भटक या अटक गया हूं धोबी और गधे पर। धोबी की कमाई पर क्‍योंकि कमाई की जो महत्‍ता है, वह सर्वोपरि है। कमाई का मामला हो तो भटकना स्‍वाभाविक है। आजकल बाबा किरपा कर रहे हैं लेकिन असल मामला नोटों का है। नोट में लोटने के लिए बाबा बनना सबसे अच्‍छा बिजनेस है। चाहे कोई बाबा कहे या गधा कहे, गधा मिट्टी में लोटेगा और बाबा नोटों में, धोबी घाट पर लेकिन घाट के पत्‍थर पर लोटना उसकी नियति है, गधा इसलिए धूल में लोट कर खुश हो लेता है। पत्‍थर की प्रकृति सख्‍त होना है। वह मुलायम नहीं हो सकता, उससे भगवान बना दो या इंसान की मूर्ति लेकिन सख्‍ती उसमें से गायब नहीं हो सकती है। वही सख्‍ती माया या उसके हाथियों की मूर्तियों में से गायब होने की भनक पाकर, माया हनक में लौट आई है। यह किसने कहा है कि जो हार जाता है, वह हनक नहीं रखता। हारने के बाद क्‍योंकि अब उसकी निगाहें केन्‍द्र पर हैं जो जरूर तो सत्‍तरवें आसमान पर ही होगा, क्‍या आपको इसमें कोई शक है ?

खूनी घास का बिजनेस : डेली न्‍यूज एक्टिविस्‍ट के चकल्‍लस स्‍तंभ में 21 अप्रैल 2012 के अंक में प्रकाशित


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बोली घास की नहीं बापू के खून की हुई है। खरीदने वाले गधे थोड़े ही हैं जो घास के लालच में इतने नोट खर्च कर देंगे। उस घास में बापू का खून है, खून लाल ही रहा होगा लेकिन इतना लाल भी नहीं कि बापू के असर से घास का रंग बदल कर लाल हो गया हो और खरीदने वाले लाल रंग की घास उपजाने के लिए बोली लगा बैठे हैं। तब खून करने की कीमत थी, आज खूनी घास की कीमत है। खूनी घास कहने से घास को हत्‍यारा मत समझ लीजिए। हत्‍यारे तो वह भी नहीं हैं जिन्‍होंने बोली लगाई है। वह घास को बोली लगाकर इसलिए खरीद रहे हैं ताकि भावनाओं से खिलंदड़पना करने का जालिम अहसास किया जा सके। आप इसे प्‍यार की पुंगी बजाना समझ सकते हैं जबकि यह भावनाओं की पुंगी बजाई जा रही है।
घास चिल्‍ला चिल्‍लाकर यही कह रही है लेकिन कोई गधा नहीं सुन रहा है, वैसे भी जब गधा घास खा रहा होता है तो उसे घास खाने के सिवाय कुछ और नहीं सूझता है। फिर वह न तो दुलत्‍ती मारने की ओर ध्‍यान लगाता है और न ढेंचू ढेंचू का रियाज करता है। सब घास खाने में तल्‍लीन हैं। गधे का स्‍वभाव है कि जो मिल जाए, खाए जाओ और घास हरी हो या लाल। लाल चाहे बापू का खून हो लेकिन गधा भी तो धोबी का लाल है। लाल वही जो कमाई करके दे, गधा खूब लाद कर ले जाता है और कमाई होती है। कमाई को लादने की जरूरत नहीं होती क्‍योंकि वह तो धोबी की जेब में समा जाती है। धोबी गधे पर लादे कपड़ों की भरपूर धुलाई करता है, उन्‍हें चमकदार बनाता है लेकिन गधे को एक दिन भी नहीं नहलाता। कहता है कि वह तो कपड़ों को भी कूट पीट कर चमकाता है। अगर गधे को चमकदार बनाने की कोशिश की और वो कुछ ज्‍यादा ही चमक कर किसी चिकनी चमेली गधी के इश्‍क में पड़ गया तो उसकी तो कमाई धरी रह जाएगी। गधा गधी से रोमांस करता रहेगा और धोबी कपड़ों का गट्ठर ढोता और धोता रहेगा।  