फेरबदल या हेराफेरी नहीं है .. चोरी : दैनिक हिंदी मिलाप स्‍तंभ 'बैठे ठाले' में 19 नवम्‍बर 2012 को प्रकाशित

मिलाप कीजिए



मौन रहके कोई कितना मुखर हो सकता है,मौनी बाबा से बेहतर मिसाल नहीं मिलेगी। उनके कुनबे में फेरबदल होती है तो शतरंज की तरह मोहरे बदले जाते हैं और मुखिया खुद मोहरा बन जाता है। ऐसी हेराफेरी निःशब्द होती है और मीडिया प्रायोजित रूप से स्तब्ध रह जाता है। यह सब पूरी ईमानदारी के साथ होता है और जनता को काटने के लिए हथियार बदल दिए जाते हैं। जनता को नए सपने देखने का संकेत किया जाता है और इस बहाने कई फूटे-अधूरे सपने पूरे कर लिए जाते हैं। मलाई खाने वाले अघाकर एक ओर हो जाते हैं तो नई पारी के लिए दूसरे अपनी जीभ तैयार करने लगते हैं। मलाई खाकर देशसेवा का बोनस मिलता है, सो अलग मन को मोह लेता है।
ईमानदार को यह अधिकार है कि वह ईमानदारी पर डटा रहे, सो जमा हुआ है अंगद के पांव के माफिक। फिर उसे हिलाने वाले कैसे कामयाब हो रहे हैं, इसे जानने के लिए हालातों पर गहराई से गौर करना निहायत अनिवार्य है। बजाय इसके देश और इसके नागरिक फीलपांव का सुंदर अहसास कर रहे हैं क्‍योंकि उनके सामने परिस्थितियां ही ऐसी पेश की जा रही हैं। पब्लिक वही देखने के लिए मजबूर है जो उसे सत्‍ता पक्ष दिखलाना चाहता है। इससे अलग अहसास पब्लिक कैसे करे, इसके लिए नया मीडिया आज अपने पूरे रुतबे के साथ मौजूद है। इसी से आत्‍मबल डगमग है। जिसकी डगमगाहट मुखिया के निर्णय में देखी जा रही है। पूरा मोहल्‍ला तो नहीं बदला, हल्‍का सा फेरबदल ही किया है। कौन कह रहा है कि हेराफेरी का बाजार जमा लिया है। अंत भला सो सब भला। सब भले रहें, चंगे रहें, चाहे पब्लिक के सामने नंगे रहें। किंतु वस्‍त्रों का अहसास होना ही काफी समझा जा रहा है, उन्‍हें पहनें अथवा नहीं पहनें। इसकी वजह में जाना सामाजिक दृष्टि से उचित नहीं है।
पंगे सिर्फ पब्लिक से ही लिए जाते हैं। टीम के मुखिया ने भूल कर दी तो कौन सा पहाड़ टूट कर आ गिरा, चुनाव आने पर उसकी पीठ पर हाथ फिरा देंगे। वह तसल्‍ली पाएगा,उनके चुनने का जुगाड़ सध जाएगा। एकाध नुक्‍कड़ वाले से ही तो बदला लिया है। कैप्‍टेन वही है जो चुप रहता है, चुप सहता है। जब विचारों की बाढ़ आती है, टीम सारी जुट जाती है। जिसका नाम टीम में नहीं है, जो सिर्फ दर्शक की हैसियत से शुमार हुआ था। फेरबदल को हेराफेरी की तर्ज पर बिठाकर इंतहा तक पहुंचाया, अहसास यह किया कि इसको पीठ पर लादे चल रहे हैं। इसे ही कहते हैं कि आजकल गधों के ही नहीं, घोड़ों के भी सींग निखर रहे हैं। एक को सींग मारा, दूसरे से सींग पर पालिश करवाकर चमकवाया। सींग पर भरपूर चमक आई जिससे पब्लिक समेत विपक्ष चौंधिया गया। इसको टीम से निकाला, उसको टीम में घुसेड़ा। दो चार को रुसवा किया। पब्लिक को हंसने के तोहफे दिए। एक दो ने भड़ास निकाली। डेढ़ ढाई की आस पूरी हुई। टीम में परिवर्तन से कामयाबी में तेजी की उम्‍मीद बंधी है किंतु इसके सिवाय कोई और निष्‍कपट रास्‍ता ही नहीं था। आपका सोचना भी सही है कि रास्‍ता नहीं था तो हवाई मार्ग से जाना चाहिए था। रेल की पटरियों को आजमाना चाहिए था किंतु क्‍या करें इतना सब्र होता तो अगले चुनाव होने तक इंतजार नहीं करते।
मंत्रियों को आप सिर्फ लोकल मंतर मारने वाला ही मत मान लीजिएगा। वे अपने खेल और मैदान के माहिर खिलाड़ी हैं। यह अकेले खेलने वाला खेल है, इसमें विजय पक्‍की होती है। उनकी जीत पर सिर्फ टिप्‍पणियां ही कर सकते हैं यह, जबकि इनकी टिप्‍पणियों को कोई गंभीरता से लेता नहीं है। न सत्‍ता पक्ष और न आम जनता यानी पब्लिक। क्रिकेट टीम में फेरबदल और मंत्रिमंडल में यह फेरबदल हेराफेरी के पर्याय के तौर पर जाने जाते हैं। यह फेरबदल तो ऐसा है कि जो अभी तक साईकिल चलाता रहा है, उसको कार थमा दी गई है कि इस पर खूब सारी एवरेज निकालिए, चाहे हादसे होते रहें। रेल और कार से दुर्घटनाएं करने के बाद भी हवाई जहाज उड़ाने को थमा दिया जाता है। देश के मौजूदा कानूनों से खिलवाड़ करने की योग्‍यता हासिल करने के बाद इन्‍हें विदेश तक जाने का लाईसेंस थमा दिया गया है। देश में मधुर संबंधों की जरूरत नहीं है किंतु विदेशों से नाते रिश्‍तों को मधुर बनाने के ठेके इन्‍हें सौंप दिए गए हैं।

'मच्‍छर का पट्ठा' बड़ा दिलदार :दैनिक नेशनल दुनिया स्‍तंभ 'चिकोटी' 16 नवम्‍बर 2012 में प्रकाशित


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 ‘मैं डेंगू मच्‍छर हू’ जल्‍दी ही आप ओपनमैन की सभाओं में, टीवी चैनलों की फिजाओं में, अखबारों की कालिमा में मतलब चहुं ओर ऐसे टोपीधारक पाएंगे। जो मच्‍छर मच्‍छर चिल्‍लाएंगे, किंतु काट किसी को नहीं पाएंगे। मैं भी मच्‍छर, तू भी मच्‍छर, ये भी मच्‍छर, वे भी मच्‍छर हैं। नेता कहते पाए जा रहे हैं कि मच्‍छरों तंग मत करो। आजकल ऐसे बयान थोक दरों पर उपलब्‍ध हैं। इन बयानों से आपको हैरानी हो सकती है किंतु टोपियों से परेशानी नहीं। टोपी पहनने और पहनाने का चलन फिर से जोरों पर हैं। जिस प्रकार वाहनों के पीछे शेर लिखे जाते हैं, उसी प्रकार आजकल टोपियों पर पंच लाईन मढ़ी जा रही है। आम आदमी चलता फिरता वाहन नजर आ रहा है। टोपी पहनकर अपनी स्‍पीड बढ़ा रहा है। बीते जमाने में रिक्‍शे पर फिल्‍मी पोस्‍टर लगाकर आने वाली और चल रही फिल्‍म की मुनादी रिक्‍शे के आगे ढोल पीट रहे ढोलचियों के जरिए कराई जाती थी और उससे फिल्‍म के व्‍यवसाय में इजाफा होता था। 

आजकल उन ढोलकों को आप गले के फंदे के तौर पर कसा हुआ देख रहे हैं। इससे ढोलकों की पौ बारह और तबलचियों की पौ सत्‍तर हो गई है।  आज वह शुभ कार्य तबलचियों के जिम्‍मे आ पड़ा है और वह उसे पूरी शिद्दत से निबाह रहा है। इनमें वे लोग हैं एक तो वे जो ओपनमैन के मुरीद हैं और दूसरे खुद ओपनमैन डेंगू मच्‍छरों के फैन है। किंग खान वाला किस्‍सा फिजा को संगीन यादों से रंगीन कर रहा है।

लोग सीधी ऊंगली से घी नहीं निकालते हैं क्‍योंकि कम निकलता है।  ऊंगली टेढ़ी करने या घुमाने फिराने से भी मनमाफिक नतीजा नहीं मिलता है। सो आज सीधी ऊंगली से बरतन को टेढ़ा किया जाता है। टेढ़ा बरतन तुरंत उलटता है और घी की मनचाही मात्रा हासिल हो जाती है।  सीधी ऊंगली से घी के बरतन को टेढ़ा करना कामयाबी की नई मिसाल है। मच्‍छर को सबसे पहली सुर्खी नाना पाटेकर के संवाद की देन है और दूसरी अब ओपनमैन की। एक अभिनेता है और दूसरा अभी-अभी नेता बना है। मच्‍छर की किस्‍मत बुलंदी के शिखर पर है, वह आम आदमी के सिर पर टोपी बनकर छाने वाला है। मच्‍छर अगर फेसबुक खाता खोल ले या ट्विटर एकाउंट बना ले तो शर्तिया सोशल मीडिया के शहंशाहों को बुरी तरह पछाड़ देगा। आखिर पिछले हफ्ते ही उसने कसाब को काटा है। कसाब डेंगू मच्‍छर के जहर से भी जहरीला निकला इसलिए बच गया और जिस मच्‍छर ने काटा, वह मर गया।

