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हे राम आसाराम : दैनिक नेशनल दुनिया स्तंभ 'चिकोटी' में 11 जनवरी 2013 को प्रकाशित
हजारी लाल ने आज अपनी दुकान बंद कर रखी है। बाहर एक टैन्ट लगा हुआ है और नीचे बिछे गद्दों पर आठ दस लोग मुंह लटकाए बैठे हैं।मैं किसी अनहोनी की आशंका से स्तब्ध हूं। क्या हुआ हजारीलाल मैं पूरी तरह गंभीरता ओढ़कर पूछता हूं। मुन्नाभाई आज मुझे पहली बार अपने हज्जाम होने पर दुख हो रहा है, कि क्यों मैंने नाई की दुकान खोली, जबकि देश में रोजगार के इतने अधिक अवसर मौजूद हैं। पढ़ा लिखा हूं इसलिए ही तो बाल काट रहा हूं, उस घड़ी को कोस रहा हूं जिस दिन मैंने हज्जाम बनने का फैसला लिया था मुन्नाभाई।
बतलाओ तो हो सकता है कि मैं तुम्हारी कुछ मदद कर सकूं,मैंने इंसान बनते हुए कहा। आप कुछ नहीं कर पाओगे मुन्नाभाई। मैं सचमुच की कैंची से पब्लिक के बाल कतरता हूँ और वो अपनी जुबान की कैंची से दिमाग को कुतर रहा है। उसने अपने धंधे में पूंजी भी नहीं लगाई और करोड़पति बन बैठा । अब हाल यह है कि करोड़पति और नेता तक उसके दरबार में हाजिरी बजाने के लिए लालायित रहते हैं और मौका मिल जाए तो धन्य हो जाते हैं।
मैं तुम्हारे दुख का सिर-पैर नहीं समझ पा रहा हूँ हजारीलाल। उसने कहा, एक हो तो गिनवाऊं मुन्नाभाई और हजारीलाल फूट फूट कर रोने लगा। मुझे लगा जरूर इसके किसी नजदीकी सगे-संबंधी की मौत हो गई है तभी यह बहकी-बहकी बातें करके विलाप कर रहा है।
दरअसल, बात यह है कि बाबा बनकर नाम, दाम कमाने और इसे रोजगार बनाने का धंधा आजकल बहुत उपजाऊ है। यहां पब्लिसिटी भी खूब मिलती है,भीड़ बिना बटोरे सामने निकम्मे घुग्गू की तरह बैठी रहती है और जिस चीज को हाथ लगा दो, वह हाथों हाथ खूब बिक जाती है। आलम यह है कि वह मिट्टी को हाथ लगा दे तो अंधभक्तगण मुट्टी भर-भर मिट्टी खरीद कर ले जाते हैं। किसी पॉर्न पत्रिका की प्रचार-प्रसार संख्या भी इसकी पत्रिका के आगे पानी नहीं भर पाती है।
यह अपनी पर आ जाएं तो ‘राम नाम’ की मदिरा बनवाकर मदिरा बेचने के सारे रिकार्ड ध्वस्त कर दें और एक पैसे का टैक्स भी न चुकाएं। ‘मछलियों के किंग’ को किसी ने बुद्धि नहीं दी होगी, अगर उन्होंने सरकार की जगह इनकी शरण ली होती तो अब तक वारे-न्यारे हो गए होते। जहाज उड़ाकर कमाने की तो बात छोड़िए, वह अगर इनसे केवल दीक्षा ले लेता तो आज रंगीन कलेंडर छाप रहा होता !
हजारीलाल बतलाए जा रहा था कि जितने भी बाबा हैं, सभी एक ही थैली के चटावन लाल हैं। वे चाहे आसाराम हों, निर्मल बाबा हों या किसी मंदिर के पुजारी बाबा। सबकी मुंडियां और मुट्ठियां नोटों की कड़ाही में डूबी रहती हैं। इनके लुभावने नाम इनकी ओर सहज ही आकर्षण पैदा करते हैं। धर्म को धंधा बनाने के लिए इनका किया गया योगदान अतुलनीय है मुन्नाभाई। अब मुझे हजारीलाल का दुख समझ में आने लगा। मैंने कहा, तुम बिल्कुल ठीक कह रहे हो। अगर ईश्वर पृथ्वी पर होता तो इनकी कारगुजारियां देखकर जरूर विस्मित हो रहा होता और उसे अपने ईश्वर होने पर पछतावा होता। ईश्वर को भी महसूस हो जाता कि भगवान बनने से अधिक अच्छा धंधा तो बाबा बनने में है। महात्मा गांधी यानी बापू ने जितना नाम और ख्याति अपने जीवन भर में नहीं कमाई, उससे अधिक तो तथाकथित बाबा आज पल भर में बटोर लेते हैं,चाहे इसके लिए इन्हें बकवास ही क्यों न करनी पड़े। जिन महिलाओं को यह इज्जत देने का दावा करते हैं, और जिनके जुड़ने से इनका धंधा जमा है,उन्हीं को मौका पड़ने पर‘बाजारू’ कहने से नहीं चूकते हैं। मतलब तो सुर्खियां बटोरने से है, इन्हें ‘सुर्खीखोर’ कहा जा सकता है।
'मच्छर का पट्ठा' बड़ा दिलदार :दैनिक नेशनल दुनिया स्तंभ 'चिकोटी' 16 नवम्बर 2012 में प्रकाशित
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‘मैं डेंगू मच्छर हू’ जल्दी ही आप ओपनमैन की सभाओं में, टीवी चैनलों की फिजाओं में, अखबारों की कालिमा में मतलब चहुं ओर ऐसे टोपीधारक पाएंगे। जो मच्छर मच्छर चिल्लाएंगे, किंतु काट किसी को नहीं पाएंगे। मैं भी मच्छर, तू भी मच्छर, ये भी मच्छर, वे भी मच्छर हैं। नेता कहते पाए जा रहे हैं कि मच्छरों तंग मत करो। आजकल ऐसे बयान थोक दरों पर उपलब्ध हैं। इन बयानों से आपको हैरानी हो सकती है किंतु टोपियों से परेशानी नहीं। टोपी पहनने और पहनाने का चलन फिर से जोरों पर हैं। जिस प्रकार वाहनों के पीछे शेर लिखे जाते हैं, उसी प्रकार आजकल टोपियों पर पंच लाईन मढ़ी जा रही है। आम आदमी चलता फिरता वाहन नजर आ रहा है। टोपी पहनकर अपनी स्पीड बढ़ा रहा है। बीते जमाने में रिक्शे पर फिल्मी पोस्टर लगाकर आने वाली और चल रही फिल्म की मुनादी रिक्शे के आगे ढोल पीट रहे ढोलचियों के जरिए कराई जाती थी और उससे फिल्म के व्यवसाय में इजाफा होता था।
आजकल उन ढोलकों को आप गले के फंदे के तौर पर कसा हुआ देख रहे हैं। इससे ढोलकों की पौ बारह और तबलचियों की पौ सत्तर हो गई है। आज वह शुभ कार्य तबलचियों के जिम्मे आ पड़ा है और वह उसे पूरी शिद्दत से निबाह रहा है। इनमें वे लोग हैं एक तो वे जो ओपनमैन के मुरीद हैं और दूसरे खुद ओपनमैन डेंगू मच्छरों के फैन है। किंग खान वाला किस्सा फिजा को संगीन यादों से रंगीन कर रहा है।