नतीजा उसकी कमाई को बिना गधे के मारे ही जोरदार दुलत्‍ती लग जाएगी। यह प्‍यार की पुंगी बजना-बजाना नहीं है। प्‍यार की सभी पुंगियां आजकल बाबा बजा रहे हैं, नीलामी में बापू का खून हड़पने वाले बजा रहे हैं। फिर व्‍यंग्‍यकार और अखबार वाले इस दौड़ से बाहर क्‍यों रह जाएं।
गधे की इस दुलत्‍ती से बचने के लिए धोबी का तर्क मौजूं लगता है लेकिन चिकना बनाने के चक्‍कर में ज्‍यादा कूट पीट दिया या निचोड़ पटक दिया तो उसके खून से भी घास लाल हो जाएगी। इससे भी बचने के लिए वह गधे को नहलाने से बचता रहा है। फिर उस लाल घास को कोई नहीं खरीदना चाहेगा, गधे के खून की वैसे भी कोई कीमत नहीं है, उसे तो आप अवाम ही समझ लीजिए। गर्दभराज नहाएं या बिना नहाए मस्‍त रहें, कमाई तो उतनी ही होगी। दुलत्‍ती भी उतनी ही मारेगा और ढेंचू ढेंचू से भी कोई सुर नहीं सधेगा। जितना समय गधे को नहलाने में बरबाद होगा, उतने में तो और पचास जोड़ी कपड़ों को धोबी महाराज धो पटक लेगा और अपनी कमाई में खूब इजाफा करेगा।
मामला बापू के खून से सनी घास की नीलामी का है और मैं भटक या अटक गया हूं धोबी और गधे के करतबों पर यानी धोबी-गधे से होने वाली कमाई। कमाई की महत्‍ता सर्वोपरि है, उसी से जीवन चलता है इसलिए विशेषज्ञ नोटों का जंगल बनाते रहते हैं। कमाई का मामला हो तो भटकना स्‍वाभाविक है। चाहे बाबा की किरपा का मामला हो या खूनी घास की नीलामी का, असल मामला नोटों की चाहत का है। नोट में लोटने के लिए बाबा बनना और अब खूनी घास बेचना सबसे अच्‍छा बिजनेस है। चाहे कोई बाबा कहे या गधा कहे,गधा मिट्टी में लोटेगा और बाबा नोटों में, धोबी घाट पर लेकिन घाट के पत्‍थर पर लोटना किसकी अंतिम परिणति है, आप परिचित हैं। पत्‍थर की प्रकृति सख्‍त होना है। वह मुलायम नहीं हो सकता, उससे भगवान बना दो या इंसान की मूर्ति लेकिन सख्‍ती उसमें मौजूद रहेगी। वही सख्‍ती की माया हाथियों की मूर्तियों में से गायब होने की भनक पाकर, माया की हनक के रूप में वापिस लौट आई है। यह किसने कहा है कि जो हार जाता है, वह हनक नहीं सकता। हारने के बाद हनक बढ़ने के मूल में अब निगाहें केन्‍द्र पर जमना हैं। आओ सब मिलकर इसे सत्‍तरवें आसमान पर तलाशने चलते हैं, आप भी मेरे साथ चल रहे हैं क्‍या ?

