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चूहे फुल फ्लेज्‍ड खुंदक में हैं : डेली न्‍यूज एक्टिविस्‍ट में 12 जून 2012 अंक में प्रकाशित


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चूहे फुल फ्लेज्‍ड खुंदक में हैं। खुदंक चुहियों को भी आ रही है। वैसे खुश भी हैं चुहियाएं कि उनके चूहेदेवों को करोड़ों का अनाज खाने के तमगे से सम्‍मानित किया गया है। चूहे करोड़पति हुए न, सुन लो बिग बी। चूहे भी बन गए हैं करोड़पति, चाहे करोड़ों का अन्‍न खाकर ही, जरूरी थोड़े ही है कि सवालों के जवाब देकर ही, वह भी दर्शकों की राय, दोस्‍तों को फोन करके या जोखिम लेकर सवालों के जवाब देकर ही असली करोड़पति बना जा सकता है। मोबाइल फोन हो तो एसएमएस भेजकर लखपति बना जा सकता है। चूहे अनाज खाकर, चाहे बित्‍ता भर ही पेट है उनका, डकार लेने के हकदार साबित हुए हैं। डकार लेना और डकारना कोई इत्‍ता आसान नहीं है। पर चूहे सीख गए हैं नौकरशाहों से और नेताओं से, यह साबित किया जा रहा है।
जब से साक्षरता अभियान का लाभ चूहों को मिलना शुरू हुआ है। यह तो इंसानों का उन पर किया गया एक्‍सपेरीमेंट ही था जो एक्‍सपायर नहीं हुआ, हंड्रेड परसेंट विक्‍ट्री मिली। नहीं ऑस्‍कर या दादा साहेब फाल्‍के मिला तो क्‍या हुआ, सफलता पुरस्कारों से नहीं, कारनामों से मिलती है, कारगुजारियों के कर गुजरने से मिलती है। चूहे जान गए हैं कि उनको बकरा बनाकर, शातिर इंसान जब चाहे उनकी बलि दे देता है। जबकि कहां चूहा और कहां बकरा, किसमें अधिक गोश्‍त है सब जानते हैं। इंसान ने शैतान को भी मात अपनी इन करारी मातों से ही दी है और रोजाना इसमें बढ़ोतरी हो रही है। इंसान करतूतों को कारनामा बनाने की कूबत रखता है।
अनाज बेच गया इंसान, फंस गया चूहा नन्‍ही सी जान। मढ़ दिया आरोप कि चूहे डकार गए जबकि डकारने के लिए तोंद की अनिवार्यता से इंकार नहीं किया जा सकता है। एक, दो, हजार, पांच, दस हजार, पचास लाख का नहीं, करोड़ों का अन्‍न, कितना बड़ा बतलाया है इंसान ने चूहे का मन। इंसान की उदारता है कि इत्‍ती बिग चोरी होने के बाद भी सब कुछ कर गुजरने में सक्षम इंसान, निरुपाय, निस्‍सहाय भाव से महसूसता रहा। चूहे जो इस आरोप को हज़म नहीं कर पा रहे हैं, वे करोड़ों का अनाज कैसे डकार गए, तो इतने महाशक्तिशाली हैं, सुपरचूहे हैं हम। जबकि चूहे का बित्‍ता भर पेट थोड़ा कुतरने भर से ही, अनाज की खुशबू से ही अफारा मारने लगता है और तुरंत किसी मेडिकल स्‍टोर में जाकर पुदीन हरा सूंघकर अपना इलाज खुद करने को मजबूर हो जाता है। तोंदियल तक गले भरने के बाद भी डकार नहीं लेते हैं। फिर चूहे और डकार – कित्‍ता बड़ा विरोधाभास है।
चूहों ने जब से चैनलों पर खबर को देखा-सुना और अखबारों को कुतरते हुए जानकारी ली है कि वे इंसान का करोड़ों का अनाज खा गए हैं। उन्‍हें पेड न्‍यूज में सच्‍चाई नजर आने लगी है। अब उन्‍हें कुछ भी कुतरना रुचिकर नहीं लग रहा है। कुतरने से उनका मोह भंग हो रहा है। चूहे खुद को इंसान की कुतरने की शक्ति के आगे शर्मिन्‍दा महसूस कर रहे हैं। पर चूहे हैं न, नेता तो हैं नहीं, जो प्रेस कांफ्रेंस कर डालें। कोशिश भी करेंगे तो बेहद चालाक इंसान बिल्लियों और कुत्‍तों के रूप में रिपोर्टर बनकर उनकी प्रेस कांफ्रेंस को शुरू होने से पहले ही तितर-बितर कर देगा। इंसानों के और उनके स्‍वामी श्रीगणेशजी का नाम प्रत्‍येक अच्‍छे काम के शुरू करने को श्रीगणेश करना कहा जाता है तो उनका बित्‍ते भर के पेट में मौजूद जीरा के आकार का कलेजा यान जिगर जल भुन जाता है।
चूहे चीत्‍कार भी करेंगे, चिल्‍लाएंगे भी तो अपने गले में ही खराश करेंगे और उनकी इतनी कोशिश उनकी जान जाने का सबब भी बन सकती है। जबकि इंसान के कानों में मक्‍खी जैसी भिनभिनाहट या मच्‍छर जैसी गुनगुनाहट महसूस नहीं होगी। चूहे उदास जरूर हैं पर मायूस नहीं हैं। चूहे शेर नहीं हैं पर चूहे तो हैं। वे लड़-भिड़ नहीं सकते परंतु दौड़-फुदक तो सकते हैं। उन्‍हें कुछ न सुनाई दे पर वे ‘नीरो की बांसुरी का स्‍वर सुनकर’ मग्‍न हो सकते हैं। वे डिफरेंट कलर में पृथ्‍वी पर मौजूद हैं। इंसान बतलाए कि कौन से रंगों के चूहों ने उनके करोड़ों के अनाज पर अपने दांतों की खुजली मिटाई है। मालूम चलेगा तो वे अपने वीर चूहों के लिए ‘ऑस्‍कर’ की सिफारिश जरूर करेंगे। नहीं तो गिन्‍नीज बुक ऑफ रिकार्ड्स में नाम तो दर्ज करवा ही लेंगे।
चूहे आज पहली बार खुदक में नहीं हैं। वे तब से ही खुंदक में हैं जब से पुलिस वालों ने उन पर दारू की बोतलों के ढक्‍कन कुतर कर सैकड़ों बरामद शराब की पेटियों को पीने का संगीन आरोप लगाया है। चूहे बहुत सह जाते हैं लेकिन अब वे गंभीर रूप से चिंतित हैं। उनका चिंतन उनके लिए जायज, एक ‘जून क्रांति’ का आगाज़ है, फिर भी इंसान के लिए नाजायज है। र्इश्‍वर ने जब सबको भरने के लिए पेट दिया है और भकोसने के लिए अन्‍न। फिर भी त‍थाकथित सभ्‍य लोग पेट में अन्‍न नहीं, विदेशी बैंकों में काले धन को सहेजने में बिजी रहते हैं। इंसान सारे अनाज पर अपना जबरदस्‍ती का अधिकार जतलाकर, उन्‍हें कुतरने से महरूम करने की साजिश रच चुका है। चूहे छोटे जरूर हैं परंतु उनकी यह दलील जोरदार है कि देश की, मानवीयता की समृद्धि के सबसे बड़े दुश्‍मन नेता और नौकरशाह देश को लगातार कुतर रहे हैं।
बाबाओं को भी इस धंधे में स्‍वाद आने लगा है पर किसकी नीयत सच्‍ची है और किसकी बिल्‍कुल कच्‍ची, नाम के निर्मल मन के मैले के तौर पर ख्‍याति अर्जित कर चुके हैं। जानकर भी कोई पुख्‍ता सबूत नहीं पेश कर पा रहा है। उनके द्वारा अनाज को कुतरना भी साबित नहीं होगा लेकिन बहुत बड़ी समस्‍याओं को छोटा करने के लिए, ऐसे बवाल मचाना इंसान की आधुनिक संस्‍कृति का अंश है। डकारना तो उनका भी साबित नहीं होगा बशर्ते सीसीटीवी के कैमरे न लगा दिए जाएं। वैसे चूहे इंसान जितने चालाक नहीं हैं। चूहे चाचा और मामा भी नहीं हैं फिर क्‍यों बिल्लियां उनकी मौसियां बनकर इतरा रही हैं। बादाम वे खा रही हैं और हमें सूखे अनाज पर टरका रही हैं। अब यह मामला ‘भूखों की अदालत’ में है, निर्णय की प्रतीक्षा चूहों को भी है और आम आदमी को भी, तब तक हम भी फैसले का इंतजार करते हैं ?

