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संसद और रुपये की गिरावट : जनवाणी 31 मई 2012 में प्रकाशित




संसद भी एक बाजार है बल्कि यूं कहना अधिक समीचीन होगा कि बाजार के दबाव से दब चुका है। आजकल उसे दबाया-सजाया जा रहा है। एक बाजार लोक के लिए है लेकिन इंटीरियर का काम राज्‍यसभा के लिए किया गया है। संसद में चीयर्स गर्ल्‍स, अरे, चीयर्स ग्‍लर्स नहीं आइटम गर्ल्‍स का जिक्र सुनकर आप चौंक जाएंगे। वैसे भी चौंकना अवाम के लिए जरूरी है। कभी उसे चैनल चौंकाते हैं, कभी बाबा और कभी सेलीब्रिटीज और बाजार ने तो चौंकाने का मानो ठेका ही उठा रखा है। अभिनेत्री रेखा का राज्‍य सभा में प्रवेश, उस रेखा को कभी न गरीब जन की चिंता रही है और न कभी जन-जन से जुड़े सरोकारों की। सेलीब्रिटीज का काम यूं ही चल जाता है। एक खिलाड़ी को राज्‍यसभा की ओर दौड़ाया गया है क्‍योंकि जुए और खेल में दौड़ना जरूरी है। फिक्सिंग के लिए दौड़ना, काली कमाई के लिए क्रिकेट में घोड़ों को खोलना है। दौड़ना सिर्फ दौड़ना है। दौड़ शुरू होती है और यकदम से भागमभाग में बदलती हुई दिखाई देती है। बाल फेंकने से लेकर रन के लिए दौड़ने का नंबर टीम में शामिल दौड़ में विजयी होने पर ही आ पाता है। जो विजयी होता है, वह फिर सभी प्रकार की दौड़ में पारंगत हो जाता है। पैसों के लिए दौड़ प्रमुख हो जाती है। पैसा जो चाहे काला है या गोरा है, बॉल नहीं है लेकिन सबसे अधिक उसी का बोलबाला है।
पहले सजना फिर दौड़ना। फिर संसद में बैठकर आपस में बोलते हुए सिरों को तोड़ना-फोड़ना – इतना सरल नहीं है, यह सब संसद में शक्ति-प्रदर्शन का परिचायक है। आसान तो फिक्सिंग भी नहीं है लेकिन क्‍या संसद में रेखा नहीं खींची जानी चाहिए, सो खींच दी गई। गरीबी की खींचना मुफीद नहीं रहता, सो अमीरी की खींची गई। खींचना जरूरी है, नहीं तो कोई भी आपको कब खींच देगा, आपको खिंचने के बाद ही मालूम चलेगा। अब इसमें भी आपत्तियां सामने आ रही हैं। आपत्ति-कार्य सबसे सरल है, इसे विरले नहीं करते। फिर भी शुक्र है कि सब नहीं करते हैं। कुछ करके माफी मांग लेते हैं क्‍योंकि वे माफी मांगकर मन में विभम्र पैदा करने में विशेषज्ञता रखते हैं। यह बाजार का मन पर छाया आधिपत्‍य है। फिर भी रेखा को राज्‍य सभा और सचिन को इस सभा में दौड़ने के लिए कहना, कठपुतली का खेल तो नहीं कहा जा सकता है। सचिन को ‘भारत रत्‍न’ न देने की विवशता को, नियमों को दरकिनार कर राज्‍य सभा की सदस्‍यता देकर बतौर मुआवजा दी गई। जैसे बच्‍चे को टाफी देकर बहला दिया जाता है और महंगा खिलौना बाद में देने का वायदा करके उसे फांस लिया गया, ताकि उसे फांस की चुभन न महसूस हो।