मच्‍छर निरक्षर लिखे हुए को पढ़ना नहीं जानता किंतु कसाब को पहचानता है। जरूर किसी खुफिया विभाग में रहा होगा या किसी खुफिया अधिकारी को खुफिया तरीके से काटा होगा। कसाब को काटना उसने ओपनीय रखा है गोपनीय नहीं। पंखा चलाओ तो मच्‍छर भाग जाते हैं। मच्‍छर का मंडराना जब मन को दिखाई नहीं देगा। मच्‍छर गूंज गूंज कर, मंडरा मंडरा कर आम आदमी के मन को डराने में मशगूल है ओपनमैन के माफिक। यह मच्‍छर का प्रिय शगल है।

मच्‍छर जब खून का स्‍वाद ले चुका होता है और अपनी सुई आम आदमी की त्‍वचा से बाहर निकालता है, तब टीस जरूर होती है किंतु तब तलक बहुत देर हो जाती है, मच्‍छर खून पी चुका होता है। आप टीस वाली जगह पर ताली बजाते हैं और मच्‍छर चुपके से खिसक जाता है। आप थोड़ी देर से प्रतिक्रिया करते तो आपके खून के नशे में अलमस्‍त वह अवश्‍य शिकार बनता। ‘मच्‍छर का पट्ठा’ बड़ा दिलदार निकला। उड़ कर बचने वालों का सरदार निकला। वे कह रहे हैं कि मच्‍छर का काम भुनभुनाना है और ओपनमैन यही कर रहा है। ओपनमैन मच्‍छर की तरह गजब नहीं ढा पाएगा। कसरत जो मच्‍छर करते हैं, वह उसके बस की नहीं है, फिर कैसे साबित करेगा कि ‘मैं डेंगू मच्‍छर हूं।‘ जिस जिसको उसने काटा है, चूमा है अथवा चाटा है, वे सब सुरक्षित हैं।  
तुम मच्‍छर हो, विषधर होते तो तनिक चिंतित हम होते, सोचते, किंतु सत्‍ता रूपी धरा के विषधर हम हैं। विषधरों की मंडली से नाहक ले रहो हो पंगे, पानी से पलते हो किंतु पानी ही तुम्‍हारी मौत का सबब बन सकता है, नहीं जानते इसलिए बचा नहीं पाओगे खुद को, कर देंगे पानी से ही इतने घाव। तुम्‍हारे चिल्‍लाने से हमें शक्ति मिलती है, हम घोड़े हैं। चने का हश्र देखा है, उसे घोड़ा खाता है लेकिन मच्‍छर नहीं खाता। मच्‍छर जो खाता चना, तो रहता सदा बना। हम देते हैं बयान, इसलिए हो गए हैं सर्वशक्तिमान। 

खुलासा मैन की ओपन दीपावली : डेली न्‍यूज एक्टिविस्‍ट 14 नवम्‍बर 2012 में प्रकाशित


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दाल का अरहरापन : अट्टहास मासिक पत्रिका के नवम्‍बर 12 अंक में 'ताल बेताल' स्‍तंभ में प्रकाशित


ओह माई गॉड 'राम' से पंगा : दैनिक जनसंदेश टाइमस 13 नवम्‍बर 2012 स्‍तंभ -उलटबांसी' में प्रकाशित



राम बना राम का दुश्‍मन। उसने राम के पतीत्‍व में ही खोट निकाल दिया। वह भी राम, मैं भी राम सब में राम समाया, फिर भी राम का पतीत्‍व उसके हमनाम भाई राम की समझ में नहीं समाया और उसने पंगा ले लिया। राम सहनशील हैं, पंगे को भी सहज भाव से सह जाते हैं, दंगा करना सिर्फ उनके भक्‍तों की फितरत है। वे ऐसे जेठ हैं जो मनाली के गीत गाते-गाते सीता की फेवर में उतर आए हैं। अब अगर दंगा न भड़के तो जरूर हैरानी होगी। जाहिर है कि आजकल भाई अपने सगे भाई का दुश्‍मन है। प्‍यार भी उसी मित्र से होता है जिससे लाभ की उम्‍मीद होती है। मतलब घूम-टहल कर यही निकलता है कि सब नाते-रिश्‍ते स्‍वार्थ के हैं, स्‍वार्थ जरूर सधना चाहिए। आराम शब्‍द में राम बसा है और कवि गोपाल प्रसाद व्‍यास जी कह गए हैं कि छिपा है। सचमुच का राम आज लुकाछिपी खेल रहा है और रावण ढीठ के माफिक सरेआम दंड पेल रहा है, जिम में अपनी बाजुओं की मछलियों को मछली का तेल पिला रहा है, बाहुबलियों और बाउंसर्स के रूप में सर्वत्र नजर आ रहा है।   
राम में भी रावण देखना चाहने के इच्‍छुक इस मौके को कैश करने में जुट गए हैं। चैनल और मीडिया का सक्रिय होना आज खबर नहीं है।  मौका दीपावली का है, घी, सरसों का तेल और मोमबत्‍ती सब महंगाई की लपेट में हैं और राम को चपेट मार दी गई है। आजकल धर्म का अहम् रोल भी गरमागरम बहस का विषय बना लिया गया है और फिल्‍मों में भुना लिया गया है।  राम का पुतला बनाकर फूंकने की नौबत आने वाली है। चाहत है कि राम का पुतला आग से ऑक्‍सीजन सोख ले और आग बुझ जाए। आग के बुझने से पुतला जिंदा रह जाएगा। इसे चमत्‍कार बतला कर ढिंढोरा पीट धन कमाने का मौका नहीं गंवाया जाएगा। दंगा हुआ तो आम आदमी पिट जाएगा। रावण से राम नहीं डरते, लेकिन राम से डरने लगे हैं। भाई भाई से डरता नहीं, उलझता है। बाजारी और धार्मिक शक्तियां न राम को और न रावण को चैन लेने देती हैं, वे अपने हितसाधन में बिजी हैं।
राम अच्‍छे पति नहीं थे, धोबी के कहने को आधार बनाकर राम की गर्दन पर नश्‍तर से वार किया है। अच्‍छे पति की परिभाषाएं तलाशी जाने लगी हैं। सच भी यही है कि बहुत कम पत्नियां अपने पति को अच्‍छा मानती हैं जबकि पतियों द्वारा अपनी पत्नियों को अच्‍छा मानने का औसत इतना भी नहीं है। किसी पत्‍नी को बहादुर पति अच्‍छा लगता है तो किसी पत्‍नी को पत्‍नी से डरने वाला। पिता की मानने वाले और प्रजा से डरने वाले पति आजकल की पत्नियों के भी पसंदीदा नहीं हैं, ऐसे में राम ने किसी धोबी के कहने को ही दिल से लगा लिया है तो इसकी तो निंदा ही की जाएगी।
आप अपना पक्ष जाहिर कीजिए कि राम अच्‍छा लगता है या रावण अथवा आप भय के कारण धोबी के पक्ष में हैं कि उसे कपड़े धुलने को दिए और उसने आपके चरित्र को ही धो पोंछकर जनता में बिखेर दिया तो ... ओह माई गॉड।

छूट की लूट : दैनिक जनसत्‍ता 13 नवम्‍बर 2012 के स्‍तंभ 'समांतर' में प्रकाशित

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मच्‍छर बड़ा दिलदार निकला : दैनिक जनवाणी 13 नवम्‍बर 2012 स्‍तंभ 'तीखी नजर' में प्रकाशित

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 ‘मैं डेंगू मच्‍छर हू’ जल्‍दी ही आप ओपनमैन की सभाओं में, टीवी चैनलों की फिजाओं में, अखबारों की कालिमा में मतलब चहुं ओर ऐसे टोपीधारक पाएंगे। जो मच्‍छर मच्‍छर चिल्‍लाएंगे, किंतु काट किसी को नहीं पाएंगे। मैं भी मच्‍छर, तू भी मच्‍छर, ये भी मच्‍छर, वे भी मच्‍छर हैं। नेता कहते पाए जा रहे हैं कि मच्‍छरों तंग मत करो। आजकल ऐसे बयान थोक दरों पर उपलब्‍ध हैं। इन बयानों से आपको हैरानी हो सकती है किंतु टोपियों से परेशानी नहीं। टोपी पहनने और पहनाने का चलन फिर से जोरों पर हैं। जिस प्रकार वाहनों के पीछे शेर लिखे जाते हैं, उसी प्रकार आजकल टोपियों पर पंच लाईन मढ़ी जा रही है। आम आदमी चलता फिरता वाहन नजर आ रहा है। टोपी पहनकर अपनी स्‍पीड बढ़ा रहा है। बीते जमाने में रिक्‍शे पर फिल्‍मी पोस्‍टर लगाकर आने वाली और चल रही फिल्‍म की मुनादी रिक्‍शे के आगे ढोल पीट रहे ढोलचियों के जरिए कराई जाती थी और उससे फिल्‍म के व्‍यवसाय में इजाफा होता था। 