परमानेंट संन्‍यासी प्‍यारे मोहन : डेली न्‍यूज एक्टिविस्‍ट में 4 जून 2012 को प्रकाशित

संन्‍यासी बनने के कई नेक लाभ हैं। बिग बास में लियोनी को खुली आंखों से देख सकते हैं। उनसे शेक हैंड कर सकते हैं।  आई पी एल में पूनम पांडेय दिखती हैं। यह दिखने-दिखाने का बाजार बहुत हॉट है। दिखाने वाले रेडी हैं। कल अगले दिवस की पूर्व संध्‍या पर जब पीएम ने मुझे फोन करके बतलाया कि आरोप रोपने दूं या रोक दूं। मैंने उन्‍हें सलाह दी कि आरोप रोपने देने में कोई बुराई नहीं है, बस वे अंकुरित नहीं होने चाहिएं।  फिर आप अपने संन्‍यासी बनने के फैसले पर अडिग रह सकते हैं और इसमें तनिक भी जोखिम नहीं है। अडिग रहने का आपको सख्‍त अनुभव है। जब आप मौनी बाबा बन जाते हैं तब आपसे कोई बुलवा नहीं सकता। मुझे लगता है कि यह आपका सत्‍ता योग का अधिकतम सुफल लेने का अपना बेहद निजी तरीका है। आपको कई जगह पर हां या न करने की जरूरत नहीं पड़ती और मौन सारे कार्य निपटा देता है। यह निपटना ही दरअसल प्रत्‍येक प्रकार की समस्‍याओं से सुलटना है। इसी से देश की समस्‍याएं भी टलती रही हैं और लोक पा(ग)ल बनते रहे हैं पर लोकपाल नहीं बनना इसलिए नहीं बनता है। संन्‍यासी की लटें सदा ओजस्विता में बढ़ोतरी करती हैं।
मैं फोन का जिक्र इसलिए निडर होकर कर रहा हूं क्‍योंकि कार्टून नहीं बना रहा हूं। कार्टून बना रहा होता तो जरूर मेरी डर के मारे घिग्‍घी बन गई होती और मैं कार्टून बनाने से पहले ही बेहोश हो गया होता या कर दिया गया होता। अब चूंकि मैं व्‍यंग्‍य लिख रहा हूं और आज तक किसी व्‍यंग्‍यकार को उसके व्‍यंग्‍य के लिए सजा या प्रताडि़त करने की मिसाल इसलिए नहीं मिलती है क्‍योंकि लोग देख कर समझने में विश्‍वास रखते हैं। पढ़कर समय बेकार करने में उनका यकीन नहीं होता। अब आप इस न पढ़ने के रुझान  का प्रभाव देख लीजिए कि लेखक को प्रकाशक निचोड़ता रहता है और लेखक नींबू की तरह पूरा निचुड़ जाने और पाठकों को ठंडक व खटाई पहुंचाने में खप जाता है। इस मेहनत के लिए उसे मजदूर की श्रेणी में भी नहीं लाया गया है और उसे न्‍यूनतम मजदूरी के लायक भी नहीं समझा जाता है। लेखक वही जो बेगार करे, लिख लिखकर बेकार पन्‍नों को काला करे और सरकार कागज को कोरा ही रहने दे। किसी भी प्रकार के कारधारक होने के तो फायदे अब रहे नहीं हैं। यह सब पेट्रोल की बदमाशी है। अब साइ्रकिल अथवा रिक्‍शाधारक होना खूब सुकून देता है।
आरोप रोपने के बाद अंकुरित होगा या नहीं होगा। इस बारे में राजनैतिक किसान जानते हैा कि खेती और फसल वाले सारे नियम यहां लागू नहीं होते हैं। सियासत के नियम खूब लचीले होते हैं और सत्‍तासीन उन्‍हें लीची सरीखा बना लेते हैं। लीची की रसधार खूब गुदगुदाती है और अधिक चाहिए तो रसभरी ले आइए। जैसे लियोनी की देह और पूनम पांडेय के वस्‍त्रों को सब निगाह में ही खींच उधेड़ डालते हैं। यह कपड़ों से वीतरागीपन है । संन्‍यासी भी सिर्फ एक ही कार्य कर सकता है। ऐसा नहीं है, आजकल के संन्‍यासी भी मल्‍टीटॉस्किंग में भरोसा रखते हैं। पहले संन्‍यास सिर्फ गृहस्‍थ धर्म से मुक्ति पाने के अर्थ में प्रयोग किया जाता था, जिसे आज दुरुपयोग समझा जाता है। संन्‍यास चाहे जिससे ले लो। लो मत सिर्फ घोषणा ही कर दो और सारे लाभ झटक लो। संन्‍यास लो और किसी के साथ भी लटक लो। कोई भटक जाए पर आप लटकना मत छोडि़ए।
आप मन मोहन के साथ संन्‍यासी परमानेंट मोहन हैं, इसे मत भूलिएगा। इसी के बल पर आप जमे रहेंगे और कोई फसल का एक पौधा भी नहीं उखाड़ पाएगा। कोशिश करेगा तो बुरी तरह पिछड़ जाएगा। संन्‍यासी के लिए मंदिर बेहद मुफीद जगह है। वैसे पहले पहाड़ और उनकी गुफाएं हुआ करती थीं, आजकल विदेशी बैंक हुआ करते हैं। इतना अंतर तो तकनीक की प्रगति के साथ अपेक्षित है प्‍यारे मोहन जी। मोहन जी को मेरी बातों में हनी का आस्‍वादन हो रहा था और इसके विपरीत वह संन्‍यासी होने के लिए भा‍षणिक रूप से तैयार चुके हैं। इसी आस्‍वाद में रमण करते करते वह हनी में डूबने उतराने लगे और उन्‍हें बेहद रंगीले संगीन सपने आंखों में आने लगे, दिल में समाने लगे। वही सपने रूप बदलकर प्‍यारे मोहन जी अब पब्लिक को दिखला रहे हैं और पब्लिकसिटी का भरपूर फायदा उठा रहे हैं। इस प्रकार के फायदे उठाने में जोर नहीं लगता है और इससे पैदा हुए उभार भी दिखलाई नहीं देते हैं, इसलिए इन्‍हें भार नहीं माना जाता। वैसे भी उभार मन को ललचाते रहे हैं।
पीएम की बातों के रस रहस्‍य जंगल में मुझे भी आनंद आने लगा था और में व्‍यंग्‍य की कार छोड़कर अब रिक्‍शा चलाने लगा था। यह सलाह भी प्‍यारे मोहन ने ही फोन पर बातचीत में दी थी ताकि बढ़े हुए पेट्रोल रेटों का वेट व्‍यंग्‍यलेखक की रूखी सूखी काया पर असर न डाल सके। आप भी मेरी तरह प्‍यारे मोहन जी की राय से सहमत हैं न ?