दौड़ सिर्फ शिखर के लिए ही नहीं होती है, डर के कारण भी दौड़ा जाता है। लोग डराने के लिए भी खूब तेजी से दौड़ते हैं लेकिन डर से दौड़ने वाले से कभी कोई बाजी नहीं मार पाया है। वह सदा आगे ही रहता है। किसी भी प्रकार की पकड़ की जकड़ से बचने के लिए यह सब करना आवश्‍यक है। अनेक बार न दौड़ने वाला भी शिखर पर दिखाई देता है। इसे‍ फिक्सिंग के जरिए शिफ्टिंग कह सकते हैं। शिफ्ट करने के लिए आजकल मजबूरों और मजदूरों की नहीं, लिफ्ट की जरूरत रहती है। राज्‍यसभा में सीट पक्‍की करना न लिफ्ट है, न शिफ्ट है, न फिक्‍स है – यह गिफ्ट है। गिफ्ट किसने किसे दिया है। गिफ्ट यानी उपहार – यह बिग हार है, शिखर पर पहुंचने के समान है। हार होकर भी हार में सबसे बड़ी जीत है। यही आज के बाजार की रीत है। सब इसी से प्रीत कर रहे हैं। घर, जेबें, महत्‍वाकांक्षाएं मन की पूरी कर रहे हैं।
संसद जिसमें अब बत्‍ती सिर्फ आती ही नहीं है, जाती भी है। सुगंध जाए, मत जाए लेकिन दुर्गंध घुसी चली आ रही है। यश और सत्‍ता के शीर्ष पर पहुंचाती है। शीर्ष पर पहुंचना शीर्षक बनना है। हर्ष ही इस खेल का उत्‍कर्ष है। यहां पर रन नहीं बनाए जाते हैं। यहां पर बेइंतहा ऊधम मचाकर भी शीर्षक बना जाता है। जोरों से चिल्‍लाते हैं। अपनी कहने को बौराते हैं, खूब तूती बजाते हैं। उस समय लगता है कि मानो संसद नक्‍कारखाना हो, सब अपनी-अपनी तूतियां बजा रहे हैं। पुंगियों की आवाज कोई सुनना नहीं चाहता है। सुन तो कोई तूतियों की आवाज भी नहीं रहा है। जब सब एक साथ बजाएंगे तो कैसे सुन पाएंगे।  कान पक रहे हैं, कच्‍चे न रह जाएं यानी बौराना सत्‍ता का पागलपन है। इसी पागलपन में छिपा अपनापन है। यही सपना था जो अब वास्‍तविकता है। तय है, सपने सपने ही रह जाते हैं जो दूर नहीं दिखाई देते हैं। वह भी वास्‍तविकता के जगत में जमे नजर आते हैं।
संसद पर बाजार का दबाव बढ़ता जा रहा है। यह कैसा विकास है कि रुपया तो गिर रहा है लेकिन उसे गिराने में कौन सी ताकतें सक्रिय हैं, इसका आभास जनता को नहीं हो रहा है, अगर आप जानते हैं तो जनता के ज्ञान में इजाफा जरूर करिएगा।

संसद में एक रेखा जरूरी थी ... : डेली न्‍यूज एक्टिविस्‍ट में 23 मई 2012 को प्रकाशित

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संसद भी एक बाजार है बल्कि यूं कहना अधिक समीचीन होगा कि बाजार के दबाव से दब चुका है। आजकल उसे दबाया-सजाया जा रहा है। एक बाजार लोक के लिए है, लेकिन इंटीरियर का काम राज्यसभा के लिए किया गया है। संसद में चीयर्स गर्ल्स या कहें आएटम गर्ल्स का जिक्र सुनकर आप चौंक जाएंगे। वैसे भी चौंकना अवाम के लिए जरूरी है। कभी उसे चैनल चौंकाते हैं, कभी बाबा और कभी सेलेब्रिटीज और बाजार ने तो चौंकाने का मानो ठेका ही उठा रखा है। अभिनेत्री रेखा का राज्य सभा में प्रवेश, इस रेखा को कभी न गरीब जन की चिंता रही है और न कभी जन-जन से जुड़े सरोकारों की। सेलेब्रिटीज का काम यूं ही चल जाता है। एक खिलाड़ी को राज्यसभा की ओर दौड़ाया गया है, क्योंकि जुए और खेल में दौड़ना जरूरी