आजकल उन ढोलकों को आप गले के फंदे के तौर पर कसा हुआ देख रहे हैं। इससे ढोलकों की पौ बारह और तबलचियों की पौ सत्‍तर हो गई है।  आज वह शुभ कार्य तबलचियों के जिम्‍मे आ पड़ा है और वह उसे पूरी शिद्दत से निबाह रहा है। इनमें वे लोग हैं एक तो वे जो ओपनमैन के मुरीद हैं और दूसरे खुद ओपनमैन डेंगू मच्‍छरों के फैन है। किंग खान वाला किस्‍सा फिजा को संगीन यादों से रंगीन कर रहा है।

लोग सीधी ऊंगली से घी नहीं निकालते हैं क्‍योंकि कम निकलता है।  ऊंगली टेढ़ी करने या घुमाने फिराने से भी मनमाफिक नतीजा नहीं मिलता है। सो आज सीधी ऊंगली से बरतन को टेढ़ा किया जाता है। टेढ़ा बरतन तुरंत उलटता है और घी की मनचाही मात्रा हासिल हो जाती है।  सीधी ऊंगली से घी के बरतन को टेढ़ा करना कामयाबी की नई मिसाल है। मच्‍छर को सबसे पहली सुर्खी नाना पाटेकर के संवाद की देन है और दूसरी अब ओपनमैन की। एक अभिनेता है और दूसरा अभी-अभी नेता बना है। मच्‍छर की किस्‍मत बुलंदी के शिखर पर है, वह आम आदमी के सिर पर टोपी बनकर छाने वाला है। मच्‍छर अगर फेसबुक खाता खोल ले या ट्विटर एकाउंट बना ले तो शर्तिया सोशल मीडिया के शहंशाहों को बुरी तरह पछाड़ देगा। आखिर पिछले हफ्ते ही उसने कसाब को काटा है। कसाब डेंगू मच्‍छर के जहर से भी जहरीला निकला इसलिए बच गया और जिस मच्‍छर ने काटा, वह मर गया।

मच्‍छर निरक्षर लिखे हुए को पढ़ना नहीं जानता किंतु कसाब को पहचानता है। जरूर किसी खुफिया विभाग में रहा होगा या किसी खुफिया अधिकारी को खुफिया तरीके से काटा होगा। कसाब को काटना उसने ओपनीय रखा है गोपनीय नहीं। पंखा चलाओ तो मच्‍छर भाग जाते हैं। मच्‍छर का मंडराना जब मन को दिखाई नहीं देगा। मच्‍छर गूंज गूंज कर, मंडरा मंडरा कर आम आदमी के मन को डराने में मशगूल है ओपनमैन के माफिक। यह मच्‍छर का प्रिय शगल है।

मच्‍छर जब खून का स्‍वाद ले चुका होता है और अपनी सुई आम आदमी की त्‍वचा से बाहर निकालता है, तब टीस जरूर होती है किंतु तब तलक बहुत देर हो जाती है, मच्‍छर खून पी चुका होता है। आप टीस वाली जगह पर ताली बजाते हैं और मच्‍छर चुपके से खिसक जाता है। आप थोड़ी देर से प्रतिक्रिया करते तो आपके खून के नशे में अलमस्‍त वह अवश्‍य शिकार बनता। ‘मच्‍छर का पट्ठा’ बड़ा दिलदार निकला। उड़ कर बचने वालों का सरदार निकला। वे कह रहे हैं कि मच्‍छर का काम भुनभुनाना है और ओपनमैन यही कर रहा है। ओपनमैन मच्‍छर की तरह गजब नहीं ढा पाएगा। कसरत जो मच्‍छर करते हैं, वह उसके बस की नहीं है, फिर कैसे साबित करेगा कि ‘मैं डेंगू मच्‍छर हूं।‘ जिस जिसको उसने काटा है, चूमा है अथवा चाटा है, वे सब सुरक्षित हैं।  
तुम मच्‍छर हो, विषधर होते तो तनिक चिंतित हम होते, सोचते, किंतु सत्‍ता रूपी धरा के विषधर हम हैं। विषधरों की मंडली से नाहक ले रहो हो पंगे, पानी से पलते हो किंतु पानी ही तुम्‍हारी मौत का सबब बन सकता है, नहीं जानते इसलिए बचा नहीं पाओगे खुद को, कर देंगे पानी से ही इतने घाव।

Cost of having a girlfriend ! : आई नेक्‍स्‍ट 13 नवम्‍बर 2012 'खूब कही' स्‍तंभ में प्रकाशित



गर्ल फ्रेंड का जिक्र आने पर जिनकी बांछें खिल जाती हैं वे कई गुणा हैं, उनके चेहरे पर खुशी लाने के लिए पचास करोड़ रुपये उल्‍लेखनीय भूमिका निभाते हैं। पचास रुपये मिलने पर खुश होने वाले भी इस देश में करोड़ों हैं। उनकी मासूमियत के चर्चे फिजाओं को गुल गुलशन गुलजार कर रहे हैं। गुलगुलों से परहेज करने वाले पेट भर कर गुल खा रहे हैं और खिला रहे हैं। अपनी बीवी को अनमोल बतलाकर उन्‍होंने जमाने भर की बीवियों पर प्राइज टैग चस्‍पा कर दिया है। बीवी अपने खाविंद के लिए सदा से अनमोल है, कितने ही पतियों के लिए उनकी बीवियां दुधारू गाय की मानिंद हैं, वे जब चाहते हैं दुह लेते हैं। बीवी का मायका मालदार हो और बीवी सीधी गाय, तब समझो पतियों की रोजाना मौज़ है। सीधी गाय के सींग मारने का रिस्‍क नहीं है, वह दहेज के नाम पर दुहे जाते समय पूंछ नहीं फटकारती। अपनी नाराजगी जतलाने के लिए लात चलाने की सोचना भी उसके लिए पाप है। ऐसी बीवियां अनमोल होती हैं इसमें तनिक भी अतिरंजना नहीं है।
बीवी की अनमोलियत के जितने किस्‍से फिल्‍मी गीतों में गाए गए हैं, उतने गर्ल फ्रेंड के नहीं। जिसकी बीवी मोटी, छोटी, लंबी, ऊंची चाहे कैसी भी हो, उसका बड़ा नाम है, आज पूरी शिद्दत से यह अहसास हो रहा है। बीवी की महानता की बाबत सदी के महानायक बिग बी ने अपने एक गीत में खूब शौर्यगान किया है। मायके के मायाजाल से ग्रसित हों और माल का जलवा भरपूर हो तो कहा गया है कि सोने में सुहागा वाली परम स्थिति दामाद को प्राप्‍त होती है। दस पचास हजार एकड़ भूमि या दो पांच फार्म हाउस मिलना दामाद के मौलिक अधिकारों की श्रेणी में आ जाता है।
अपनी बीवी को अनमोल बतलाकर जमाने भर के पतियों और उनकी पत्नियों से बैर मोल लेकर उन्‍होंने बर्र के छत्‍ते में हाथ देने का अपराध कर दिया है। मानो कहना चाह रहे हैं कि दूसरे की बीवी तोलकर मिल रही है और उन सब पर कीमत की चिप्‍पी चिपकी हुई है। बहरहाल, बच्‍चन साहब ने हर तरह की बीवी का गुणगान ही किया है। जैसे बीवी गुणों की खान होती है वैसे ही कोयले की खदान होती है जिसमें काले होने के बावजूद खूब तमाम गुण समाए हैं। खान खोदने का मौका जिसे मिल जाए, उसकी झोली स्‍वर्ण मुद्राओं की खनखनाहट से लबालब भर जाएगी, न कि खाली टीन कनस्‍तर के माफिक गला फाड़ कर चिल्‍लाएगी। बिगड़ने वाले तो अपनी भैंस को डंडा मारने पर बिफर जाते हैं। किसी गैर की बीवी के मर्द की क्‍या मजाल कि जमाने भर के पतियों की बीवियों का मोल लगाने की जुर्रत करे। नारी के विरुद्ध आरी चलाने की गुस्‍ताखी का यह मामला सामाजिक नियमों के उल्‍लंघन की श्रेणी में आता है, आप समझ रहे हैं न ?

