रायता फैलाना हमारी जन्‍मसिद्ध आजादी है ! : जनसंदेश टाइम्‍स 14 अगस्‍त 2012 'उलटबांसी' स्‍तंभ में प्रकाशित



हम भारतवासियों को तिरंगा फहराने की आजादी मिल गई है लेकिन उतने से संतोष नहीं है। इसलिए प्रत्‍येक क्षेत्र में आज देश भर में सब बड़े बड़े लोग रायता फैलाने में जुट गए हैं। एक साल से अधिक हो गया है अन्‍ना को जंतर पर मंतर मारते हुए लेकिन वे ‘लोकपाल’ का रायता फैलाने से सरकार को नहीं रोक पा रहे हैं। जबकि सरकार उनका रायता पूरी तरह फैला चुकी है। उधर बाबाराम (रामदेव) यह समझाने-बतलाने में जुटे हुए हैं कि उनका रायता अलग वैरायटी का है, पब्लिक के लिए हितकर है, गुणकारी है लेकिन सरकार उसे भी फैलाने से बाज नहीं आ रही है। लग रहा है कि सरकार का भी एक काम रायता फैलाने का रह गया है। जबकि रायतानिर्माताओं और धारकों ने अपने बरतनों, लोटों में मजबूत पेंदों की व्‍यवस्‍था कर ली है। फिर भी ताकतवर सरकार उनके रायते को लुढ़काने में हर बार कामयाब हो जाती है। सब जानते हैं कि रायता पेट के लिए हितकर होता है। इसका मूल स्‍वरूप दही और दही का मूल रूप दूध है। इन सबका रंग सफेद है तो अपनी मरजी से सरकार चलाने वाले ‘सफेदपोश’ भला किसी के रायते को सुरक्षित कैसे रहने देंगे, इसलिए यह कहकर लुढ़का देते हैं कि जिस दूध का रायता बनाया जा रहा है, वह मिलावटी है, सर्फ और रिफाइंड से बनाया गया है।
क्रिकेट जैसे महाखेल में जब से फिक्सिंग का रायता फैलना शुरू हुआ तब खूब हो-हल्‍ला मचा लेकिन रायता फैलाने का यह काम सिर्फ देश में ही नहीं होता है। यह कार्य खिलाड़ी ओलंपिक जैसे आयोजनों के नाम पर विदेशों में जाकर खेलों में शामिल होकर और ओलंपिक न जीतकर देश के रायते को विदेशों में फैलाने का मोह भी नहीं छोड़ पा रहे हैं तथा हारने के बाद भी हार पहनकर खुशी-खुशी आजादी का जश्‍न मना रहे हैं।  देश में नेता इस फील्‍ड में न जाने कब से बाजी मार कर रिकार्ड बना रहे हैं। प्रत्‍येक कार्य में घपले-घोटाले करके नेता खूब खा-कमा रहे हैं। अभी हाल ही में नेताओं के रायता फैलाने की खबरें खूब प्रमुखता से सुर्खियों में हैं। जिसमें एक ओर फिजा ने चन्‍द्रमोहन ऊर्फ चांद मोहम्‍मद का रायता फैला दिया है, उधर गीतिका ने गोपाल कांडा का रायता इतनी बुरी तरह से फैलाया है कि गोपाल को गो गो गो करके फरार होना पड़ा है । जब अपनी जान और आन सांसत में हो तब आम आदमी तो सांस लेना भूल जाता है किंतु नेता तब भी दूसरों का सांस लेना दूभर करने में सफल हो जाते हैं।  विदेशी बैंको में ‘काला धन’ जमा करके भी देश की आजादी का रायता न जाने कब से फैलाया जा रहा है। फैल फैल कर रायता काला हो गया है जिसे वापिस सफेद करने के लिए बाबा रामदेव प्रयासरत हैं।
सरकार का कहना है कि जब देशवासियों को कपालभाति, भ्रामरी इत्‍यादि प्राणायाम करने की आजादी मिली हुई है फिर बाबा रामदेव क्‍यों काले धन पर सरकार का रायता फैलाने का मोह नहीं तज पा रहे हैं। जब पतंग उड़ाने की आजादी मिली हुई है फिर क्‍यों सब लोग पतंग न उड़ाकर बाबा रामदेव के साथ काले धन का काला रायता फैलाने की मूर्खतापूर्ण हरकतों को अंजाम दे रहे हैं।   
रायता फैलाने की आजादी से पहले रायता बनाने की आजादी पर विचार करना चाहिए लेकिन जरूरी नहीं कि दोनों आजादियां एक के पास ही हों। रायता कोई बनाए और उसे दूसरा फैलाए तो रायता फैलाने में, लाने से अधिक लुत्‍फ आता है। स्थिति यह है कि आजादी के 66वें बरस में आकर देश ने अपनी का‍बलियत में इजाफा करके ‘रायता’ फैलाने में विशेषज्ञता हासिल कर ली है। आप जान लीजिए कि जिस वस्‍तु की अधिकता होती है, वही बांटी या फैलाई जाती है। बचाने से अधिक फैलाने में मजा आता है। रायता फैलने से बचाने के लिए मेरीकॉम जैसी बॉक्‍सर के मुक्‍कों जैसी हिम्‍मत चाहिए, सो कोई तैयार नहीं है। चाहे पड़ा पड़ा खराब हो जाए, खराब होने के बाद फैलाने वाले का इंतजार करते रहते हैं। आप देख रहे हैं कि आज देश का रायता खराब हो चुका है लेकिन उसे फैलाने से बचाने का पब्लिक को मौका नहीं मिल रहा है। रायता फैलाने के लिए नेता खूब तल्‍लीन हैं। रायता फैलाने पर भी जिनका सम्‍मान किया जाता है, वे भी नेता ही होते हैं।
आजादी के इस 66वें पड़ाव पर विचार किया जाना चाहिए कि एकदम से रायता सुर्खियों में कैसे आ गया है। दरअसल, आज हर नकारात्‍मक चीज तुरंत सुर्खियों में आ जाती है, जैसे गालियां चर्चा में हैं, सेक्‍स की बात करके टीआरपी बढ़ाई जा रही है। कितनी ही देशभक्‍त कन्‍याएं खुद नंगी होकर देश को नंगा कर रही हैं। इसी प्रकार बात-बेबात में रायते का जिक्र करके, रायते को देश की समस्‍याओं के लिए जिम्‍मेदार ठहराने का शुभ अवसर कोई नहीं चूकता है। हालत यह हो गई है कि ‘रायता’ सिर्फ ‘दही’ का ही नहीं बनता। किसी भी समस्‍या का रायता बनाकर फैला दिया जाता है। अपने सिवाय किसी का भी रायता हो, उसे ही फैलाने में आनंद की प्राप्ति होती है जिसे सब लूटना चाह रहे हैं।  
यह कहना गलत नहीं है कि जो देश दूध दही की नदियों के लिए फेमस था, वह आज रायते के समन्‍दर के लिए प्रख्‍यात हो चुका है। जिधर देखो उधर रायता। मानो बरसात के पानी में सर्फ, सोडा, रिफाइंड तेल इत्‍यादि डालकर उसे दूध, मतलब मिलावटी दूध में तब्‍दील कर लिया गया हो, फिर उसका रायता बनाकर देश भर में फैला दिया हो। देश में आज रायते की नदियां उफान मार रही हैं और लोग उह ... लाला .... उह ... ला ... ला ... गा रहे हैं। जिन राज्‍यों में समन्‍दर हैं, वहां रायते अनाकरली के डिस्‍को में मगन हैं, चारों ओर रायता ही रायता है। हालत यह हो गई है कि नलों में से पानी की जगह रायता, पैट्रोल पंपों में पैट्रोल/डीजल/गैस की  बजाय रायते की नदियां बह रही हैं। नलकों के लिए बाल्टियां, ड्रम, गिलास, कटोरी लगाकर भर तो रहे हैं परंतु उसे पीने के लिए नहीं, फैलाने के लिए उपयोग कर रहे हैं।
कोई भी अपना रायता खुद नहीं फैलाता है बल्कि उसे दूसरे को फैलाने का अवसर देकर पुण्‍य हासिल कर रहा है। अब यह दीपावली पर फोड़ने-जलाने वाली आतिशबाजी तो है नहीं कि जब तक खुद माचिस की तीली या मोमबत्‍ती की लौ में सुलगाएंगे नहीं, आनंद ही नहीं आएगा। दीवाली मनाने के लिए तीली के जरिए फुलझड़ी, बम, पटाखों का खुद सुलगाना ही आनंद देता है और उसका आनंद दूना तब हो जाता है जब आवाज पड़ोसी सुन रहे हैं और तिगुना मजा लेने के लिए आतिशबाजी को वर्जित समय में गाया-बजाया जाता है।
आजादी के इस अवसर पर पूरा राष्‍ट्र रायतामय हो गया है। सिर्फ कुछ जगहों पर अभी भी बरसात का बदबूदार पानी हिलोंरे ले रहा है। जैसे इंडिया गेट के पास बनाई गई नहरों में जो पानी की लहरें हैं, वे न जाने क्‍यों अभी तक ‘रायता’ क्‍यों नहीं बन पाई हैं। हो सकता है कि इनका ठेका दिया जाना हो और उन ठेकों से किसी मंत्री को ‘काला धन’ मिलने का मंतर मिलने वाला हो। लगे कीबोर्ड आपको रहस्‍य की बात बतलाता चलूं कि जिस रायते का यहां पर जिक्र किया जा रहा है, वह ‘सफेदपोश’ नहीं है बल्कि एकदम ‘स्‍याह काला’ है।
काले रायते का जिक्र सुनकर आप चौंकिएगा मत, जब देश मंत्रियों के व्‍यभिचार से नहीं चौंकता फिर आपका चौंकना कैसे जायज करार दिया जा सकता है। आजादी मनाइए परंतु चौंकने की आजादी बिल्‍कुल नहीं है आपको। हां, आप आजादी का रायता फैलाने के लिए बिल्‍कुल आजाद थे, आजाद हैं और सदा आजाद रहेंगे। आज यह महसूस हो रहा है कि ‘रायता फैलाना हमारी जन्‍मसिद्ध आज़ादी है’।

