Cost of having a girlfriend ! : आई नेक्‍स्‍ट 13 नवम्‍बर 2012 'खूब कही' स्‍तंभ में प्रकाशित



गर्ल फ्रेंड का जिक्र आने पर जिनकी बांछें खिल जाती हैं वे कई गुणा हैं, उनके चेहरे पर खुशी लाने के लिए पचास करोड़ रुपये उल्‍लेखनीय भूमिका निभाते हैं। पचास रुपये मिलने पर खुश होने वाले भी इस देश में करोड़ों हैं। उनकी मासूमियत के चर्चे फिजाओं को गुल गुलशन गुलजार कर रहे हैं। गुलगुलों से परहेज करने वाले पेट भर कर गुल खा रहे हैं और खिला रहे हैं। अपनी बीवी को अनमोल बतलाकर उन्‍होंने जमाने भर की बीवियों पर प्राइज टैग चस्‍पा कर दिया है। बीवी अपने खाविंद के लिए सदा से अनमोल हैकितने ही पतियों के लिए उनकी बीवियां दुधारू गाय की मानिंद हैंवे जब चाहते हैं दुह लेते हैं। बीवी का मायका मालदार हो और बीवी सीधी गायतब समझो पतियों की रोजाना मौज़ है। सीधी गाय के सींग मारने का रिस्‍क नहीं हैवह दहेज के नाम पर दुहे जाते समय पूंछ नहीं फटकारती। अपनी नाराजगी जतलाने के लिए लात चलाने की सोचना भी उसके लिए पाप है। ऐसी बीवियां अनमोल होती हैं इसमें तनिक भी अतिरंजना नहीं है।
बीवी की अनमोलियत के जितने किस्‍से फिल्‍मी गीतों में गाए गए हैंउतने गर्ल फ्रेंड के नहीं। जिसकी बीवी मोटीछोटीलंबीऊंची चाहे कैसी भी होउसका बड़ा नाम हैआज पूरी शिद्दत से यह अहसास हो रहा है। बीवी की महानता की बाबत सदी के महानायक बिग बी ने अपने एक गीत में खूब शौर्यगान किया है। मायके के मायाजाल से ग्रसित हों और माल का जलवा भरपूर हो तो कहा गया है कि सोने में सुहागा वाली परम स्थिति दामाद को प्राप्‍त होती है। दस पचास हजार एकड़ भूमि या दो पांच फार्म हाउस मिलना दामाद के मौलिक अधिकारों की श्रेणी में आ जाता है।
अपनी बीवी को अनमोल बतलाकर जमाने भर के पतियों और उनकी पत्नियों से बैर मोल लेकर उन्‍होंने बर्र के छत्‍ते में हाथ देने का अपराध कर दिया है। मानो कहना चाह रहे हैं कि दूसरे की बीवी तोलकर मिल रही है और उन सब पर कीमत की चिप्‍पी चिपकी हुई है। बहरहालबच्‍चन साहब ने हर तरह की बीवी का गुणगान ही किया है। जैसे बीवी गुणों की खान होती है वैसे ही कोयले की खदान होती है जिसमें काले होने के बावजूद खूब तमाम गुण समाए हैं। खान खोदने का मौका जिसे मिल जाएउसकी झोली स्‍वर्ण मुद्राओं की खनखनाहट से लबालब भर जाएगीन कि खाली टीन कनस्‍तर के माफिक गला फाड़ कर चिल्‍लाएगी। बिगड़ने वाले तो अपनी भैंस को डंडा मारने पर बिफर जाते हैं। किसी गैर की बीवी के मर्द की क्‍या मजाल कि जमाने भर के पतियों की बीवियों का मोल लगाने की जुर्रत करे। नारी के विरुद्ध आरी चलाने की गुस्‍ताखी का यह मामला सामाजिक नियमों के उल्‍लंघन की श्रेणी में आता हैआप समझ रहे हैं न ?

दिवाली में शिफ्ट हो रहे गिफ्ट : दैनिक राष्‍ट्रीय सहारा में 12 नवम्‍बर 2012 को प्रकाशित

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दिवाली के नाम पर दिवाला दिलवालों का निकलता है। सेल के नाम पर बचा खुचा सब माल गोदामों से निकल जाता है। सब छूट से खिंचे चले आते हैं और सेल में सारा माल ऐसे निपट जाता हैमानो फ्री में बंट रहा हो। यह तो नेताओं का असर है कि देकर छूट लेते हैं लूट। दीपावली एक ऐसा त्‍योहार कि इधर गुजराउधर अगली का इंतजार शुरू गया।  इसमें कसूर आपका नहीं हैइसमें है ही ऐसा आकर्षण। सब लौट लौट कर दीपावली मनाना चाहते हैं। आखिर यह त्‍योहार है ही खूब नोट बरसाने वाला। जेबों को सरसाने वाला। जिनके खर्च होते हैंउनके पास भी कई गुने होकर बरसते हैं।

अब मैं आपको एक ऐसा रहस्‍य बतला रहा हूं कि क्‍यों एक दीवाली जाते ही अगली दीवाली का बेसब्री से इंतजार होने लगता है। राम नाम जपना और बचा खुचा माल खपना। छूट और त्‍योहार के नाम पर सब बिक जाता है। गिफ्ट आइटम टूटे फूटे भी धकेल दिए जाते हैं। इन दिनों थोक में भरपूर ऑर्डर आते हैं और धंधा चोखा चमकता है। गिफ्ट एक जगह से चलकर कहां रुकेगायह न गिफ्ट देने वाला जानता है और न लेने वाला ही। गिफ्ट को गिफ्ट कर शिफ्ट कर दिया जाता है। वैसे भी बम फटने की घटनाओं के कारण जब तक जरूरी न हो और पक्‍का विश्‍वास न होकोई भी गिफ्ट को अनपैक करने के नुकसानदायक खेल में नहीं उलझता है। बम निकला और फट गया तो नुकसान और दोबारा से पैक करना पड़ा तो श्रीमान परेशान और पैक करने की फिजूलखर्ची साथ में तंग करती है।

दीपावली का लुत्‍फ लेते हुए हलवाई तो बची खुची बासी मिठाई थोक ऑर्डर के डिब्‍बों में ही घुसा देते हैं। गिफ्ट लेने वाले भी उसे आगे सरका देते हैं। आफिसों के लिए थोक में खरीद करने वाले दुकानदार से सैटिंग करके किलो के डिब्‍बे में दो चार बासी मिठाई के खपाने की जो छूट देते हैं,उसका लाभ भी दीवाली पर ही मिलता है और गत्‍ते का डिब्‍बा तो इन सौदों में मिठाई के रेट से ही तुलता है। अच्‍छी मिठाई मिलावटी ही होगीइसकी भी गारंटी बनी रहती है। इसके बदले खरीदार की सेवा पानी हलवाई कर ही देते हैंजिसके बारे में खुलासा करना जरूरी नहीं है।

खुलासामैन ने सबकी खूब पोल खोली किंतु इस दीपावली की नामुराद झोली नहीं उंडेली। आजकल तक इस संबंध में किसी ने भी जानबूझकर इस तरह के भ्रष्‍टाचार के निदान के बारे में नहीं सोचा। दिवाली के डिब्‍बे दिवाली के कई दिन पहले से बंटने शुरू हो जाते हैं और कई दिन बाद तक बंटते रहते हैं। कौन डिब्‍बा कहां से चलाकिधर से होता हुआ किधर पहुंचाकोई नहीं जानतावे कब खुलते हैं लेकिन यह तय है कि उनकी अंतिम परिणति घरों में जाकर नौकरों और काम करने वालों तक पहुंचने में ही होती है और वे भी उसे खाते नहीं हैंसीधे कूड़ा घरों में पहुंचा देते हैं।

ड्राई फ्रूट्स में तो बिल्‍कुल भी रिस्‍क नहीं होता हैवे पहले से ही इतने सूखे होते हैं कि उन्‍हें कितना ही सुखा लोउनका रूप और दमक कर सामने आता हैमानो उन्‍हें फेशियल करके निखारा गया हो। मेवों का तेल पानी भला किसने जांचा है। वे कितने ही पुराने और खराब हो चुके हों परंतु बहुत आराम से गिफ्ट के तौर पर बांट दिए जाते हैं। मिलावट करने वाले भी इन दिनों खूब बिजी रहते हैं। इतनी मिलावट करते हैं कि कई बार किसी आइटम में बूरे की जगह आटा या नमक डाल देने तक की दुर्घटनाएं घट जाती हैं।