लोग सीधी ऊंगली से घी नहीं निकालते हैं क्योंकि कम निकलता है। ऊंगली टेढ़ी करने या घुमाने फिराने से भी मनमाफिक नतीजा नहीं मिलता है। सो आज सीधी ऊंगली से बरतन को टेढ़ा किया जाता है। टेढ़ा बरतन तुरंत उलटता है और घी की मनचाही मात्रा हासिल हो जाती है। सीधी ऊंगली से घी के बरतन को टेढ़ा करना कामयाबी की नई मिसाल है। मच्छर को सबसे पहली सुर्खी नाना पाटेकर के संवाद की देन है और दूसरी अब ओपनमैन की। एक अभिनेता है और दूसरा अभी-अभी नेता बना है। मच्छर की किस्मत बुलंदी के शिखर पर है, वह आम आदमी के सिर पर टोपी बनकर छाने वाला है। मच्छर अगर फेसबुक खाता खोल ले या ट्विटर एकाउंट बना ले तो शर्तिया सोशल मीडिया के शहंशाहों को बुरी तरह पछाड़ देगा। आखिर पिछले हफ्ते ही उसने कसाब को काटा है। कसाब डेंगू मच्छर के जहर से भी जहरीला निकला इसलिए बच गया और जिस मच्छर ने काटा, वह मर गया।
मच्छर निरक्षर लिखे हुए को पढ़ना नहीं जानता किंतु कसाब को पहचानता है। जरूर किसी खुफिया विभाग में रहा होगा या किसी खुफिया अधिकारी को खुफिया तरीके से काटा होगा। कसाब को काटना उसने ओपनीय रखा है गोपनीय नहीं। पंखा चलाओ तो मच्छर भाग जाते हैं। मच्छर का मंडराना जब मन को दिखाई नहीं देगा। मच्छर गूंज गूंज कर, मंडरा मंडरा कर आम आदमी के मन को डराने में मशगूल है ओपनमैन के माफिक। यह मच्छर का प्रिय शगल है।
मच्छर जब खून का स्वाद ले चुका होता है और अपनी सुई आम आदमी की त्वचा से बाहर निकालता है, तब टीस जरूर होती है किंतु तब तलक बहुत देर हो जाती है, मच्छर खून पी चुका होता है। आप टीस वाली जगह पर ताली बजाते हैं और मच्छर चुपके से खिसक जाता है। आप थोड़ी देर से प्रतिक्रिया करते तो आपके खून के नशे में अलमस्त वह अवश्य शिकार बनता। ‘मच्छर का पट्ठा’ बड़ा दिलदार निकला। उड़ कर बचने वालों का सरदार निकला। वे कह रहे हैं कि मच्छर का काम भुनभुनाना है और ओपनमैन यही कर रहा है। ओपनमैन मच्छर की तरह गजब नहीं ढा पाएगा। कसरत जो मच्छर करते हैं, वह उसके बस की नहीं है, फिर कैसे साबित करेगा कि ‘मैं डेंगू मच्छर हूं।‘ जिस जिसको उसने काटा है, चूमा है अथवा चाटा है, वे सब सुरक्षित हैं।
तुम मच्छर हो, विषधर होते तो तनिक चिंतित हम होते, सोचते, किंतु सत्ता रूपी धरा के विषधर हम हैं। विषधरों की मंडली से नाहक ले रहो हो पंगे, पानी से पलते हो किंतु पानी ही तुम्हारी मौत का सबब बन सकता है, नहीं जानते इसलिए बचा नहीं पाओगे खुद को, कर देंगे पानी से ही इतने घाव। तुम्हारे चिल्लाने से हमें शक्ति मिलती है, हम घोड़े हैं। चने का हश्र देखा है, उसे घोड़ा खाता है लेकिन मच्छर नहीं खाता। मच्छर जो खाता चना, तो रहता सदा बना। हम देते हैं बयान, इसलिए हो गए हैं सर्वशक्तिमान।
दामादगिरी की राजनीति : नेशनल दुनिया स्तंभ चिकोटी 25 अक्टूबर 2012 अंक में प्रकाशित
राजनीति में दामादगिरी जोरों की कयामत ढा रही है जिसकी वजह से केला और आम चर्चित हो गए हैं। वैसे आम उत्सव के मौके पर आम की कई किस्मों के दाम बादाम को भी मात कर देते हैं आंधियों के कारण आम का असमय गिरना भी उसके दामों में इजाफे के लिए दोषी होता है। केले कभी आंधियों से नहीं गिरते, केलों को तहस-नहस करने का श्रेय सदा से हाथियों और बंदरों के नाम रहा है। हाथी और बंदर का स्वभाव नेताओं में नहीं पाया जाता, वे सदा आम चूसना ही पसंद करते हैं और कॉमनमैन को आम की तरह चटकारे लेकर चूसते ही पाए जाते हैं।
पब्लिक को केला बनाना जितना आसान है उतना ही आम को चूसना। पब्लिक को केला बनाकर छिलका छीलकर कहीं भी फेंक दो और केले की लचीली गिरी उदरस्थ कर लो, पब्लिक फिसल जाएगी, फिर खूब हंस लो, ठहाके लगा लो और लाफ्टर चैलेंज के शो में बढ़त बना लो। केले के छिलके पर पब्लिक फिसले, तुरत जुर्माना लगा दो। पब्लिक वह आम है जो सदा चूसी जाती है,पब्लिक केले के छिलके पर फिसलती है और नेता पब्लिक पर। फिसलता भी है और पब्लिक को घसीटता भी है। यही युगीन सत्य है। आम का पापड़, पापड़ होते हुए भी उसके अवगुणों से मुक्त रहता है। आम का पापड़ खाते हुए कड़ तड़ पड़ की आवाज नहीं करता, यह चबाए जाने पर भी मौन रहता है। इस पापड़ को युगों युगों से चटकारे लेकर चाटा जाता रहा है और चाटा ही जाता रहेगा। यह आम की खासियत है, ऐसा समझ रहे हैं तो आप मुगालते में हैं क्योंकि आम का मुरब्बा भी बनता है, जैसे नेता पब्लिक का स्वादिष्ट मुरब्बा बनाती है। पब्लिक को जानवर (गधा) या पक्षी (उल्लू) भी बनाया जाता है।
वो मुरब्बा ही क्या जिसके खाने पर अब्बा की याद नहीं आई और अब्बा की याद के पीछे अम्मा न दौड़ी चली आई। देश की पब्लिक केले के छिलके पर रोजाना फिसल रही है। उस पर तुर्रा यह कि नियम बना दिया गया है कि केले के छिलके पर फिसलने पर चालान जरूर होगा। आम चूसने पर दामादगिरी का मसला होने पर भी चर्चा नहीं होती। आम फल पर सामान्यत:, न बंदर और न हाथी की नीयत डोलती है। हाथी और बंदर गन्ना और केला देखकर डोलते हैं और मन के रंजन के लिए केले के बागों को उजाड़ते भी रहते हैं। जबकि लोकतंत्र में हाथी आम पर ललचायी नजरें गड़ाए रखते हैं।
हाथी का मोह गन्ने से भंग हो चुका है। बंदर गन्ना नहीं खाता है। बंदर गन्ना हाथ में लेकर डांस कर सकता है, हाथी के बस का यह नहीं है। हाथी को सांकल डालकर बंदर के माफिक डांस नहीं कराया जा सकता। जरूरत भी नहीं है क्योंकि पब्लिक भिन्न-भिन्न प्रकार के डांस करने में मशगूल रहती है।
हाथी को नचाना पब्लिक और नेता के बस का नहीं है इसलिए वे खतरा सामने देखकर हाथी को ढककर काम चलाते हैं। हाथी को अक्ल से बड़ा मान लिया गया है, भैंस इस मामले में पिछड़ गई है। इसी से देश के चहुंमुखी विकास की जानकारी मिलती है। जिनके हाथ नहीं होते, उनके हाथी होते हैं और जिनके हाथ होते हैं, उनके ही हाथों में हथियार होते हैं, वे महावत को भी बांधकर रखते हैं, अब समझ रहे हैं आप कि देश का महावत क्यों मौन है ?