है। फिक्सिंग के लिए दौड़ना, काली कमाई के लिए क्रिकेट में घोड़ों को खोलना है। दौड़ना सिर्फ दौड़ना है। दौड़ शुरू होती है और एकदम से भागमभाग में बदलती हुई दिखाई देती है। बाल फेंकने से लेकर रन के लिए दौड़ने का नंबर टीम में शामिल दौड़ में विजयी होने पर ही आ पाता है। जो विजयी होता है, वह फिर सभी प्रकार की दौड़ में पारंगत हो जाता है। पैसों के लिए दौड़ प्रमुख हो जाती है। पैसा जो चाहे काला है या गोरा है, बॉल नहीं है, लेकिन सबसे अधिक उसी का बोलबाला है। पहले सजना फिर दौड़ना। फिर संसद में बैठकर आपस में बोलते हुए सिरों को तोड़ना-फोड़ना इतना सरल नहीं है, यह सब संसद में शक्ति-प्रदर्शन का परिचायक है। आसान तो फिक्सिंग भी नहीं है लेकिन क्या संसद में रेखा नहीं खींची जानी चाहिए, सो खींच दी गई। गरीबी की खींचना मुफीद नहीं रहता, सो अमीरी की खींची गई। खींचना जरूरी है, नहीं तो कोई भी आपको कब खींच देगा, आपको खिंचने के बाद ही मालूम चलेगा। अब इसमें भी आपत्तियां सामने आ रही हैं। आपत्ति सबसे सरल है, इसे विरले नहीं करते। फिर भी शुक्र है कि सब नहीं करते हैं। कुछ करके माफी मांग लेते हैं, क्योंकि वे माफी मांगकर मन में विभम्र पैदा करने में विशेषज्ञता रखते हैं। यह बाजार का मन पर छाया आधिपत्य है। फिर भी रेखा को राज्यसभा और सचिन को इस सभा में दौड़ने के लिए कहना, कठपुतली का खेल तो नहीं कहा जा सकता है। सचिन को ‘भारत रत्न’ न दे पाने की विवशता के कारण उन्हें राज्यसभा की सदस्यता बतौर मुआवजा दी गई है। जैसे बच्चे को टॉफी देकर बहला दिया जाता है और महंगा खिलौना बाद में देने का वायदा करके फांस लिया जाता है। टॉफी की वजह से उसे फांस की चुभन महसूस नहीं होती। दौड़ सिर्फ शिखर के लिए ही नहीं होती है, डर के कारण भी दौड़ा जाता है। लोग डराने के लिए भी खूब तेजी से दौड़ते हैं, लेकिन डर से दौड़ने वाले से कभी कोई बाजी नहीं मार पाया है। वह सदा आगे ही रहता है। किसी भी प्रकार की पकड़ की जकड़ से बचने के लिए यह सब करना आवश्यक है। अनेक बार न दौड़ने वाला भी शिखर पर दिखाई देता है। इसे फिक्सिंग के जरिए शिफ्टिंग कह सकते हैं। शिफ्ट करने के लिए आजकल मजबूरों और मजदूरों की नहीं लिफ्ट की जरूरत रहती है। राज्यसभा में सीट पक्की करना न लिफ्ट है, न शिफ्ट है, न फिक्स है- यह गिफ्ट है। गिफ्ट किसने किसे दिया है। गिफ्ट यानी उपहार, यह बिग हार है, शिखर पर पहुंचने के समान है। हार होकर भी हार में सबसे बड़ी जीत है। यही आज के बाजार की रीत है। अब इसी से सबकी प्रीत हैं। सब ऐसे ही मन की महत्वाकांक्षाएं पूरी कर रहे हैं। संसद जिसमें अब बत्ती सिर्फ आती ही नहीं है, जाती भी है। सुगंध आए या मत आए लेकिन दरुगध घुसी चली आ रही है। यह दरुगध यश और सत्ता के शीर्ष पर पहुंचाती है। शीर्ष पर पहुंचना शीर्षक बनना है। हर्ष ही इस खेल का उत्कर्ष है। यहां