पुलिस वालों और ट्रेफिक वालोंएमसीडीइंकम टैक्‍स,सेल्‍स टैक्‍सखाद्य सामग्री जांच विभाग मतलब जितने लोगों पर कानून के पालन करवाने का जिम्‍मा होता हैवे पूरी जिम्‍मेदारी और ईमानदारी से उसे कारनामा बनाने में जुटे रहते हैं। इन दिनों जिनको उपहार ढोने और बाद में बेचने का मौका नहीं मिला तो उसकी दीपावली तो व्‍यर्थ गईसमझ लीजिए। अनेक अधिकारी तो दीवाली पर मिलने वाले गिफ्टमिठाईयों की रीसेल के लिए दुकानदारों से डील कर लेते हैं और ढेर के ढेर डिब्‍बे दोबारा बिक जाते हैं। कई बार तो ऐसा हुआ है कि कोई डेढ़ बजे जिस डिब्‍बे को खरीदकर ले गयाउसने दो बजे गिफ्ट किया और तीन बजे वापिस वही डिब्‍बा दुकानदार के पास दोबारा बिकने के लिए लौट आया।

जब मंदिरों में भगवान की और शमशान में शवों की मौजूदगी में ऐसे ही कार्य किए जाते हैं तो आफिसों और घरों में किसे दिक्‍कत होगी। वहां पर सब अपने अपने मालिक खुद होते हैं। भगवान के यहां चढ़ाए जाने वाले नारियलफूल मालाएं और पूजा सामग्री वगैरह से धन कमाने की ऐसी सैटिंग होती है कि इधर चढ़ावा चढ़ता है और उधर पिछले दरवाजे पर तैनात भगवान के नितांत निजी भक्‍त अति गोपनीय तरीके से उसे वापिस दुकानों में फिर से बिकने के लिए भिजवा देते हैं। फिर यह मंदिरों के लिए भी अच्‍छा है क्‍योंकि बेहिसाब पूजा सामग्री,फूलफल इत्‍यादि आएं और वे भगवान के चरणों में पड़े सड़ते रहेंभगवान भी इसे बर्दाश्‍त नहीं करेंगे। सारी सामग्री भगवान खा लेंगे तो निश्चित ही उनका पेट खराब होने से कोई नहीं रोक सकता। अगर उस सामग्री को वहां से न ले जाया जाए तो भगवान उसी में खो जायेंगे और भक्‍तों को कैसे नजर आयेंगे।
खुलासामैन को मेरी एक नेक सलाह है कि वे पोल खोलने का पर्व प्रत्‍येक पर्व पर अवश्‍य मनाया करें और  दीपावली जैसे त्‍योहारों पर खाकर जरूर इसका उपयोग किया करें। ऐसा न हो कि इस सलाह की भनक किसी को लग जाए और वे अमल करके लाभ उठा लें जिसमें इस गिफ्ट रूपी भ्रष्‍टाचार की समाप्ति का आग्रह किया गया हो। जिस तरह दीपावली लोकप्रिय है उसी तरह खुलासामैन और भी अधिक लोकप्रिय हो जायेंगे। दीपावली वैसे तो प्रेम का त्‍योहार हैविजय का त्‍योहार है। असली प्रेम उपहारों से किया जाता है और विजयी वही होता है जो सबसे अधिक गिफ्ट हथियाता है।

गिफ्ट पाना या हथियाना भी एक कला से कम नहीं है। इस अवसर पर जूते कपड़ों की इतनी सेल लगती हैं और सभी सपरिवार उन्‍हें खरीदने में इस कदर जुटे रहते हैं कि लगता है कि जूतेकपड़े फ्री में बंट रहे हैं। पहले नए कपड़ों के खरीदने से दीवाली होती थी और अब नए गैजेट्स खरीदने से दीवाली की खुशियां मिलती हैं। बम पटाखे के रूप में नोटों का दहन नहीं किया तो कैसी दीवाली और वरिष्‍ठ रचनाकारों की सब पुरानी रचनाएं इस अवसर पर नहीं छपीं तो फिर काहे की दीवाली। रही बची कसर इस अवसर पर जुआ खेलकरलाटरी के टिकट खरीद कर भाग्‍य आजमाने में निकाल ली जाती है। जुआ खेलनाशराब पीना जैसी कलाएं दीपावली के उत्‍साह में खूब बढ़ोतरी करती हैं। आयाम तो इतने हैं कि इस पर एक पूरी पुस्‍तक लिखकर दीपावली के दिन लोकार्पित की जा सकती हैआपकी क्‍या राय हैक्‍या ऐसा कर लिया जाए ?


खुलासामैन की ओपन दीपावली : दैनिक हिंदी मिलाप में 'बैठे ठाले' स्‍तंभ में प्रकाशित



दीवाली के नाम पर दिवाला दिलवालों का निकलता है। सेल के नाम पर बचा खुचा सब माल गोदामों से निकल जाता है। सब छूट से खिंचे चले आते हैं और सेल में सारा माल ऐसे निपट जाता हैमानो फ्री में बंट रहा हो। यह तो नेताओं का असर है कि देकर छूट लेते हैं लूट। दीपावली एक ऐसा त्‍योहार कि इधर गुजराउधर अगली का इंतजार शुरू गया।  इसमें कसूर आपका नहीं हैइसमें है ही ऐसा आकर्षण। सब लौट लौट कर दीपावली मनाना चाहते हैं। आखिर यह त्‍योहार है ही खूब नोट बरसाने वाला। जेबों को सरसाने वाला। जिनके खर्च होते हैंउनके पास भी कई गुने होकर बरसते हैं।

अब मैं आपको एक ऐसा रहस्‍य बतला रहा हूं कि क्‍यों एक दीवाली जाते ही अगली दीवाली का बेसब्री से इंतजार होने लगता है। राम नाम जपना और बचा खुचा माल खपना। छूट और त्‍योहार के नाम पर सब बिक जाता है। गिफ्ट आइटम टूटे फूटे भी धकेल दिए जाते हैं। इन दिनों थोक में भरपूर ऑर्डर आते हैं और धंधा चोखा चमकता है। गिफ्ट एक जगह से चलकर कहां रुकेगायह न गिफ्ट देने वाला जानता है और न लेने वाला ही। गिफ्ट को गिफ्ट कर शिफ्ट कर दिया जाता है। वैसे भी बम फटने की घटनाओं के कारण जब तक जरूरी न हो और पक्‍का विश्‍वास न होकोई भी गिफ्ट को अनपैक करने के नुकसानदायक खेल में नहीं उलझता है। बम निकला और फट गया तो नुकसान और दोबारा से पैक करना पड़ा तो श्रीमान परेशान और पैक करने की फिजूलखर्ची साथ में तंग करती है।

दीपावली का लुत्‍फ लेते हुए हलवाई तो बची खुची बासी मिठाई थोक ऑर्डर के डिब्‍बों में ही घुसा देते हैं। गिफ्ट लेने वाले भी उसे आगे सरका देते हैं। आफिसों के लिए थोक में खरीद करने वाले दुकानदार से सैटिंग करके किलो के डिब्‍बे में दो चार बासी मिठाई के खपाने की जो छूट देते हैं,उसका लाभ भी दीवाली पर ही मिलता है और गत्‍ते का डिब्‍बा तो इन सौदों में मिठाई के रेट से ही तुलता है। अच्‍छी मिठाई मिलावटी ही होगीइसकी भी गारंटी बनी रहती है। इसके बदले खरीदार की सेवा पानी हलवाई कर ही देते हैंजिसके बारे में खुलासा करना जरूरी नहीं है।

खुलासामैन ने सबकी खूब पोल खोली किंतु इस दीपावली की नामुराद झोली नहीं उंडेली। आजकल तक इस संबंध में किसी ने भी जानबूझकर इस तरह के भ्रष्‍टाचार के निदान के बारे में नहीं सोचा। दिवाली के डिब्‍बे दिवाली के कई दिन पहले से बंटने शुरू हो जाते हैं और कई दिन बाद तक बंटते रहते हैं। कौन डिब्‍बा कहां से चलाकिधर से होता हुआ किधर पहुंचाकोई नहीं जानतावे कब खुलते हैं लेकिन यह तय है कि उनकी अंतिम परिणति घरों में जाकर नौकरों और काम करने वालों तक पहुंचने में ही होती है और वे भी उसे खाते नहीं हैंसीधे कूड़ा घरों में पहुंचा देते हैं।

ड्राई फ्रूट्स में तो बिल्‍कुल भी रिस्‍क नहीं होता हैवे पहले से ही इतने सूखे होते हैं कि उन्‍हें कितना ही सुखा लोउनका रूप और दमक कर सामने आता हैमानो उन्‍हें फेशियल करके निखारा गया हो। मेवों का तेल पानी भला किसने जांचा है। वे कितने ही पुराने और खराब हो चुके हों परंतु बहुत आराम से गिफ्ट के तौर पर बांट दिए जाते हैं। मिलावट करने वाले भी इन दिनों खूब बिजी रहते हैं। इतनी मिलावट करते हैं कि कई बार किसी आइटम में बूरे की जगह आटा या नमक डाल देने तक की दुर्घटनाएं घट जाती हैं।