आज 'भारत बंद' है, चलो चलकर खोलें : डेली न्‍यूज एक्टिविस्‍ट में 31 मई 2012 को प्रकाशित



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‘आज मोहब्‍बत बंद है’ गीत फिजा में गूंज रहा है जबकि ‘आज भारत बंद है’ जब भारत बंद होगा तो मोहब्‍बत पर तो अपने आप ही लॉक लग जाएगा। पहले चार अक्षर उस लोकप्रिय फिल्‍मी गीत के नाम, जिसने मोहब्‍बत को बंद बतला कर एक जमाने में मोहब्‍बत करने वालों के कलेजे में तूफान मचा दिया था, वैसे ही जैसे अंधड़ आता है। उसी गीत का सकारात्‍मक संदेश यह है कि मोहब्‍बत तो बंद हो सकती है लेकिन हिंसा, रक्‍तपात, खून खराबा, मारपीटी नहीं शुरू होनी चाहिए। इसके विपरीत आज भारत बंद और उधर हिंसा का नंगा नाच ओपन हो चुका है, जिसमें नाचने वाले नेताओं के शागिर्द होते हैं, वे ऊधम, हो हल्‍ले, हंगामे को नाच बतलाते नहीं शर्माते हैं। इन्‍हें आप भाईजी, गुंडे, बाउंसर, सक्रिय कार्यकर्ता इत्‍यादि नामों से पहचानते हैं। वैसे सच्‍चाई यह है कि धरती का आधार प्रेम है। प्रेम से ताकतवर कुछ नहीं है। प्रेम के बिना झगड़े भी नहीं है। किसी से प्रेम होगा तो किसी से उसी प्रेम के लिए झगड़ा भी होगा। यही इस सृष्टि का सनातन सत्‍य है। इसमें कोई बुराई नहीं है। यह बुराई न हो तो आप अच्‍छाई को न तो पहचान ही पाएं और न उसका उचित मोल ही लगा पाएं। बाजारवाद के इस युग में कीमत लगाना बहुत जरूरी है क्‍योंकि जब तक कीमत नहीं लगती, तब तक जनता मत नहीं देती है। लोकतंत्र में मत शक्तिस्‍वरूपा है।
भारत बंद बुराईयों को हटाने के लिए प्रेम का शक्ति प्रदर्शन है। बुराईयां जिन्‍हें सत्‍ता वाले अच्‍छाईयां मानते हैं और बे-सत्‍ता वाले ? विरोध करने का एक तरीका भारत बंद करने का चला आ रहा है। महात्‍मा गांधी जी ने अनशन का रास्‍ता अपनाया। बे-सत्‍ता वालों ने भारत बंद का। लेकिन मेरी समझ में अब तक यह समझ नहीं आया कि ‘भारत बंद’ कहां पर किया जाता है। इसके लिए किसी भारत घर की व्‍यवस्‍था नहीं है। काले धन की तरह इसे किसी विदेशी भूमि पर बंधक नहीं बनाया जा सकता है। चिडि़याघर काफी लंबे चौड़े होते हैं लेकिन उसमें से चिडि़यों को बाहर निकालें, तब भारत को बंद करने की सोचें। परंतु चिडि़याएं कौओं के लिए अपना घर खाली करने से रहीं और अपने साथ तो वे उन्‍हें रखेंगी नहीं। और उस छोटे से चिडि़याघर में भारत को कैसे बंद कर पाएंगे। लेकिन फिर भी जब बे-सत्‍ता वाले कह रहे हैं तो कुछ जानते होंगे तभी तो कह रहे हैं। फिर भी मेरा कवि मन कह रहा है कि हो सकता है कि वे प्रतीक तौर पर भारत बंद का शोर मचाते हों। करते तो हों दुकानें बंद, मार्केट बंद, आफिस बंद, यातायात बंद, सिनेमा हाल बंद और चिल्‍लाते हैं कि कर दिया भारत बंद। माना कि भारत दुकानों में बसता है, बसों में टहलता है, ऑटो और टैक्सियों में सफर करता है, रिक्‍शे पर सवारी करता है, किसी को पैदल भी नहीं निकलने देंगे और खुद भाईगिरी करते छुट्टे घूमेंगे। गाय की तरह तो घूमने से रहे, सांड की तरह ही घूमेंगे। सोचते हैं कि उनकी इस बहादुरी से सत्‍ता उनके सामने घुटने टेक देगी जबकि सत्‍ता यानी सरकार के घुटने कभी अपने नहीं हुए, वह तो सदा इसके उसके तेरे या मेरे घुटनों का इस्‍तेमाल करती है। रही बात टी वी और अखबार वालों की उनको इसलिए बंद नहीं करते कयोंकि उनके सहयोग के बिना इनके कारनामे जग जाहिर कैसे होंगे और इन्‍हें यह भारत बंद से अलग रखना चाहते हैं। नेता बंद कैसे होंगे, वे तो चौबीस घंटे में 96 घंटे खुले रहते हैं। न्‍यू मीडिया पर अभी सरकार का ही बस नहीं चल रहा है तो इन बे-सत्‍तावासियों का कैसे चलेगा। वे भी इनके प्रचार में सगे भाई का रोल कर रहे हैं।