'कुश्‍ती का रोमांच' : देशबंधु दैनिक में 'आपके पत्र' स्‍तंभ में प्रकाशित


अखबार ने लेख को बना दिया है पत्र
देशबंधु में यह भी लुभा रहा है मित्र।।

ओलंपिक खेलों में कुश्‍ती के लिए चांदी जीतकर सुशील कुमार ने प्रत्‍येक भारतवासी का मन मस्‍ती से भर दिया है। कुश्‍ती रूपी चिडि़या के पंख खुल गए हैं और वह सफलता की उड़ान भर रही है। इससे चिडि़या की मजबूती साबित हो गई है। कुश्‍ती में मैडल पाकर, कुश्‍ती के खेल को ‘डल’ होने से सुशील कुमार ने बचा लिया है और चिडि़या को उड़ने के लिए खुला आसमान दिया है। इसी वजह से हॉकी के माफिक यह खेल ‘डल’ होने से बचा है। इससे पहलवान सुशील कुमार में कितना बल है, यह भी साबित हो गया है। ओलंपिक में कुश्‍ती में सिर्फ ‘चांदी’ जीतना ही भारत को ‘सोना’ पाने से अधिक खुशी देगा और इतनी मस्‍ती से भर देगा, इसका कयास लंदन वालों को नहीं रहा होगा। वरना वे इस खेल को ओलंपिक से बाहर निकालकर सुस्‍त  हो जाते।

हम सब परिचित हैं कि खेलों में शामिल होने के लिए ‘कुश्‍ती’ के निराले खेल राजनीति में रोजाना दिखाई दे रहे हैं। नेता और अफसर खेलों से पहले कुश्‍ती लड़ने में खूब व्‍यस्‍त हो जाते हैं।  ओलंपिक में हमारे पहलवान के चांदी जीतने से राजनीतिज्ञ मायूस हो गए हैं क्‍योंकि वे तो रोजाना ‘संसद में कुश्‍ती’ खेलते हैं और उन्‍हें अब यह अहसास हो गया है कि चांदी पाने का उनका ख्‍वाब कभी पूरा नहीं होगा। इसलिए अगर वे ‘काला धन’ बटोरने और विदेशी बैंकों में सहेजने की कुश्‍ती में जुटे हुए हैं, तो इसमें उनका कतई दोष नहीं है। माहौल ही ऐसा बन गया है।  जिन्‍हें ‘संसद में कुश्‍ती’ के लिए चांदी तो नहीं मिलती किंतु ‘काले धन’ पर सुर्खियों की चांदमारी उन्‍हें पुरसुकून से भर देती है। ओलंपिक जैसे खेलों में शामिल होने की उनकी विजय पर कहीं दीपावली भी नहीं मनाई जाती है।

खेलों में कुश्‍ती की पुरानी परंपरा रही है। कुश्‍ती की खासियतों से प्रभावित होकर अब अन्‍य क्षेत्रों में भी कुश्तियां जारी हैं। रोज ही आप कुश्‍ती की सगी बहन धींगामुश्‍ती के अजूबों से दो-चार-छह हो रहे हैं। खेलों में ‘कुश्‍ती की धींगामुश्‍ती’ पर लिखने के लिए खूब सारी संभावनाएं हैं। ओलंपिक में सरकारी मेहमान बनकर शामिल होने के लिए ‘खिलाड़ी’ सभी उपाय अपनाते हैं, जो खेलों में जाने की मंजूरी पा जाते हैं, वे खिलाड़ी और बाकी अनाड़ी साबित हो जाते हैं। जबकि खेलों में शामिल होने के लिए सिफारिश से लेकर नोटों तक की बारिश करने के लिए तैयार रहते हैं। खेलों में कुश्‍ती की शुरूआत यहीं से मानी जा सकती है।

‘सच्‍चे खिलाड़ी’ चाहे लाख कोशिश करते रहें किंतु वे अपनी सच्‍चाई के बल पर ओलंपिक में शामिल नहीं हो पाते। शामिल नहीं हो पाते इसलिए चांदी सोने और कांस्‍य के मिलने से वंचित रह जाते हैं। इसी खूबसूरत कुश्‍ती के चलते न जाने कितनी प्रतिभाएं गुमनामी के भंवर में घूम गई हैं, जिनमें से बहुत सारी तो डूब गई हैं। जिसका बुरा नतीजा सामने है, कोई सड़क के किनारे खड़े होकर छोले-भटूरे बेच रहा है, तो कोई चाय का ठिया चला रहा है, कई खिलाड़ी तो सिगरेट, पान, गुटके की दुकानें सजाए बैठे हैं और अब गुटके पर बैन लगने से उनके रोजगार पर गंदा असर पड़ा है। खिलाड़ी में अब इतनी ताकत भी नहीं बची है कि वह कुश्‍ती में शामिल होने के ख्‍वाब भी देख सके, शामिल होकर खेलना ‘दूर की कुश्‍ती’ है।

खिलाड़ी से पहले इस प्रकार के समारोहों में भाग लेने के लिए सबसे अधिक उतावले हमारे चयनित प्रतिनिधि रहते हैं। फिर मंत्रालयों के अधिकारी शामिल होने के लिए जुगाड़ भिड़ाते रहते हैं। इन सबकी कोशिशें सपरिवार जाने की होती हैं। मानो, इनके न शामिल होने से खेलों का आयोजन खटाई में पड़ जाएगा। इनमें एक और श्रेणी इन दिनों उजागर हुई है, घपले-घोटाले करने के बाद भी खेलों में शामिल होने के उनके द्वारा की जारही ‘कुश्‍ती’ प्रशंसनीय रही है। संसद और विधानसभाओं में तो रोजाना ‘कुश्‍ती के जौहर’ दिखलाई दे रहे हैं।

कुश्‍ती विधा की देश के प्रत्‍येक क्षेत्र में खासी जरूरत है और इससे इंकार नहीं किया जा सकता। आप इंकार करेंगे तब भी कुश्‍ती विधा, किश्‍ती बनकर तैरते हुए डूबने से तो रही। कुश्‍ती को आप हाकी, बैडमिंटन, बॉलीबाल अथवा क्रिकेट मत समझ लीजिएगा जबकि कुश्‍ती का व्‍यापक असर इन खेलों पर भी पड़े बिना नहीं रहा है। जहां भी, जब भी खेलों का आयोजन होता है, वहां पर सबको कुश्तियों का दिव्‍य-भव्‍य स्‍वरूप अवलोकित करने का अवसर मिलता है। इन कुश्तियों के दीदार के सामने, किसी भी खेल में खेलकर चांदी, सोना पाना कोई अहमियत नहीं रखता है। ‘कुश्‍ती का रोमांच’ बड़े-छोटे सभी प्रकार के मंचों पर आप रोज ही देखते हैं। आजकल ‘बाबाओं की कुश्‍ती’ जंतर पर अपना मंतर दिखला रही है, इससे तो आप इत्‍तेफाक रखते हैं न। और हां, अब आखिरी सवाल कि आप इसे ‘नूराकुश्‍ती’ के खिताब से नवाजना चाहते हैं अथवा नहीं, जरूर बतलाएं ?

कुश्‍ती की धींगामुश्‍ती : आई नेक्‍स्‍ट 14 अगस्‍त 2012 'खूब कही' स्‍तंभ में प्रकाशित