पुलिस वालों और ट्रेफिक वालोंएमसीडीइंकम टैक्‍स,सेल्‍स टैक्‍सखाद्य सामग्री जांच विभाग मतलब जितने लोगों पर कानून के पालन करवाने का जिम्‍मा होता हैवे पूरी जिम्‍मेदारी और ईमानदारी से उसे कारनामा बनाने में जुटे रहते हैं। इन दिनों जिनको उपहार ढोने और बाद में बेचने का मौका नहीं मिला तो उसकी दीपावली तो व्‍यर्थ गईसमझ लीजिए। अनेक अधिकारी तो दीवाली पर मिलने वाले गिफ्टमिठाईयों की रीसेल के लिए दुकानदारों से डील कर लेते हैं और ढेर के ढेर डिब्‍बे दोबारा बिक जाते हैं। कई बार तो ऐसा हुआ है कि कोई डेढ़ बजे जिस डिब्‍बे को खरीदकर ले गयाउसने दो बजे गिफ्ट किया और तीन बजे वापिस वही डिब्‍बा दुकानदार के पास दोबारा बिकने के लिए लौट आया।

जब मंदिरों में भगवान की और शमशान में शवों की मौजूदगी में ऐसे ही कार्य किए जाते हैं तो आफिसों और घरों में किसे दिक्‍कत होगी। वहां पर सब अपने अपने मालिक खुद होते हैं। भगवान के यहां चढ़ाए जाने वाले नारियलफूल मालाएं और पूजा सामग्री वगैरह से धन कमाने की ऐसी सैटिंग होती है कि इधर चढ़ावा चढ़ता है और उधर पिछले दरवाजे पर तैनात भगवान के नितांत निजी भक्‍त अति गोपनीय तरीके से उसे वापिस दुकानों में फिर से बिकने के लिए भिजवा देते हैं। फिर यह मंदिरों के लिए भी अच्‍छा है क्‍योंकि बेहिसाब पूजा सामग्री,फूलफल इत्‍यादि आएं और वे भगवान के चरणों में पड़े सड़ते रहेंभगवान भी इसे बर्दाश्‍त नहीं करेंगे। सारी सामग्री भगवान खा लेंगे तो निश्चित ही उनका पेट खराब होने से कोई नहीं रोक सकता। अगर उस सामग्री को वहां से न ले जाया जाए तो भगवान उसी में खो जायेंगे और भक्‍तों को कैसे नजर आयेंगे।
खुलासामैन को मेरी एक नेक सलाह है कि वे पोल खोलने का पर्व प्रत्‍येक पर्व पर अवश्‍य मनाया करें और  दीपावली जैसे त्‍योहारों पर खाकर जरूर इसका उपयोग किया करें। ऐसा न हो कि इस सलाह की भनक किसी को लग जाए और वे अमल करके लाभ उठा लें जिसमें इस गिफ्ट रूपी भ्रष्‍टाचार की समाप्ति का आग्रह किया गया हो। जिस तरह दीपावली लोकप्रिय है उसी तरह खुलासामैन और भी अधिक लोकप्रिय हो जायेंगे। दीपावली वैसे तो प्रेम का त्‍योहार हैविजय का त्‍योहार है। असली प्रेम उपहारों से किया जाता है और विजयी वही होता है जो सबसे अधिक गिफ्ट हथियाता है।

गिफ्ट पाना या हथियाना भी एक कला से कम नहीं है। इस अवसर पर जूते कपड़ों की इतनी सेल लगती हैं और सभी सपरिवार उन्‍हें खरीदने में इस कदर जुटे रहते हैं कि लगता है कि जूतेकपड़े फ्री में बंट रहे हैं। पहले नए कपड़ों के खरीदने से दीवाली होती थी और अब नए गैजेट्स खरीदने से दीवाली की खुशियां मिलती हैं। बम पटाखे के रूप में नोटों का दहन नहीं किया तो कैसी दीवाली और वरिष्‍ठ रचनाकारों की सब पुरानी रचनाएं इस अवसर पर नहीं छपीं तो फिर काहे की दीवाली। रही बची कसर इस अवसर पर जुआ खेलकरलाटरी के टिकट खरीद कर भाग्‍य आजमाने में निकाल ली जाती है। जुआ खेलनाशराब पीना जैसी कलाएं दीपावली के उत्‍साह में खूब बढ़ोतरी करती हैं। आयाम तो इतने हैं कि इस पर एक पूरी पुस्‍तक लिखकर दीपावली के दिन लोकार्पित की जा सकती हैआपकी क्‍या राय हैक्‍या ऐसा कर लिया जाए ?

खुलासामैन की ओपन दीपावली


दीवाली के नाम पर दिवाला दिलवालों का निकलता है। सेल के नाम पर बचा खुचा सब माल गोदामों से निकल जाता है। सब छूट से खिंचे चले आते हैं और सेल में सारा माल ऐसे निपट जाता हैमानो फ्री में बंट रहा हो। यह तो नेताओं का असर है कि देकर छूट लेते हैं लूट। दीपावली एक ऐसा त्‍योहार कि इधर गुजराउधर अगली का इंतजार शुरू गया।  इसमें कसूर आपका नहीं हैइसमें है ही ऐसा आकर्षण। सब लौट लौट कर दीपावली मनाना चाहते हैं। आखिर यह त्‍योहार है ही खूब नोट बरसाने वाला। जेबों को सरसाने वाला। जिनके खर्च होते हैंउनके पास भी कई गुने होकर बरसते हैं।

अब मैं आपको एक ऐसा रहस्‍य बतला रहा हूं कि क्‍यों एक दीवाली जाते ही अगली दीवाली का बेसब्री से इंतजार होने लगता है। राम नाम जपना और बचा खुचा माल खपना। छूट और त्‍योहार के नाम पर सब बिक जाता है। गिफ्ट आइटम टूटे फूटे भी धकेल दिए जाते हैं। इन दिनों थोक में भरपूर ऑर्डर आते हैं और धंधा चोखा चमकता है। गिफ्ट एक जगह से चलकर कहां रुकेगायह न गिफ्ट देने वाला जानता है और न लेने वाला ही। गिफ्ट को गिफ्ट कर शिफ्ट कर दिया जाता है। वैसे भी बम फटने की घटनाओं के कारण जब तक जरूरी न हो और पक्‍का विश्‍वास न होकोई भी गिफ्ट को अनपैक करने के नुकसानदायक खेल में नहीं उलझता है। बम निकला और फट गया तो नुकसान और दोबारा से पैक करना पड़ा तो श्रीमान परेशान और पैक करने की फिजूलखर्ची साथ में तंग करती है।

दीपावली का लुत्‍फ लेते हुए हलवाई तो बची खुची बासी मिठाई थोक ऑर्डर के डिब्‍बों में ही घुसा देते हैं। गिफ्ट लेने वाले भी उसे आगे सरका देते हैं। आफिसों के लिए थोक में खरीद करने वाले दुकानदार से सैटिंग करके किलो के डिब्‍बे में दो चार बासी मिठाई के खपाने की जो छूट देते हैंउसका लाभ भी दीवाली पर ही मिलता है और गत्‍ते का डिब्‍बा तो इन सौदों में मिठाई के रेट से ही तुलता है। अच्‍छी मिठाई मिलावटी ही होगीइसकी भी गारंटी बनी रहती है। इसके बदले खरीदार की सेवा पानी हलवाई कर ही देते हैंजिसके बारे में खुलासा करना जरूरी नहीं है।

खुलासामैन ने सबकी खूब पोल खोली किंतु इस दीपावली की नामुराद झोली नहीं उंडेली। आजकल तक इस संबंध में किसी ने भी जानबूझकर इस तरह के भ्रष्‍टाचार के निदान के बारे में नहीं सोचा। दिवाली के डिब्‍बे दिवाली के कई दिन पहले से बंटने शुरू हो जाते हैं और कई दिन बाद तक बंटते रहते हैं। कौन डिब्‍बा कहां से चलाकिधर से होता हुआ किधर पहुंचाकोई नहीं जानतावे कब खुलते हैं लेकिन यह तय है कि उनकी अंतिम परिणति घरों में जाकर नौकरों और काम करने वालों तक पहुंचने में ही होती है और वे भी उसे खाते नहीं हैंसीधे कूड़ा घरों में पहुंचा देते हैं।

ड्राई फ्रूट्स में तो बिल्‍कुल भी रिस्‍क नहीं होता हैवे पहले से ही इतने सूखे होते हैं कि उन्‍हें कितना ही सुखा लोउनका रूप और दमक कर सामने आता हैमानो उन्‍हें फेशियल करके निखारा गया हो। मेवों का तेल पानी भला किसने जांचा है। वे कितने ही पुराने और खराब हो चुके हों परंतु बहुत आराम से गिफ्ट के तौर पर बांट दिए जाते हैं। मिलावट करने वाले भी इन दिनों खूब बिजी रहते हैं। इतनी मिलावट करते हैं कि कई बार किसी आइटम में बूरे की जगह आटा या नमक डाल देने तक की दुर्घटनाएं घट जाती हैं।