दिवाली में शिफ्ट हो रहे गिफ्ट : दैनिक राष्‍ट्रीय सहारा में 12 नवम्‍बर 2012 को प्रकाशित

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दिवाली के नाम पर दिवाला दिलवालों का निकलता है। सेल के नाम पर बचा खुचा सब माल गोदामों से निकल जाता है। सब छूट से खिंचे चले आते हैं और सेल में सारा माल ऐसे निपट जाता है, मानो फ्री में बंट रहा हो। यह तो नेताओं का असर है कि देकर छूट लेते हैं लूट। दीपावली एक ऐसा त्‍योहार कि इधर गुजरा, उधर अगली का इंतजार शुरू गया।  इसमें कसूर आपका नहीं है, इसमें है ही ऐसा आकर्षण। सब लौट लौट कर दीपावली मनाना चाहते हैं। आखिर यह त्‍योहार है ही खूब नोट बरसाने वाला। जेबों को सरसाने वाला। जिनके खर्च होते हैं, उनके पास भी कई गुने होकर बरसते हैं।

अब मैं आपको एक ऐसा रहस्‍य बतला रहा हूं कि क्‍यों एक दीवाली जाते ही अगली दीवाली का बेसब्री से इंतजार होने लगता है। राम नाम जपना और बचा खुचा माल खपना। छूट और त्‍योहार के नाम पर सब बिक जाता है। गिफ्ट आइटम टूटे फूटे भी धकेल दिए जाते हैं। इन दिनों थोक में भरपूर ऑर्डर आते हैं और धंधा चोखा चमकता है। गिफ्ट एक जगह से चलकर कहां रुकेगा, यह न गिफ्ट देने वाला जानता है और न लेने वाला ही। गिफ्ट को गिफ्ट कर शिफ्ट कर दिया जाता है। वैसे भी बम फटने की घटनाओं के कारण जब तक जरूरी न हो और पक्‍का विश्‍वास न हो, कोई भी गिफ्ट को अनपैक करने के नुकसानदायक खेल में नहीं उलझता है। बम निकला और फट गया तो नुकसान और दोबारा से पैक करना पड़ा तो श्रीमान परेशान और पैक करने की फिजूलखर्ची साथ में तंग करती है।

दीपावली का लुत्‍फ लेते हुए हलवाई तो बची खुची बासी मिठाई थोक ऑर्डर के डिब्‍बों में ही घुसा देते हैं। गिफ्ट लेने वाले भी उसे आगे सरका देते हैं। आफिसों के लिए थोक में खरीद करने वाले दुकानदार से सैटिंग करके किलो के डिब्‍बे में दो चार बासी मिठाई के खपाने की जो छूट देते हैं,उसका लाभ भी दीवाली पर ही मिलता है और गत्‍ते का डिब्‍बा तो इन सौदों में मिठाई के रेट से ही तुलता है। अच्‍छी मिठाई मिलावटी ही होगी, इसकी भी गारंटी बनी रहती है। इसके बदले खरीदार की सेवा पानी हलवाई कर ही देते हैं, जिसके बारे में खुलासा करना जरूरी नहीं है।

खुलासामैन ने सबकी खूब पोल खोली किंतु इस दीपावली की नामुराद झोली नहीं उंडेली। आजकल तक इस संबंध में किसी ने भी जानबूझकर इस तरह के भ्रष्‍टाचार के निदान के बारे में नहीं सोचा। दिवाली के डिब्‍बे दिवाली के कई दिन पहले से बंटने शुरू हो जाते हैं और कई दिन बाद तक बंटते रहते हैं। कौन डिब्‍बा कहां से चला, किधर से होता हुआ किधर पहुंचा, कोई नहीं जानता, वे कब खुलते हैं लेकिन यह तय है कि उनकी अंतिम परिणति घरों में जाकर नौकरों और काम करने वालों तक पहुंचने में ही होती है और वे भी उसे खाते नहीं हैं, सीधे कूड़ा घरों में पहुंचा देते हैं।

ड्राई फ्रूट्स में तो बिल्‍कुल भी रिस्‍क नहीं होता है, वे पहले से ही इतने सूखे होते हैं कि उन्‍हें कितना ही सुखा लो, उनका रूप और दमक कर सामने आता है, मानो उन्‍हें फेशियल करके निखारा गया हो। मेवों का तेल पानी भला किसने जांचा है। वे कितने ही पुराने और खराब हो चुके हों परंतु बहुत आराम से गिफ्ट के तौर पर बांट दिए जाते हैं। मिलावट करने वाले भी इन दिनों खूब बिजी रहते हैं। इतनी मिलावट करते हैं कि कई बार किसी आइटम में बूरे की जगह आटा या नमक डाल देने तक की दुर्घटनाएं घट जाती हैं।

पुलिस वालों और ट्रेफिक वालों, एमसीडी, इंकम टैक्‍स,सेल्‍स टैक्‍स, खाद्य सामग्री जांच विभाग मतलब जितने लोगों पर कानून के पालन करवाने का जिम्‍मा होता है, वे पूरी जिम्‍मेदारी और ईमानदारी से उसे कारनामा बनाने में जुटे रहते हैं। इन दिनों जिनको उपहार ढोने और बाद में बेचने का मौका नहीं मिला तो उसकी दीपावली तो व्‍यर्थ गई, समझ लीजिए। अनेक अधिकारी तो दीवाली पर मिलने वाले गिफ्ट, मिठाईयों की रीसेल के लिए दुकानदारों से डील कर लेते हैं और ढेर के ढेर डिब्‍बे दोबारा बिक जाते हैं। कई बार तो ऐसा हुआ है कि कोई डेढ़ बजे जिस डिब्‍बे को खरीदकर ले गया, उसने दो बजे गिफ्ट किया और तीन बजे वापिस वही डिब्‍बा दुकानदार के पास दोबारा बिकने के लिए लौट आया।

जब मंदिरों में भगवान की और शमशान में शवों की मौजूदगी में ऐसे ही कार्य किए जाते हैं तो आफिसों और घरों में किसे दिक्‍कत होगी। वहां पर सब अपने अपने मालिक खुद होते हैं। भगवान के यहां चढ़ाए जाने वाले नारियल, फूल मालाएं और पूजा सामग्री वगैरह से धन कमाने की ऐसी सैटिंग होती है कि इधर चढ़ावा चढ़ता है और उधर पिछले दरवाजे पर तैनात भगवान के नितांत निजी भक्‍त अति गोपनीय तरीके से उसे वापिस दुकानों में फिर से बिकने के लिए भिजवा देते हैं। फिर यह मंदिरों के लिए भी अच्‍छा है क्‍योंकि बेहिसाब पूजा सामग्री,फूल, फल इत्‍यादि आएं और वे भगवान के चरणों में पड़े सड़ते रहें, भगवान भी इसे बर्दाश्‍त नहीं करेंगे। सारी सामग्री भगवान खा लेंगे तो निश्चित ही उनका पेट खराब होने से कोई नहीं रोक सकता। अगर उस सामग्री को वहां से न ले जाया जाए तो भगवान उसी में खो जायेंगे और भक्‍तों को कैसे नजर आयेंगे।
खुलासामैन को मेरी एक नेक सलाह है कि वे पोल खोलने का पर्व प्रत्‍येक पर्व पर अवश्‍य मनाया करें और  दीपावली जैसे त्‍योहारों पर खाकर जरूर इसका उपयोग किया करें। ऐसा न हो कि इस सलाह की भनक किसी को लग जाए और वे अमल करके लाभ उठा लें जिसमें इस गिफ्ट रूपी भ्रष्‍टाचार की समाप्ति का आग्रह किया गया हो। जिस तरह दीपावली लोकप्रिय है उसी तरह खुलासामैन और भी अधिक लोकप्रिय हो जायेंगे। दीपावली वैसे तो प्रेम का त्‍योहार है, विजय का त्‍योहार है। असली प्रेम उपहारों से किया जाता है और विजयी वही होता है जो सबसे अधिक गिफ्ट हथियाता है।

गिफ्ट पाना या हथियाना भी एक कला से कम नहीं है। इस अवसर पर जूते कपड़ों की इतनी सेल लगती हैं और सभी सपरिवार उन्‍हें खरीदने में इस कदर जुटे रहते हैं कि लगता है कि जूते, कपड़े फ्री में बंट रहे हैं। पहले नए कपड़ों के खरीदने से दीवाली होती थी और अब नए गैजेट्स खरीदने से दीवाली की खुशियां मिलती हैं। बम पटाखे के रूप में नोटों का दहन नहीं किया तो कैसी दीवाली और वरिष्‍ठ रचनाकारों की सब पुरानी रचनाएं इस अवसर पर नहीं छपीं तो फिर काहे की दीवाली। रही बची कसर इस अवसर पर जुआ खेलकर, लाटरी के टिकट खरीद कर भाग्‍य आजमाने में निकाल ली जाती है। जुआ खेलना, शराब पीना जैसी कलाएं दीपावली के उत्‍साह में खूब बढ़ोतरी करती हैं। आयाम तो इतने हैं कि इस पर एक पूरी पुस्‍तक लिखकर दीपावली के दिन लोकार्पित की जा सकती है, आपकी क्‍या राय है, क्‍या ऐसा कर लिया जाए ?


खुलासामैन की ओपन दीपावली : दैनिक हिंदी मिलाप में 'बैठे ठाले' स्‍तंभ में प्रकाशित



दीवाली के नाम पर दिवाला दिलवालों का निकलता है। सेल के नाम पर बचा खुचा सब माल गोदामों से निकल जाता है। सब छूट से खिंचे चले आते हैं और सेल में सारा माल ऐसे निपट जाता है, मानो फ्री में बंट रहा हो। यह तो नेताओं का असर है कि देकर छूट लेते हैं लूट। दीपावली एक ऐसा त्‍योहार कि इधर गुजरा, उधर अगली का इंतजार शुरू गया।  इसमें कसूर आपका नहीं है, इसमें है ही ऐसा आकर्षण। सब लौट लौट कर दीपावली मनाना चाहते हैं। आखिर यह त्‍योहार है ही खूब नोट बरसाने वाला। जेबों को सरसाने वाला। जिनके खर्च होते हैं, उनके पास भी कई गुने होकर बरसते हैं।