मैंने दो बार लिखकर भेजा था, अखबार ने एक बार भी नहीं छापा, लेख नहीं लेखक का नाम। 


ओलंपिक खेलों में कुश्‍ती के लिए चांदी जीतकर सुशील कुमार ने प्रत्‍येक भारतवासी का मन सोना-सोहना कर दिया है। जबकि खेलों में शामिल होने के लिए ‘कुश्‍ती’ के निराले खेल राजनीति में रोजाना दिखाई दे रहे हैं। ओलंपिक में हमारे पहलवान ने कुश्‍ती में चांदी जीत ली है इससे राजनीतिज्ञ मायूस हो गए हैं क्‍योंकि वे तो रोजाना ‘संसद में कुश्‍ती’ खेलते हैं। फिर भी न तो उनको चांदी मिलती है और न इतनी सारी सुर्खियां, न ओलंपिक जैसे खेलों में उनको शामिल होने के लिए सरकारी दौरे को मंजूरी ही मिलती है। उनकी कुश्‍ती से प्रभावित होकर कहीं दीपावली भी नहीं मनाई जाती है।
खेलों में कुश्‍ती की पुरानी परंपरा रही है। कुश्‍ती की खासियतों से प्रभावित होकर अब अन्‍य क्षेत्रों में भी कुश्तियां जारी हैं। रोज ही आप कुश्‍ती की सगी बहन धींगामुश्‍ती के अजूबों से दो-चार-छह होते रहते हैं। खेलों में ‘कुश्‍ती की धींगामुश्‍ती’ पर लिखने के लिए खूब सारी संभावनाएं हैं। ओलंपिक में सरकारी मेहमान बनकर शामिल होने के लिए ‘खिलाड़ी’ सभी उपाय अपनाते हैं, जो खेलों में जाने की मंजूरी पा जाते हैं, वे खिलाड़ी और बाकी अनाड़ी साबित हो जाते हैं। जबकि खेलों में शामिल होने के लिए सिफारिश से लेकर नोटों तक की बारिश करने के लिए तैयार रहते हैं। खेलों में कुश्‍ती की शुरूआत यहीं से मानी जा सकती है।
‘सच्‍चे खिलाड़ी’ चाहे लाख कोशिश करते रहें किंतु वे अपनी सच्‍चाई के बल पर ओलंपिक में शामिल नहीं हो पाते। शामिल नहीं हो पाते इसलिए चांदी सोने और कांस्‍य के मिलने से वंचित रह जाते हैं। इसी खूबसूरत कुश्‍ती के चलते न जाने कितनी प्रतिभाएं गुमनामी के भंवर में घूम गई हैं, जिनमें से बहुत सारी तो डूब गई हैं। कोई सड़क के किनारे खड़े होकर छोले-भटूरे बेच रहा है, तो कोई चाय का ठिया चला रहा है, अब उस खिलाड़ी में इतनी ताकत भी नहीं बची है कि वह कुश्‍ती में शामिल होने के ख्‍वाब भी देख सके, शामिल होकर खेलना ‘दूर की कुश्‍ती’ है।
खिलाड़ी से पहले इस प्रकार के समारोहों में भाग लेने के लिए सबसे अधिक उतावले हमारे चयनित प्रतिनिधि रहते हैं। फिर मंत्रालयों के अधिकारी शामिल होने के लिए जुगाड़ भिड़ाते रहते हैं। इन सबकी कोशिशें सपरिवार जाने की होती हैं। मानो, इनके न शामिल होने से खेलों का आयोजन खटाई में पड़ जाएगा। इनमें एक और नई श्रेणी इन दिनों उजागर हुई है, घपले-घोटाले करने के बाद भी खेलों में शामिल होने के उनके द्वारा की जारी ‘कुश्‍ती’ प्रशंसनीय रही है। संसद और विधानसभाओं में तो रोजाना ‘कुश्‍ती के जौहर दिखलाने का मौसम’ बना रहता है।
कुश्‍ती विधा की देश को प्रत्‍येक क्षेत्र में खासी जरूरत है और इससे इंकार नहीं किया जा सकता। आप इंकार करेंगे तब भी कुश्‍ती विधा, किश्‍ती बनकर तैरते हुए डूबने से तो रही। कुश्‍ती को आप हाकी, बैडमिंटन, बॉलीबाल अथवा क्रिकेट मत समझ लीजिएगा जबकि कुश्‍ती का व्‍यापक असर इन खेलों पर भी पड़े बिना नहीं रहा है।
जहां भी जब भी खेलों का आयोजन होता है, वहां पर सबको कुश्तियों का दिव्‍य-भव्‍य स्‍वरूप अवलोकित करने का अवसर मिलता है। इन कुश्तियों के दीदार के सामने, किसी भी खेल में खेलकर चांदी, सोना पाना भी कोई अहमियत नहीं रखता है। ‘कुश्‍ती का रोमांच’ बड़े-बड़े सभी प्रकार के मंचों पर आप रोज ही देखते हैं। आजकल ‘बाबाओं की कुश्‍ती’ जंतर पर अपना मंतर दिखला रही है, इससे तो आप इत्‍तेफाक रखते हैं न !

ओलंपिक की कुश्‍ती है मस्‍त-मस्‍त : जनवाणी 14 अगस्‍त 2012 'तीखी नज़र' में प्रकाशित


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ओलंपिक खेलों में कुश्‍ती के लिए चांदी जीतकर सुशील कुमार ने प्रत्‍येक भारतवासी का मन मस्‍ती से भर दिया है। कुश्‍ती रूपी चिडि़या के पंख खुल गए हैं और वह सफलता की उड़ान भर रही है। इससे चिडि़या की मजबूती साबित हो गई है। कुश्‍ती में मैडल पाकर, कुश्‍ती के खेल को ‘डल’ होने से सुशील कुमार ने बचा लिया है और चिडि़या को उड़ने के लिए खुला आसमान दिया है। इसी वजह से हॉकी के माफिक यह खेल ‘डल’ होने से बचा है। इससे पहलवान सुशील कुमार में कितना बल है, यह भी साबित हो गया है। ओलंपिक में कुश्‍ती में सिर्फ ‘चांदी’ जीतना ही भारत को ‘सोना’ पाने से अधिक खुशी देगा और इतनी मस्‍ती से भर देगा, इसका कयास लंदन वालों को नहीं रहा होगा। वरना वे इस खेल को ओलंपिक से बाहर निकालकर सुस्‍त  हो जाते।

हम सब परिचित हैं कि खेलों में शामिल होने के लिए ‘कुश्‍ती’ के निराले खेल राजनीति में रोजाना दिखाई दे रहे हैं। नेता और अफसर खेलों से पहले कुश्‍ती लड़ने में खूब व्‍यस्‍त हो जाते हैं।  ओलंपिक में हमारे पहलवान के चांदी जीतने से राजनीतिज्ञ मायूस हो गए हैं क्‍योंकि वे तो रोजाना ‘संसद में कुश्‍ती’ खेलते हैं और उन्‍हें अब यह अहसास हो गया है कि चांदी पाने का उनका ख्‍वाब कभी पूरा नहीं होगा। इसलिए अगर वे ‘काला धन’ बटोरने और विदेशी बैंकों में सहेजने की कुश्‍ती में जुटे हुए हैं, तो इसमें उनका कतई दोष नहीं है। माहौल ही ऐसा बन गया है।  जिन्‍हें ‘संसद में कुश्‍ती’ के लिए चांदी तो नहीं मिलती किंतु ‘काले धन’ पर सुर्खियों की चांदमारी उन्‍हें पुरसुकून से भर देती है। ओलंपिक जैसे खेलों में शामिल होने की उनकी विजय पर कहीं दीपावली भी नहीं मनाई जाती है।

खेलों में कुश्‍ती की पुरानी परंपरा रही है। कुश्‍ती की खासियतों से प्रभावित होकर अब अन्‍य क्षेत्रों में भी कुश्तियां जारी हैं। रोज ही आप कुश्‍ती की सगी बहन धींगामुश्‍ती के अजूबों से दो-चार-छह हो रहे हैं। खेलों में ‘कुश्‍ती की धींगामुश्‍ती’ पर लिखने के लिए खूब सारी संभावनाएं हैं। ओलंपिक में सरकारी मेहमान बनकर शामिल होने के लिए ‘खिलाड़ी’ सभी उपाय अपनाते हैं, जो खेलों में जाने की मंजूरी पा जाते हैं, वे खिलाड़ी और बाकी अनाड़ी साबित हो जाते हैं। जबकि खेलों में शामिल होने के लिए सिफारिश से लेकर नोटों तक की बारिश करने के लिए तैयार रहते हैं। खेलों में कुश्‍ती की शुरूआत यहीं से मानी जा सकती है।

‘सच्‍चे खिलाड़ी’ चाहे लाख कोशिश करते रहें किंतु वे अपनी सच्‍चाई के बल पर ओलंपिक में शामिल नहीं हो पाते। शामिल नहीं हो पाते इसलिए चांदी सोने और कांस्‍य के मिलने से वंचित रह जाते हैं। इसी खूबसूरत कुश्‍ती के चलते न जाने कितनी प्रतिभाएं गुमनामी के भंवर में घूम गई हैं, जिनमें से बहुत सारी तो डूब गई हैं। जिसका बुरा नतीजा सामने है, कोई सड़क के किनारे खड़े होकर छोले-भटूरे बेच रहा है, तो कोई चाय का ठिया चला रहा है, कई खिलाड़ी तो सिगरेट, पान, गुटके की दुकानें सजाए बैठे हैं और अब गुटके पर बैन लगने से उनके रोजगार पर गंदा असर पड़ा है। खिलाड़ी में अब इतनी ताकत भी नहीं बची है कि वह कुश्‍ती में शामिल होने के ख्‍वाब भी देख सके, शामिल होकर खेलना ‘दूर की कुश्‍ती’ है।

खिलाड़ी से पहले इस प्रकार के समारोहों में भाग लेने के लिए सबसे अधिक उतावले हमारे चयनित प्रतिनिधि रहते हैं। फिर मंत्रालयों के अधिकारी शामिल होने के लिए जुगाड़ भिड़ाते रहते हैं। इन सबकी कोशिशें सपरिवार जाने की होती हैं। मानो, इनके न शामिल होने से खेलों का आयोजन खटाई में पड़ जाएगा। इनमें एक और श्रेणी इन दिनों उजागर हुई है, घपले-घोटाले करने के बाद भी खेलों में शामिल होने के उनके द्वारा की जारही ‘कुश्‍ती’ प्रशंसनीय रही है। संसद और विधानसभाओं में तो रोजाना ‘कुश्‍ती के जौहर’ दिखलाई दे रहे हैं।

कुश्‍ती विधा की देश के प्रत्‍येक क्षेत्र में खासी जरूरत है और इससे इंकार नहीं किया जा सकता। आप इंकार करेंगे तब भी कुश्‍ती विधा, किश्‍ती बनकर तैरते हुए डूबने से तो रही। कुश्‍ती को आप हाकी, बैडमिंटन, बॉलीबाल अथवा क्रिकेट मत समझ लीजिएगा। जबकि कुश्‍ती का व्‍यापक असर इन खेलों पर भी पड़े बिना नहीं रहा है। जहां भी, जब भी खेलों का आयोजन होता है, वहां पर सबको कुश्तियों का दिव्‍य-भव्‍य स्‍वरूप अवलोकित करने का अवसर मिलता है। इन कुश्तियों के दीदार के सामने, किसी भी खेल में खेलकर चांदी, सोना पाना कोई अहमियत नहीं रखता है। ‘कुश्‍ती का रोमांच’ बड़े-छोटे सभी प्रकार के मंचों पर आप रोज ही देखते हैं। आजकल ‘बाबाओं की कुश्‍ती’ जंतर पर अपना मंतर दिखला रही है, इससे तो आप इत्‍तेफाक रखते हैं न। और हां, अब आखिरी सवाल कि आप इसे ‘नूराकुश्‍ती’ के खिताब से नवाजना चाहते हैं अथवा नहीं, जरूर बतलाएं ?