पुलिस वालों और ट्रेफिक वालोंएमसीडीइंकम टैक्‍स,सेल्‍स टैक्‍सखाद्य सामग्री जांच विभाग मतलब जितने लोगों पर कानून के पालन करवाने का जिम्‍मा होता हैवे पूरी जिम्‍मेदारी और ईमानदारी से उसे कारनामा बनाने में जुटे रहते हैं। इन दिनों जिनको उपहार ढोने और बाद में बेचने का मौका नहीं मिला तो उसकी दीपावली तो व्‍यर्थ गई,समझ लीजिए। अनेक अधिकारी तो दीवाली पर मिलने वाले गिफ्टमिठाईयों की रीसेल के लिए दुकानदारों से डील कर लेते हैं और ढेर के ढेर डिब्‍बे दोबारा बिक जाते हैं। कई बार तो ऐसा हुआ है कि कोई डेढ़ बजे जिस डिब्‍बे को खरीदकर ले गयाउसने दो बजे गिफ्ट किया और तीन बजे वापिस वही डिब्‍बा दुकानदार के पास दोबारा बिकने के लिए लौट आया।

जब मंदिरों में भगवान की और शमशान में शवों की मौजूदगी में ऐसे ही कार्य किए जाते हैं तो आफिसों और घरों में किसे दिक्‍कत होगी। वहां पर सब अपने अपने मालिक खुद होते हैं। भगवान के यहां चढ़ाए जाने वाले नारियलफूल मालाएं और पूजा सामग्री वगैरह से धन कमाने की ऐसी सैटिंग होती है कि इधर चढ़ावा चढ़ता है और उधर पिछले दरवाजे पर तैनात भगवान के नितांत निजी भक्‍त अति गोपनीय तरीके से उसे वापिस दुकानों में फिर से बिकने के लिए भिजवा देते हैं। फिर यह मंदिरों के लिए भी अच्‍छा है क्‍योंकि बेहिसाब पूजा सामग्री,फूलफल इत्‍यादि आएं और वे भगवान के चरणों में पड़े सड़ते रहें,भगवान भी इसे बर्दाश्‍त नहीं करेंगे। सारी सामग्री भगवान खा लेंगे तो निश्चित ही उनका पेट खराब होने से कोई नहीं रोक सकता। अगर उस सामग्री को वहां से न ले जाया जाए तो भगवान उसी में खो जायेंगे और भक्‍तों को कैसे नजर आयेंगे।
खुलासामैन को मेरी एक नेक सलाह है कि वे पोल खोलने का पर्व प्रत्‍येक पर्व पर अवश्‍य मनाया करें और  दीपावली जैसे त्‍योहारों पर खाकर जरूर इसका उपयोग किया करें। ऐसा न हो कि इस सलाह की भनक किसी को लग जाए और वे अमल करके लाभ उठा लें जिसमें इस गिफ्ट रूपी भ्रष्‍टाचार की समाप्ति का आग्रह किया गया हो। जिस तरह दीपावली लोकप्रिय है उसी तरह खुलासामैन और भी अधिक लोकप्रिय हो जायेंगे। दीपावली वैसे तो प्रेम का त्‍योहार हैविजय का त्‍योहार है। असली प्रेम उपहारों से किया जाता है और विजयी वही होता है जो सबसे अधिक गिफ्ट हथियाता है।

गिफ्ट पाना या हथियाना भी एक कला से कम नहीं है। इस अवसर पर जूते कपड़ों की इतनी सेल लगती हैं और सभी सपरिवार उन्‍हें खरीदने में इस कदर जुटे रहते हैं कि लगता है कि जूतेकपड़े फ्री में बंट रहे हैं। पहले नए कपड़ों के खरीदने से दीवाली होती थी और अब नए गैजेट्स खरीदने से दीवाली की खुशियां मिलती हैं। बम पटाखे के रूप में नोटों का दहन नहीं किया तो कैसी दीवाली और वरिष्‍ठ रचनाकारों की सब पुरानी रचनाएं इस अवसर पर नहीं छपीं तो फिर काहे की दीवाली। रही बची कसर इस अवसर पर जुआ खेलकरलाटरी के टिकट खरीद कर भाग्‍य आजमाने में निकाल ली जाती है। जुआ खेलनाशराब पीना जैसी कलाएं दीपावली के उत्‍साह में खूब बढ़ोतरी करती हैं। आयाम तो इतने हैं कि इस पर एक पूरी पुस्‍तक लिखकर दीपावली के दिन लोकार्पित की जा सकती हैआपकी क्‍या राय हैक्‍या ऐसा कर लिया जाए ?

अनचाहे एमएसएस पाने वालों को भी मिले रकम : नवभारत टाइम्‍स दैनिक 9 नवम्‍बर 2012 पेज 12

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प्रेमिकाओं के रेट में इज़ाफा : जनसंदेश टाइम्‍स 8 नवम्‍बर 2012 को उलटबांसी में प्रकाशित


गर्ल फ्रेंड का जिक्र आने पर जिनकी बांछें खिल जाती हैं वे कई गुणा हैं, उनके चेहरे पर खुशी लाने के लिए पचास करोड़ रुपये उल्‍लेखनीय भूमिका निभाते हैं। पचास रुपये मिलने पर खुश होने वाले भी इस देश में करोड़ों हैं। उनकी मासूमियत के चर्चे फिजाओं को गुल गुलशन गुलजार कर रहे हैं। गुलगुलों से परहेज करने वाले पेट भर कर गुल खा रहे हैं और खिला रहे हैं। अपनी बीवी को अनमोल बतलाकर उन्‍होंने जमाने भर की बीवियों पर प्राइज टैग चस्‍पा कर दिया है। बीवी अपने खाविंद के लिए सदा से अनमोल हैकितने ही पतियों के लिए उनकी बीवियां दुधारू गाय की मानिंद हैंवे जब चाहते हैं दुह लेते हैं। बीवी का मायका मालदार हो और बीवी सीधी गायतब समझो पतियों की रोजाना मौज़ है। सीधी गाय के सींग मारने का रिस्‍क नहीं हैवह दहेज के नाम पर दुहे जाते समय पूंछ नहीं फटकारती। अपनी नाराजगी जतलाने के लिए लात चलाने की सोचना भी उसके लिए पाप है। ऐसी बीवियां अनमोल होती हैं इसमें तनिक भी अतिरंजना नहीं है।
बीवी की अनमोलियत के जितने किस्‍से फिल्‍मी गीतों में गाए गए हैंउतने गर्ल फ्रेंड के नहीं। जिसकी बीवी मोटीछोटीलंबीऊंची चाहे कैसी भी होउसका बड़ा नाम हैआज पूरी शिद्दत से यह अहसास हो रहा है। बीवी की महानता की बाबत सदी के महानायक बिग बी ने अपने एक गीत में खूब शौर्यगान किया है। मायके के मायाजाल से ग्रसित हों और माल का जलवा भरपूर हो तो कहा गया है कि सोने में सुहागा वाली परम स्थिति दामाद को प्राप्‍त होती है। दस पचास हजार एकड़ भूमि या दो पांच फार्म हाउस मिलना दामाद के मौलिक अधिकारों की श्रेणी में आ जाता है।
अपनी बीवी को अनमोल बतलाकर जमाने भर के पतियों और उनकी पत्नियों से बैर मोल लेकर उन्‍होंने बर्र के छत्‍ते में हाथ देने का अपराध कर दिया है। मानो कहना चाह रहे हैं कि दूसरे की बीवी तोलकर मिल रही है और उन सब पर कीमत की चिप्‍पी चिपकी हुई है। बहरहालबच्‍चन साहब ने हर तरह की बीवी का गुणगान ही किया है। जैसे बीवी गुणों की खान होती है वैसे ही कोयले की खदान होती है जिसमें काले होने के बावजूद खूब तमाम गुण समाए हैं। खान खोदने का मौका जिसे मिल जाएउसकी झोली स्‍वर्ण मुद्राओं की खनखनाहट से लबालब भर जाएगीन कि खाली टीन कनस्‍तर के माफिक गला फाड़ कर चिल्‍लाएगी। बिगड़ने वाले तो अपनी भैंस को डंडा मारने पर बिफर जाते हैं। किसी गैर की बीवी के मर्द की क्‍या मजाल कि जमाने भर के पतियों की बीवियों का मोल लगाने की जुर्रत करे। नारी के विरुद्ध आरी चलाने की गुस्‍ताखी का यह मामला सामाजिक नियमों के उल्‍लंघन की श्रेणी में आता हैआप समझ रहे हैं न ?