अब मैं आपको एक ऐसा रहस्‍य बतला रहा हूं कि क्‍यों एक दीवाली जाते ही अगली दीवाली का बेसब्री से इंतजार होने लगता है। राम नाम जपना और बचा खुचा माल खपना। छूट और त्‍योहार के नाम पर सब बिक जाता है। गिफ्ट आइटम टूटे फूटे भी धकेल दिए जाते हैं। इन दिनों थोक में भरपूर ऑर्डर आते हैं और धंधा चोखा चमकता है। गिफ्ट एक जगह से चलकर कहां रुकेगा, यह न गिफ्ट देने वाला जानता है और न लेने वाला ही। गिफ्ट को गिफ्ट कर शिफ्ट कर दिया जाता है। वैसे भी बम फटने की घटनाओं के कारण जब तक जरूरी न हो और पक्‍का विश्‍वास न हो, कोई भी गिफ्ट को अनपैक करने के नुकसानदायक खेल में नहीं उलझता है। बम निकला और फट गया तो नुकसान और दोबारा से पैक करना पड़ा तो श्रीमान परेशान और पैक करने की फिजूलखर्ची साथ में तंग करती है।

दीपावली का लुत्‍फ लेते हुए हलवाई तो बची खुची बासी मिठाई थोक ऑर्डर के डिब्‍बों में ही घुसा देते हैं। गिफ्ट लेने वाले भी उसे आगे सरका देते हैं। आफिसों के लिए थोक में खरीद करने वाले दुकानदार से सैटिंग करके किलो के डिब्‍बे में दो चार बासी मिठाई के खपाने की जो छूट देते हैं,उसका लाभ भी दीवाली पर ही मिलता है और गत्‍ते का डिब्‍बा तो इन सौदों में मिठाई के रेट से ही तुलता है। अच्‍छी मिठाई मिलावटी ही होगी, इसकी भी गारंटी बनी रहती है। इसके बदले खरीदार की सेवा पानी हलवाई कर ही देते हैं, जिसके बारे में खुलासा करना जरूरी नहीं है।

खुलासामैन ने सबकी खूब पोल खोली किंतु इस दीपावली की नामुराद झोली नहीं उंडेली। आजकल तक इस संबंध में किसी ने भी जानबूझकर इस तरह के भ्रष्‍टाचार के निदान के बारे में नहीं सोचा। दिवाली के डिब्‍बे दिवाली के कई दिन पहले से बंटने शुरू हो जाते हैं और कई दिन बाद तक बंटते रहते हैं। कौन डिब्‍बा कहां से चला, किधर से होता हुआ किधर पहुंचा, कोई नहीं जानता, वे कब खुलते हैं लेकिन यह तय है कि उनकी अंतिम परिणति घरों में जाकर नौकरों और काम करने वालों तक पहुंचने में ही होती है और वे भी उसे खाते नहीं हैं, सीधे कूड़ा घरों में पहुंचा देते हैं।

ड्राई फ्रूट्स में तो बिल्‍कुल भी रिस्‍क नहीं होता है, वे पहले से ही इतने सूखे होते हैं कि उन्‍हें कितना ही सुखा लो, उनका रूप और दमक कर सामने आता है, मानो उन्‍हें फेशियल करके निखारा गया हो। मेवों का तेल पानी भला किसने जांचा है। वे कितने ही पुराने और खराब हो चुके हों परंतु बहुत आराम से गिफ्ट के तौर पर बांट दिए जाते हैं। मिलावट करने वाले भी इन दिनों खूब बिजी रहते हैं। इतनी मिलावट करते हैं कि कई बार किसी आइटम में बूरे की जगह आटा या नमक डाल देने तक की दुर्घटनाएं घट जाती हैं।

पुलिस वालों और ट्रेफिक वालों, एमसीडी, इंकम टैक्‍स,सेल्‍स टैक्‍स, खाद्य सामग्री जांच विभाग मतलब जितने लोगों पर कानून के पालन करवाने का जिम्‍मा होता है, वे पूरी जिम्‍मेदारी और ईमानदारी से उसे कारनामा बनाने में जुटे रहते हैं। इन दिनों जिनको उपहार ढोने और बाद में बेचने का मौका नहीं मिला तो उसकी दीपावली तो व्‍यर्थ गई, समझ लीजिए। अनेक अधिकारी तो दीवाली पर मिलने वाले गिफ्ट, मिठाईयों की रीसेल के लिए दुकानदारों से डील कर लेते हैं और ढेर के ढेर डिब्‍बे दोबारा बिक जाते हैं। कई बार तो ऐसा हुआ है कि कोई डेढ़ बजे जिस डिब्‍बे को खरीदकर ले गया, उसने दो बजे गिफ्ट किया और तीन बजे वापिस वही डिब्‍बा दुकानदार के पास दोबारा बिकने के लिए लौट आया।

जब मंदिरों में भगवान की और शमशान में शवों की मौजूदगी में ऐसे ही कार्य किए जाते हैं तो आफिसों और घरों में किसे दिक्‍कत होगी। वहां पर सब अपने अपने मालिक खुद होते हैं। भगवान के यहां चढ़ाए जाने वाले नारियल, फूल मालाएं और पूजा सामग्री वगैरह से धन कमाने की ऐसी सैटिंग होती है कि इधर चढ़ावा चढ़ता है और उधर पिछले दरवाजे पर तैनात भगवान के नितांत निजी भक्‍त अति गोपनीय तरीके से उसे वापिस दुकानों में फिर से बिकने के लिए भिजवा देते हैं। फिर यह मंदिरों के लिए भी अच्‍छा है क्‍योंकि बेहिसाब पूजा सामग्री,फूल, फल इत्‍यादि आएं और वे भगवान के चरणों में पड़े सड़ते रहें, भगवान भी इसे बर्दाश्‍त नहीं करेंगे। सारी सामग्री भगवान खा लेंगे तो निश्चित ही उनका पेट खराब होने से कोई नहीं रोक सकता। अगर उस सामग्री को वहां से न ले जाया जाए तो भगवान उसी में खो जायेंगे और भक्‍तों को कैसे नजर आयेंगे।
खुलासामैन को मेरी एक नेक सलाह है कि वे पोल खोलने का पर्व प्रत्‍येक पर्व पर अवश्‍य मनाया करें और  दीपावली जैसे त्‍योहारों पर खाकर जरूर इसका उपयोग किया करें। ऐसा न हो कि इस सलाह की भनक किसी को लग जाए और वे अमल करके लाभ उठा लें जिसमें इस गिफ्ट रूपी भ्रष्‍टाचार की समाप्ति का आग्रह किया गया हो। जिस तरह दीपावली लोकप्रिय है उसी तरह खुलासामैन और भी अधिक लोकप्रिय हो जायेंगे। दीपावली वैसे तो प्रेम का त्‍योहार है, विजय का त्‍योहार है। असली प्रेम उपहारों से किया जाता है और विजयी वही होता है जो सबसे अधिक गिफ्ट हथियाता है।

गिफ्ट पाना या हथियाना भी एक कला से कम नहीं है। इस अवसर पर जूते कपड़ों की इतनी सेल लगती हैं और सभी सपरिवार उन्‍हें खरीदने में इस कदर जुटे रहते हैं कि लगता है कि जूते, कपड़े फ्री में बंट रहे हैं। पहले नए कपड़ों के खरीदने से दीवाली होती थी और अब नए गैजेट्स खरीदने से दीवाली की खुशियां मिलती हैं। बम पटाखे के रूप में नोटों का दहन नहीं किया तो कैसी दीवाली और वरिष्‍ठ रचनाकारों की सब पुरानी रचनाएं इस अवसर पर नहीं छपीं तो फिर काहे की दीवाली। रही बची कसर इस अवसर पर जुआ खेलकर, लाटरी के टिकट खरीद कर भाग्‍य आजमाने में निकाल ली जाती है। जुआ खेलना, शराब पीना जैसी कलाएं दीपावली के उत्‍साह में खूब बढ़ोतरी करती हैं। आयाम तो इतने हैं कि इस पर एक पूरी पुस्‍तक लिखकर दीपावली के दिन लोकार्पित की जा सकती है, आपकी क्‍या राय है, क्‍या ऐसा कर लिया जाए ?

खुलासामैन की ओपन दीपावली


दीवाली के नाम पर दिवाला दिलवालों का निकलता है। सेल के नाम पर बचा खुचा सब माल गोदामों से निकल जाता है। सब छूट से खिंचे चले आते हैं और सेल में सारा माल ऐसे निपट जाता है, मानो फ्री में बंट रहा हो। यह तो नेताओं का असर है कि देकर छूट लेते हैं लूट। दीपावली एक ऐसा त्‍योहार कि इधर गुजरा, उधर अगली का इंतजार शुरू गया।  इसमें कसूर आपका नहीं है, इसमें है ही ऐसा आकर्षण। सब लौट लौट कर दीपावली मनाना चाहते हैं। आखिर यह त्‍योहार है ही खूब नोट बरसाने वाला। जेबों को सरसाने वाला। जिनके खर्च होते हैं, उनके पास भी कई गुने होकर बरसते हैं।

अब मैं आपको एक ऐसा रहस्‍य बतला रहा हूं कि क्‍यों एक दीवाली जाते ही अगली दीवाली का बेसब्री से इंतजार होने लगता है। राम नाम जपना और बचा खुचा माल खपना। छूट और त्‍योहार के नाम पर सब बिक जाता है। गिफ्ट आइटम टूटे फूटे भी धकेल दिए जाते हैं। इन दिनों थोक में भरपूर ऑर्डर आते हैं और धंधा चोखा चमकता है। गिफ्ट एक जगह से चलकर कहां रुकेगा, यह न गिफ्ट देने वाला जानता है और न लेने वाला ही। गिफ्ट को गिफ्ट कर शिफ्ट कर दिया जाता है। वैसे भी बम फटने की घटनाओं के कारण जब तक जरूरी न हो और पक्‍का विश्‍वास न हो, कोई भी गिफ्ट को अनपैक करने के नुकसानदायक खेल में नहीं उलझता है। बम निकला और फट गया तो नुकसान और दोबारा से पैक करना पड़ा तो श्रीमान परेशान और पैक करने की फिजूलखर्ची साथ में तंग करती है।