मौसम है बिग बॉसियाना : दैनिक नेशनल दुनिया 11 अक्टूबर 2012 के स्तंभ 'चिकोटी' में प्रकाशित
मौसम पार्टी पार्टी हो रहा है, सुनकर यह मुगालता मत पाल लीजिएगा कि किसी फाइव या सेवन स्टार होटल में विदेशी शराब और मांसाहारी व्यंजनों की बाबत चर्चा हो रही है और इसमें शामिल होने का निमंत्रण बस मिलने ही वाला है। यह वो वाली पार्टी नहीं है। इस पार्टी का कनैक्शन सरकार से है, बिजली से चाहे न हो किंतु करेंट से जरूर है। यह जरूरी भी है बिना करेंट के मौसम कैसा भी हो, गर्मियों के आसपास उमस हो ही जाती है। इस बार यह उमस सत्ता पक्ष के लिए है। इस उमस में 2 जी से लेकर दमदार दामाद जी तक दमदमा रहे हैं। कह सकते हैं कि राजनीति में दमादम मस्त कलंदर के जमाने बीतते महसूस हो रहे हैं जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है। ताकतों की कटाई यूं ही नहीं हो जाती है, काफी अरसे तक कताई बुनाई का सिलसिला चलता रहता है,सो चल रहा है।
पक्ष और विपक्ष के जानवर और पक्षी सक्रिय हैं। विपक्ष भी भिन्न भिन्न प्रकार के पक्षियों से भरा है और पक्ष में पक्षियों के अतिरिक्त जानवर भी सक्रिय हैं। जानवर सिर्फ पशुबल से ही ओत प्रोत नहीं हैं अपितु धनबल पाकर धन्य धन्य हो रहे हैं। मंदिर और टॉयलेट खूब विवादों में हैं। प्राकृतिक आपदाओं से डटकर मुकाबला किया जा रहा है। पहले मंदिरों की मायावी दुनिया पर खूब विमर्श होता रहा है। कभी मस्जिद के साथ, कभी इंसानों के साथ। पिछले दिनों एक बदलाव आया है। जबसे योजना आयोग ने लाखों के टॉयलेट्स बनवाए हैं, तभी से टॉयलेट्स उपेक्षा नहीं, अपेक्षा से भर उठे हैं। उनके प्रति उपेक्षा अब अपेक्षा में बदल चुकी है। खर्च हो रहे हैं और करोड़ों मिल रहे हैं। इसका जिक्र तक नहीं किया जाता था किंतु अब इनके जिक्र के बिना मंदिरों में घंटियां तक नहीं बज रही हैं।
मौसम बिग बॉस का भी नगाड़े बजा रहा है। एंटरटेनमेंट मिंट के सुखद अहसास से भर गया लगता है। सिद्धू को उनके अपने बाहर से ही डांट-फटकारने में मशगूल हैं। जानते हैं कि वे जहां पर हैं, वहां पर इनकी धुन नहीं पहुंच रही है किंतु ये भुनभुना रहे हैं। कसमसा रहे हैं। मसमसा रहे हैं। इनको जप ही भाता है, सो जप रहे हैं, जपा रहे हैं। सलमान इतने पसंद किए जा रहे हैं,सक्रिय नजर आ रहे हैं। इनकी बजाय अगर खूबसूरत सलमा भी मैदान में उतर आएं तब भी इतनी ख्याति हासिल न कर सकें। आजकल बलमा शक्तिपुंज हैं, सलमा प्रेमपुंज शुरू से ही रही हैं। सलमा और बलमा या बलमा और सलमा – गुड़ खा रहे हैं, गुलगुलों का स्वाद भी ले रहे हैं। जो प्राण पहले सलमा पर निछावर किए जाते रहे हैं अब यह जान की बाजी, दामादजी के लिए लगा दी गई है। कितने ही आतुर हैं – लगता है जग से भय का नामोनिशान मिट चुका है। 50 लाख से 300 करोड़ बनाने का गोपनीय धंधा ओपनीय हो चुका है। इसके फार्मूले की तलाश में सब जुट गए हैं। यह जुटान ही दरअसल लुटान है। सब लूटने को ठाने बैठे हैं। आम पब्लिक के भाग्य में तो लुटना ही लिख दिया गया है, भाग्य से भागने में ही भलाई है।
बात पार्टी की हो रही थी। पार्टी पर होने वाले खर्चे की हो रही थी। परंतु तकनीक इतनी तेज हो गई है कि पार्टी टिकटें बेचकर कमाई कर रही हैं। सोच रहा हूं कि एक पार्टी मैं भी बना लूं, चुनाव न लडूं, चुनाव के लिए टिकट बेचकर ही नोट कमा लूं। टिकटें खरीदने वाले खूब सारे नोट लेकर तैयार रहते हैं, वो नोट मैं समेट लूं वैसे भी मुझे सत्ता में आने पर ताकत नहीं नोट बटोरने का ही शौक है। नोट आने के बाद खुदबखुद मैं ताकतवर हो ही जाऊंगा। धनोबल अब मनोबल में खूब इजाफा करता है। इसे सब पहचानने लग गए हैं। आप तो इससे अपरिचित नहीं हैं न ?