शून्‍यकाल से आया व्‍यंग्‍य : सोपान स्‍टेप मासिक पत्रिका के नवम्‍बर 2012 अंक में पुस्‍तक समीक्षा

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यूं ही दिख रहा है आवरण 

भ्रष्‍टाचार में विकास की संभावनाएं : दैनिक जनवाणी स्‍तंभ 'तीखी' नज़र' 6 नवम्‍बर 2012 अंक में प्रकाशित


चश्‍मारहित पाठन के लिए मुझे चटकाएं


भ्रष्‍टाचार करना और मिटाना दोनों आजकल बतौर कैरियर खूब पसंद किए जा रहे हैं। भ्रष्‍टाचार को इस समय सबसे अधिक फुटेज मिल रही है। पिछले कई महीने से उसकी ऊंचाई का ग्राफ बहुत तेजी से ऊपर की ओर गया है लेकिन उससे प्रभावित वे नीचे वाले हो रहे हैं। यह ऐसा धंधा है कि भ्रष्‍टाचार करो तो खूब कमा लो और मुखालफत करो तब भी जेबें लबालब भर लो।  महंगाई इस सच को जान गई है और उसका रो रोकर बहुत बुरा हाल है। वह मन ही मन कुढ़ रही है, सीढि़यां तो वह भी चढ़ रही है किंतु वह इसे इसलिए जाहिर नहीं कर रही है क्‍योंकि ऐसा करने से उसकी जमी हुई साख पिघलकर पानी की तरह बह जाएगी। डॉयन के खिताब से सम्‍मानित होने के बाद भी वह नित नए शिखरों पर चढ़ने की जुगत में सदा सक्रिय रहती है, इसमें उसे सफलता भी मिलती रही है। जब उसके प्रतिद्वंद्वी भ्रष्‍टाचार को इतनी लोकप्रियता नहीं मिली थी, तब तक तो सब ठीक चल रहा था लेकिन एकाएक भ्रष्‍टाचार ने पूरे परदे के आकार में अपने रूप को चौड़ा लिया है। लोकप्रिय होने के नेताओं के रिकार्ड को भी ध्‍वस्‍त करने में उसे घनघोर सफलता मिल चुकी है।
इसे देखकर महंगाई तो महंगाई उसके गठबंधन केर सहयोगी टीम के सक्रिय मेम्‍बर पैट्रोल, डीजल, गैस, सब्जियां और फल तक बेहद गमगीन हैं। उनका ऐसा करना सतही तौर से महंगाई की सहानुभूति प्राप्‍त करना है, वरना तो उन्‍हें तो भ्रष्‍टाचार से जितनी बढ़त मिल रही है, उनका कैरियर जितना विकास पर है, उतनी बढ़त उन्‍हें कभी महंगाई के साथ होने से भी नहीं मिली है।  महंगाई नित नई रणनीतियां बनाती है, उस पर पूरी तरह से अमल भी करती है परंतु रेट्स के बढ़ने से बुरी तरह मात खा रही है, वह ऊंचे रेटों के साथ लोकप्रियता के कॉम्‍बो पैक पर भी कब्‍जा जमाने फेर में है। दरअसल, भ्रष्‍टाचार ने उससे बहुत कम समय में बाजी मार ली है।

भ्रष्‍टाचार के विकास में यूं तो महंगाई की उल्‍लेखनीय भूमिका है और वह चाहती है कि चर्चा के केन्‍द्र में वह खुद बनी रहे। दरअसल, भ्रष्‍टाचार को लोकप्रियता के पायदान पर काबिज होने में महंगाई का भरपूर सहयोग मिला है। भ्रष्‍टाचार को लोकप्रियता की बुलंदियों के शिखर पर पहुंचाने में अन्‍ना और उनकी टीम का भरपूर योगदान रहा है। अब टीम के सदस्‍यों ने अपनी कई टीमें बना ली हैं और चौतरफा लोकप्रियता को भुना रही हैं। भुने हुए में कितना स्‍वाद मिलता है, इसे भुनने वाला नहीं, भुने हुए को खाने वाला ही जानता है। महंगाई के सारे प्रयत्‍न फेल हो रहे हैं और वह भुनभुना रही है। महंगाई के कारण नफा काटने वाले तेज गति से भ्रष्‍टाचार की ओर उन्‍मुख हो रहे हैं, महंगाई महारानी के लिए यह भी चिंता का सबब बन गया है । महारानी की कुर्सी पर रिस्‍क ऐसे समय में बढ़ गया है जबकि चुनाव नजदीक हैं और सरकार डोलायमान है।

गैस के सिलैंडरों की संख्‍या सीमित करने, कनैक्‍शनों पर सख्‍ती बरतने से पब्लिक परेशान हुई, परेशान पब्लिक ने गैस के पुतले भी फूंके लेकिन महंगाई में अब वह ताकत नहीं रही है जिससे उसकी औकात कानी कौड़ी की भी नहीं रही है। आज के माहौल में महंगाई के सारे ही दुख बड़े हैं और उससे मुकाबला करने के‍ लिए खड़े हैं। वैसे अब भी उसमें इतना दम तो बाकी है कि जरा सा जोर मारती है तो बहुत कुछ हासिल कर लेती है। महंगाई महारानी अब चाह रही है कि आजकल सुर्खियों में बने हुए खुलासामैन उसकी बुराईयों और उसकी वजह से समाज को रहे नुकसान की खामियों का भी पर्दाफाश करें ताकि वह अपनी खोई हुई प्रतिष्‍ठा को हासिल करने में सफल हो सके।

जहां देखो वह रोती बिसूरती नजर आ रही है परंतु किसी की भी उसकी खामियों का खुलासा करने में दिलचस्‍पी नहीं रह गई है। ऐसे निराशाजनक दौर में वह कई बार खुदकुशी करने की भी सोच चुकी है। वह ऐसा न करे इसके लिए आप महंगाई को उसकी उन्‍नति के लिए कुछ मौलिक उपाय सुझा सकते हैं क्‍या ?

व्‍यंग्‍य का शून्‍यकाल : पाखी मासिक पत्रिका के अक्‍टूबर नवम्‍बर 2012 के सुंयुक्‍तांक में

व्‍यंग्‍य का शून्‍यकाल अपनी मित्र पुस्‍तकों के साथ

पाखी में जमावड़ा जमा है पुस्‍तकों का

कैमरों से पंगा, नहला देंगे गंगा : दैनिक मिलाप स्‍तंभ 'बैठे ठाले' 3 नवम्‍बर 2012 में प्रकाशित




कैमरे फुलटॉस खुंदक में हैं। सवाल पत्रकारों ने पूछा और वे हमारे से चिढ़ गएक्विटलों गालियां फेंकीं और धमकाते हुए भिड़ गए। हमें तोड़ कर वे अपना नुकसान करेंगे। कायर अभद्र न होते तो मुकाबला करते। सवाल सम कोई और नहीं। देखा नहीं पब्लिसिटी की प्‍यासी अभिनेत्री, केजरीवाल से सवाल करने के मूड में मौके को समझ रही त्‍यौहार है। चारों ओर सवालों का मौसम तारी है इसलिए बाजी मारने की फिराक में, फ्राक उतार लघु वस्‍त्र धारण किए है। सवाल क्‍या कर लिए, वे तो सिरे से ही उखड़ गए,  भूल गए कि उनके बुलाने पर पहुंचे थे। जिसकी जड़ें होती हैंवह अच्‍छी तरह जानता है कि किसी भी जड़वान को उखाड़ने की धमकी देना व्‍यर्थ है। क्‍योंकि असली मट्ठे के अभाव में चाणक्‍य की शपथ की मानिंद जड़ें उखाड़कर उसमें मट्ठा डालने की ख्‍वाहिश पूरी करना भी पॉसीबल नहीं है।

ताव खाकर बेजुबान कैमरों को ही धमकाने में जुट गए। देश के कानून मंत्री ने पिछले दिनों धमकाने को कानूनी मान्‍यता क्‍या दे डाली हैइतराने लगे। माना कि उनके कहे पर आंखनाककान मूंद कर अमल करना है। पर हम भयभीत नहीं हैसमझ लो। हमारे भीतर प्राण नहीं हैं किंतु सबके पल-पल को जीवंत करते हैं। सिरफिरे मंत्रियों के मंतर से बचने के लिए इंश्‍योर्ड हैं।  तोड़ लोजितना मन करे। टूटने के बाद हमारे से बेहतर क्‍वालिटी के कैमरे आ जाएंगे। जो फोटो खींचेंगेआवाज रिकार्ड करेंगे और बदतमीजी की तो गाली भी देंगे। गालियां बकने के ठेके के हकदार सिर्फ वे ही नहीं है। एफएम चैनलों पर ही देख लोइसकी उसकी सबकी बजाई जा रही है। किसी को टोपी पहनाई और किसी की सरेआम आरती उतारी जा रही है।
वाह रेहिमाचल के तथाकथित वीर। पुरातनता के एंटीक पीस। चोर कहने पर ही इतना बिफर गएडकैत कह दिया होता, तब तो अवश्‍य ही एक बयानवीर की तरह गोली मार देते।  पब्लिक के वोटों पर खुलकर डकैती डालने वाले दस्‍यु। आरोप साबित हो जाएंगेतब तिहाड़ की दीवारों में कैद कर दिए जाओगे। धमकी देकर कौन सा गिन्‍नीज बुक में नाम दर्ज हो जाएगा। गुजरे जमाने के सुल्‍तान। सोच रहे हो कि मीडिया के सवालों से डरने वाले को सरकार मैडल देगी। सेब के फलों का भी कर रहे हो धंधा। एक सेब का सेवन डॉक्‍टरों को दूर रखता है लेकिन उनका धंधा करने से पौष्टिकता नहीं मिला करती। धन मिलता है और धनवेदना में इजाफा होता है। फल को कुफल बनाने की चेष्‍टा करने वाले पब्लिक तेरा और तेरे हिमायतियों का भरपूर गुणगान करेगी। कैमरों से पंगा ले रहो हो, मालूम नहीं है कि नई टैक्‍नीक वाले कैमरे आपके वस्‍त्रसहित चित्रों को वस्‍त्रविहीन कर देंगे और नहला देंगे गंगा। कैमरों को बेजुबान समझने के मुगालते में मत रहना। पहनकर हिमालय की खाल, मत बघारो शानपब्लिक गर्म हो गई तो उसकी गर्मी से बर्फ की मानिंद पिघल जाओगे, कितनी भी कोशिश कर लो पब्लिक के लिए मीठी बर्फी नहीं बन पाओगे ?