बाबे दी फुल किरपा : डीएलए दैनिक में 18 अप्रैल 2012 के अंक में प्रकाशित


किरपा करना किरपाण चलाने से जनहितकारी, सुंदर और नेक कार्य है। सब चाहते हैं कि उस पर किरपा हो, किरपा करना कोई नहीं चाहता। अब ऐसे में एक बाबा आए और खूब किरपा बरसाई, किरपाण भी नहीं चलाई, फिर लोग दुखी क्‍यों हैं, टी वी चैनल वालों पर भी खूब किरपा बरसी। वे मालामाल हैं और मालामाल हो गए। फिर जब इतना सा डिस्‍क्‍लेमर लगाकर छुटकारा मिल जाता है कि ‘इन चमत्‍कारों के लिए चैनल वाले उत्‍तरदायी नहीं हैं’, फिर भला चैनल वाले क्‍यों नहीं चलाएंगे। जबकि बाबा चैनल के जरिए किरपा ही कर रहे हैं, सब पर किरपा बरस रही है। आप यह क्‍यों नहीं समझ रहे हैं कि बाबा तो सिर्फ 2000 रुपये में किरपा कर रहे हैं। जबकि चैनल वाले लाखों लेकर किरपा करवा रहे हैं। अब अगर बाबा लालची होते तो सब धन समेट लेते। न चैनल वालों को देते, न सरकार को टैक्‍स चुकाते। फिर देश की बैंकों में ही क्‍यों जमा करवाते, विदेशी बैंकों में नहीं जमा करवाते। एक प्रकार से समझा जाए तो पब्लिक से किरपा करने के लिए इकट्ठे हुए माल असबाब में हिस्‍सेधारी बंटाने के लिए चैनल वाले सक्रिय हैं और एक दो नहीं बीसियों चैनल। अब एक दो तो बाबा पर आफत आते देख पल्‍ला झाड़कर निकल लिए हैं। बाबा ने कभी चैनल वालों का उधार नहीं रखा और न जिन पर किरपा की, उनको उधारी का लाभ दिया। नकद का इतना शानदार और चोखा धंधा बल्कि इसे व्‍यवसाय कहना चाहिए, भला इस कलयुग में और कौन सा हो सकता है। कोई चोरी चकारी नहीं, लूट खसोट नहीं, किरपा के लिए थोड़ा सा धन, लेकिन बदले में ‘बाबे दी फुल किरपा’।
किरपा मतलब कर पा, जितना बाबा कर पा रहे हैं, खूब कर रहे हैं। कोई भेद भाव नहीं, दो साल का बच्‍चा हो या 30 साल का युवा अथवा 50 साल का अधेड़ या फिर 80 साल का बुजुर्ग, कन्‍या हो, महिला हो, किन्‍नर हो – किरपा करने में कोई भेद भाव नहीं। सबकी फीस सिर्फ 2000 नकद। अब यह शोर मचाना कितना जायज है कि बाबा पहले दुकान चलाते थे या ठेकेदारी करते थे और सफलता नहीं मिली। अब यह किसने कहा है कि एक धंधा सफल न हो तो दूसरा काम नहीं किया जा सकता। सबको आजादी है कि वह किसी भी धंधे में किस्‍मत आजमा सकता है। अब अगर बाबा की किस्‍मत चमक गई है और वह देशवासियों की किस्‍मत चमकाने में जुट गए हैं तो इसमें दुखी होने की क्‍या बात है।
किस्‍मत की चमक निराली होती है। जब जिसकी चमक जाती है तो वो दूसरे की चमकाना नहीं चाहता बल्कि सारी चमक खुद ही बटोरना चाहता है। बाबा इस मामले में सिर्फ नाम के ही नहीं, मन के भी निर्मल हैं और वे चमक को बांट रहे हैं, क्‍या हुआ जो इसके बदले में ‘सब धन धूरि समान’ के अंश को भरपूर सम्‍मान दे रहे हैं, आप इसमें इतना अपमान क्‍यों महसूस कर रहे हैं, जलते हैं न बाबा पर हुई किरपा से और बाबा जो कर रहे हैं उस किरपा को पाना चाहते हैं। चिंता कीजिए और बुद्धिमान बनिए, एक हालिया शोध तो यही कह रहा है।