भारत, भारत न हुआ कोई गुनहगार हो गया। इसे तुरंत बंद कर दो। पेट्रोल के रेट कैसे बढ़ाए, सीएनजी के रेट क्‍यों बढ़ाए, कीमतों को बंद नहीं करके रखा इसलिए भारत को तो बंद होना ही होगा। भारत बंद होगा तो रेट खुल जाएंगे, यह नहीं समझ रहे कि खुलते ही रेट और ऊपर चढ़ जाएंगे। फिर किसे किसे बंद करवाएंगे। भारत क्‍या है, अगर संसद भारत है, नेता भारत है तो क्‍या उन्‍हें बंद करना इतना आसान है। बंद करना है तो पुलिस के अत्‍याचारों को करो, ब्‍यूरोक्रेसी में भ्रष्‍टाचार फैलाने वालों को काबू करो, अच्‍छाईयों के दुश्‍मनों को करो। पर उन पर आपका बस कहां चलता है। वहां पर तो आप सिरे से पैदल चलना शुरू कर देते हैं। भारत बंद का शोर मचाते हैं और एक मकान तक बंद नहीं कर पाते हैं, बुरे विचारों पर लगाम नहीं लगा पाते हैं। नेताओं की बकवास को बंद कर नहीं पा रहे हो और भारत बंद करने के ठेके उठा रहे हो।
सचमुच में बंद करने का इतना ही मन है तो कन्‍या भ्रूण हत्‍या को करो, प्रसव पूर्व लिंग जांच को करो, मिलावटी दवाईयों को रोको, अपनी बंद करने की ताकत को इनके खिलाफ झोंको। क्‍या आप नहीं जानते कि एक चूहे को चूहेदानी में बंद करने के लिए भी कितनी मशक्‍कत करनी होती है, बिना यह जाने चल दिए हैं कि पूरा भारत बंद करेंगे। पहले एक चूहा तो चूहेदानी में बंद करने का जौहर दिखलाओ। भारत बंद करने का आशय देश की सक्रियता को किडनैप करके देश को नुकसान पहुंचाने से है जबकि देश का अपहरण तो पहले से ही नेताओं ने निजी लाभ के लिए कर रखा है और उसके लिए घोटाले, घपलों में पूरी मुस्‍तैदी से बेखौफ होकर जुटे रहते हैं। मैं तो नहीं चाहता कि बंद रूपी ग्रहण का वायरस  मोहब्‍बत या भारत को लगे, आप क्‍या महसूस कर रहे हैं ?

दारु को बनाओ राष्‍ट्रीय पेय : डेली न्‍यूज एक्टिविस्‍ट 12 मई 2012 अंक में चकल्‍लस स्‍तंभ में प्रकाशित