आज़ादी पर सेंसर ! : दैनिक ट्रिब्‍यून 12 अगस्‍त 2012 में 'खरी-खरी' स्‍तंभ में प्रकाशित


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आजादी कहकर आजा दी को नहीं बुला रहे है। दीदी गर ममता है तो वे स्‍वतंत्रता पर अंकुश हैं। माया है तो मूर्तियां हैं। माया ने मूर्तियां बनाने की स्‍वतंत्रता का सुख लिया। वैसे मूर्तियां बनाकर वे मूर्तियों के पराधीन हो गईं और कहा गया है कि पराधीन सपने हूं सुख नाहीं। दीदी ने कार्टूनों के सुख से भी दूर कर दिया। किताबों से कार्टूनों को बाहर कर दिया गया और कोई रास्‍ता भी नहीं दिखाया गया। वैसे जब किसी को बाहर किया जाता है तो कहा जाता है कि इसे बाहर का रास्‍ता दिखाओ। ऐसे लगता है मानो दी की इस कार्रवाई से समस्‍त कार्टूनकार अंधे रास्‍ते पर धकेल दिए गए हैं। जबकि रास्‍ते अंधे नहीं होते, धकेलने वाले जरूर अंधे होते हैं। रास्‍तों को देखने की जरूरत नहीं होती कि उन पर कौन चल रहा है और किसे धकेला जा रहा है। रास्‍तों की आंखें भी नहीं होती हैं। वरना चलने वालों को बहुत दिक्‍कत हो सकती थी। उनके ऊपर से गुजरने वालों को नीचे से देखना ... काफी रिस्‍की हो जाता है, खासकर महिलाओं को, अब इसके विस्‍तार में न ही जाया जाए तो बेहतर है।
अंधे को आजादी मिले, न मिले। एक ही बात है उसकी आजादी पर अंकुश ईश्‍वर ने कस दिया है। आंखों में रोशनी न देकर, या देने के बाद भी छीन कर। आजादी आंख की, कान से सुनने की आजादी, नाक से सूंघने की,सांस लेने की, मुंह से बोलने की – सब कुछ प्रकृति प्रदत्‍त हैं। इसलिए नाक का रुतबा सदा कायम रखने की कोशिशें जारी रहती हैं। वैसे भी नाक को मूंछ के जरिए अंडरलाईन ईश्‍वर ने ही किया है। महिलाओं की नाक को नहीं, फिर भी जो नाक की साख कायम रखने में खुद को सक्षम नहीं पाते हैं, वे मूंछों रूपी अंडरलाईन को डिलीट कर देते हैं।
नाक पर न सेंसर लगा है और न लग ही सकता है। इसमें स्‍वच्‍छ सांस लेने के लिए भी फिल्‍टर की कोई व्‍यवस्‍था नहीं है। सब धड़ के भीतर लगी हुई मशीनों में धड़धड़ाता रहता है। सरकार चाहे तो इस पर टैक्‍स लगा सकती है परंतु रोक नहीं। आजादी के ईश्‍वरप्रदत्‍त प्रवाह को इंसान रोकने में सरकार सक्षम नहीं है। मुझे लग रहा है कि अब अगर ईश्‍वर भी चाह रहा होगा तो रोक नहीं पा रहा होगा। इंसानप्रदत्‍त आजादी पर अराजकता के बरक्‍स सेंसर, अंकुश सब लगाया जा सकता है, लगाया जाता है। चाबुक भी चलाई जाती है। सजा देना चाबुक चलाना ही है। लगाम कसना गला घोंटना है।
आजादी के दुश्‍मन अनेक, आजादी एक। गला घोंट दो,लगाम कस दो, चाबुक चला दो – आजादी मत रहने दो। आजादी का सुख लेने की आजादी छीनना ही सरकारों का अभिप्राय रहता है। बादलों ने इस मानसून के मौसम में आजादी का बेपनाह लुत्‍फ उठाया कि इंसान को नानी नहीं, सूखा याद आ गया। वे सरकारी सब्सिडी के सपने देखने लगे। किंतु रायता बनाने के लिए कहीं की सरकार सब्सिडी नहीं देती है क्‍योंकि रायता बनाने के लिए दूध का दही बनाना और दही से रायता बनाना और उस पर सबको यह भ्रम है कि वे किसी के भी रायते को फैला दें। रायता फैलाना जुल्‍म ही है, जुर्म भी है। आप सरकार का रायता फैलाने की कोशिश करके ही देखिएगा, फैलाना तो ‘दूर का मंगल’ है लेकिन फिर आप सरकारी जंगल में ऐसे घूमेंगे कि ताउम्र भटकते और अटकते ही रहेंगे। कितनी मेहनत से दही तैयार करके सरकार घोटालों-घपलों रूपी दही का रायता बनाती हैं और उसे कोई यूं ही ‘आजादी’ के नाम पर लुढ़का जाए। लुढ़काने वाले की तो शामत आएगी ही, उस लोटे का भी रिमांड लिया जाएगा कि ‘तू लुढ़का क्‍यों’ मतलब लोटे को लुढ़कने की भी आजादी नहीं है। जबकि नेता यूं ही नोटों के लिए जीवन भर लुढ़कते-लुढ़काते रहते हैं।
फेसबुक की आजादी का मजा सब लूट रहे हैं। जिसमें न फेस अपना है और बुक। फिर भी धड़ल्‍ले से कहा जाता है फेसबुक। बड़े, बूढ़े, बच्‍चे, जवान मन भर भर कर टनों के तोल से आजादी लूट रहे हैं। इस लूट को रोकने के लिए न कोई पुलिस है, कोई खाप पंचायत भी इसमें दखल नहीं रखती है। इस लूट रूपी छूट को रोकने की प्रक्रिया तब तक कारगर नहीं हो सकती जब तक इंटरनेट पर खाता खोलने के लिए किसी सरकारी पहचान पत्र की अनिवार्यता नहीं की जाती। बगैर इसके इस सोशल मीडिया पर जो निरंकुशता का मानसून दिखाई दे रहा है, बरस रहा है, सब लुत्‍फ ले रहे हैं, महसूस हो रहा है – विकासमान ही होगा। इस दही का रायता मत बनाओ, न बनने दो पर इतना तो मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि इस रायते को फेलने से कोई रोक नहीं पाएगा।
इस रायते को लुढ़काने भी नेता ही आएगा और लुढ़कने की जांच के लिए नेता को ही जांच अधिकारी बनाया जाएगा। ‘लोटा, नेता और रायता क्‍यों लुढ़कते हैं’, इस पर यदि कोई विश्‍वविद्यालय राज़ी हो जाए तो सोच रहा हूं कि पीएचडी कर लूं। लेकिन इतने गूढ़ विषय पर शोध करने के लिए ‘विश्‍वविदयालय अनुदान आयोग’ से भी सहायता की दरकार रहेगी। आप किसी विश्‍वविद्यालय की जानकारी देकर आजादी के रायते को फैलाने, अरे नहीं, समेटने में मददगार बनेंगे कि नहीं ?