दीपावली का लुत्‍फ लेते हुए हलवाई तो बची खुची बासी मिठाई थोक ऑर्डर के डिब्‍बों में ही घुसा देते हैं। गिफ्ट लेने वाले भी उसे आगे सरका देते हैं। आफिसों के लिए थोक में खरीद करने वाले दुकानदार से सैटिंग करके किलो के डिब्‍बे में दो चार बासी मिठाई के खपाने की जो छूट देते हैं, उसका लाभ भी दीवाली पर ही मिलता है और गत्‍ते का डिब्‍बा तो इन सौदों में मिठाई के रेट से ही तुलता है। अच्‍छी मिठाई मिलावटी ही होगी, इसकी भी गारंटी बनी रहती है। इसके बदले खरीदार की सेवा पानी हलवाई कर ही देते हैं, जिसके बारे में खुलासा करना जरूरी नहीं है।

खुलासामैन ने सबकी खूब पोल खोली किंतु इस दीपावली की नामुराद झोली नहीं उंडेली। आजकल तक इस संबंध में किसी ने भी जानबूझकर इस तरह के भ्रष्‍टाचार के निदान के बारे में नहीं सोचा। दिवाली के डिब्‍बे दिवाली के कई दिन पहले से बंटने शुरू हो जाते हैं और कई दिन बाद तक बंटते रहते हैं। कौन डिब्‍बा कहां से चला, किधर से होता हुआ किधर पहुंचा, कोई नहीं जानता, वे कब खुलते हैं लेकिन यह तय है कि उनकी अंतिम परिणति घरों में जाकर नौकरों और काम करने वालों तक पहुंचने में ही होती है और वे भी उसे खाते नहीं हैं, सीधे कूड़ा घरों में पहुंचा देते हैं।

ड्राई फ्रूट्स में तो बिल्‍कुल भी रिस्‍क नहीं होता है, वे पहले से ही इतने सूखे होते हैं कि उन्‍हें कितना ही सुखा लो, उनका रूप और दमक कर सामने आता है, मानो उन्‍हें फेशियल करके निखारा गया हो। मेवों का तेल पानी भला किसने जांचा है। वे कितने ही पुराने और खराब हो चुके हों परंतु बहुत आराम से गिफ्ट के तौर पर बांट दिए जाते हैं। मिलावट करने वाले भी इन दिनों खूब बिजी रहते हैं। इतनी मिलावट करते हैं कि कई बार किसी आइटम में बूरे की जगह आटा या नमक डाल देने तक की दुर्घटनाएं घट जाती हैं।

पुलिस वालों और ट्रेफिक वालों, एमसीडी, इंकम टैक्‍स,सेल्‍स टैक्‍स, खाद्य सामग्री जांच विभाग मतलब जितने लोगों पर कानून के पालन करवाने का जिम्‍मा होता है, वे पूरी जिम्‍मेदारी और ईमानदारी से उसे कारनामा बनाने में जुटे रहते हैं। इन दिनों जिनको उपहार ढोने और बाद में बेचने का मौका नहीं मिला तो उसकी दीपावली तो व्‍यर्थ गई,समझ लीजिए। अनेक अधिकारी तो दीवाली पर मिलने वाले गिफ्ट, मिठाईयों की रीसेल के लिए दुकानदारों से डील कर लेते हैं और ढेर के ढेर डिब्‍बे दोबारा बिक जाते हैं। कई बार तो ऐसा हुआ है कि कोई डेढ़ बजे जिस डिब्‍बे को खरीदकर ले गया, उसने दो बजे गिफ्ट किया और तीन बजे वापिस वही डिब्‍बा दुकानदार के पास दोबारा बिकने के लिए लौट आया।

जब मंदिरों में भगवान की और शमशान में शवों की मौजूदगी में ऐसे ही कार्य किए जाते हैं तो आफिसों और घरों में किसे दिक्‍कत होगी। वहां पर सब अपने अपने मालिक खुद होते हैं। भगवान के यहां चढ़ाए जाने वाले नारियल, फूल मालाएं और पूजा सामग्री वगैरह से धन कमाने की ऐसी सैटिंग होती है कि इधर चढ़ावा चढ़ता है और उधर पिछले दरवाजे पर तैनात भगवान के नितांत निजी भक्‍त अति गोपनीय तरीके से उसे वापिस दुकानों में फिर से बिकने के लिए भिजवा देते हैं। फिर यह मंदिरों के लिए भी अच्‍छा है क्‍योंकि बेहिसाब पूजा सामग्री,फूल, फल इत्‍यादि आएं और वे भगवान के चरणों में पड़े सड़ते रहें,भगवान भी इसे बर्दाश्‍त नहीं करेंगे। सारी सामग्री भगवान खा लेंगे तो निश्चित ही उनका पेट खराब होने से कोई नहीं रोक सकता। अगर उस सामग्री को वहां से न ले जाया जाए तो भगवान उसी में खो जायेंगे और भक्‍तों को कैसे नजर आयेंगे।
खुलासामैन को मेरी एक नेक सलाह है कि वे पोल खोलने का पर्व प्रत्‍येक पर्व पर अवश्‍य मनाया करें और  दीपावली जैसे त्‍योहारों पर खाकर जरूर इसका उपयोग किया करें। ऐसा न हो कि इस सलाह की भनक किसी को लग जाए और वे अमल करके लाभ उठा लें जिसमें इस गिफ्ट रूपी भ्रष्‍टाचार की समाप्ति का आग्रह किया गया हो। जिस तरह दीपावली लोकप्रिय है उसी तरह खुलासामैन और भी अधिक लोकप्रिय हो जायेंगे। दीपावली वैसे तो प्रेम का त्‍योहार है, विजय का त्‍योहार है। असली प्रेम उपहारों से किया जाता है और विजयी वही होता है जो सबसे अधिक गिफ्ट हथियाता है।

गिफ्ट पाना या हथियाना भी एक कला से कम नहीं है। इस अवसर पर जूते कपड़ों की इतनी सेल लगती हैं और सभी सपरिवार उन्‍हें खरीदने में इस कदर जुटे रहते हैं कि लगता है कि जूते, कपड़े फ्री में बंट रहे हैं। पहले नए कपड़ों के खरीदने से दीवाली होती थी और अब नए गैजेट्स खरीदने से दीवाली की खुशियां मिलती हैं। बम पटाखे के रूप में नोटों का दहन नहीं किया तो कैसी दीवाली और वरिष्‍ठ रचनाकारों की सब पुरानी रचनाएं इस अवसर पर नहीं छपीं तो फिर काहे की दीवाली। रही बची कसर इस अवसर पर जुआ खेलकर, लाटरी के टिकट खरीद कर भाग्‍य आजमाने में निकाल ली जाती है। जुआ खेलना, शराब पीना जैसी कलाएं दीपावली के उत्‍साह में खूब बढ़ोतरी करती हैं। आयाम तो इतने हैं कि इस पर एक पूरी पुस्‍तक लिखकर दीपावली के दिन लोकार्पित की जा सकती है, आपकी क्‍या राय है, क्‍या ऐसा कर लिया जाए ?

अनचाहे एमएसएस पाने वालों को भी मिले रकम : नवभारत टाइम्‍स दैनिक 9 नवम्‍बर 2012 पेज 12

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प्रेमिकाओं के रेट में इज़ाफा : जनसंदेश टाइम्‍स 8 नवम्‍बर 2012 को उलटबांसी में प्रकाशित