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चाय को राष्‍ट्रीय पेय बनवाने की मांग करने वालों, अब तो शर्म करो। अमूल मैदान में आ गया है और दूध को राष्‍ट्रीय पेय बनवाने के लिए सीना तान के चाय की मुखालफत कर रहा है। क्‍या अमूल नहीं जानता है कि 90 प्रतिशत चाय दूध की मिलावट करने की बनाई जाती है। आप रेहडि़यों, पटरियों, दुकानों पर बिकने वाली चाय के बारे में जान सकते हैं। कितने ही चाय पीने के शौकीन सिर्फ दूध में पत्‍ती चीनी डलवा कर खौलवाते हैं और उसे पीकर तसल्‍ली पाते हैं।  इससे उनके मन में यह धारणा भी बनी रहती है कि खालिस दूध की चाय पीने से, चाय से होने वाले नुकसान से भी बचे रहेंगे।  इधर यह मामला अभी चाय की तरह गर्मागर्म ही है जबकि मौसम में गर्मियां अभी अपने पूरे उफान पर नहीं हैं। गर्मियों के पूरी तरह गर्म होने के बाद पक्‍की संभावना है कि लस्‍सी, छाछ, ठंडाई, कोल्‍ड ड्रिंक, नींबू पानी भी खुद को राष्‍ट्रीय पेय में शुमार करने के अपने दावे पेश कर दें। मौके की नजाकत भांप कर दिल्‍ली की सी एम ने देशी शराब की बिक्री पर रोक लगाने की घोषणा कर दी है। ‘टैक्‍स भी ज्‍यादा मिले, माल भी महंगा बिके’ की तर्ज पर देसी ब्रांडों से बेहतर लेकिन विदेसी ब्रांडों से कमतर दिल्‍ली मीडियम नामक शराब अपने देसी ठेकों के जरिए ग्राहकों के लिए बाजार में लाई जा रही है।
देसी शराब जहरीली भी होती है जबकि मुझे तो सरकार शराब से भी अधिक जहरीली महसूस हो रही है। जितनी जनता देसी जहरीली शराब पीने से मरती है, उससे अधिक तो राजनीतिज्ञों की दोषपूर्ण नीतियों के कारण मारी जाती है। ऐसा संभवत: इसलिए होता है क्‍योंकि जितनी जनता मरेगी, उतनी समस्‍याएं भी कम होंगी। लेकिन हम नहीं सुधरेंगे और इससे बचाव के नाम पर सरकार ने दिल्‍ली मीडियम शराब बाजार में परोसने का मन बना लिया गया है, जिससे जनता मरे भी न और जिंदा भी न रहे। जो देसी शराब को देस के बाजार से धक्‍का देकर बाहर कर देगी। दिल्‍ली सरकार का तर्क है कि इससे खूब सारे राजस्‍व की प्राप्ति होगी और जनता की भलाई के और अधिक कार्य किए जा सकेंगे।  कभी तो सरकार तंबाखू, गुटका, पान मसाला, सिगरेट, बीड़ी  पर प्रतिबंध लगाने की बात करती है तो दूसरी तरफ जनता को शराब की बेहतर क्‍वालिटी पिलाने का दंभ भरती है। वैसे एक बात तो तय है कि चाय या दूध पीने से शरीर को वह ताकत नहीं मिलती है जो शराब पीने से तुरंत मिल जाती है। शराब से होने वाले फायदों की तुलना में चाय और दूध के तनिक भी फायदे नहीं हैं, न तो जनता को और न सरकार को। जबकि दूध एक लीटर चालीस रुपये का मिल रहा है और चाय भी इससे कम में तो नहीं मिल रही है। दूध में मिलावटियों की पौ छत्‍तीस हमेशा रही है जबकि शराब में मिलावट करना इतना आसान नहीं होता। पीने वाले खुद ही उसमें सोडा, कोल्‍ड ड्रिंक, बिस्‍लेरी इत्‍यादि मिला मिलाकर पीते हैं। जनता को तो प्‍योर ही मिलना चाहिए, फिर वह चाहे उसमें कुछ भी मिलाकर पिए, यह उसकी मर्जी, अब चाहे वह दूध हो या शराब हो।
जो अथाह जोश शराब के नाम से ही मन और तन में उछालें मारने लगता है और पीने के बाद पूरे शरीर को भरपूर ऊर्जा से खदबदा देता है। शरीर अकूत बल का मालिक बन जाता है, मन में हौसले का संचार हो जाता है। पियक्‍कड़ किसी से भी मानसिक और शारीरिक तौर पर मुकाबला करने के लिए सदा तैयार मिलता है। भला ऐसे गुण चाय और दूध अथवा दही की लस्‍सी में मिल सकते हैं। लस्‍सी पीने के बाद तो पूरे शरीर में आलस भर जाता है। चाय मात्र कुछ पलों के लिए शरीर में उत्‍तेजना लगाती है और दूध ... बिना मिलावट वाला प्‍योर हो तब भी शराब और चाय के बराबर किसी का प्‍यारा बनने का गुण नहीं रखता है। दूध तो सिर्फ बच्‍चों और महिलाओं के लिए ही उपयुक्‍त रहता है। शराब का असर काफी देर तक शरीर पर रहता है। वह कितने ही कष्‍टों और गमों को भुलाने में सहायक बनता है। आदमी अपनी सभी परेशानियों से निजात पा जाता है। उसके प्रति सबके मन में सहज आकर्षण पाया जाता है। कड़वा होने पर भी पीने वाले कतार में तैयार मिलते हैं। प्‍यार में धोखा खाए लोगों के लिए तो यह रामबाण के माफिक काम करती है।
शराब की युवाओं और नशेडि़यों में जो सहज स्‍वीकार्यता है, वह किसी और चीज में नहीं है। गुटखा, तंबाखू, जर्दा का सेवन करने वालों को आप इलायची और सौंफ के चबाने के लिए सहज ही राजी कर सकते हैं क्‍या, शराब और उसके साथ बीड़ी, सिगरेट के सेवन के लिए आपको अधिकतर लोग यकायक तत्‍पर मिलेंगे। मेरा तो मानना है कि सरकार को चाय अथवा दूध को राष्‍ट्रीय पेय घोषित करने के चक्‍कर में उलझने के बजाय तुरंत‘दिल्‍ली मीडियम’ न देसी और न विदेशी, को कठोर फैसला करके राष्‍ट्रीय पेय घोषित कर, सिरमौर बन जाना चाहिए और इस दिन को एक ‘राष्‍ट्रीय पर्व’ की मान्‍यता भी लगे हाथ दे देनी चाहिए, आप क्‍या कहते हैं?