अण्‍णा हजारे का मिशन इलेक्‍शन : हरिभूमि 11 अगस्‍त 2012 अंक में प्रकाशित


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अन्‍ना राजनीति में, राजनीति गन्‍ना है, गंडेरी नहीं, गौर कीजिएगा। गंडेरी सीधे दांतों में चबाकर उसके रस का आनंद लिया जा सकता है जबकि गन्‍ने के सख्‍त छिलके को पहले छीलना पड़ता है। गन्‍ने को यूं ही उठाकर डण्‍डे के माफिक भी मारा जा सकता है। इसमें खाने वाले को (गौर कीजिएगा चबाने वाले को नहीं) चोट लगेगी, मारने में गन्‍ना टूटने पर भी उपयोगिता कम नहीं होती। मीठे रस से भरपूर गन्‍ना बे-रस हो जाता है किंतु राजनीति कभी बे-रस होकर बरसती नहीं, नीरस भी नहीं होती, संभावनाएं सदा जिंदा रहती हैं।
आप चाहे पक्ष में हों या विपक्ष में, पशु हों या पक्षी, राजनीति की कुशल नीतियां सबका भला करती हैं। सबका भला करे भगवान, राजनीति भी सबका भला ही करती है। लाभ लेने का सबसे सरल तरीका भ्रष्‍टाचार, जिसे देश में रोजाना त्‍यौहार की तरह मनाया जाता है। नेताओं को ऐसे मौके तोहफे में प्रदान किए जाते हैं, जिससे वे घपले और घोटालों को अंजाम देते हैं।
अन्‍ना पहले भ्रष्‍टाचार के पीछे बिना भूख प्‍यास की चिंता किए दौड़े जा रहे थे, उन्‍हें घोड़े की तरह राजनीति के पीछे पेट भर के दौड़ने की चुनौती दी गई है। अन्‍ना को यह बोध हुआ कि जिसका खात्‍मा करना हो, उसे नज़दीक से जानना बहुत जरूरी होता है। रावण को जानने-मारने के लिए राम ने विभीषण का सहारा लिया। राजनीति में पक्ष वा विपक्ष सब एक-दूसरे के अवलंब होते हैं। ‘जो तेरा है वह मेरा है, जो मेरा है वह तेरा है, जो तेरा है वह तेरा है, जो मेरा है वह मेरा है। इस तेरे मेरे की उलझन में कोई नहीं मरा है। इस तेरे मेरे ने ही सबको तरा है।‘ सब राम बन गए हैं।
अब देखना यह महत्‍वपूर्ण है कि अन्‍ना राजनीति में कौन से मीठे गुल खिलवाते हैं, लोकपाल को लागू करवाते हैं या पहले की तरह ही लोक को पागल बनना होगा। पागल बनकर पब्लिक जंतर मंतर पर इकट्ठा होना छोड़ देगी। अन्‍ना में राजनीति या राजनीति में अन्‍ना – यह तराना बहुतों को लुभा रहा है।  मलाई-राबड़ी चाटने के सपने दिखलाई दे रहे हैं। विशिष्‍ट व्‍यक्तियों का पर्यावरण यूं ही हरा नहीं होता, उसमें हरियाली लाने के प्रयत्‍न करने पड़ते हैं। जंतर पर भीड़ लगाकर मंतर बहुत जोर से फूंका गया है।
अन्‍ना पर फूंका गया मंतर मिशन इलेक्‍शन है। इस मंतर के प्रभाव से कई मंत्री बनेंगे, कितने ही संतरियों के दिन फिरेंगे। आज गन्‍ने का रस निकाला जा रहा है। गन्‍ने के मजबूत छिलके छीलने के बाद ही, संतरों के मुलायम छिलकों को छीलने के अवसर मिलते हैं। आप छिलकों की उपयोगिता से परिचित हैं कि नहीं। बादाम के दाम यूं ही नहीं बढ़ते हैं। छिलके वाले साबुत बादाम के दाम सबसे कम, छिलके रहित बादाम के दाम अधिक और बादामगिरी के दाम आसमान छूते हैं। राजनीति बादामगिरी है। पब्लिक इसे अन्‍नागिरी और गन्‍नागिरी तक ही पहचानती है। मालूम नहीं क्‍यों फिल्‍म 'रोटी' का यह लोकप्रिय गीत राजनीति में ऐसे गठबंधनों की पोल खोलता दिखाई देता है। गीत के बोल हैं - ‘ये जो पब्लिक है सब जानती है, भीतर क्‍या है बाहर क्‍या है, यह सब पहचानती है’। अगर पब्लिक सब जानती-पहचानती होती तो अन्‍ना की गन्‍नागिरी के फेर में न उलझकर, नेताओं की बादामगिरी की अहमियत पर सवाल न उठाती ? पाठकों, आप तो बादामगिरी के सफर को पहचान चुके हैं न।



बेटा करवाएगा बाप की हजामत : डीएलए 9 अगस्‍त 2012 में प्रकाशित


हिंदी फिल्‍मों ने बाप का बहुत नुकसान किया है क्‍योंकि बेटे बाप की फिल्‍मी मरम्‍मत करते रहे हैं। फिल्‍मी मरम्‍मत अब पर्दे से उतर बापों की असली हजामत का सबब बनने वाली है।  पिताश्री, डैडी, पिताजी, डैड, बापू, अप्‍पा, अब्‍बा जैसे अन्‍य संबोधन अब कानों में पिघले शीशे की माफिक असर करेंगे।  बेटे के कारनामों का डायरेक्‍ट इफेक्‍ट बाप के गाल पर दिखाई देने का जमाना आ गया है।
मसला अभी पूरी तरह मसला नहीं गया है लेकिन ‘बेटा करे करतूत और बाप खाए शहतूत’ के रसीले जमाने अब लदने वाले हैं। जनता कम सुनती है और मंत्रियों की बातों पर अमल नहीं करती। जबकि कही बात से मुकर जाना – मंत्रियों का सुर्खी पाने का मंत्र है। जिसमें मुख्‍य भूमिका वही जीभ यंत्र बनकर निबाहती है, जो दिन भर आपके मुंह में लार में नहाती है। कभी मीठी हो जाती है तो मीठे मंत्र दे जाती है और नमकीन या खट्टे, कसैले से नहाने पर कड़वे बीज मंत्र देती है।
छत्‍तीसी के गढ़ में सेंध लगाने वाले मन-मंत्री रमन के बत्‍तीसी ओपन करने पर बाप घबरा गए हैं और बेटे अपराध करने के मूड में आ गए हैं। मानो, अपने सगे बाप से पुरानी दुश्‍मनी का बदला ले रहे हों। यह भी माना जा सकता है कि मंत्री खुद कोई करतूत करने वाले हों और ........... ।  
खैर, मामला बहुत भयानक होने वाला है, कल कोई ‘दीदी’, बनकर ‘दादा’ एक बीज मंत्र जमाने को दे सकती है कि ‘गलती करे बेटी तो पिटे माता’। तकनीक सदा जमाने को फायदा ही पहुंचाती है, इसे समझ लेंगे तो जरूर जान जाएंगे कि मंत्री क्‍यों रोने-रुलाने वाले बयान देते हैं। इस बयान की कोई कितनी भी थुक्‍का-फजीहत और घनघोर निंदा कर रहा है जबकि अपने देश का जनसंख्‍या विभाग बहुत खुश है।‘अब्‍बा-अम्‍मा’ की इस संभावित पिटाई के कारण जनसंख्‍या विभाग अपनी नीतियों के प्रचार-प्रसार  पर किए जा रहे बजट को सरेंडर करते हुए वित्‍त विभाग को कह सकता है कि जनसंख्‍या रोकने की मद में बजट रुपी करवट अपनी ओर करने की न तो जरूरत है और न ही बेहिसाब धन बर्बाद करने की।
बाप बनना हो रहा है अभिशाप जैसा श्राप देने की जरूरत नहीं है। सब ‘बाप’ बनकर रोमांचित होते रहे हैं लेकिन अब बचकर उनकी खुशी का कोई पारावार नहीं रहेगा। एक बेटा हो जाए तो तर जाऊं, की चाह रखने वाले कहेंगे कि बेटा होने से पहले मर जाऊं।

अन्‍नागिरी से बादामगिरी तक ! : दैनिक ट्रिब्‍यून 9 अगस्‍त 2012 स्‍तंभ 'सागर में गागर' में प्रकाशित


अन्‍ना राजनीति में, राजनीति गन्‍ना है, गंडेरी नहीं, गौर कीजिएगा। गंडेरी सीधे दांतों में चबाकर उसके रस का आनंद लिया जा सकता है जबकि गन्‍ने के सख्‍त छिलके को पहले छीलना पड़ता है। इस छीलन-प्रक्रिया में दांत जख्‍मी हो सकते हैं। गन्‍ना कभी जख्‍मी नहीं हुआ करता। उसे तो यूं ही उठाकर डण्‍डे के माफिक भी मारा जा सकता है। इसमें खाने वाले को (गौर कीजिएगा चबाने वाले को नहीं) चोट लगेगी, मारने में गन्‍ना टूट सकता है लेकिन फिर भी उसकी उपयोगिता कम नहीं होती। गन्‍ने का रस निचोड़ कर वैसे मज़ा लिया जाता है, न निचोड़ पाएं तो उसे चलती मशीन में दबाकर पीसने की युक्ति कारगर रहती है। पूरा रस निकल जाता है। मीठे रस से भरपूर गन्‍ना बे-रस हो जाता है किंतु राजनीति कभी बरसती नहीं, नीरस भी नहीं होती, उसमें संभावनाएं सदा जिंदा रहती हैं।

आप चाहे पक्ष में हों या विपक्ष में, पशु हों या पक्षी, राजनीति की कुशल नीतियां सबका भला करती हैं। सबका भला करे भगवान, राजनीति भी सबका भला ही करती है। लाभ लेने वाला प्रवीण होना चाहिए। लाभ लेने का सबसे सरल तरीका भ्रष्‍टाचार, जिसे देश में रोजाना त्‍यौहार की तरह मनाया जाता है। सरकारी महकमों से जुड़े अधिकांश अधिकारी और कर्मचारी इसे मनाने का मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहते। इसके विपरीत नेताओं को ऐसे मौके तोहफे में प्रदान किए जाते हैं, जिससे वे घपले और घोटालों को अंजाम देते हैं। फंसने पर उन्‍हें बचने के गुर सिखलाए जाते हैं। इसमें जांच होती है। जांच का जांचना ही फंसावट से सुरक्षित बाहर निकाल मुक्ति प्रदान करता है।

अन्‍ना राजनीति में आ रहे हैं। पहले वे भ्रष्‍टाचार के पीछे बिना भूख प्‍यास की चिंता किए दौड़े जा रहे थे, अब उन्‍हें घोड़े की तरह राजनीति के पीछे पेट भर के दौड़ने की चुनौती दी गई है। अन्‍ना ने ना नहीं की और चुनौती स्‍वीकार कर ली। अन्‍ना को यह बोध हुआ है कि जिसका खात्‍मा करना हो, उसे नज़दीक से जानना बहुत जरूरी होता है। जैसे रावण को जानने-मारने के लिए राम ने विभीषण का सहारा लिया। राजनीति में सब एकदूसरे को सहारा देते हैं। चाहे पक्ष हो या विपक्ष हो। सियासत में लूटकार्य मिल कर ही संपन्‍न किए जाते हैं। जो तेरा है वह मेरा है, जो मेरा है वह तेरा है, जो तेरा है वह तेरा है, जो मेरा है वह मेरा है। इस तेरे मेरे की उलझन में कोई नहीं मरा है। इस तेरे मेरे ने ही सबको राम बना दिया है। सब जीवंत हो उठे हैं।