बंद के बेढ़गे ढंग को बंद करो जी : नेशनल दुनिया 21 सितम्बर 2012 स्तंभ 'चिकोटी' में प्रकाशित
‘आज मोहब्बत बंद है’ गीत फिजा में गूंज रहा है जबकि ‘कल भारत बंद था’। भारत बंद होने पर मोहब्बत पर तो अपने आप ही लॉक लग जाएगा। गीत का सकारात्मक संदेश है कि मोहब्बत बंद हो सकती है लेकिन हिंसा, रक्तपात, खून खराबा, मारपीटी शुरू होने के बजाय महंगाई बंद होनी चाहिए। इसके विपरीत भारत बंद हुआ क्योंकि महंगाई ने नंगपना मचा रखा है, जिसमें नाच देखने वालों और नाचने वालों में नेताओं के शागिर्द होते हैं। इन्हें आप भाईजी, गुंडे, बाउंसर, सक्रिय कार्यकर्ता इत्यादि नामों से पहचानते हैं। बहरहाल, सच्चाई यह है कि धरती का आधार प्रेम है। प्रेम से ताकतवर कुछ नहीं है। प्रेम के बिना झगड़े भी नहीं है। किसी से प्रेम होगा तो किसी से उसी प्रेम के लिए झगड़ा भी होगा। यही इस सृष्टि का सनातन सत्य है।
भारत बंद महंगाई रूपी बुराई को हटाने के लिए प्रेम का शक्ति प्रदर्शन है। महात्मा गांधी ने अनशन का रास्ता अपनाया। बे-सत्ता वालों ने भारत बंद का। भारत बंद के लिए किसी भारत घर की व्यवस्था नहीं है। काले धन की तरह इसे किसी विदेशी भूमि पर बंधक नहीं बनाया जा सकता है। चिडि़याघर काफी लंबे चौड़े होते हैं लेकिन उसमें से चिडि़यों को बाहर निकालें, तब भारत को बंद करने की सोचें। परंतु चिडि़याएं कौओं के लिए अपना घर खाली करने से रहीं। व्यंग्यकार का कवि मन कह रहा है कि वे प्रतीक तौर पर भारत बंद का शोर मचाते हैं। करते तो हों दुकानें बंद, मार्केट बंद, आफिस बंद, यातायात बंद, सिनेमा हाल बंद और चिल्लाते हैं कि कर दिया भारत बंद। माना कि भारत दुकानों में बसता है और दुकानों में सर्वसुखदायक करेंसी नोट। न्यू मीडिया पर अभी सरकार का ही बस नहीं चल रहा है। जबकि सरकार ने घोषणा कर दी है कि ‘न्यू मीडिया’ को बंद करने के लिए वे तत्पर हैं। अच्छी चीजें बंद और बुरी रखें खुली।
भारत, भारत न हुआ कोई गुनहगार हो गया या दिल्ली ने जुर्म किया है, इसे तुरंत हिरासत में बंद कर दो। पेट्रोल के रेट कैसे बढ़ाए, सीएनजी के रेट क्यों बढ़ाए, डीजल में कीमतों का तड़का क्यूं लगाया, कीमतों को बंद नहीं करके रखा इसलिए भारत या राजधानी दिल्ली को तो बंद होना ही होगा। बंद करना है तो पुलिस के अत्याचारों, ब्यूरोक्रेसी में भ्रष्टाचार फैलाने वालों,अच्छाईयों के दुश्मनों को करो। उन पर आपका बस कहां चलता है। वहां पर तो आप सिरे से पैदल चलना शुरू कर देते हैं। भारत बंद का शोर मचाते हैं और बुरे विचारों पर लगाम नहीं लगा पाते। दिल्ली बंद करते हैं परंतु दिल में से काले धन और कोयले के साक्षात दीदार हो रहे हैं।
सचमुच में बंद करने का इतना ही मन है तो कन्या भ्रूण हत्या को करो, प्रसव पूर्व लिंग जांच को करो, मिलावटी दवाईयों को करो, क्या आप नहीं जानते कि एक चूहे को चूहेदानी में बंद करने के लिए भी कितनी मशक्कत करनी होती है। भारत बंद करने का आशय देश की सक्रियता को किडनैप करके देश को नुकसान पहुंचाने से है। मैं तो नहीं चाहता कि बंद रूपी ग्रहण का वायरस मोहब्बत या भारत को लगे, महंगाई को यह कैंसर की मानिंद जकड़ लें, आप भी कुछ ऐसा ही महसूस कर रहे हैं क्या ?