'सा' से सांसद .. 'सा' से साधु .. : डेली न्‍यूज एक्टिविस्‍ट में 7 मई 2012 के चकल्‍लस स्‍तंभ में प्रकाशित


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सभी सांसद चोर उचक्के नहीं हैं और मैंने सबको चोर उचक्का कहा भी नहीं है। मीडिया ने हंगामा मचा दिया जिससे सारे सांसद नाराज हो गए। वैसे भी यह तो साफ जाहिर है कि जब सारे बलात्कारी नहीं हो सकते तो सारे चोर उचक्के कैसे हो सकते हैं। वैसे ही जैसे सारे बाबा किरपा नहीं बरसाते, कुछ की किरपा तो सदा खुद पर ही बरसती रहती है और देखने वाला सोचता रहता है कि किरपा उस पर बरस रही है, जबकि बरस वह लौटकर बरसाने वाले पर ही रही होती है। इसी प्रकार सारे साधु, स्वादु नहीं कहे जा सकते, मगर एक प्रकार से कहे भी जा सकते हैं, क्योंकि सभी साधुओं को चरस, गांजे, भांग में स्वाद नहीं आता है, जबकि कुछ को तो इनके बिना स्वाद ही नहीं आता है। जिनको इनमें स्वाद नहीं आता है, वे गुटखा, पान, तंबाकू, बीड़ी, सिगरेट का सेवन करते देखे जा सकते हैं। ऐसा भी नहीं है कि साधु हैं तो दारू का स्वाद नहीं लेंगे। आखिर आनंद की प्राप्ति के लिए साधु चोला धारण किया है और उस चोले में भी मजा नहीं पाया तो किस बात के साधु मतलब स्वादु। कितने ही साधुओं को तो भीख मांगने में असीम आनंद आता है। अब अगर उनकी पोल खोली जा रही है तो किसी सांसद को एतराज नहीं है। सांसदों की सच्चाई के बारे में जब भी जनता को बतलाने की कोशिश की जाती है तो वह ऐसे हाय तौबा मचाने लगते हैं, मानो दूध पीते बच्चे हों और उनके दूध के दांत अभी टूटे नहीं हों। जबकि उनके दूध के दांत तो छोड़िए, चाय के दांत भी नहीं बचे हैं और अब उनके सभी दांत दारू के दांत बनकर आवाम के सामने बहुत ही दरुगधयुक्त बेशर्मी से खिलखिला रहे हैं। इस पर किसी को तनिक भी एतराज नहीं है। साधुओं को तो सांसद न जाने कब से स्वादु, ढोंगी, कपटी, चरसी और न जाने क्या-क्या कहते रहते हैं। कभी-कभार एकाध साधु नारी शक्ति का स्वाद लेते हुए पकड़ा जाता है तो उसे पकड़कर जेल में ठूंस दिया जाता है। जब भगवान के सीधे सच्चे प्रतिनिधि साधु के लिए ऐसे नियम सर्वमान्य हो सकते हैं तो सांसदों के लिए क्यों नहीं, क्या वे सृष्टि की परम सत्ता से भी ऊपर हैं। संसद को कोई भगवान या देवता तो चला नहीं रहे हैं। फिर सभी सांसदों की गारंटी क्यों ली जा रही है, एक को कुछ कहा जाता है, तो मोहल्ले के कुत्तों के माफिक सब समवेत स्वर में गीत गाना शुरू कर देते हैं, बिना यह जाने कि इस प्रकार के गीतों की असलियत से अब जनता पूरी तरह वाकिफ हो चुकी है। मैं मानता हूं कि मेरे से भूल हो गई है, लेकिन अगली दफा मैं इस प्रकार की गलती नहीं करूंगा। मैं भी कोई भगवान तो हूं नहीं, हूं तो आपकी तरह इंसान ही, इंसान से गुरु ही तो बन रहा हूं, गुरु घंटाल तो नहीं बनना चाह रहा हूं। भविष्य में सांसदों को चोर-उचक्का नहीं कहूंगा बल्कि यह बयान दूंगा कि सभी सांसद चोर उचक्के नहीं हैं, तब तो आपमें से किसी को कोई आपत्ति नहीं होगी न। आपकी खुशी का मैं अपने आगामी बयानों में पूरी तरह ध्यान रखूंगा। आखिर आप भी ‘सा’ से सांसद हैं और हम भी ‘सा’ से साधु हैं। यह अलग बात है कि कुछ किरपा बरसाने वाले खुद को खुदा घोषित करके अपनी अलग कैटेगिरी ‘बाबा’ हथिया चुके हैं। वैसे भी ‘बाबा’ शब्द के उच्चारण से मन निर्मल हो जाता है, एक पारिवारिक अटूट भावना नजर आती है। अब तो ऐसा महसूस होने लगा है कि हम साधुओं को भी नेताई गुणों का विकास करना होगा। वरना शातिर नेता हमें कहां सामान्य वस्त्रों में जीने देंगे और हमें बार बार इनसे बचकर लेडीज सूट, साड़ी, सलवार, जींस, टॉप इत्यादि पहनकर ही अपनी जान बचानी होगी। वैसे भी मीडिया तो चाहता है कि हम वस्त्रविहीन हो जाएं और वह सारी दुनिया को दिखलाकर कमाई करता रहे। सारी दुनिया आपस में उलझती फिरे और वह फिर कभी इस बहाने तो कभी उस बहाने कमाई करता रहे। अपनी टीआरपी बढ़ाकर अपने दर्शकों पर कहर ढाता रहे। कभी वे नक्सलियों का मुद्दा उछाल देते हैं, कभी नुपूर तलवार पर वार करते दिखाई देते हैं, कभी निर्मल बाबा को तलाश लेते हैं और जब हर तरफ से निराश हो जाते हैं तब मेरे जैसे सीधे-साधे सच्चे योगगुरु को अपना चेला बनाने के लिए जाल बिछाने लग जाते हैं। फिर यह तो पुराने घाघ हैं, मैं यह सांसदों को नहीं कह रहा हूं बल्कि मीडिया और चैनल वालों को कह रहा हूं। अब अगर इसको भी चैनल वाले तोड़-मरोड़कर सांसदों के खिलाफ साबित कर देंगे तो मैं साधु क्या कर लूंगा, सांसद मेरे बयान पर चिल्लाते रहेंगे और मीडिया वाले अपनी टीआरपी बढ़ाने के साथ उन्हें बार-बार चैनल पर अड़तालीस घंटे दिखलाते रहेंगे। क्या अब भी सांसदों को मेरे से कोई शिकायत है, मैं अपनी गलती मानते हुए फिर से कह रहा हूं कि सभी सांसद चोर-उचक्के नहीं हैं..।