अन्‍ना गन्‍ना चूसेंगे तो पब्लिक क्‍या करेगी, पब्लिक उस गन्‍ने को छीलेगी। पब्लिक हर कार्य करने के लिए तैयार रहती है, वह नहीं विचार कर पाती कि इस कार्य से उसे नफा होगा या नुकसान। नेता उसे नफे की निराली दुनिया दिखाते रहते हैं। पब्लिक देखते हुए गन्‍ने के छिलके छीनने में जुटी रहती है। राजनीति के गन्‍ने ने अन्‍ना को मोह लियो है, अब वे भी गन्‍ने को छीलने में जुटने वाले हैं, चाहे घाव दांतों में ही हो जाएं। गन्‍ना सख्‍त है तो क्‍या हुआ, अन्‍ना भी तो भ्रष्‍टाचार को लेकर पूरे सख्‍त हैं। क्‍या हुआ जो अपनी टीम के सदस्‍यों को उस सख्‍ती का अहसास अन्‍ना ने नहीं कराया है। अब करायेंगे, जब राजनीति में आए हैं तो उस सख्‍ती को भी जरूर दिखलाएंगे। अब देखना यह महत्‍वपूर्ण है कि अन्‍ना राजनीति में कौन से मीठे गुल खिलवाते हैं, लोकपाल को लागू करवाते हैं या पहले की तरह ही लोक को पागल बनना होगा।

पब्लिक पागल हो जाए तो कई संकट अपने आप छू मंतर हो जाएंगे। पागल बनकर पब्लिक जंतर मंतर पर इकट्ठा होना छोड़ देगी। बवाल मचाना छोड़ देगी। पागलपन की धुन बहुत मस्‍त होती है। पब्लिक पागलपन की पूरी मस्‍ती में है। अन्‍ना में राजनीति या राजनीति में अन्‍ना – यह तराना बहुतों को लुभा रहा है।  मलाई-राबड़ी चाटने के सपने दिखलाई दे रहे हैं। रात-दिन सुनहरे होने वाले हैं। विशिष्‍ट व्‍यक्तियों का पर्यावरण यूं ही हरा नहीं होता, उसमें हरियाली लाने के प्रयत्‍न करने पड़ते हैं। जंतर पर भीड़ लगाकर मंतर बहुत जोर से फूंका जाता है।

अन्‍ना पर फूंका गया मंतर मिशन इलेक्‍शन है। इस मंतर के प्रभाव से कई मंत्री बनेंगे, कितने ही संतरियों के दिन फिरेंगे। आज गन्‍ने का रस निकाला जा रहा है। गन्‍ने के मजबूत छिलके छीलने के बाद ही, संतरों के मुलायम छिलकों को छीलने के अवसर मिलते हैं। आप छिलकों की उपयोगिता से परिचित हैं कि नहीं। बादाम के दाम यूं ही नहीं बढ़ते हैं। छिलके वाले साबुत बादाम के दाम सबसे कम, छिलके रहित बादाम के दाम अधिक और बादामगिरी के दाम आसमान छूते हैं। राजनीति भी बादामगिरी ही है। पर पब्लिक इसे अन्‍नागिरी और गन्‍नागिरी तक ही पहचानती है। मालूम नहीं क्‍यों फिल्‍म 'रोटी' का यह लोकप्रिय गीत राजनीति में ऐसे गठबंधनों की पोल खोलता दिखाई देता है।गीत के बोल हैं - ‘ये जो पब्लिक है सब जानती है, भीतर क्‍या है बाहर क्‍या है, यह सब पहचानती है’। अगर पब्लिक सब जानती-पहचानती होती तो अन्‍ना की गन्‍नागिरी के फेर में न उलझकर, नेताओं की बादामगिरी की अहमियत पर सवाल न उठाती ? पाठकों,आप तो बादामगिरी के सफर को पहचान चुके हैं न।

अन्‍ना का मिशन इलेक्‍शन : नवभारत दैनिक 9 अगस्‍त 2012 में प्रकाशित


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राजनीति गन्‍ना है, गंडेरी नहीं, अन्‍ना जी गौर कीजिएगा कि गंडेरी सीधे दांतों में कुचलकर उसके रस का आनंद लिया जाता है। जबकि गन्‍ने के सख्‍त छिलके को पहले छीलना पड़ता है। गन्‍ने को यूं ही उठाकर डण्‍डे के माफिक भी मारा जा सकता है। इसमें खाने वाले को (चबाने वाले को नहीं) चोट लगेगी, मारने में गन्‍ना टूटने पर भी उपयोगिता कम नहीं होती। उसी तरह राजनीति में संभावनाएं सदा जिंदा रहती हैं।
आप चाहे पक्ष के पक्षी हों या विपक्ष के पशु, राजनीति की नीतियां सबका भला करती हैं। लाभ लेने का सबसे सरल तरीका भ्रष्‍टाचार, जिसे देश में रोजाना त्‍यौहार की तरह मनाया जाता है। नेताओं को ऐसे मौके तोहफे में प्रदान किए जाते हैं, जिससे वे घपले और घोटालों को अंजाम देते हैं।
अन्‍ना पहले भ्रष्‍टाचार के पीछे बिना भूख प्‍यास की चिंता किए दौड़े जा रहे थे, उन्‍हें घोड़े की तरह राजनीति के पीछे पेट भर के दौड़ने की चुनौती दी गई है। अन्‍ना को बोध हुआ कि जिसका खात्‍मा करना हो, उसे नज़दीक से जानना बहुत जरूरी होता है। रावण को जानने-मारने के लिए राम ने विभीषण का सहारा लिया।
अब देखना यह महत्‍वपूर्ण है कि अन्‍ना राजनीति में कौन से मीठे गुल खिलवाते हैं,लोकपाल को लागू करवाते हैं या पहले की तरह ही लोक को पागल बनना होगा। पागल बनकर पब्लिक जंतर मंतर पर इकट्ठा होना छोड़ देगी। अन्‍ना में राजनीति या राजनीति में अन्‍ना – यह तराना बहुतों को लुभा रहा है।  मलाई-राबड़ी चाटने के सपने दिखलाई दे रहे हैं।
अन्‍ना पर फूंका गया मंतर मिशन इलेक्‍शन है। इस मंतर के प्रभाव से कई मंत्री बनेंगे, कितने ही संतरियों के दिन फिरेंगे। गन्‍ने के मजबूत छिलके छीलने के बाद ही, संतरों के मुलायम छिलकों को छीलने के अवसर मिलते हैं। बादाम के दाम यूं ही नहीं बढ़ते हैं। छिलके वाले साबुत बादाम के दाम सबसे कम, छिलके रहित बादाम के दाम अधिक और बादामगिरी के दाम आसमान छूते हैं। राजनीति बादामगिरी है। मालूम नहीं क्‍यों फिल्‍म 'रोटी' का यह लोकप्रिय गीत राजनीति में ऐसे गठबंधनों की पोल खोलता दिखाई देता है। गीत के बोल हैं - ‘ये जो पब्लिक है सब जानती है, भीतर क्‍या है बाहर क्‍या है, यह सब पहचानती है’। अगर पब्लिक सब जानती होती तो नेताओं की बादामगिरी की अहमियत पर सवाल न उठाती ? पाठकों, आप तो बादामगिरी के सफर को पहचान चुके हैं न। जो प्‍याजगिरी तक पहुंच रहा है क्‍योंकि इसके छिलके उतरते जा रहे हैं।

मंतर मिशन इलेक्‍शन : दैनिक जनवाणी स्‍तंभ 'तीखी नज़र' 7 अगस्‍त 2012 अंक में प्रकाशित


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अन्‍ना राजनीति में, राजनीति गन्‍ना है, गंडेरी नहीं, गौर कीजिएगा। गंडेरी सीधे दांतों में चबाकर उसके रस का आनंद लिया जा सकता है जबकि गन्‍ने के सख्‍त छिलके को पहले छीलना पड़ता है। इस छीलन-प्रक्रिया में दांत जख्‍मी हो सकते हैं। गन्‍ना कभी जख्‍मी नहीं हुआ करता। उसे तो यूं ही उठाकर डण्‍डे के माफिक भी मारा जा सकता है। इसमें खाने वाले को (गौर कीजिएगा चबाने वाले को नहीं) चोट लगेगी, मारने में गन्‍ना टूट सकता है लेकिन फिर भी उसकी उपयोगिता कम नहीं होती। गन्‍ने का रस निचोड़ कर वैसे मज़ा लिया जाता है, न निचोड़ पाएं तो उसे चलती मशीन में दबाकर पीसने की युक्ति कारगर रहती है। पूरा रस निकल जाता है। मीठे रस से भरपूर गन्‍ना बे-रस हो जाता है किंतु राजनीति कभी बरसती नहीं, नीरस भी नहीं होती, उसमें संभावनाएं सदा जिंदा रहती हैं।

आप चाहे पक्ष में हों या विपक्ष में, पशु हों या पक्षी, राजनीति की कुशल नीतियां सबका भला करती हैं। सबका भला करे भगवान, राजनीति भी सबका भला ही करती है। लाभ लेने वाला प्रवीण होना चाहिए। लाभ लेने का सबसे सरल तरीका भ्रष्‍टाचार, जिसे देश में रोजाना त्‍यौहार की तरह मनाया जाता है। सरकारी महकमों से जुड़े अधिकांश अधिकारी और कर्मचारी इसे मनाने का मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहते। इसके विपरीत नेताओं को ऐसे मौके तोहफे में प्रदान किए जाते हैं, जिससे वे घपले और घोटालों को अंजाम देते हैं। फंसने पर उन्‍हें बचने के गुर सिखलाए जाते हैं। इसमें जांच होती है। जांच का जांचना ही फंसावट से सुरक्षित बाहर निकाल मुक्ति प्रदान करता है।