पार्किंग में उपजा 'राग भिड़ासी' : दैनिक नेशनल दुनिया 18 सितम्बर 2012 स्तंभ 'चिकोटी' में प्रकाशित
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संगीत के कच्चे-पक्के और पुख्ता रागों की जानकारी यूं तो सभी को होती है जिनको नहीं होती वे भी संगीत सुनकर मौज लेते हैं। आजकल समाज में एक नए राग की उत्पत्ति हुई है। इस राग का आविर्भाव वाहनों की संख्या तेजी से बढ़ने पर सामने आया है। इस राग में कारों के निरंतर बजने वाले हॉर्न और जोर-जोर से आती चिल्लाहटों से मधुरता आती है, इसे राग भिड़ासी माना गया है।
राग भिड़ासी से यूं तो सभी परिचित हैं किंतु मेट्रो शहरों में इसके मुक्तभोगियों की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है। इसके गाने-बजाने के संबंध में कोई तय समय नहीं है। इसे कभी भी गाया-बजाया जा सकता है। इसका आयोजन स्थल आपके घर के सामने उस जगह पर होता है, जो आपकी न होते हुए भी आपकी मानी जाती है। यह सिलसिला रोजाना वहीं शुरू होकर संपन्न होता है। शहरों में बढ़ती वाहनों की आबादी इसके होने का सबब बनी है। हम सबके कानों में आवाज आ रही है कि ‘तेरे घर के सामने मैं राग भिड़ासी गाऊंगा’। राग भिड़ासी सड़कों पर होने वाले‘रोडरेज’ से उन्नत किस्म का राग है।
जब दो वाहन टकराते हैं तो आवाज होती है किंतु जब दो राग भिड़ासी वाले इस राग में हिस्सेदारी निभाते हैं तो देखने-सुनने वालों का मन इससे मिली प्रसन्नता से गदगद हो उठता है। सुनने वाले, इसका आनंद लेने वाले इसकी गांभीर्यता को समझते हुए भनक मिलते ही अपने-अपने घरों की बालकनियों में आकर मोर्चा संभाल लेते हैं। यह राग दर्शकों को तुरंत आमंत्रित करता है। दर्शकों को आमंत्रित करने के लिए इसमें कार्ड छपवाकर बंटवाने की औपचारिकता नहीं निभाई जाती। इसे देखने-सुनने वालों के लिए नाश्ता अथवा भोज का कोई प्रावधान न होना, मितव्ययिता की सबसे सुंदर मिसाल है।
घर के सामने वाहनों को खड़े करने का ‘मौन मौलिक अधिकार’घर में रहने वालों का होता है। इस अधिकार में दखल राग भिड़ासी की उत्पत्ति दिखलाता है। इस संबंध में अभी तक सरकार की ओर कोई दिशा-निर्देश नहीं जारी किए गए हैं किंतु इसमें व्यापक संभावनाओं को देखते हुए भारत की राजधानी में‘कर वसूलने’ की शुरुआत अपने दूसरे अथवा तीसरे चरण में है। इसका आनंद हिंदी भाषा में अथवा पंजाबी भाषा अथवा किसी देसी बोली में खुलकर निखरकर आता है। इसमें अंग्रेजी का प्रयोग होते भी अधिकतर देखा गया है। इससे राग भिड़ासी का जलवा देदीप्यमान होकर चमक उठता है।
ऐसे आयोजनों को अखबारों की सुर्खियां मिलने लगी हैं। ऐसे में एक बचाव पक्ष भी सक्रिय होता है। जिसे दाल भात में मूसलचंद की संज्ञा इसलिए दी गई है क्योंकि वह इस तरह के आयोजनों का सर्वथा विरोध करता है और इन्हें रोकने के लिए सदैव तैयार मिलता है। कई बार ऐसे आयोजनों की गाज इन पर इस बुरी तरह गिर जाती है कि इनका नाम शहीदों में शुमार हो जाता है। क्लाइमेक्स तक पहुंचने पर बोध होता है कि इंसानों की भिड़ंत हो गई है। स्त्री, पुरुष और बच्चों के लुटे-पिटे चेहरे-मोहरे इसकी गवाही देते हैं। किंतु पुलिस के पहुंचने पर वे सब गवाही देने से मुकरते हुए तितर-बितर हो जाते हैं। जिन बालकनियों में कुछ देर पहले चहल-पहल और गहमा-गहमी का मौसम था, वहां पतझड़ कब्जा जमा लेती है। लगता है कि इन बालकनियों में बसंत आता ही नहीं है। आपने भी अवश्य ही ऐसे आयोजनों में हिस्सा लिया होगा, मुक्तभोगी रहे होंगे, फिर अपने अनुभव हमारे साथ साझा करने में आप देरी क्यों कर रहे हैं ?
लोटे ने बनाया कीर्तिमान : नेशनल दुनिया 17 जुलाई 2012 स्तंभ 'चिकोटी' में प्रकाशित
दिल्ली के आनंद विहार में एक लोटा चोरी की एफआईदर्ज हो गई। इससे कितने ही बरतन भांडे दुखी हैं। लगता है इस एफआईआर के दर्ज होने से उनका आनंद लूट लिया गया है। दिल, दुपट्टा तो खूब चोरी होते रहे हैं, उनकी एफआईआर न सही, लेकिन फिल्मी गीतों ने उनकी चोरी को बार बार गा बजाकर सुर्खियों में ला दिया। ताजा सुर्खियां इसलिए हैं क्योंकि चोरी गया लोटा इंकम टैक्स डिपार्टमेंट के रिटायर्ड अधिकारी का था। जहां पुलिस वाले मोबाइल, पर्स चोरी के एफआईआर तक लिखने में आनाकानी करते हैं। बल्कि साफ कहूं कि लिखते ही नहीं है, ऐसे में लोटा चोरी की एफआईआर दर्ज होना सुकून से भर देता है।
एफआईआर के बाद से तश्तरी, चम्मच, कटोरी, गिलास का तो दुख से बहुत बुरा हाल है। इनमें चम्मच इतना रो रही है कि लगता है जब तक उसकी चोरी की एफआईआर दर्ज नहीं की जाएगी, वह चुप ही नहीं होएगी। यह भी हो सकता है कि वह जंतर-मंतर पर अनशन और प्रदर्शन कर डाले। सबसे ज्यादा मुझे ही चुराया जाता है और जिसके यहां से चुराया जाता है, उसके आने पर छिपाया जाता है। कितनी आसानी से मेरी चोरी कर ली जाती है। जरा सा ऊंगलियों में दबाया और जेब में सरका लिया और मैं पीएम की तरह मौन न इशारा कर पाती हूं, न बोल पाती हूं। कभी मौका पाकर जेब में पहुंचने से पहले सरक कर फर्श पर जोर से खनखनाती हूं तो मेरा कथित चोर यह कहकर ‘सॉरी, चम्मच गिर गई, कहकर अपनी चोरी पर तम्बू तान लेता है और बच निकलता है। कोई भी चम्मच चोर साधारण नहीं होता, हमेशा बहुत बड़ी हैसियत का मालिक होता है।
क्या होटल, क्या घर, क्या पार्टी मुझे कहीं से भी किसी के द्वारा चुरा लिया जाता है और यहां तो सिर्फ एक लोटा ही चोरी हुआ है जबकि यह भी नहीं मालूम कि वह पेंदी वाला था या बेपेंदी वाला। फिर भी एफआईआर लिखवाने में सफल। सचमुच में देश में कानून और व्यवस्था का पुरसा हाल है, अपनी पीड़ा बतला रही है चम्मच। आज तक चम्मच चोरी की एफआईआर कभी किसी पुलिस थाने में दर्ज नहीं हुई है। जैसे ही हम चार बरतन इकट्ठे होंगे, मैं खनखनाहट मचाकर बवाला मचा दूंगी, चुप नहीं रहूंगी। मुझ निरीह चम्मच पर इतना घनघोर अत्याचार। इतिहास में जिक्र होना चाहिए था चम्मच चोरी की एफआईआर का और उसे भी लुटेरा लोटा लूटकर ले गया। आज ज्ञान हुआ है कि जहां चार बरतन होते हैं, वे खड़कते क्यों हैं, वे खड़कें न तो क्या करें, क्या पीएम की तरह मौन रह कर अपनी इज्जत रूपी दौलत को गंवा दें। बरतन तो दो ही खड़कने पर सुनामी ला सकते हैं। पर चार हों तो खड़कने का सच्चा सुर सध जाता है।
इधर गिलास का भी रो रोकर बुरा हाल है। आंसुओं से गिलास खुद ही भर चुका है। कटोरी लबालब भरने के बाद पहले से बही जा रही है जिससे आसपास का फर्श पूरी तरह गीला हो चुका है। उसमें डूबी हुई तश्तरी तो कुछ कह ही नहीं पा रही है, जिसका सांस लेना भी दूभर हो रहा है, सोच रही है कि गिलास, कटोरी रोना बंद करें तो वह बाहर निकलकर अपनी दुख-तकलीफों का बयान कर सके। जिन बरतनों का यहां जिक्र नहीं है, वे सोच रहे हैं कि इस मसले पर अपनी प्रतिक्रिया किन शब्दों में जाहिर करें ?