फेरबदल नहीं है चोरी : दैनिक जनवाणी स्‍तंभ 'तीखी नज़र' 30 अक्‍टूबर 2012 में प्रकाशित



मौन रहके कोई कितना मुखर हो सकता है,मौनी बाबा से बेहतर मिसाल नहीं मिलेगी। उनके कुनबे में फेरबदल होती है तो शतरंज की तरह मोहरे बदले जाते हैं और मुखिया खुद मोहरा बन जाता है। ऐसी हेराफेरी निःशब्द होती है और मीडिया प्रायोजित रूप से स्तब्ध रह जाता है। यह सब पूरी ईमानदारी के साथ होता है और जनता को काटने के लिए हथियार बदल दिए जाते हैं। जनता को नए सपने देखने का संकेत किया जाता है और इस बहाने कई फूटे-अधूरे सपने पूरे कर लिए जाते हैं। मलाई खाने वाले अघाकर एक ओर हो जाते हैं तो नई पारी के लिए दूसरे अपनी जीभ तैयार करने लगते हैं। मलाई खाकर देशसेवा का बोनस मिलता है, सो अलग मन को मोह लेता है।
ईमानदार को यह अधिकार है कि वह ईमानदारी पर डटा रहेसो जमा हुआ है अंगद के पांव के माफिक। फिर उसे हिलाने वाले कैसे कामयाब हो रहे हैंइसे जानने के लिए हालातों पर गहराई से गौर करना निहायत अनिवार्य है। बजाय इसके देश और इसके नागरिक फीलपांव का सुंदर अहसास कर रहे हैं क्‍योंकि उनके सामने परिस्थितियां ही ऐसी पेश की जा रही हैं। पब्लिक वही देखने के लिए मजबूर है जो उसे सत्‍ता पक्ष दिखलाना चाहता है। इससे अलग अहसास पब्लिक कैसे करेइसके लिए नया मीडिया आज अपने पूरे रुतबे के साथ मौजूद है। इसी से आत्‍मबल डगमग है। जिसकी डगमगाहट मुखिया के निर्णय में देखी जा रही है। पूरा मोहल्‍ला तो नहीं बदलाहल्‍का सा फेरबदल ही किया है। कौन कह रहा है कि हेराफेरी का बाजार जमा लिया है। अंत भला सो सब भला। सब भले रहेंचंगे रहेंचाहे पब्लिक के सामने नंगे रहें। किंतु वस्‍त्रों का अहसास होना ही काफी समझा जा रहा हैउन्‍हें पहनें अथवा नहीं पहनें। इसकी वजह में जाना सामाजिक दृष्टि से उचित नहीं है।
पंगे सिर्फ पब्लिक से ही लिए जाते हैं। टीम के मुखिया ने भूल कर दी तो कौन सा पहाड़ टूट कर आ गिरा, चुनाव आने पर उसकी पीठ पर हाथ फिरा देंगे। वह तसल्‍ली पाएगा,उनके चुनने का जुगाड़ सध जाएगा। एकाध नुक्‍कड़ वाले से ही तो बदला लिया है। कैप्‍टेन वही है जो चुप रहता हैचुप सहता है। जब विचारों की बाढ़ आती हैटीम सारी जुट जाती है। जिसका नाम टीम में नहीं हैजो सिर्फ दर्शक की हैसियत से शुमार हुआ था। फेरबदल को हेराफेरी की तर्ज पर बिठाकर इंतहा तक पहुंचाया, अहसास यह किया कि इसको पीठ पर लादे चल रहे हैं। इसे ही कहते हैं कि आजकल गधों के ही नहींघोड़ों के भी सींग निखर रहे हैं। एक को सींग मारादूसरे से सींग पर पालिश करवाकर चमकवाया। सींग पर भरपूर चमक आई जिससे पब्लिक समेत विपक्ष चौंधिया गया। इसको टीम से निकालाउसको टीम में घुसेड़ा। दो चार को रुसवा किया। पब्लिक को हंसने के तोहफे दिए। एक दो ने भड़ास निकाली। डेढ़ ढाई की आस पूरी हुई। टीम में परिवर्तन से कामयाबी में तेजी की उम्‍मीद बंधी है किंतु इसके सिवाय कोई और निष्‍कपट रास्‍ता ही नहीं था। आपका सोचना भी सही है कि रास्‍ता नहीं था तो हवाई मार्ग से जाना चाहिए था। रेल की पटरियों को आजमाना चाहिए था किंतु क्‍या करें इतना सब्र होता तो अगले चुनाव होने तक इंतजार नहीं करते।
मंत्रियों को आप सिर्फ लोकल मंतर मारने वाला ही मत मान लीजिएगा। वे अपने खेल और मैदान के माहिर खिलाड़ी हैं। यह अकेले खेलने वाला खेल हैइसमें विजय पक्‍की होती है। उनकी जीत पर सिर्फ टिप्‍पणियां ही कर सकते हैं यहजबकि इनकी टिप्‍पणियों को कोई गंभीरता से लेता नहीं है। न सत्‍ता पक्ष और न आम जनता यानी पब्लिक। क्रिकेट टीम में फेरबदल और मंत्रिमंडल में यह फेरबदल हेराफेरी के पर्याय के तौर पर जाने जाते हैं। यह फेरबदल तो ऐसा है कि जो अभी तक साईकिल चलाता रहा हैउसको कार थमा दी गई है कि इस पर खूब सारी एवरेज निकालिएचाहे हादसे होते रहें। रेल और कार से दुर्घटनाएं करने के बाद भी हवाई जहाज उड़ाने को थमा दिया जाता है। देश के मौजूदा कानूनों से खिलवाड़ करने की योग्‍यता हासिल करने के बाद इन्‍हें विदेश तक जाने का लाईसेंस थमा दिया गया है। देश में मधुर संबंधों की जरूरत नहीं है किंतु विदेशों से नाते रिश्‍तों को मधुर बनाने के ठेके इन्‍हें सौंप दिए गए हैं।