अन्‍ना राजनीति में आ रहे हैं। पहले वे भ्रष्‍टाचार के पीछे बिना भूख प्‍यास की चिंता किए दौड़े जा रहे थे, अब उन्‍हें घोड़े की तरह राजनीति के पीछे पेट भर के दौड़ने की चुनौती दी गई है। अन्‍ना ने ना नहीं की और चुनौती स्‍वीकार कर ली। अन्‍ना को यह बोध हुआ है कि जिसका खात्‍मा करना हो, उसे नज़दीक से जानना बहुत जरूरी होता है। जैसे रावण को जानने-मारने के लिए राम ने विभीषण का सहारा लिया। राजनीति में सब एकदूसरे को सहारा देते हैं। चाहे पक्ष हो या विपक्ष हो। सियासत में लूटकार्य मिल कर ही संपन्‍न किए जाते हैं। जो तेरा है वह मेरा है, जो मेरा है वह तेरा है, जो तेरा है वह तेरा है, जो मेरा है वह मेरा है। इस तेरे मेरे की उलझन में कोई नहीं मरा है। इस तेरे मेरे ने ही सबको राम बना दिया है। सब जीवंत हो उठे हैं।

अन्‍ना गन्‍ना चूसेंगे तो पब्लिक क्‍या करेगी, पब्लिक उस गन्‍ने को छीलेगी। पब्लिक हर कार्य करने के लिए तैयार रहती है, वह नहीं विचार कर पाती कि इस कार्य से उसे नफा होगा या नुकसान। नेता उसे नफे की निराली दुनिया दिखाते रहते हैं। पब्लिक देखते हुए गन्‍ने के छिलके छीनने में जुटी रहती है। राजनीति के गन्‍ने ने अन्‍ना को मोह लियो है, अब वे भी गन्‍ने को छीलने में जुटने वाले हैं, चाहे घाव दांतों में ही हो जाएं। गन्‍ना सख्‍त है तो क्‍या हुआ, अन्‍ना भी तो भ्रष्‍टाचार को लेकर पूरे सख्‍त हैं। क्‍या हुआ जो अपनी टीम के सदस्‍यों को उस सख्‍ती का अहसास अन्‍ना ने नहीं कराया है। अब करायेंगे, जब राजनीति में आए हैं तो उस सख्‍ती को भी जरूर दिखलाएंगे। अब देखना यह महत्‍वपूर्ण है कि अन्‍ना राजनीति में कौन से मीठे गुल खिलवाते हैं, लोकपाल को लागू करवाते हैं या पहले की तरह ही लोक को पागल बनना होगा।

पब्लिक पागल हो जाए तो कई संकट अपने आप छू मंतर हो जाएंगे। पागल बनकर पब्लिक जंतर मंतर पर इकट्ठा होना छोड़ देगी। बवाल मचाना छोड़ देगी। पागलपन की धुन बहुत मस्‍त होती है। पब्लिक पागलपन की पूरी मस्‍ती में है। अन्‍ना में राजनीति या राजनीति में अन्‍ना – यह तराना बहुतों को लुभा रहा है।  मलाई-राबड़ी चाटने के सपने दिखलाई दे रहे हैं। रात-दिन सुनहरे होने वाले हैं। विशिष्‍ट व्‍यक्तियों का पर्यावरण यूं ही हरा नहीं होता, उसमें हरियाली लाने के प्रयत्‍न करने पड़ते हैं। जंतर पर भीड़ लगाकर मंतर बहुत जोर से फूंका जाता है।

अन्‍ना पर फूंका गया मंतर मिशन इलेक्‍शन है। इस मंतर के प्रभाव से कई मंत्री बनेंगे, कितने ही संतरियों के दिन फिरेंगे। आज गन्‍ने का रस निकाला जा रहा है। गन्‍ने के मजबूत छिलके छीलने के बाद ही, संतरों के मुलायम छिलकों को छीलने के अवसर मिलते हैं। आप छिलकों की उपयोगिता से परिचित हैं कि नहीं। बादाम के दाम यूं ही नहीं बढ़ते हैं। छिलके वाले साबुत बादाम के दाम सबसे कम, छिलके रहित बादाम के दाम अधिक और बादामगिरी के दाम आसमान छूते हैं। राजनीति भी बादामगिरी ही है। पर पब्लिक इसे अन्‍नागिरी और गन्‍नागिरी तक ही पहचानती है। मालूम नहीं क्‍यों फिल्‍म 'रोटी' का यह लोकप्रिय गीत राजनीति में ऐसे गठबंधनों की पोल खोलता दिखाई देता है।गीत के बोल हैं - ‘ये जो पब्लिक है सब जानती है, भीतर क्‍या है बाहर क्‍या है, यह सब पहचानती है’। अगर पब्लिक सब जानती-पहचानती होती तो अन्‍ना की गन्‍नागिरी के फेर में न उलझकर, नेताओं की बादामगिरी की अहमियत पर सवाल न उठाती ? पाठकों, आप तो बादामगिरी के सफर को पहचान चुके हैं न।

अपना फेस, नहीं बुक : फिर भी फेसबुक - मनमीत हिंदी मासिक के जुलाई 2012 अंक यानी फेसबुक विशेषांक में प्रकाशित


बेटा होने से पहले मर जाऊं : दैनिक जागरण 3 अगस्‍त 2012 संपादकीय पेज पर प्रकाशित



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हमारी फिल्‍मों ने बाप नामक जीव का इत्‍ता नुकसान किया है कि बेटे बाप की फिल्‍मी मरम्‍मत करते रहे हैं। फिल्‍में समाज का दर्पण है, फिल्‍मों में जो घट रहा था, वह अब सचमुच में प्‍लस होने वाला है। बाप सावधान हो जाएं, सिर्फ बाप ही नहीं पिताश्री, डैडी, पिताजी, डैड, बापू, अप्‍पा, अब्‍बा  जैसे अन्‍य संबोधनधारक भी स्‍वयं को सेफ न समझें।  बेटे के कारनामों का डायरेक्‍ट इफेक्‍ट जल्‍दी ही बाप के गाल पर दिखाई दिया करेगा।
मसला अभी पूरी तरह मसला नहीं गया है लेकिन ‘बेटा करे करतूत और बाप खाए शहतूत’ के रसीले जमाने अब लदने वाले हैं। लदने से आप ओलंपिक खेलों में पदक लाने के लिए लंदन जाने का आशय मत लगा लीजिएगा। जनता कम सुनती है और मंत्रियों की बातों पर अमल नहीं करती। जबकि कही बात से मुकर जाना – मंत्रियों का सुर्खी पाने का मंत्र है। जिसमें मुख्‍य भूमिका वही जीभ यंत्र बनकर निबाहती है, जो दिन भर आपके मुंह में लार में नहाती है। कभी मीठी हो जाती है तो मीठे मंत्र दे जाती है और नमकीन या खट्टे, कसैले से नहाने पर कड़वे बीज मंत्र देती है।
छत्‍तीसी के गढ़ में सेंध लगाने वाले मन-मंत्री रमन के बत्‍तीसी ओपन करने पर बाप घबरा गए हैं और बेटे अपराध करने के मूड में आ गए हैं। मानो, अपने सगे बाप से पुरानी दुश्‍मनी का बदला ले रहे हों। यह भी माना जा सकता है कि मंत्री खुद कोई करतूत करने वाले हों और ……….. ।  खैर, मामला बहुत भयानक होने वाला है, कल कोई ‘दीदी’, बनकर ‘दादा’ एक बीज मंत्र जमाने को दे सकती है कि ‘गलती करे बेटी तो पिटे माता’। राजनीति के स्‍पेशल इफेक्‍ट के आईने में भविष्‍य की कल्‍पना करता हूं तो सिहर जाता हूं कि ‘बेटे-बेटियों’ की करतूतें क्‍या गुल खिलाने वाली हैं, इश्‍क करते पकड़े जाएंगे ‘बेटे-बेटियां’ और भुगतेंगे ‘मम्‍मा-बापू’।
तकनीक सदा जमाने को फायदा ही पहुंचाती है, इसे समझ लेंगे तो जरूर जान जाएंगे कि मंत्री क्‍यों रोने-रुलाने वाले बयान देते हैं। इस बयान की कोई कितनी भी थुक्‍का-फजीहत और घनघोर निंदा कर रहा है जबकि अपने देश का जनसंख्‍या विभाग बहुत खुश है। ‘अब्‍बा-अम्‍मा’ की इस संभावित पिटाई के कारण जनसंख्‍या विभाग अपनी नीतियों के प्रचार-प्रसार  पर किए जा रहे बजट को सरेंडर करते हुए वित्‍त विभाग को कह सकता है कि जनसंख्‍या रोकने की मद में बजट रुपी करवट अपनी ओर करने की न तो जरूरत है और न ही बेहिसाब धन बर्बाद करने की।
पड़ोस के बेटे-बेटियों के मोहब्‍बत संबंधी मामलों का खामियाजा, जब ‘माता-पिता’ पिटकर करेंगे तब इस सद्गति को देखकर भला कौन बेटे-बेटियों की चाह करेगा, इससे तो बे-औलाद मरना पसंद करेगा। मर जाएगा लेकिन उस जुर्म के लिए पिटने से जरूर बचना चाहेगा, जो उसने किया ही नहीं है। फिल्‍मों में पिट-पिट कर कोई मर रहा हो तो ‘लाईक’ किया जाता है जबकि सचमुच में पिटने से हर कोई खौफ खाता है। मतलब बाप बनना हो रहा है अभिशाप जैसा श्राप को देने की जरूरत नहीं है। सब ‘बाप’ बनकर रोमांचित होते रहे हैं लेकिन अब बचकर उनकी खुशी का कोई पारावार नहीं रहेगा। एक बेटा हो जाए तो तर जाऊं, की चाह रखने वाले कहेंगे कि बेटा होने से पहले मर जाऊं।