गर्ल फ्रेंड का जिक्र आने पर जिनकी बांछें खिल जाती हैं वे कई गुणा हैं, उनके चेहरे पर खुशी लाने के लिए पचास करोड़ रुपये उल्‍लेखनीय भूमिका निभाते हैं। पचास रुपये मिलने पर खुश होने वाले भी इस देश में करोड़ों हैं। उनकी मासूमियत के चर्चे फिजाओं को गुल गुलशन गुलजार कर रहे हैं। गुलगुलों से परहेज करने वाले पेट भर कर गुल खा रहे हैं और खिला रहे हैं। अपनी बीवी को अनमोल बतलाकर उन्‍होंने जमाने भर की बीवियों पर प्राइज टैग चस्‍पा कर दिया है। बीवी अपने खाविंद के लिए सदा से अनमोल है, कितने ही पतियों के लिए उनकी बीवियां दुधारू गाय की मानिंद हैं, वे जब चाहते हैं दुह लेते हैं। बीवी का मायका मालदार हो और बीवी सीधी गाय, तब समझो पतियों की रोजाना मौज़ है। सीधी गाय के सींग मारने का रिस्‍क नहीं है, वह दहेज के नाम पर दुहे जाते समय पूंछ नहीं फटकारती। अपनी नाराजगी जतलाने के लिए लात चलाने की सोचना भी उसके लिए पाप है। ऐसी बीवियां अनमोल होती हैं इसमें तनिक भी अतिरंजना नहीं है।
बीवी की अनमोलियत के जितने किस्‍से फिल्‍मी गीतों में गाए गए हैं, उतने गर्ल फ्रेंड के नहीं। जिसकी बीवी मोटी, छोटी, लंबी, ऊंची चाहे कैसी भी हो, उसका बड़ा नाम है, आज पूरी शिद्दत से यह अहसास हो रहा है। बीवी की महानता की बाबत सदी के महानायक बिग बी ने अपने एक गीत में खूब शौर्यगान किया है। मायके के मायाजाल से ग्रसित हों और माल का जलवा भरपूर हो तो कहा गया है कि सोने में सुहागा वाली परम स्थिति दामाद को प्राप्‍त होती है। दस पचास हजार एकड़ भूमि या दो पांच फार्म हाउस मिलना दामाद के मौलिक अधिकारों की श्रेणी में आ जाता है।
अपनी बीवी को अनमोल बतलाकर जमाने भर के पतियों और उनकी पत्नियों से बैर मोल लेकर उन्‍होंने बर्र के छत्‍ते में हाथ देने का अपराध कर दिया है। मानो कहना चाह रहे हैं कि दूसरे की बीवी तोलकर मिल रही है और उन सब पर कीमत की चिप्‍पी चिपकी हुई है। बहरहाल, बच्‍चन साहब ने हर तरह की बीवी का गुणगान ही किया है। जैसे बीवी गुणों की खान होती है वैसे ही कोयले की खदान होती है जिसमें काले होने के बावजूद खूब तमाम गुण समाए हैं। खान खोदने का मौका जिसे मिल जाए, उसकी झोली स्‍वर्ण मुद्राओं की खनखनाहट से लबालब भर जाएगी, न कि खाली टीन कनस्‍तर के माफिक गला फाड़ कर चिल्‍लाएगी। बिगड़ने वाले तो अपनी भैंस को डंडा मारने पर बिफर जाते हैं। किसी गैर की बीवी के मर्द की क्‍या मजाल कि जमाने भर के पतियों की बीवियों का मोल लगाने की जुर्रत करे। नारी के विरुद्ध आरी चलाने की गुस्‍ताखी का यह मामला सामाजिक नियमों के उल्‍लंघन की श्रेणी में आता है, आप समझ रहे हैं न ?

शून्‍यकाल से आया व्‍यंग्‍य : सोपान स्‍टेप मासिक पत्रिका के नवम्‍बर 2012 अंक में पुस्‍तक समीक्षा

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यूं ही दिख रहा है आवरण 

भ्रष्‍टाचार में विकास की संभावनाएं : दैनिक जनवाणी स्‍तंभ 'तीखी' नज़र' 6 नवम्‍बर 2012 अंक में प्रकाशित


चश्‍मारहित पाठन के लिए मुझे चटकाएं


भ्रष्‍टाचार करना और मिटाना दोनों आजकल बतौर कैरियर खूब पसंद किए जा रहे हैं। भ्रष्‍टाचार को इस समय सबसे अधिक फुटेज मिल रही है। पिछले कई महीने से उसकी ऊंचाई का ग्राफ बहुत तेजी से ऊपर की ओर गया है लेकिन उससे प्रभावित वे नीचे वाले हो रहे हैं। यह ऐसा धंधा है कि भ्रष्‍टाचार करो तो खूब कमा लो और मुखालफत करो तब भी जेबें लबालब भर लो।  महंगाई इस सच को जान गई है और उसका रो रोकर बहुत बुरा हाल है। वह मन ही मन कुढ़ रही है, सीढि़यां तो वह भी चढ़ रही है किंतु वह इसे इसलिए जाहिर नहीं कर रही है क्‍योंकि ऐसा करने से उसकी जमी हुई साख पिघलकर पानी की तरह बह जाएगी। डॉयन के खिताब से सम्‍मानित होने के बाद भी वह नित नए शिखरों पर चढ़ने की जुगत में सदा सक्रिय रहती है, इसमें उसे सफलता भी मिलती रही है। जब उसके प्रतिद्वंद्वी भ्रष्‍टाचार को इतनी लोकप्रियता नहीं मिली थी, तब तक तो सब ठीक चल रहा था लेकिन एकाएक भ्रष्‍टाचार ने पूरे परदे के आकार में अपने रूप को चौड़ा लिया है। लोकप्रिय होने के नेताओं के रिकार्ड को भी ध्‍वस्‍त करने में उसे घनघोर सफलता मिल चुकी है।
इसे देखकर महंगाई तो महंगाई उसके गठबंधन केर सहयोगी टीम के सक्रिय मेम्‍बर पैट्रोल, डीजल, गैस, सब्जियां और फल तक बेहद गमगीन हैं। उनका ऐसा करना सतही तौर से महंगाई की सहानुभूति प्राप्‍त करना है, वरना तो उन्‍हें तो भ्रष्‍टाचार से जितनी बढ़त मिल रही है, उनका कैरियर जितना विकास पर है, उतनी बढ़त उन्‍हें कभी महंगाई के साथ होने से भी नहीं मिली है।  महंगाई नित नई रणनीतियां बनाती है, उस पर पूरी तरह से अमल भी करती है परंतु रेट्स के बढ़ने से बुरी तरह मात खा रही है, वह ऊंचे रेटों के साथ लोकप्रियता के कॉम्‍बो पैक पर भी कब्‍जा जमाने फेर में है। दरअसल, भ्रष्‍टाचार ने उससे बहुत कम समय में बाजी मार ली है।

भ्रष्‍टाचार के विकास में यूं तो महंगाई की उल्‍लेखनीय भूमिका है और वह चाहती है कि चर्चा के केन्‍द्र में वह खुद बनी रहे। दरअसल, भ्रष्‍टाचार को लोकप्रियता के पायदान पर काबिज होने में महंगाई का भरपूर सहयोग मिला है। भ्रष्‍टाचार को लोकप्रियता की बुलंदियों के शिखर पर पहुंचाने में अन्‍ना और उनकी टीम का भरपूर योगदान रहा है। अब टीम के सदस्‍यों ने अपनी कई टीमें बना ली हैं और चौतरफा लोकप्रियता को भुना रही हैं। भुने हुए में कितना स्‍वाद मिलता है, इसे भुनने वाला नहीं, भुने हुए को खाने वाला ही जानता है। महंगाई के सारे प्रयत्‍न फेल हो रहे हैं और वह भुनभुना रही है। महंगाई के कारण नफा काटने वाले तेज गति से भ्रष्‍टाचार की ओर उन्‍मुख हो रहे हैं, महंगाई महारानी के लिए यह भी चिंता का सबब बन गया है । महारानी की कुर्सी पर रिस्‍क ऐसे समय में बढ़ गया है जबकि चुनाव नजदीक हैं और सरकार डोलायमान है।

गैस के सिलैंडरों की संख्‍या सीमित करने, कनैक्‍शनों पर सख्‍ती बरतने से पब्लिक परेशान हुई, परेशान पब्लिक ने गैस के पुतले भी फूंके लेकिन महंगाई में अब वह ताकत नहीं रही है जिससे उसकी औकात कानी कौड़ी की भी नहीं रही है। आज के माहौल में महंगाई के सारे ही दुख बड़े हैं और उससे मुकाबला करने के‍ लिए खड़े हैं। वैसे अब भी उसमें इतना दम तो बाकी है कि जरा सा जोर मारती है तो बहुत कुछ हासिल कर लेती है। महंगाई महारानी अब चाह रही है कि आजकल सुर्खियों में बने हुए खुलासामैन उसकी बुराईयों और उसकी वजह से समाज को रहे नुकसान की खामियों का भी पर्दाफाश करें ताकि वह अपनी खोई हुई प्रतिष्‍ठा को हासिल करने में सफल हो सके।

जहां देखो वह रोती बिसूरती नजर आ रही है परंतु किसी की भी उसकी खामियों का खुलासा करने में दिलचस्‍पी नहीं रह गई है। ऐसे निराशाजनक दौर में वह कई बार खुदकुशी करने की भी सोच चुकी है। वह ऐसा न करे इसके लिए आप महंगाई को उसकी उन्‍नति के लिए कुछ मौलिक उपाय सुझा सकते हैं क्‍या ?