होली, चुनाव और हाईटेकीय धमाल : उदंती मासिक के मार्च 2012 अंक में प्रकाशित





चुनाव और होली। नेता भर रहे हैं वोटों से झोली। वाह जनाब वाह। हाथी ढक दिए गए हैं। परदे कस दिए गए हैं। फेंकने वाले तो परदे लगने पर भी तानों के रंग फेंक रहे थे। तानों के रंग कौन से गुब्‍बारे में भरे जाते हैं और कौन सी पिचकारियों से फेंके जाते हैं। इस बारे में चाइना वाले भी नहीं बतला पा रहे हैं। इस पर शोध कार्य जारी हैं, कुछ रोषपूर्वक कर रहे हैं और अधिकतर धौंस में आकर कर रहे हैं। बच्‍चे बचपने के दवाब में करके खुश हैं और मजा मार रहे हैं। इस बार होली हाई टेक होकर आई है. हाई टेक और चुनावी भी। इलेक्‍ट्रानिक वोटिंग मशीनें कितने ही तरह के रंग उगल रही हैं। चुनावों से पहले ही उनका अलग तरह के रंग खौफ छाया हुआ है। वोटर के मन में शंका है कि वोट राम को दूंगा तो क्‍या मशीन उसे श्‍याम के खाते फारवर्ड तो नहीं कर देगी, इसकी क्‍या गारंटी है। जब इस जमाने में वारंटी किसी चीज की नहीं है। गारंटियों वाले जमाने तो ईद का चांद हो गए हैं। गारंटी वारंटी की बात भर कर लो तो मंगल पर दंगल हो जाता है। जब होली के रंग ही गारंटिड नहीं रहे हैं कि आप लाल रंग डालेंगे तो लाल ही करेंगे, हो सकता है वो थोबड़े को हरा रंग दें। इसे होली का पर्यावरण कहा जा सकता है। नतीजे काले, लाल या स्‍याह सफेद भी आएंगे। वे भी तो होली मनाएंगे। आखिर चुनावी नतीजों के बीच में होली का आ धमकना, अकारण ही तो नहीं है। गुब्‍बारे का फूटना अब स्टिकी रंगीय बम का कमाल है। जो अपने आप में अपनी मिसाल है।
कभी आपने एक मेंढक को दूसरे मेंढक को गुब्‍बारा मारते देखा है, देखा तो आपने एक विजयी नेता को पराजित नेता को गुब्‍बारा मारते भी नहीं होगा। चाहे वे ऊपर से हार जीत जाएं पर उनके भीतर विजयी भाव सदा समाया रहता है। उस समाने में रंग काले नहीं होते, वे रंगीन होते हैं। जो सबको मुग्‍ध करते हैं। आप कल्‍पना कर सकते हैं कि नीला रंग करेंसी नोटों की नीली छटा बिखेर रहा है, लाल रंग भी करेंसी नोटों की लालिमा निखार रहा है और हरा रंग तो हरियाली सदा बिखेरने में सदा से निपुण ही है। सबने मिलकर सब तरफ सिर्फ धन और धन की बरसात ही कर रखी है और इसमें नहाने को हर कोई बेताब है। जब धन लबालब दिखलाई दे रहा हो तो फिर कोई भी कहीं ओर क्‍यों जाएगा। सब एक बार होली बिना खेले तो काम चला लेंगे परंतु नोटों की झोली भरे बिना उनके मन और तन को चैन नहीं मिलेगा। गुझिया और कांजी के बिना भी एक बार होली मना लेंगे परंतु धन पाने के बिना वासना का ज्‍वार कैसे शांत होगा।