ई मेल, फी मेल और जी मेल : नेशनल दुनिया 5 जुलाई 2012 'चिकोटी' स्तंभ में प्रकाशित
गांधी जी की चिट्ठियों की इतनी अधिक बढ़ती डिमांड और ई मेल का कोई मूल्य नहीं, सरासर नाइंसाफी है। जब तकनीक विकास कर रही है फिर चिट्ठियों के मुकाबले ई मेल के प्रति इतनी बेरुखी क्यों। ई मेल की नीलामी भी होनी चाहिए। यह क्या कि कभी गांधी जी का चरखा,कभी गांधी जी का चश्मा, कभी गांधी जी का पंखा, कलम, कागज तक की बोली लगाई जाए और ऊंची कीमत पाई जाए और इधर हम ई मेल पर ई मेल धड़ाधड़ भेजे जा रहे हैं और कोई बोलीदाता इसमें दिलचस्पी नहीं ले रहा। चिट्ठियां जो पहले बहुत दुखी थीं। कई कई दिन, महीने, बरसों तक सफर में जाया कर देती थीं, अब सुख महसूस कर रही हैं और फिल्मी गीत गुनगुना रही हैं ‘दुख भरे दिन बीते रे भैया, अब सुख आयो रे ... मज़ा चिट्ठी पढ़ने का अब आयो रे ...’! ई मेल दुखी हैं।
पहले की चिट्ठियां अब चिट्ठे बनकर तहलका मचा रही हैं,सरकारों को हिला रही हैं, गिरा रही हैं, उनकी पेशानी पर बल ला रही हैं, सूनामी ला रही हैं। चिट्ठे आजकल मजबूत पट्ठे बनकर इंटरनेट पर अपना वर्चस्व कायम कर चुके हैं। उधर पुरानी चिठ्ठियों के दिन बहुर गए हैं। उन्हें लाखों, करोड़ों की बोली लगाकर खरीदने, सहेजने वाले मिल रहे हैं। इधर ई मेल खाता भरने के डर से से हमें निर्ममतापूर्वक डिलीट किया जा रहा हैं। जैसे कन्याओं की मां की कोख में ही भ्रूण हत्या की जा रही हो। क्या हमारे उद्धार के लिए इंटरनेट जगत में बन पाएगा कोई आमिर खा और बुंलद आवाज में कहेगा ई मेल जयते।
ई मेल कह रही है कि कितनी तेज गति से चलती हूं। इधर चली और उधर पहुंची। पैट्रोल, डीजल, गैस या टिकट का खर्चा नहीं, किसी वाहन की दरकार नहीं। दूरी के कोई मायने नहीं रह गए हैं। पलक झपकने से पहले ही पाने वाले को मिल जाती हूं। किसी जमाने में टेलेक्स, और तार के मैसेज अब मोबाइल के मैसेज बनकर धूम मचा रहे हैं। उनके जरिए तो कमाने वाले खूब कमा रहे हैं, मेरी मिट्टी पलीद और पलीत करने में इंसान रूपी शैतान का ही हाथ है। उस हथेली की ऊंगलियों की यह करामात है। उसने ही मुझे खोजा है और फिर डिलीट स्पैम जैसे गर्त में ढकेला है।
हंगामा मचाने के लिए चिट्ठी बम नहीं, आजकल सी डी शक्तिमान हो गई है। पॉवरफुल पैन ड्राइव भी यहां पर फेल है। पर कह रही है कि सीडी मेरी बड़ी दीदी है,उसके होते मैं पॉवरलैस ही ठीक हूं। सीडी दीदी के राज में ठाठ तो पैन ड्राइव भैया के ही हैं। दीदी की ताकत से ही पैन ड्राइव आजकल दबंग है। कम्प्यूटर से जुड़ा अति महत्वपूर्ण अंग है। इसकी ताकत और विशाल रूप देखकर आई टी जगत दंग है। इसी के कारण अब आई टी का चढ़ता रंग है। यह जिसके संग है, उससे कोई नहीं करता जंग है। एक छोटा कंप्यूटर भी अब वैज्ञानिक विकसित कर चुके हैं। जी हां, इसी पैन ड्राइव में। आप साइबर कैफे में जाकर यूएसबी पोर्ट में अपना पैनड्राइव कंप्यूटर लगाकर जोखिमरहित इंटरनेट का मजा लीजिए। आप कुछ भी कर लो परंतु इंटरनेट के दीवानों तुम यह काम न करो, ई मेल को यूं बदनाम न करो। ट्विटर और फेसबुक जैसे सोशल मीडिया के सक्रिय होने के बाद भी आपको क्या लग रहा है कि ई मेल सच कह रही है ?