पर रन नहीं बनाए जाते हैं। यहां पर बेइंतहा ऊधम मचाकर भी शीर्षक बना जाता है। जोरों से चिल्लाते हैं। अपनी कहने को बौराते हैं, खूब तूती बजाते हैं। उस समय लगता है कि मानो संसद नक्कारखाना हो, सब अपनी-अपनी तूतियां बजा रहे हैं। पुंगियों की आवाज कोई सुनना नहीं चाहता है। सुन तो कोई तूतियों की आवाज भी नहीं रहा है। जब सब एक साथ बजाएंगे तो कैसे सुन पाएंगे? कान पक रहे हैं, कच्चे न रह जाएं यानी बौराना सत्ता का पागलपन है। इसी पागलपन में छिपा अपनापन है। यही सपना था जो अब वास्तविकता है। तय है, सपने-सपने ही रह जाते हैं। जो दूर नहीं दिखाई देते हैं, वह भी वास्तविकता के जगत में जमे नजर आते हैं। संसद पर बाजार का दबाव बढ़ता जा रहा है। यह कैसा विकास है कि रुपया तो गिर रहा है, लेकिन उसे गिराने में कौन सी ताकतें सक्रिय हैं, इसका आभास जनता को नहीं हो रहा है, अगर आप जानते हैं तो जनता के ज्ञान में इजाफा जरूर करिएगा।

सचिन खेलेंगे अब संसद में : नेशनल दुनिया 8 मई 2012 अंक में चिकोटी स्‍तंभ में प्रकाशित



हाथ में गिल्‍ली डंडा मतलब बैट बल्‍ला संभालने से अब मां-बाप बच्‍चों को इसलिए मना नहीं किया करेंगे। इस इसलिए में बहुत से किंतु किंतु हैं और परंतु एक भी नहीं है क्‍योंकि कैरियर के नजरिए से यह एक लाभकारी धंधा पहले से ही है और सचिन भगवान के राज्‍यसभा में पहुंचने से इस पर पक्‍की स्‍वर्णिम मुहर लग गई है। अरबपति होने का खूब सारा स्‍कोप है, छोटा सा भी ढाई तीन अक्षरों का नाम हो तो इतना फेमस हो जाता है कि भगवान के कोटि कोटि नाम भी इसके आगे अपनी चमक धुंधली कर बैठते हैं, इसमें मारे गए चौके छक्‍कों पर सिर्फ तालियां और हुड़दंग ही नहीं मचता है, अल्‍पवस्‍त्रों में बालाएं तन के साथ साथ मन से खुशी भी बिखेरती हैं, बिखेरना तो वह और भी बहुत कुछ चाहती हैं, पर सब कहां बिखेर पाती हैं, एक पूनम पांडेय ने सिर्फ कपड़े बिखरने की घोषणा की और बिना बिखेरे ही पता नहीं किन किनके दिल उधेड़ कर रख दिए, उससे उत्‍पन्‍न हुई राख को भी आज तक सहेजा नहीं जा सका है। खुशी बिखेरना उन कमनीय बालाओं का काम है जो चिमनी के माफिक तन और मन को यहां वहां यानी कहां कहां से चिकना कर डालती हैं, भारत रत्‍न नहीं मिला तो क्‍या हुआ, संभावना तो बनी हुई है। बल्कि इसलिए कि राज्‍य सभा की मेम्‍बरशिप भी बिना इलेक्‍शन लड़े मिलती है। कोई ऐसा काम नहीं है जो बैट बल्‍ला थामने वाले थाम न सकें।
बैट बल्‍ला थामे हुए ही अगर राज्‍य सभा में वह चौकस नजर आएं तो सदन में जूते-चप्‍पल, माइक, कुर्सियों के चलने की संभावना ही खत्‍म हो जाएगी और दूरदृष्टि का उपयोग करके सदन में हाजिर रहने के लिए हेलमेट, पैड, ग्‍लव्‍ज यानी दस्‍ताने, बैट बल्‍ला थामे हाथों से बचने के लिए तानने अनिवार्य कर दिए जाएंगे, मतलब कमाई का एक और स्‍कोप। बाहर खेला जाने वाला सट्टा सदन में एक एक गेंद पर खेला जाने लगेगा जिससे सवाल पेश करने के लिए नोट वसूलने के धंधे में बहुत तेजी से गिरावट आएगी। फिक्सिंग में तेजी जरूर आएगी। संभावना यह भी है कि अभिभावक अपने बच्‍चों के लिए नहीं, अपने लिए ही मन में खिलाड़ी बनने के सपने बुनने लगेंगे, चाहे इस‍के लिए उन्‍हें दिन में ही ओवरटाइम लगाकर ही सोना पड़े।  