व्‍यंग्‍य का शून्‍यकाल : पाखी मासिक पत्रिका के अक्‍टूबर नवम्‍बर 2012 के सुंयुक्‍तांक में

व्‍यंग्‍य का शून्‍यकाल अपनी मित्र पुस्‍तकों के साथ

पाखी में जमावड़ा जमा है पुस्‍तकों का

कैमरों से पंगा, नहला देंगे गंगा : दैनिक मिलाप स्‍तंभ 'बैठे ठाले' 3 नवम्‍बर 2012 में प्रकाशित




कैमरे फुलटॉस खुंदक में हैं। सवाल पत्रकारों ने पूछा और वे हमारे से चिढ़ गए, क्विटलों गालियां फेंकीं और धमकाते हुए भिड़ गए। हमें तोड़ कर वे अपना नुकसान करेंगे। कायर अभद्र न होते तो मुकाबला करते। सवाल सम कोई और नहीं। देखा नहीं पब्लिसिटी की प्‍यासी अभिनेत्री, केजरीवाल से सवाल करने के मूड में मौके को समझ रही त्‍यौहार है। चारों ओर सवालों का मौसम तारी है इसलिए बाजी मारने की फिराक में, फ्राक उतार लघु वस्‍त्र धारण किए है। सवाल क्‍या कर लिए, वे तो सिरे से ही उखड़ गए,  भूल गए कि उनके बुलाने पर पहुंचे थे। जिसकी जड़ें होती हैं, वह अच्‍छी तरह जानता है कि किसी भी जड़वान को उखाड़ने की धमकी देना व्‍यर्थ है। क्‍योंकि असली मट्ठे के अभाव में चाणक्‍य की शपथ की मानिंद जड़ें उखाड़कर उसमें मट्ठा डालने की ख्‍वाहिश पूरी करना भी पॉसीबल नहीं है।

ताव खाकर बेजुबान कैमरों को ही धमकाने में जुट गए। देश के कानून मंत्री ने पिछले दिनों धमकाने को कानूनी मान्‍यता क्‍या दे डाली है, इतराने लगे। माना कि उनके कहे पर आंख, नाक, कान मूंद कर अमल करना है। पर हम भयभीत नहीं है, समझ लो। हमारे भीतर प्राण नहीं हैं किंतु सबके पल-पल को जीवंत करते हैं। सिरफिरे मंत्रियों के मंतर से बचने के लिए इंश्‍योर्ड हैं।  तोड़ लो, जितना मन करे। टूटने के बाद हमारे से बेहतर क्‍वालिटी के कैमरे आ जाएंगे। जो फोटो खींचेंगे, आवाज रिकार्ड करेंगे और बदतमीजी की तो गाली भी देंगे। गालियां बकने के ठेके के हकदार सिर्फ वे ही नहीं है। एफएम चैनलों पर ही देख लो, इसकी उसकी सबकी बजाई जा रही है। किसी को टोपी पहनाई और किसी की सरेआम आरती उतारी जा रही है।
वाह रे, हिमाचल के तथाकथित वीर। पुरातनता के एंटीक पीस। चोर कहने पर ही इतना बिफर गए, डकैत कह दिया होता, तब तो अवश्‍य ही एक बयानवीर की तरह गोली मार देते।  पब्लिक के वोटों पर खुलकर डकैती डालने वाले दस्‍यु। आरोप साबित हो जाएंगे, तब तिहाड़ की दीवारों में कैद कर दिए जाओगे। धमकी देकर कौन सा गिन्‍नीज बुक में नाम दर्ज हो जाएगा। गुजरे जमाने के सुल्‍तान। सोच रहे हो कि मीडिया के सवालों से डरने वाले को सरकार मैडल देगी। सेब के फलों का भी कर रहे हो धंधा। एक सेब का सेवन डॉक्‍टरों को दूर रखता है लेकिन उनका धंधा करने से पौष्टिकता नहीं मिला करती। धन मिलता है और धनवेदना में इजाफा होता है। फल को कुफल बनाने की चेष्‍टा करने वाले पब्लिक तेरा और तेरे हिमायतियों का भरपूर गुणगान करेगी। कैमरों से पंगा ले रहो हो, मालूम नहीं है कि नई टैक्‍नीक वाले कैमरे आपके वस्‍त्रसहित चित्रों को वस्‍त्रविहीन कर देंगे और नहला देंगे गंगा। कैमरों को बेजुबान समझने के मुगालते में मत रहना। पहनकर हिमालय की खाल, मत बघारो शान, पब्लिक गर्म हो गई तो उसकी गर्मी से बर्फ की मानिंद पिघल जाओगे, कितनी भी कोशिश कर लो पब्लिक के लिए मीठी बर्फी नहीं बन पाओगे ?

फेरबदल नहीं है चोरी : दैनिक जनवाणी स्‍तंभ 'तीखी नज़र' 30 अक्‍टूबर 2012 में प्रकाशित



मौन रहके कोई कितना मुखर हो सकता है,मौनी बाबा से बेहतर मिसाल नहीं मिलेगी। उनके कुनबे में फेरबदल होती है तो शतरंज की तरह मोहरे बदले जाते हैं और मुखिया खुद मोहरा बन जाता है। ऐसी हेराफेरी निःशब्द होती है और मीडिया प्रायोजित रूप से स्तब्ध रह जाता है। यह सब पूरी ईमानदारी के साथ होता है और जनता को काटने के लिए हथियार बदल दिए जाते हैं। जनता को नए सपने देखने का संकेत किया जाता है और इस बहाने कई फूटे-अधूरे सपने पूरे कर लिए जाते हैं। मलाई खाने वाले अघाकर एक ओर हो जाते हैं तो नई पारी के लिए दूसरे अपनी जीभ तैयार करने लगते हैं। मलाई खाकर देशसेवा का बोनस मिलता है, सो अलग मन को मोह लेता है।
ईमानदार को यह अधिकार है कि वह ईमानदारी पर डटा रहे, सो जमा हुआ है अंगद के पांव के माफिक। फिर उसे हिलाने वाले कैसे कामयाब हो रहे हैं, इसे जानने के लिए हालातों पर गहराई से गौर करना निहायत अनिवार्य है। बजाय इसके देश और इसके नागरिक फीलपांव का सुंदर अहसास कर रहे हैं क्‍योंकि उनके सामने परिस्थितियां ही ऐसी पेश की जा रही हैं। पब्लिक वही देखने के लिए मजबूर है जो उसे सत्‍ता पक्ष दिखलाना चाहता है। इससे अलग अहसास पब्लिक कैसे करे, इसके लिए नया मीडिया आज अपने पूरे रुतबे के साथ मौजूद है। इसी से आत्‍मबल डगमग है। जिसकी डगमगाहट मुखिया के निर्णय में देखी जा रही है। पूरा मोहल्‍ला तो नहीं बदला, हल्‍का सा फेरबदल ही किया है। कौन कह रहा है कि हेराफेरी का बाजार जमा लिया है। अंत भला सो सब भला। सब भले रहें, चंगे रहें, चाहे पब्लिक के सामने नंगे रहें। किंतु वस्‍त्रों का अहसास होना ही काफी समझा जा रहा है, उन्‍हें पहनें अथवा नहीं पहनें। इसकी वजह में जाना सामाजिक दृष्टि से उचित नहीं है।
पंगे सिर्फ पब्लिक से ही लिए जाते हैं। टीम के मुखिया ने भूल कर दी तो कौन सा पहाड़ टूट कर आ गिरा, चुनाव आने पर उसकी पीठ पर हाथ फिरा देंगे। वह तसल्‍ली पाएगा,उनके चुनने का जुगाड़ सध जाएगा। एकाध नुक्‍कड़ वाले से ही तो बदला लिया है। कैप्‍टेन वही है जो चुप रहता है, चुप सहता है। जब विचारों की बाढ़ आती है, टीम सारी जुट जाती है। जिसका नाम टीम में नहीं है, जो सिर्फ दर्शक की हैसियत से शुमार हुआ था। फेरबदल को हेराफेरी की तर्ज पर बिठाकर इंतहा तक पहुंचाया, अहसास यह किया कि इसको पीठ पर लादे चल रहे हैं। इसे ही कहते हैं कि आजकल गधों के ही नहीं, घोड़ों के भी सींग निखर रहे हैं। एक को सींग मारा, दूसरे से सींग पर पालिश करवाकर चमकवाया। सींग पर भरपूर चमक आई जिससे पब्लिक समेत विपक्ष चौंधिया गया। इसको टीम से निकाला, उसको टीम में घुसेड़ा। दो चार को रुसवा किया। पब्लिक को हंसने के तोहफे दिए। एक दो ने भड़ास निकाली। डेढ़ ढाई की आस पूरी हुई। टीम में परिवर्तन से कामयाबी में तेजी की उम्‍मीद बंधी है किंतु इसके सिवाय कोई और निष्‍कपट रास्‍ता ही नहीं था। आपका सोचना भी सही है कि रास्‍ता नहीं था तो हवाई मार्ग से जाना चाहिए था। रेल की पटरियों को आजमाना चाहिए था किंतु क्‍या करें इतना सब्र होता तो अगले चुनाव होने तक इंतजार नहीं करते।
मंत्रियों को आप सिर्फ लोकल मंतर मारने वाला ही मत मान लीजिएगा। वे अपने खेल और मैदान के माहिर खिलाड़ी हैं। यह अकेले खेलने वाला खेल है, इसमें विजय पक्‍की होती है। उनकी जीत पर सिर्फ टिप्‍पणियां ही कर सकते हैं यह, जबकि इनकी टिप्‍पणियों को कोई गंभीरता से लेता नहीं है। न सत्‍ता पक्ष और न आम जनता यानी पब्लिक। क्रिकेट टीम में फेरबदल और मंत्रिमंडल में यह फेरबदल हेराफेरी के पर्याय के तौर पर जाने जाते हैं। यह फेरबदल तो ऐसा है कि जो अभी तक साईकिल चलाता रहा है, उसको कार थमा दी गई है कि इस पर खूब सारी एवरेज निकालिए, चाहे हादसे होते रहें। रेल और कार से दुर्घटनाएं करने के बाद भी हवाई जहाज उड़ाने को थमा दिया जाता है। देश के मौजूदा कानूनों से खिलवाड़ करने की योग्‍यता हासिल करने के बाद इन्‍हें विदेश तक जाने का लाईसेंस थमा दिया गया है। देश में मधुर संबंधों की जरूरत नहीं है किंतु विदेशों से नाते रिश्‍तों को मधुर बनाने के ठेके इन्‍हें सौंप दिए गए हैं।