तोप का ताप : डेली न्‍यूज एक्टिविस्‍ट में 28 अप्रैल 2012 अंक में प्रकाशित


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तोप का ताप कभी नहीं बुझता,  उसकी गर्मी कभी कम नहीं होती, चाहे उसके कारण कि कितने ही गम बढ़ जाएं। सुख सदा सुलगते रहते हैं। सुख के मूल में ही सारे जगत के दुख हैं। वह ताप किसके लिए चिंगारी बनता है और किसके लिए ठंडक। कब ठंडक, भाप बनकर झुलसा देती है। कौन जान पाया है, वह भी नहीं जो इन सबके पीछे अपने कारनामों को अंजाम दे रहा है। भर भर कर जाम पी रहा है। मालूम चल गया है कि बिग बी को डुबोने के लिए फोर्स को बोया गया। लगता है इसी फोर्स के चलते तोपों के इस घोटाले के मामले का नाम बोफोर्स हुआ, यह रहस्‍य अब खुला है। पर इससे बाहर आने के लिए बिग बी बीते 25 बरस भीतर ही भीतर सुलगते रहे। उनके दिल को कितनी पीड़ा मिली। पीड़ा की सच्‍चाई अब सामने आई है। पोल थी जो खुल गई है। बोफोर्स को ‘लो’ फोर्स होने में 25 साल लग गए। तोप का ताप भी सुलग सुलग कर लगा कि ‘गो’ फोर्स हो गई होगी। लेकिन चिंगारियां फिर से सुलग उठी हैं।  उन्‍हें हवा मिली, वे शोले बने लेकिन इस बार शोले शाल बने और बिग बी का के मन के संताप रूपी ज्‍वाला को हरने का सबब बन सके। पूरा दुख तो नहीं हरा नहीं हुआ, पर जितना भी हरा हुआ, उससे मन को हरियाली का सुखद अहसास हुआ। संताप की कालिमा कुछ तो कम हुई।
जाहिर है कि फोर्स सिर्फ बीज में ही नहीं होता है। यह सत्य है कि बीज का अंकुरण होता है। फोर्स तोप में भी होता है। झूठ में सबसे अधिक फोर्सफुल होता है लेकिन सच्‍चाई के फोर्स की तुलना किसी हॉर्स से नहीं की जा सकती है, वह तो सर्वोपरि होता है। फोर्स जब बोया जाता है उस समय हॉर्स की गति से कुलांचे भरता है। किसी को उसकी तेज चाल में सच नजर नहीं आता है। जो प्‍लांट किया जाता है, वह सामने आता है। आंखें देख रही होती हैं लेकिन उनमें में भी चमक चढ़ जाती है। चमक जो झूठ है, चमक जो धोखा है, चमक जो चकमक नहीं है, चमक नमक हो सकती है। नमक अधिक हो तो दुख दारूण देता है। बिना नमक के भी चमक फीकी हो जाती है। चमक चीनी हो जाए तब भी उसकी अधिकता सुगर बन शरीर को गलाती है।
साफ है किसी चीज की अधिकता बुरी होती है। सच्‍चाई पूरी होते हुए भी उसकी फोर्स लो रही और वह सामने नहीं आ सकी। इस बोने में सिर्फ तोपें ही नहीं बोई गईं। तोपों के नाम पर नोटों के अंकुर फूटे।  नोट का फोर्स इन सबसे ताकतवर है। सब इन्‍हीं के इर्द-गिर्द मंडराते रहते हैं। भागते हैं तो घोड़े हो जाते हैं। नोट दिखलाई दें या उनका आभास भी होने लगे तो मच्‍छर बन मंडराते हैं। वहां से कहीं जाते नहीं हैं। जबकि कभी किसी ने नोटों को मच्‍छरदानी से नहीं ढका होगा क्‍योंकि बाहर से ही दिखलाई दे जाएंगे। फिर भी इंसान मच्‍छर की तरह नोटों परे मंडराने से बाज नहीं आता। आजकल तो बाबा भी इसकी फुल किरपा अपने ऊपर बरसा रहे हैं। मौसम बारिस का हो, न हो।  गर्मी हो नोटों की, न हो। लेकिन नोटों की चाहत मरने तक भी खत्‍म नहीं होती। यह वह प्‍यास है जो जितनी बुझाने की कोशिश की जाए, उतनी और बढ़ जाती है। दूसरे का गला भी घोंटने से परहेज नहीं किया जाता। दूसरे ही क्‍या सबसे पहले अपनों का गला ही तराशा जाता है क्‍योंकि इसमें सबसे अधिक नोट मिलने की आशा है। आशा जो विश्‍वास बन चुकी है। उसे पाने के लिए सारे भरोसे तोड़ दिए जाते हैं। कोई शर्म नहीं, कोई जिल्‍लत नहीं महसूस होती। यह मानवीय वृतियों का क्षरण काल है। इंसानी वृतियों पर आक्रमण हो रहा है और आक्रमण करने वाले भी हम ही हैं।  
करेंसी नोटों को किसने बोया, यह अलग से बौनेपन की कुत्सित वृति को जाहिर करता है। बोना सिर्फ लाभदायक नहीं होता। बोफोर्स मामले से मालूम चलता है कि फोर्स लो हो तो भी नुकसान पहुंचाती है, अधिक हो तो इससे शान नहीं चढ़ती। यह सच्‍चाई को झूठ के आवरण में ढकती है। आवरण का वरण हटाकर झूठ के विरुद्ध रण में डट जाना चाहिए। उसके नतीजे बेहतर होते हैं। बोफोर्स में लोफोर्स होने पर ताजा मामले में यह खुलासा हो गया है। अब भी क्‍या आपको फोर्स के कम या अधिक होने पर संदेह हो रहा है ? 