फेरबदल का फेर : दैनिक जनसत्‍ता 31 अक्‍टूबर 2012 की चौपाल में प्रकाशित

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मौन रहके कोई कितना मुखर हो सकता है,मौनी बाबा से बेहतर मिसाल नहीं मिलेगी। उनके कुनबे में फेरबदल होती है तो शतरंज की तरह मोहरे बदले जाते हैं और मुखिया खुद मोहरा बन जाता है। ऐसी हेराफेरी निःशब्द होती है और मीडिया प्रायोजित रूप से स्तब्ध रह जाता है। यह सब पूरी ईमानदारी के साथ होता है और जनता को काटने के लिए हथियार बदल दिए जाते हैं। जनता को नए सपने देखने का संकेत किया जाता है और इस बहाने कई फूटे-अधूरे सपने पूरे कर लिए जाते हैं। मलाई खाने वाले अघाकर एक ओर हो जाते हैं तो नई पारी के लिए दूसरे अपनी जीभ तैयार करने लगते हैं। मलाई खाकर देशसेवा का बोनस मिलता है, सो अलग मन को मोह लेता है।
ईमानदार को यह अधिकार है कि वह ईमानदारी पर डटा रहेसो जमा हुआ है अंगद के पांव के माफिक। फिर उसे हिलाने वाले कैसे कामयाब हो रहे हैंइसे जानने के लिए हालातों पर गहराई से गौर करना निहायत अनिवार्य है। बजाय इसके देश और इसके नागरिक फीलपांव का सुंदर अहसास कर रहे हैं क्‍योंकि उनके सामने परिस्थितियां ही ऐसी पेश की जा रही हैं। पब्लिक वही देखने के लिए मजबूर है जो उसे सत्‍ता पक्ष दिखलाना चाहता है। पूरा मोहल्‍ला तो नहीं बदलाहल्‍का सा फेरबदल ही किया है। कौन कह रहा है कि हेराफेरी का बाजार जमा लिया है। अंत भला सो सब भला। सब भले रहेंचंगे रहेंचाहे पब्लिक के सामने नंगे रहें।
पंगे सिर्फ पब्लिक से ही लिए जाते हैं। टीम के मुखिया ने भूल कर दी तो कौन सा पहाड़ टूट कर आ गिराचुनाव आने पर उसकी पीठ पर हाथ फिरा देंगे। वह तसल्‍ली पाएगा,उनके चुनने का जुगाड़ सध जाएगा। एकाध नुक्‍कड़ वाले से ही तो बदला लिया है। कैप्‍टेन वही है जो चुप रहता हैचुप सहता है। जब विचारों की बाढ़ आती हैटीम सारी जुट जाती है। जिसका नाम टीम में नहीं हैजो सिर्फ दर्शक की हैसियत से शुमार हुआ था। फेरबदल को हेराफेरी की तर्ज पर बिठाकर इंतहा तक पहुंचायाअहसास यह किया कि इसको पीठ पर लादे चल रहे हैं। इसे ही कहते हैं कि आजकल गधों के ही नहींघोड़ों के भी सींग निखर रहे हैं। एक को सींग मारादूसरे से सींग पर पालिश करवाकर चमकवाया। सींग पर भरपूर चमक आई जिससे पब्लिक समेत विपक्ष चौंधिया गया। इसको टीम से निकालाउसको टीम में घुसेड़ा। दो चार को रुसवा किया। पब्लिक को हंसने के तोहफे दिए। एक दो ने भड़ास निकाली। डेढ़ ढाई की आस पूरी हुई। टीम में परिवर्तन से कामयाबी में तेजी की उम्‍मीद बंधी है किंतु इसके सिवाय कोई और निष्‍कपट रास्‍ता ही नहीं था। आपका सोचना भी सही है कि रास्‍ता नहीं था तो हवाई मार्ग से जाना चाहिए था। रेल की पटरियों को आजमाना चाहिए था किंतु क्‍या करें इतना सब्र होता तो अगले चुनाव होने तक इंतजार नहीं करते।
मंत्रियों को आप सिर्फ लोकल मंतर मारने वाला ही मत मान लीजिएगा। वे अपने खेल और मैदान के माहिर खिलाड़ी हैं। क्रिकेट टीम में फेरबदल और मंत्रिमंडल में यह फेरबदल हेराफेरी के पर्याय के तौर पर जाने जाते हैं। यह फेरबदल तो ऐसा है कि जो अभी तक साईकिल चलाता रहा हैउसको कार थमा दी गई है कि इस पर खूब सारी एवरेज निकालिएचाहे हादसे होते रहें। रेल और कार से दुर्घटनाएं करने के बाद भी हवाई जहाज उड़ाने को थमा दिया जाता है। देश के मौजूदा कानूनों से खिलवाड़ करने की योग्‍यता हासिल करने के बाद इन्‍हें विदेश तक जाने का लाईसेंस थमा दिया गया है। देश में मधुर संबंधों की जरूरत नहीं है किंतु विदेशों से नाते रिश्‍तों को मधुर बनाने के ठेके इन्‍हें सौंप दिए गए हैं।

फेरबदल, फेरबदल, फेरबदल : दैनिक देशबंधु 31 अक्‍टूबर 2012 के अंक में प्रकाशित



मौन रहके कोई कितना मुखर हो सकता है,मौनी बाबा से बेहतर मिसाल नहीं मिलेगी। उनके कुनबे में फेरबदल होती है तो शतरंज की तरह मोहरे बदले जाते हैं और मुखिया खुद मोहरा बन जाता है। ऐसी हेराफेरी निःशब्द होती है और मीडिया प्रायोजित रूप से स्तब्ध रह जाता है। यह सब पूरी ईमानदारी के साथ होता है और जनता को काटने के लिए हथियार बदल दिए जाते हैं। जनता को नए सपने देखने का संकेत किया जाता है और इस बहाने कई फूटे-अधूरे सपने पूरे कर लिए जाते हैं। मलाई खाने वाले अघाकर एक ओर हो जाते हैं तो नई पारी के लिए दूसरे अपनी जीभ तैयार करने लगते हैं। मलाई खाकर देशसेवा का बोनस मिलता है, सो अलग मन को मोह लेता है।
ईमानदार को यह अधिकार है कि वह ईमानदारी पर डटा रहेसो जमा हुआ है अंगद के पांव के माफिक। फिर उसे हिलाने वाले कैसे कामयाब हो रहे हैंइसे जानने के लिए हालातों पर गहराई से गौर करना निहायत अनिवार्य है। बजाय इसके देश और इसके नागरिक फीलपांव का सुंदर अहसास कर रहे हैं क्‍योंकि उनके सामने परिस्थितियां ही ऐसी पेश की जा रही हैं। पब्लिक वही देखने के लिए मजबूर है जो उसे सत्‍ता पक्ष दिखलाना चाहता है। इससे अलग अहसास पब्लिक कैसे करेइसके लिए नया मीडिया आज अपने पूरे रुतबे के साथ मौजूद है। इसी से आत्‍मबल डगमग है। जिसकी डगमगाहट मुखिया के निर्णय में देखी जा रही है। पूरा मोहल्‍ला तो नहीं बदलाहल्‍का सा फेरबदल ही किया है। कौन कह रहा है कि हेराफेरी का बाजार जमा लिया है। अंत भला सो सब भला। सब भले रहेंचंगे रहेंचाहे पब्लिक के सामने नंगे रहें। किंतु वस्‍त्रों का अहसास होना ही काफी समझा जा रहा हैउन्‍हें पहनें अथवा नहीं पहनें। इसकी वजह में जाना सामाजिक दृष्टि से उचित नहीं है।
पंगे सिर्फ पब्लिक से ही लिए जाते हैं। टीम के मुखिया ने भूल कर दी तो कौन सा पहाड़ टूट कर आ गिराचुनाव आने पर उसकी पीठ पर हाथ फिरा देंगे। वह तसल्‍ली पाएगा,उनके चुनने का जुगाड़ सध जाएगा। एकाध नुक्‍कड़ वाले से ही तो बदला लिया है। कैप्‍टेन वही है जो चुप रहता हैचुप सहता है। जब विचारों की बाढ़ आती हैटीम सारी जुट जाती है। जिसका नाम टीम में नहीं हैजो सिर्फ दर्शक की हैसियत से शुमार हुआ था। फेरबदल को हेराफेरी की तर्ज पर बिठाकर इंतहा तक पहुंचायाअहसास यह किया कि इसको पीठ पर लादे चल रहे हैं। इसे ही कहते हैं कि आजकल गधों के ही नहींघोड़ों के भी सींग निखर रहे हैं। एक को सींग मारादूसरे से सींग पर पालिश करवाकर चमकवाया। सींग पर भरपूर चमक आई जिससे पब्लिक समेत विपक्ष चौंधिया गया। इसको टीम से निकालाउसको टीम में घुसेड़ा। दो चार को रुसवा किया। पब्लिक को हंसने के तोहफे दिए। एक दो ने भड़ास निकाली। डेढ़ ढाई की आस पूरी हुई। टीम में परिवर्तन से कामयाबी में तेजी की उम्‍मीद बंधी है किंतु इसके सिवाय कोई और निष्‍कपट रास्‍ता ही नहीं था। आपका सोचना भी सही है कि रास्‍ता नहीं था तो हवाई मार्ग से जाना चाहिए था। रेल की पटरियों को आजमाना चाहिए था किंतु क्‍या करें इतना सब्र होता तो अगले चुनाव होने तक इंतजार नहीं करते।
मंत्रियों को आप सिर्फ लोकल मंतर मारने वाला ही मत मान लीजिएगा। वे अपने खेल और मैदान के माहिर खिलाड़ी हैं। यह अकेले खेलने वाला खेल हैइसमें विजय पक्‍की होती है। उनकी जीत पर सिर्फ टिप्‍पणियां ही कर सकते हैं यहजबकि इनकी टिप्‍पणियों को कोई गंभीरता से लेता नहीं है। न सत्‍ता पक्ष और न आम जनता यानी पब्लिक। क्रिकेट टीम में फेरबदल और मंत्रिमंडल में यह फेरबदल हेराफेरी के पर्याय के तौर पर जाने जाते हैं। यह फेरबदल तो ऐसा है कि जो अभी तक साईकिल चलाता रहा हैउसको कार थमा दी गई है कि इस पर खूब सारी एवरेज निकालिएचाहे हादसे होते रहें। रेल और कार से दुर्घटनाएं करने के बाद भी हवाई जहाज उड़ाने को थमा दिया जाता है। देश के मौजूदा कानूनों से खिलवाड़ करने की योग्‍यता हासिल करने के बाद इन्‍हें विदेश तक जाने का लाईसेंस थमा दिया गया है। देश में मधुर संबंधों की जरूरत नहीं है किंतु विदेशों से नाते रिश्‍तों को मधुर बनाने के ठेके इन्‍हें सौंप दिए गए हैं।