बिना वोट डाले ही चुने जाने की इसकी इतनी पक्‍की बुनियाद है कि इसकी बाहर दिखाई दे रही ईंटों को भी कोई नहीं हिला सकता। अभिनेता चुनाव लड़ें तो हार सकते हैं, अभिनेत्रियों में भी जीत की पूरी संभावनाएं नहीं होती हैं। लेकिन खिलाड़ी और वह भी क्रिकेट का हो तो समझ लीजिए कि हारेगा नहीं । आप उस खबर को याद करके मत डरिएगा कि धोनी को भी मौका आने पर धोने वालों ने नहीं बख्‍शा। आप देखेंगे कि एक दिन वे धोने वाले ही अपनी गलती पर जरूर पछताएंगे और धोनी को दुग्‍ध-शहद से स्‍वयं ही स्‍नान कराने के लिए ले जाएंगे। क्रिकेट के खेल में ऐसी ही किरपाएं हुआ करती हैं और इन किरपाओं के लिए बाबाओं की नहीं, पब्लिक की जरूरत ही होती है। पब्लिक जो भेड़ होते हुए भी भेड़ नहीं है। जब चाहती है तो वह भिड़ जाती है और दिल-दिमाग के सभी दरवाजे भेड़ कर भिड़ जाती है। आंखें, कान, मुंह बंद करके भिड़ जाती है। इस भिड़ने का अपना ही आनंद है और इस आनंद को या तो भेड़ अथवा भीड़ ही महसूस कर सकती है।

मेरा मानना है कि धंधा वही अच्‍छा जो बहुमुखी हो। धंधे में से इतने धंधे निकलें कि अंधों को भी बिना देखे साफ दिखाई दे रहे हों। खेल खेल में धंधा और हर धंधे में खेल। मेल मिलाप की इससे बड़ी मिसाल तो कोई हो ही नहीं सकती। जिसमें करेंसी नोटों का मिलन हो, खूब तेजी का चलन हो, उससे बलवान नहीं कोई पहलवान। काले गोरे नोटों का मामला तो बाद में उजागर होता है। बाबाओं के चमत्‍कार तो यही साबित कर रहे हैं, क्रिकेट का खेल भी इस मायने में किसी चमत्‍कार से कम नहीं है। आप जानते ही हैं कि इसकी वजह से हाकी, बैडमिटन के खिलाड़ी तक अनाड़ी सिद्ध हो रहे हैं। क्रिकेट को नमस्‍कार नहीं बल्कि चरण स्‍पर्श (पैरी पैना) किया जाता है, इसमें कोई धर्म आड़े नहीं आता है। इस खेल के खेलने वाले नहीं, देखने वाले मुरीदों की संख्‍या बेहिसाब है। बेहिसाब से यह मत सोचिएगा कि इसमें इस खेल को खेलने वालों को गिनती नहीं आती, क्‍या हुआ जो वे एम्‍पायर रखते हैं जबकि कितनी जीवंत कमेंट्रियां की जा रही होती हैं, लेकिन भरोसा सिर्फ एम्‍पायर पर ही होता है। यहां पर इतनी तरह की और इतनी गिनतियां गिनी जाती हैं कि जीवन के सभी पहाड़े यहां पर खाई हो जाते हैं। लेकिन इन खाईयों में भी इतना स्‍कोप है कि विदेशी पहाडों में भी संदेह नहीं, पूरा विश्‍वास है कि इससे बड्डा बिजनेस दूसरा हो ही नहीं सकता। आपके मन में कोई विचार आ रहा हो तो चुप मत रहिएगा, यह क्रिकेट का खेल है, खुलकर अपनी बात कहिएगा ?