चूहे फुल फ्लेज्ड खुंदक में : नेशनल दुनिया 12 जून 2012 अंक में प्रकाशित
चूहे फुल फ्लेज्ड खुंदक में हैं। खुदंक चुहियों को भी आ रही है। वैसे खुश भी हैं चुहियाएं कि चूहे अनाज खाकर, चाहे बित्ता भर ही पेट है उनका, डकार लेने के हकदार साबित हुए हैं। डकार लेना और डकारना कोई इत्ता आसान नहीं है। पर चूहे सीख गए हैं नौकरशाहों से और नेताओं से।
जब से साक्षरता अभियान का लाभ चूहों को मिलना शुरू हुआ है। चूहे जान गए हैं कि उनको बकरा बनाकर, शातिर इंसान जब चाहे उनकी बलि दे देता है। जबकि कहां चूहा और कहां बकरा, किसमें अधिक गोश्त है सब जानते हैं।
अनाज बेच गया इंसान, फंस गया चूहा नन्ही सी जान। मढ़ दिया आरोप कि चूहे डकार गए जबकि डकारने के लिए तोंद की अनिवार्यता से इंकार नहीं किया जा सकता है। इतने महाशक्तिशाली हैं, सुपरचूहे हैं हम। जबकि चूहे का बित्ता भर पेट थोड़ा कुतरने भर से ही, अनाज की खुशबू से ही अफारा मारने लगता है और तुरंत किसी मेडिकल स्टोर में जाकर पुदीन हरा सूंघकर अपना इलाज खुद करने को मजबूर हो जाता है।
चूहों ने जब से चैनलों पर खबर को देखा-सुना और अखबारों को कुतरते हुए जानकारी ली है कि वे इंसान का करोड़ों का अनाज खा गए हैं। उन्हें पेड न्यूज में सच्चाई नजर आने लगी है। अब उन्हें कुछ भी कुतरना रुचिकर नहीं लग रहा है। कुतरने से उनका मोह भंग हो रहा है। चूहे खुद को इंसान की कुतरने की शक्ति के आगे शर्मिन्दा महसूस कर रहे हैं। पर चूहे हैं न, नेता तो हैं नहीं, जो प्रेस कांफ्रेंस कर डालें। कोशिश भी करेंगे तो बेहद चालाक इंसान बिल्लियों और कुत्तों के रूप में रिपोर्टर बनकर उनकी प्रेस कांफ्रेंस को शुरू होने से पहले ही तितर-बितर कर देगा।
चूहे उदास जरूर हैं पर मायूस नहीं हैं। चूहे शेर नहीं हैं पर चूहे हैं। वे लड़-भिड़ नहीं सकते परंतु दौड़-फुदक सकते हैं। उन्हें कुछ न सुनाई दे पर वे ‘नीरो की बांसुरी का स्वर सुनकर’ मग्न हो सकते हैं। वे डिफरेंट कलर में पृथ्वी पर मौजूद हैं। इंसान बतलाए कि कौन से रंगों के चूहों ने उनके करोड़ों के अनाज पर अपने दांतों की खुजली मिटाई है। मालूम चलेगा तो वे अपने वीर चूहों के लिए ‘ऑस्कर’ की सिफारिश जरूर करेंगे। नहीं तो गिन्नीज बुक ऑफ रिकार्ड्स में नाम तो दर्ज करवा ही लेंगे।
र्इश्वर ने जब सबको भरने के लिए पेट दिया है और भकोसने के लिए अन्न। फिर भी तथाकथित सभ्य लोग पेट में अन्न नहीं, विदेशी बैंकों में काले धन को सहेजने में बिजी हैं। इंसान सारे अनाज पर अपना जबरदस्ती का अधिकार जतलाकर, उन्हें कुतरने से महरूम करने की साजिश रच चुका है। चूहे छोटे जरूर हैं परंतु उनकी यह दलील जोरदार है कि देश की समृद्धि के सबसे बड़े दुश्मन नेता और नौकरशाह देश को लगातार कुतर रहे हैं।
बाबाओं को भी इस धंधे में स्वाद आने लगा है पर किसकी नीयत सच्ची है और किसकी बिल्कुल कच्ची, नाम के निर्मल मन के मैले के तौर पर ख्याति अर्जित कर चुके हैं। चूहे चाचा और मामा भी नहीं हैं फिर क्यों बिल्लियां उनकी मौसियां बनकर इतरा रही हैं। बादाम वे खा रही हैं और हमें सूखे अनाज पर टरका रही हैं। अब यह मामला ‘भूखों की अदालत’ में है, निर्णय की प्रतीक्षा चूहों को भी है और आम आदमी को भी, तब तक हम भी फैसले का इंतजार करते हैं ?
पेट्रोल की प्रेम पाती : नेशनल दुनिया 25 मई 2012 अंक में प्रकाशित
पेट्रोल की प्रगति देखकर सब दुखी हैं। यह नहीं देखते कि कितना उपयोगी है, उपयोगी है इसीलिए तो रेट बढ़ रहे हैं। पानी के क्या कम बढ़े हैं, पहले प्याऊ वगैरह में फ्री में इफरात में मिलता रहा है। अब बोतलों में हाजिर है। कितना जोखिम लेकर जी रहा हूं, तनिक सी चिंगारी स्वाह कर देती है मुझे। कोई आह भी नहीं कर पाता और स्वाहा हो जाता है। गर्मियों में तनिक सी गर्मी में ये दिमाग पर चढ़ गई तो क्या हो गया। पेट्रोल से जब इतना प्यार करते हो तो उसकी कीमतें बढ़ने को भीसहो। जिसे प्यार किया जाता है उसकी जायज मांगों के साथ, नाजायज मांगों को भी तो खुशी खुशी स्वीकारा जाता है। अभी तो साढ़े सात ही बढ़ाया है, एक सौ रुपये तो नहीं पहुंचाया है। पेट्रोल की प्यार कथा जारी है। खूब तन्मय होकर सुना रहा है।
क्या यह सही लगता कि रेट तो वही रहता और लीटर में मिलीलीटर घटाकर 300 कर दिए जाते। उसमें तो तुम्हारा ही नुकसान होता। देश की प्रगति का बढ़ता आंकड़ा ही नहीं दिखाई देता। फिर चिल्लाते कि नाप तोल कम कर दी है। हल्ला मचाते कि मिलीलीटर उतने ही रहने देते। महंगा चाहे बीस रुपये कर लेते। अब साढ़े सात रुपये बढ़ाये हैं, तो नानी याद आ रही है। नानी जब कहानियां सुनाती थीं तो कितना खुश होते थे। पेट्रोल के बहाने नानी और नानी के बहाने कहानी की याद। कितना दिल खुश होता है। जब याद आता है कि एक था राजा, एक थी रानी, दोनों मर गए, खत्म कहानी।
लो सुनो, नई कहानी - एक था पेट्रोल, एक था मिट्टी का तेल, एक डीजल भी है जिसमें जल नहीं है – तीनों के बढ़ गए हैं रेट, जाओ खोल दो खुशी के गेट। इसमें रोने की क्या बात है। नानी की याद आने वाली है। नानी जो कहानी सुनाती थी। जगते थे तो सुनते सुनते सो जाते थे। रोते थे तो सुनते सुनते सो जाते थे। हंसते थे तो सुनते सुनते हंसते ही रहते थे। नानी की याद कराना कोई हंसी खेल है। इतनी मुश्किलों से तो याद दिला रहेहैं। अभी एक पेट्रोल पम्प का ठेका मिल जाए,या मिट्टी के तेल का डिपो – फिर तो चाहोगे कि सरकार रोज ही रेट बढ़ाए या तुम्हें बढ़ाने दे। फिर नहीं चिल्लाओगे, पूरे मोहल्ले भर को मिठाई खिलाओगे। नुक्कड़ पर नाचोगे। पल पल पर पेट्रोल,घासलेट के बढ़ते रेटों को बांचोगे। समझ लो पेट्रोल पंप के मालिक हो गए हो। फिर क्या गम है,सबमें तुमसे और तुम्हारे में सबका दम है। जिस देश में रहते हो उसका ही विकास नहीं देख सकते। डीडीए के फ्लैटों के लिए आवेदन मांगे गए तो कितने सारे भर दिए,तब तो कोई नहीं चिल्लाया कि इतने पैसे क्यों मांग रहे हो, इतने रेट क्यों बढ़ा रहे हो और यहां पर 5 रुपये बढ़ने पर पैंट ढीली और गीली दोनों हो गई हैं।