अब तो कंप्‍यूटर का जमाना है। आप कौन से रंग की होली खेलना चाहते हैं। बस एक बार जाहिर करें, आपका मोबाइल वही रंग उगलने लगेगा. आप घबरा रहे हैं कि सामने वाले के ऊपर रंग डाला तो उसका मोबाइल भीग जाएगा, लेकिन वही मोबाइल आपको ऊपर रंग उगलने लगता है। जिसका बटन दबाए बिना सिर्फ सोचने भर से ही सामने वाले के चेहरेकी रंगीन फेसबुक बन जाती है। आप उस मोबाइल से संदेश भेजते हैं, तो उसमें से बतौर संदेश रंग भरे गुब्बारे निकलते हैं और पूछते हैं, बोल मुझे भेजने वाले, मेरे स्वामी, मेरे बिल को भुगतने वाले, जल्दी बतला मुझे, किसके फेस को रंगीन करना है, या रंगहीन करना है। मैं दोनों काम करने में भली-भांति सक्षम हूं। आजकल जिन्न दीये को रगड़ने से नहीं,मोबाइल के बटन को क्लिकाने से, निकलता है. होली का यह हाईटेकीय स्वरूप मोबाइल और कंप्यूटर के मेल से ही संभव हो पाया है। होली पर रंग इतने नहीं होते हैं, जितनी उनकी उमंगें हसीन होती हैं। भंग की तरंग उतना असर नहीं करती जितना असर कंप्‍यूटर की वायरस की जंग करती है। उमंगों में बसी तरंगें उन्हें सदा युवा रखती हैं। उमंगों पर बुढ़ापे का असर नहीं होता है। जिस तरह काले रंग पर कोई दूसरा रंग असर नहीं करता है, बिलकुल उसी प्रकार उमंगों में सदा जवानी उफनती रहती है। होली हो या न हो,उमंग शरीर के प्रत्येक अंग से फूट पड़ती है किसी गीले रंग भरे गुब्बारे की तरह और आपको मस्ती से सराबोर कर देती है। इन उमंगों को लूटने के लिए सभी तैयार रहते हैं। आप भी तैयार हैं न ? सभी के अपने अपने रंग हैं. अलग-अलग स्टाइल हैं. आप कितनी ही होली खेल खिला लें, अगर आपने साली को रंग नहीं लगाया तो काहे की होली। वैसे महंगाई और भ्रष्टाचार मिलकर खूब भर रहे हैं झोली। होली खेल खिला रहे हैं। महंगाई इतरा रही है। सबने जबकि उसका चौखटा काला कर डाला है पर उससे बच न सका कोई साली या साला है। महंगाई अब पूरे वर्ष होली खेलती है, कभी प्याज से, कभी आलू से, कभी टमाटर से, आजकल नींबू से खेल रही है।
महंगाई जिससे भी होली खेले पर निचोड़ी जनता जाती है। वो होली खेलने में मगन रहती है। पर अपने ऊपर रंगों की फुहार से वो इतना ओत-प्रोत हो जाती है कि चारों तरफ से लिप-पुत जाती है। कहीं से कुछ नजर नहीं आता है। अंधाता नहीं है पर खुली आंखें भी मुंदी रहती हैं। चैन पल भर नहीं लेने देती है महंगाई, न होली पर, न दिवाली पर दिवाली की होली और होली की दिवाली ऐसे ही मनती है और जनता मतवाली रहती है और उसका दिवाला निकल जाता है। वह ईद के इंतजार में लगन लगा लेती है। सभी को ऐसे उत्सव ही भाते हैं। सभी रंगाते हैं और साथ में होली के फिल्मी गीत गुनगुनाते हैं। कहींभांग सॉन्ग बनकर ओठों से फूटती है। होली अभी दरवाजे पर है। माहौल बन रहा है, मैं भी सोच ही रहा हूं कैसे इस बार हाईटेक होली का बेनिफिट उठाऊं। फेसबुकिया फ्रेंड्स को रंगों से कैसे नहलाऊं। कोई आइडिया हो तो बताना, मैसेज टाइप कर सेंड का बटन दबाना और अन्‍ना हमारे हैं परेशान, इस बार उनकी होली और तबीयत दोनों ढीली ढीली हैं। भ्रष्‍टाचार का रंग लाल गुलाल है, देखकर सारा देश अब हैरान है लेकिन यह सब हाईटेकीय होली का कमाल धमाल है। बच्‍चा देश के गुब्‍बारे फोड़ कर बन रहा नौनिहाल है। फेसबुक को लेकर मच रहा बवाल है।