खूनी घास का बिजनेस : डेली न्‍यूज एक्टिविस्‍ट के चकल्‍लस स्‍तंभ में 21 अप्रैल 2012 के अंक में प्रकाशित


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बोली घास की नहीं बापू के खून की हुई है। खरीदने वाले गधे थोड़े ही हैं जो घास के लालच में इतने नोट खर्च कर देंगे। उस घास में बापू का खून है, खून लाल ही रहा होगा लेकिन इतना लाल भी नहीं कि बापू के असर से घास का रंग बदल कर लाल हो गया हो और खरीदने वाले लाल रंग की घास उपजाने के लिए बोली लगा बैठे हैं। तब खून करने की कीमत थी, आज खूनी घास की कीमत है। खूनी घास कहने से घास को हत्‍यारा मत समझ लीजिए। हत्‍यारे तो वह भी नहीं हैं जिन्‍होंने बोली लगाई है। वह घास को बोली लगाकर इसलिए खरीद रहे हैं ताकि भावनाओं से खिलंदड़पना करने का जालिम अहसास किया जा सके। आप इसे प्‍यार की पुंगी बजाना समझ सकते हैं जबकि यह भावनाओं की पुंगी बजाई जा रही है।
घास चिल्‍ला चिल्‍लाकर यही कह रही है लेकिन कोई गधा नहीं सुन रहा है, वैसे भी जब गधा घास खा रहा होता है तो उसे घास खाने के सिवाय कुछ और नहीं सूझता है। फिर वह न तो दुलत्‍ती मारने की ओर ध्‍यान लगाता है और न ढेंचू ढेंचू का रियाज करता है। सब घास खाने में तल्‍लीन हैं। गधे का स्‍वभाव है कि जो मिल जाए, खाए जाओ और घास हरी हो या लाल। लाल चाहे बापू का खून हो लेकिन गधा भी तो धोबी का लाल है। लाल वही जो कमाई करके दे, गधा खूब लाद कर ले जाता है और कमाई होती है। कमाई को लादने की जरूरत नहीं होती क्‍योंकि वह तो धोबी की जेब में समा जाती है। धोबी गधे पर लादे कपड़ों की भरपूर धुलाई करता है, उन्‍हें चमकदार बनाता है लेकिन गधे को एक दिन भी नहीं नहलाता। कहता है कि वह तो कपड़ों को भी कूट पीट कर चमकाता है। अगर गधे को चमकदार बनाने की कोशिश की और वो कुछ ज्‍यादा ही चमक कर किसी चिकनी चमेली गधी के इश्‍क में पड़ गया तो उसकी तो कमाई धरी रह जाएगी। गधा गधी से रोमांस करता रहेगा और धोबी कपड़ों का गट्ठर ढोता और धोता रहेगा।  नतीजा उसकी कमाई को बिना गधे के मारे ही जोरदार दुलत्‍ती लग जाएगी। यह प्‍यार की पुंगी बजना-बजाना नहीं है। प्‍यार की सभी पुंगियां आजकल बाबा बजा रहे हैं, नीलामी में बापू का खून हड़पने वाले बजा रहे हैं। फिर व्‍यंग्‍यकार और अखबार वाले इस दौड़ से बाहर क्‍यों रह जाएं।
गधे की इस दुलत्‍ती से बचने के लिए धोबी का तर्क मौजूं लगता है लेकिन चिकना बनाने के चक्‍कर में ज्‍यादा कूट पीट दिया या निचोड़ पटक दिया तो उसके खून से भी घास लाल हो जाएगी। इससे भी बचने के लिए वह गधे को नहलाने से बचता रहा है। फिर उस लाल घास को कोई नहीं खरीदना चाहेगा, गधे के खून की वैसे भी कोई कीमत नहीं है, उसे तो आप अवाम ही समझ लीजिए। गर्दभराज नहाएं या बिना नहाए मस्‍त रहें, कमाई तो उतनी ही होगी। दुलत्‍ती भी उतनी ही मारेगा और ढेंचू ढेंचू से भी कोई सुर नहीं सधेगा। जितना समय गधे को नहलाने में बरबाद होगा, उतने में तो और पचास जोड़ी कपड़ों को धोबी महाराज धो पटक लेगा और अपनी कमाई में खूब इजाफा करेगा।
मामला बापू के खून से सनी घास की नीलामी का है और मैं भटक या अटक गया हूं धोबी और गधे के करतबों पर यानी धोबी-गधे से होने वाली कमाई। कमाई की महत्‍ता सर्वोपरि है, उसी से जीवन चलता है इसलिए विशेषज्ञ नोटों का जंगल बनाते रहते हैं। कमाई का मामला हो तो भटकना स्‍वाभाविक है। चाहे बाबा की किरपा का मामला हो या खूनी घास की नीलामी का, असल मामला नोटों की चाहत का है। नोट में लोटने के लिए बाबा बनना और अब खूनी घास बेचना सबसे अच्‍छा बिजनेस है। चाहे कोई बाबा कहे या गधा कहे,गधा मिट्टी में लोटेगा और बाबा नोटों में, धोबी घाट पर लेकिन घाट के पत्‍थर पर लोटना किसकी अंतिम परिणति है, आप परिचित हैं। पत्‍थर की प्रकृति सख्‍त होना है। वह मुलायम नहीं हो सकता, उससे भगवान बना दो या इंसान की मूर्ति लेकिन सख्‍ती उसमें मौजूद रहेगी। वही सख्‍ती की माया हाथियों की मूर्तियों में से गायब होने की भनक पाकर, माया की हनक के रूप में वापिस लौट आई है। यह किसने कहा है कि जो हार जाता है, वह हनक नहीं सकता। हारने के बाद हनक बढ़ने के मूल में अब निगाहें केन्‍द्र पर जमना हैं। आओ सब मिलकर इसे सत्‍तरवें आसमान पर तलाशने चलते हैं, आप भी मेरे साथ चल रहे हैं क्‍या ?

मूर्खता ब्‍लॉगस्‍पॉट डॉट कॉम : डेली न्‍यूज एक्टिविस्‍ट में 1 अप्रैल 2012 के अंक में प्रकाशित

बिना चश्‍मे के पढ़ने के लिए यहां क्लिक कीजिए। फिर मत कहिएगा कि बताया नहीं और जानबूझकर ही हम मूर्ख बनते रहे, वैसे फर्स्‍ट अप्रैल के दिन बुराई भी क्‍या है, मूर्ख बनना भी एक कला है, आज तक जो नहीं बने, जरा उनका दर्द तो महसूस कर देखिए।