पब्लिक उम्‍मीद से है : डीएलए 2 अगस्‍त 2012 में प्रकाशित



पीएम मौन हैं। बाकी सब चिल्‍ला रहे हैं। जब सब चिल्‍ला रहे हों तो एक का तो मौन रहना बनता है। जब कोई किसी की नहीं सुन रहा है और जो चिल्‍ल-पों मच रही है, उसकी चमक निहारने वाला भी कोई महत्‍वूर्ण शख्‍स होना चाहिए। वह पीएम के सिवाय और कौन हो सकता है। महामहिम शपथ लेने वाले हैं। पर अभी से यह कहना कि वे बहुत बातूनी है, उनकी प्रवृत्ति के साथ अन्‍याय होगा। हो सकता है कि वे पहले बातूनी रहे हों परंतु राष्‍ट्रपति पद संभालने के साथ ही उनकी बोलती बंद हो जाए। वे भी सबकी चिल्‍ल-पों सिर्फ सुनें ही, खुद चिल्‍लाने का जोखिम न लें। जोखिम मोल लेना इसलिए नहीं कहा जा सकता है क्‍योंकि वे महामहिम हैं इसलिए उन्‍हें मोल लेने की कोनो जरूरत नाही।
जैसे एक लंबे जमाने से चुप्‍पी साधे पीएम ने अपना मौन तोड़ दिया है और उन्‍होंने महंगाई के लिए मानसून को जिम्‍मेदार ठहरा दिया है। इस बात में आश्‍चर्य की बात यह है कि इस देश में जांच होती है और जांच ही होती रहती है। उसके परिणाम नहीं आते। फिर बिना जांच के मानसून को जिम्‍मेदार ठहराना चल रही नीतियों के अनुसार न्‍यायसंगत नहीं लगता। यह भी हो सकता है कि पब्लिक की चीख-पुकार सुनने के बाद पीएम की बोलती खुल गई हो और वे मानसून को इस कदर डांट बैठे हैं। जबकि आम जिंदगी में पब्लिक को जिससे काम हो उससे पंगा लेना उचित नहीं है। न जाने वह कितना बिफर जाए कि समेटने में न आए और न मनाने से माने ही। वह पीएम की डांट को भी अमान्‍य कर सकता है।
मानसून यह भी सोच सकता है कि जिस पीएम को कभी बोलते न सुना, वह कैसे उसे डांट सकते हैं और उनकी डांट पर इस गलतफहमी के कारण तवज्‍जो ही न दी जाए। बादलों के पास पानी से भरे हुए मटके तैयार हों किंतु इन्‍द्रदेव ‘एक्‍शन’ न कहें और उन मटकों का जल सूर्य के भीषण ताप के कारण भाप बनकर ऐसा उड़े कि पृथ्‍वी पर न आए और पूरा ऊपर के ऊपर ही जल जाए। अब यह जल अगर पानी वाला होता तो खूब बरसता। बरसता नहीं तो रिसता। पर जमीन पर तो एक बूंद तक नहीं टपकी। अगर टपक जाती तो पीएम सोचते कि उनकी डांट के कारण वह टसुए बहा रहा है।
इन्‍द्रदेव अब न मान रहा है और न सुन रहा है। ऐसा लगता है कि वह अब खुद को पीएम समझने लग गया है। पब्लिक सूखे से सूखती रहे लेकिन उसकी आंखों में तनिक सा पानी न दिखाई दे। कहना ही होगा कि जो न माने और न सुने, वही है मानसून। कितनी ही गुहार लगाई जा रही है पर इन्‍द्रदेव न मान रहा है और न सुन रहा है। यह भी हो सकता है कि वह यह सोच रहा हो कि अगर मैं बरसूंगा तब भी पब्लिक सड़कों पर पानी भरने, गड्ढों के गायब होने, नाले और नालियों में पानी ठहरने से वाहनों के नीचे के आधे हिस्‍से के न दिखाई देने के कारण दुखी होगी, इसलिए उसे तरस आ गया हो। अब इस तरस का रस पब्लिक को तो पसंद नहीं है। पीएम ने मानसून की डांट लगाकर बतला दिया है कि उन्‍हें भी यह रस पसंद नहीं है। जब सबको मिलावट ही पसंद है इसलिए मानसून पीएम की डांट रूपी सलाह पर विचार कर रहा है और अब बरसने ही वाला है।
इस बरसात में जो मतवाला होना चाहता है, वह मतवाला हो ले। महंगी सब्‍जी बेचने का मौका पाने वाले भी मना रहे हैं कि बारिश दो चार दिन और न हो तो वे भी अपनी पॉकेटों को माल से फुल कर लें, यह माल चाहे लूट का ही है पर इसे कोई लूट का इसलिए नहीं मानता क्‍योंकि बरसात के न होने वाले बदअसर को हर कोई है स्‍वीकारता। वैसे पब्लिक खुश है कि पीएम ने न बोलने के रिकार्ड को तोड़ा है तो अवश्‍य ही अब वे और कुछ भी बोलेंगे और अब लग रहा है कि पब्लिक ‘उम्‍मीद’ से है।

आपका प्‍यार इस बरसात में परवान चढ़ा कि नहीं : नई दुनिया 2 अगस्‍त 2012 'अधबीच' स्‍तंभ में प्रकाशित




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छतरी और छाता, एक ही है भाता। पुरुषों को भी बरसात में छतरी ही भाती है। गर्व से कहते हैं मेरे सिर छतरी है, छतरी में कन्‍या वाला भाव समाया है। जिसके साथ है, उसकी महफूजियत बनी रहती है। छाता आकार में बढ़ा होता है और सुरक्षा घनी देता है। धूप हो या बरसात, सबसे बचाता है। काम छतरी का भी यही परंतु छतरी पर पुरुष निगाहें इस कदर टहलती हैं, मानो रूपसी का दीदार कर रही हों। फोल्डिंग (अदाओं) में मिलती हैं, मनमोहक रंगों में फबती हैं छतरियां। धरा पर रंगीन छतरियों के दीदार कर इन्‍द्रदेव बरसते हैं। मुंबई में छतरियां सदैव तनी रहती हैं, सो इन्‍द्रदेव मेहरबान रहते हैं  और बाढ़ आती है।

छतरी की डंडी मजबूती से थामना कला से कम नहीं। अनेक बार डंडी हाथ में रह जाती है। ‘छतरी जो उड़ गई तो ...’ अब उड़ गई तो दूसरी खरीद लायेंगे, उड़ने वाली छतरी को पकड़ने के लिए उड़नतश्‍तरी तो नहीं बन पायेंगे। बन सकते तो बरसात होने पर बादलों के ऊपर ही मंडराते और इन्‍द्रदेव को खिजाते। जिसे पानी की बरसात धरा पर करना आता है लेकिन बादलों के ऊपर बरसने का गुर ...। इंसान जानता है कि थूकने पर वापिस मुंह पर ही गिरता है, इसलिए इन्‍द्रदेव भी कभी कोशिश नहीं करता।

गॉड पार्टिकल पहले मिल गया होता तो इन्‍द्रदेव दिव्‍यकण से बरसात के पानी को भारविहीन कर लेता,फिर बादलों के ऊपर बरसात होती लेकिन दिखाई सिर्फ हवाई यात्राओं के दौरान ही दिया करती। इससे समस्‍या हो जाती इन्‍द्रदेव कभी कण को बरसात के पानी के साथ चिपकाते और जब बादल पानी लेने समुद्रों में जाते तो कण को रिमूव करते, वरना बादल ऊंचे उड़ जाते और कण छोड़कर इन्‍द्रदेव उन्‍हें पकड़ने के लिए ऊधम मचाते।

छाता बुजुर्गों को ही है भाता। सेक्‍सी कन्‍याएं छतरी इसलिए नहीं लेतीं, कहीं हवा चले और छतरी उड़ जाए। रेनकोट भी नहीं पहनतीं हैं, फिर बरसात में भीगती हैं और पुरुष नैन आनंदित होते हैं। छतरी और छाता जिनके पास नहीं होता है, न होता है रेनकोट और वे मोटरसाईकिल पर सफर करते हैं और फ्लाई ओवरों, बस स्‍टैंडों के नीचे, जरा सी भी ओट में मजमा लगाकर यूं खड़े हो जाते हैं। मानो बरसात रूपी पूजा के बाद प्रसाद बंटने वाला हो जिसका भोग लगाना सबके लिए अनिवार्य हो।
एक अस्‍थाई छत जिसके उपयोग से कई बार दुर्गत बनती है। तेज हवाओं में छतरी हाथों से छूटकर उड़ने को मचलती हैं। खींचतान में छतरी उलट जाती हैं, छाता पलट जाता है, डंडी को छोड़ने पर ही चैन आता है। जो मजनूं मोटरसाईकिलों पर छतरियां लेकर चलते हैं, उनका प्‍यार कच्‍चा होता है, नोट कर लीजिए जितने भी सच्‍चे और पक्‍के प्‍यार होते हैं, वे सब बरसात में भीगकर ही परवान चढ़ते हैं। आपका प्‍यार इस बरसात में परवान चढ़ा कि नहीं ?