सचिन खेलेंगे अब संसद में : नेशनल दुनिया 8 मई 2012 अंक में चिकोटी स्तंभ में प्रकाशित
हाथ में गिल्ली डंडा मतलब बैट बल्ला संभालने से अब मां-बाप बच्चों को इसलिए मना नहीं किया करेंगे। इस इसलिए में बहुत से किंतु किंतु हैं और परंतु एक भी नहीं है क्योंकि कैरियर के नजरिए से यह एक लाभकारी धंधा पहले से ही है और सचिन भगवान के राज्यसभा में पहुंचने से इस पर पक्की स्वर्णिम मुहर लग गई है। अरबपति होने का खूब सारा स्कोप है, छोटा सा भी ढाई तीन अक्षरों का नाम हो तो इतना फेमस हो जाता है कि भगवान के कोटि कोटि नाम भी इसके आगे अपनी चमक धुंधली कर बैठते हैं, इसमें मारे गए चौके छक्कों पर सिर्फ तालियां और हुड़दंग ही नहीं मचता है, अल्पवस्त्रों में बालाएं तन के साथ साथ मन से खुशी भी बिखेरती हैं, बिखेरना तो वह और भी बहुत कुछ चाहती हैं, पर सब कहां बिखेर पाती हैं, एक पूनम पांडेय ने सिर्फ कपड़े बिखरने की घोषणा की और बिना बिखेरे ही पता नहीं किन किनके दिल उधेड़ कर रख दिए, उससे उत्पन्न हुई राख को भी आज तक सहेजा नहीं जा सका है। खुशी बिखेरना उन कमनीय बालाओं का काम है जो चिमनी के माफिक तन और मन को यहां वहां यानी कहां कहां से चिकना कर डालती हैं, भारत रत्न नहीं मिला तो क्या हुआ, संभावना तो बनी हुई है। बल्कि इसलिए कि राज्य सभा की मेम्बरशिप भी बिना इलेक्शन लड़े मिलती है। कोई ऐसा काम नहीं है जो बैट बल्ला थामने वाले थाम न सकें।
बैट बल्ला थामे हुए ही अगर राज्य सभा में वह चौकस नजर आएं तो सदन में जूते-चप्पल, माइक, कुर्सियों के चलने की संभावना ही खत्म हो जाएगी और दूरदृष्टि का उपयोग करके सदन में हाजिर रहने के लिए हेलमेट, पैड, ग्लव्ज यानी दस्ताने, बैट बल्ला थामे हाथों से बचने के लिए तानने अनिवार्य कर दिए जाएंगे, मतलब कमाई का एक और स्कोप। बाहर खेला जाने वाला सट्टा सदन में एक एक गेंद पर खेला जाने लगेगा जिससे सवाल पेश करने के लिए नोट वसूलने के धंधे में बहुत तेजी से गिरावट आएगी। फिक्सिंग में तेजी जरूर आएगी। संभावना यह भी है कि अभिभावक अपने बच्चों के लिए नहीं, अपने लिए ही मन में खिलाड़ी बनने के सपने बुनने लगेंगे, चाहे इसके लिए उन्हें दिन में ही ओवरटाइम लगाकर ही सोना पड़े।
बिना वोट डाले ही चुने जाने की इसकी इतनी पक्की बुनियाद है कि इसकी बाहर दिखाई दे रही ईंटों को भी कोई नहीं हिला सकता। अभिनेता चुनाव लड़ें तो हार सकते हैं, अभिनेत्रियों में भी जीत की पूरी संभावनाएं नहीं होती हैं। लेकिन खिलाड़ी और वह भी क्रिकेट का हो तो समझ लीजिए कि हारेगा नहीं । आप उस खबर को याद करके मत डरिएगा कि धोनी को भी मौका आने पर धोने वालों ने नहीं बख्शा। आप देखेंगे कि एक दिन वे धोने वाले ही अपनी गलती पर जरूर पछताएंगे और धोनी को दुग्ध-शहद से स्वयं ही स्नान कराने के लिए ले जाएंगे। क्रिकेट के खेल में ऐसी ही किरपाएं हुआ करती हैं और इन किरपाओं के लिए बाबाओं की नहीं, पब्लिक की जरूरत ही होती है। पब्लिक जो भेड़ होते हुए भी भेड़ नहीं है। जब चाहती है तो वह भिड़ जाती है और दिल-दिमाग के सभी दरवाजे भेड़ कर भिड़ जाती है। आंखें, कान, मुंह बंद करके भिड़ जाती है। इस भिड़ने का अपना ही आनंद है और इस आनंद को या तो भेड़ अथवा भीड़ ही महसूस कर सकती है।
मेरा मानना है कि धंधा वही अच्छा जो बहुमुखी हो। धंधे में से इतने धंधे निकलें कि अंधों को भी बिना देखे साफ दिखाई दे रहे हों। खेल खेल में धंधा और हर धंधे में खेल। मेल मिलाप की इससे बड़ी मिसाल तो कोई हो ही नहीं सकती। जिसमें करेंसी नोटों का मिलन हो, खूब तेजी का चलन हो, उससे बलवान नहीं कोई पहलवान। काले गोरे नोटों का मामला तो बाद में उजागर होता है। बाबाओं के चमत्कार तो यही साबित कर रहे हैं, क्रिकेट का खेल भी इस मायने में किसी चमत्कार से कम नहीं है। आप जानते ही हैं कि इसकी वजह से हाकी, बैडमिटन के खिलाड़ी तक अनाड़ी सिद्ध हो रहे हैं। क्रिकेट को नमस्कार नहीं बल्कि चरण स्पर्श (पैरी पैना) किया जाता है, इसमें कोई धर्म आड़े नहीं आता है। इस खेल के खेलने वाले नहीं, देखने वाले मुरीदों की संख्या बेहिसाब है। बेहिसाब से यह मत सोचिएगा कि इसमें इस खेल को खेलने वालों को गिनती नहीं आती, क्या हुआ जो वे एम्पायर रखते हैं जबकि कितनी जीवंत कमेंट्रियां की जा रही होती हैं, लेकिन भरोसा सिर्फ एम्पायर पर ही होता है। यहां पर इतनी तरह की और इतनी गिनतियां गिनी जाती हैं कि जीवन के सभी पहाड़े यहां पर खाई हो जाते हैं। लेकिन इन खाईयों में भी इतना स्कोप है कि विदेशी पहाडों में भी संदेह नहीं, पूरा विश्वास है कि इससे बड्डा बिजनेस दूसरा हो ही नहीं सकता। आपके मन में कोई विचार आ रहा हो तो चुप मत रहिएगा, यह क्रिकेट का खेल है, खुलकर अपनी बात कहिएगा ?
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