कैमरों से पंगा, कर देंगे नंगा : जनसंदेश टाइम्‍स 30 अक्‍टूबर 2012 में 'उलटबांसी' स्‍तंभ में प्रकाशित



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कैमरे फुलटॉस खुंदक में हैं। सवाल पत्रकारों ने पूछा और वे हमारे से चिढ़ गएक्विटलों गालियां फेंकीं और धमकाते हुए भिड़ गए। हमें तोड़ कर वे अपना नुकसान करेंगे। कायर अभद्र न होते तो मुकाबला करते। सवाल सम कोई और नहीं। देखा नहीं पब्लिसिटी की थर्स्‍टी अभिनेत्री, ओपन मैन से सवाल करने के मूड में मौके को समझ रही त्‍यौहार है। चारों ओर सवालों का मौसम तारी है इसलिए बाजी मारने की फिराक में, फ्राक उतार लघु वस्‍त्र धारण किए है। सवाल क्‍या कर लिए, वे तो सिरे से ही उखड़ गए, भूल गए कि उनके बुलाने पर पहुंचे थे। जिसकी जड़ें होती हैंवह अच्‍छी तरह जानता है कि किसी भी जड़वान को उखाड़ने की धमकी देना व्‍यर्थ है। क्‍योंकि असली मट्ठे के अभाव में चाणक्‍य की शपथ की मानिंद जड़ें उखाड़कर उसमें मट्ठा डालने की ख्‍वाहिश पूरी करना भी पॉसीबल नहीं है।

ताव खाकर बेजुबान कैमरों को ही धमकाने में जुट गए। देश के पुराने कानून मंत्री ने पिछले दिनों धमकाने को कानूनी मान्‍यता क्‍या दे डाली हैइतराने लगे। माना कि उनके कहे पर आंख,नाककान मूंद कर अमल करना है। पर हम भयभीत नहीं हैसमझ लो। हमारे भीतर प्राण नहीं हैं किंतु सबके पल-पल को जीवंत करते हैं। सिरफिरे मंत्रियों के मंतर से बचने के लिए इंश्‍योर्ड हैं।  तोड़ लोजितना मन करे। टूटने के बाद हमारे से बेहतर क्‍वालिटी के कैमरे आ जाएंगे। जो फोटो खींचेंगेआवाज रिकार्ड करेंगे और बदतमीजी की तो गाली भी देंगे। गालियां बकने के ठेके के हकदार सिर्फ वे ही नहीं है। एफएम चैनलों पर ही देख लोइसकी उसकी सबकी बजाई जा रही है। किसी को टोपी पहनाई और किसी की सरेआम आरती उतारी जा रही है।
वाह रेहिमाचल के तथाकथित वीर। पुरातनता के एंटीक पीस। चोर कहने पर ही इतना बिफर गएडकैत कह दिया होता, तब तो अवश्‍य ही एक बयानवीर की तरह गोली मार देते।  पब्लिक के वोटों पर खुलकर डकैती डालने वाले दस्‍यु। आरोप साबित हो जाएंगेतब तिहाड़ की दीवारों में कैद कर दिए जाओगे। धमकी देकर कौन सा गिन्‍नीज बुक में नाम दर्ज हो जाएगा। गुजरे जमाने के सुल्‍तान। सोच रहे हो कि मीडिया के सवालों से डरने वाले को सरकार मैडल देगी। सेब के फलों का भी कर रहे हो धंधा। एक सेब का सेवन डॉक्‍टरों को दूर रखता है लेकिन उनका धंधा करने से पौष्टिकता नहीं मिला करती। धन मिलता है और धनवेदना में इजाफा होता है। फल को कुफल बनाने की चेष्‍टा करने वाले पब्लिक तेरा और तेरे हिमायतियों का भरपूर गुणगान करेगी। कैमरों से पंगा ले रहो हो, मालूम नहीं है कि नई टैक्‍नीक वाले कैमरे आपके वस्‍त्रसहित चित्रों को वस्‍त्रविहीन कर देंगे और नहला देंगे गंगा। कैमरों को बेजुबान समझने के मुगालते में मत रहना। पहनकर हिमालय की खाल, मत बघारो शानपब्लिक गर्म हो गई तो उसकी गर्मी से बर्फ की मानिंद पिघल जाओगे, कितनी भी कोशिश कर लो पब्लिक के लिए मीठी बर्फी नहीं बन पाओगे ?

कैमरों से पंगा ... : आई नेक्‍स्‍ट स्‍तंभ 'खूब कही' 30 अक्‍टूबर 2012 में प्रकाशित

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कैमरे फुलटॉस खुंदक में हैं। सवाल पत्रकारों ने पूछा और वे हमारे से चिढ़ गएक्विटलों गालियां फेंकीं और धमकाते हुए भिड़ गए। हमें तोड़ कर वे अपना नुकसान करेंगे। कायर अभद्र न होते तो मुकाबला करते। सवाल सम कोई और नहीं। देखा नहीं पब्लिसिटी की प्‍यासी अभिनेत्री, केजरीवाल से सवाल करने के मूड में मौके को समझ रही त्‍यौहार है। चारों ओर सवालों का मौसम तारी है इसलिए बाजी मारने की फिराक में, फ्राक उतार लघु वस्‍त्र धारण किए है। सवाल क्‍या कर लिए, वे तो सिरे से ही उखड़ गए,  भूल गए कि उनके बुलाने पर पहुंचे थे। जिसकी जड़ें होती हैंवह अच्‍छी तरह जानता है कि किसी भी जड़वान को उखाड़ने की धमकी देना व्‍यर्थ है। क्‍योंकि असली मट्ठे के अभाव में चाणक्‍य की शपथ की मानिंद जड़ें उखाड़कर उसमें मट्ठा डालने की ख्‍वाहिश पूरी करना भी पॉसीबल नहीं है।

ताव खाकर बेजुबान कैमरों को ही धमकाने में जुट गए। देश के कानून मंत्री ने पिछले दिनों धमकाने को कानूनी मान्‍यता क्‍या दे डाली हैइतराने लगे। माना कि उनके कहे पर आंखनाककान मूंद कर अमल करना है। पर हम भयभीत नहीं हैसमझ लो। हमारे भीतर प्राण नहीं हैं किंतु सबके पल-पल को जीवंत करते हैं। सिरफिरे मंत्रियों के मंतर से बचने के लिए इंश्‍योर्ड हैं।  तोड़ लोजितना मन करे। टूटने के बाद हमारे से बेहतर क्‍वालिटी के कैमरे आ जाएंगे। जो फोटो खींचेंगेआवाज रिकार्ड करेंगे और बदतमीजी की तो गाली भी देंगे। गालियां बकने के ठेके के हकदार सिर्फ वे ही नहीं है। एफएम चैनलों पर ही देख लोइसकी उसकी सबकी बजाई जा रही है। किसी को टोपी पहनाई और किसी की सरेआम आरती उतारी जा रही है।
वाह रेहिमाचल के तथाकथित वीर। पुरातनता के एंटीक पीस। चोर कहने पर ही इतना बिफर गएडकैत कह दिया होता, तब तो अवश्‍य ही एक बयानवीर की तरह गोली मार देते।  पब्लिक के वोटों पर खुलकर डकैती डालने वाले दस्‍यु। आरोप साबित हो जाएंगेतब तिहाड़ की दीवारों में कैद कर दिए जाओगे। धमकी देकर कौन सा गिन्‍नीज बुक में नाम दर्ज हो जाएगा। गुजरे जमाने के सुल्‍तान। सोच रहे हो कि मीडिया के सवालों से डरने वाले को सरकार मैडल देगी। सेब के फलों का भी कर रहे हो धंधा। एक सेब का सेवन डॉक्‍टरों को दूर रखता है लेकिन उनका धंधा करने से पौष्टिकता नहीं मिला करती। धन मिलता है और धनवेदना में इजाफा होता है। फल को कुफल बनाने की चेष्‍टा करने वाले पब्लिक तेरा और तेरे हिमायतियों का भरपूर गुणगान करेगी। कैमरों से पंगा ले रहो हो, मालूम नहीं है कि नई टैक्‍नीक वाले कैमरे आपके वस्‍त्रसहित चित्रों को वस्‍त्रविहीन कर देंगे और नहला देंगे गंगा। कैमरों को बेजुबान समझने के मुगालते में मत रहना। पहनकर हिमालय की खाल, मत बघारो शानपब्लिक गर्म हो गई तो उसकी गर्मी से बर्फ की मानिंद पिघल जाओगे, कितनी भी कोशिश कर लो पब्लिक के लिए मीठी बर्फी नहीं बन पाओगे ?