मौसम पीएम पीएम हो रहा है : जनसंदेश टाइम्‍स 18 दिसम्‍बर 2012 के उलटबांसी स्‍तंभ में प्रकाशित



मौसम पीएम पीएम हो रहा है। इतना धांसू कि जो मौन पीएम हैंलगता है कि इस सुगबुगाहट भरी चिंगारी से उनकी भी बोलती खुल जाएगी। जब तक किसी को खतरा नहीं महसूस होता वह चुप रहने में ही भलाई समझते और मलाई गटकते हैंकई बार ओठों पर चुपड़ भी लेते हैं। खतरा सिर पर हो तो बड़ों बड़ों के मुंह खुल जाते हैं और जोरों की चिल्‍लाहट और चीख पुकार मच जाती है। कोई राम नाम की गुहार लगाता हैकोई देशभक्ति के तराने गाता हैकोई जोर जोर से बाजे बजाता है।
वैसे यह पुकार काफी दिनों से मच रही थी, पर  चूँकि  लाउडस्‍पीकर (ध्‍वनि विस्‍तारक यंत्र) नहीं लगाया गया था,इसलिए चीख को विस्‍तार नहीं मिल रहा था। अब जब चीख को विस्‍तार मिला है तो वह बिस्‍तर से उठ खड़ी हुई है। अपने खड़े होने के चक्‍कर में उसने कितनों को बिस्‍तर पर गिरा और लिटा दिया है। जो गिरे या लेटे हैं, सोच रहे हैं कि वे आसमान में उड़ रहे हैं। कहीं मोदी मोदी की आवाज आ रही हैमानो अभी पीएम गोदी में कुर्सी के मुगालते में बैठ ही जाएंगे। कहीं मुलायम मुलायम की घटाएं छा रही हैंजैसे माखन का उत्‍पादन वहीं से होता है। कहने वाले तो राहुल राहुल भी कह रहे हैं पर सच्‍चाई यह है कि अभी पीएम की सीट वेकेंट नहीं है और न ही वीकेंड पर वेकेंट होने वाली है। फिर भी न जाने क्‍यूं अभी से इतना शोर वातावरण को प्रदूषित कर रहा हैसुषमा भी निराली और अगाड़ी हो गई है। यूं तो कोई भी सीट खाली हो तो देश में सीट की तरफ लपकने - झपटने वालों की भीड़ इकट्ठी हो जाती है। एक चपरासी की खाली कुर्सी भी कयामत ढा देती है। बाबू चाहे सरकार में हो या बैंक में – सब बेरोजगार उसी तरफ दौड़ लगाना शुरू कर देते हैंइस दौड़ने को ही तो कंपीटीशन कहते हैं। जाहिर है कि सब बाबू बेकाबू हुए जा रहे हैं। तराजू का प्रयोग बंद कर दिया गया हैसोअपना वजन सबको अधिक लग रहा है। सबसे भारी हैं वेसब उनके ही आभारी होंगे।
जमाना बाजार का भी है और ब्‍लैकमेलिंग का भीजान पहचान का भी और खुराफात का भी। माहौल इतना गरम है कि कड़ाके की सर्दी में भी तपता तवा हो रहा है जो भाप बनाकर उड़ा देता है और जो उड़ता हैवह उड़ जाता है। बहरहालपीएम पद का ताप सबको अपनी अपनी ओर खींच रहा है। सब दोनों हाथों से उलीचे जा रहे हैं लेकिन इसे खाली करने में भी सतह तक भरने का भाव भरा हुआ है। इसे कहते हैं कि खाली करो तब भी हवा तो भर ही जाती है। नतीजतनजितने भी पीएम पद के दावेदार हैंवे सब अपने भीतर हवा भरे हुए हैं और ख्‍यालों ख्‍वाबों में विचर रहे हैं पर आप क्‍यों इन्‍हें देख विलोक सुन कर कुढ़ रहे हैं कहो कैसी रही ?

गधे घोड़े उल्‍लू की मूर्खीय व्‍यथा : मिलाप हिंदी 18 दिसम्‍बर 2012 अंक में प्रकाशित


नब्‍बे फीसदी भारतीय बेवकूफ हैंन्‍यायमूर्ति काटजू के इस कथन का सकारात्‍मक पक्ष भीहै कि बेवकूफ बहुमत में हैं। लोकतंत्र ही बहुमत, बहुमत ही लोकतंत्र है, इसके मुकाबले न ठहरा कोई तंत्र है। मतलब लोकतंत्र में बहुमत की तूती बोलती है और पुंगी बजती है। सोचिए भला, सिर्फ दस प्रतिशत बु‍द्धिमान क्‍या घास छील लेंगे, कोशिश करेंगे भी तो थक जाएंगे। उनने माहिर चिकित्‍सक की भांति कहा है कि इनके दिमाग में भेजा नहीं होता। इससे यह भी लगता है कि वे बेवकूफों के सिर में भेजा ढूंढ रहे होंगे। बेवकूफों के सिर में भेजा ढूंढना वैसा ही है, जैसा गाजर के हलुवे में तरबूज की तलाश। पहले से नियत यह आम धारणा बिल्‍कुल बेबुनियाद है कि जिस के पास जो चीज नहीं होतीवह जमाने भर में दीवानों की तरह उस चीज की बहुत शिद्दत से खोज करता है। उन्‍हें इतने भर से तसल्‍ली नहीं हुई और उसके बाद नब्‍बे फीसदी बहुमत वालों को पागल कह दिए। उनके दिमाग को भूसामय बतला दिया। मतलब यह है कि वे खुद ही निश्चित नहीं हैं कि भारतीय बेवकूफ हैं, पागल हैं या उनका दिमाग भूसे का भंडार है। मूर्ख लोगों को आसानी से बहकाया जा सकता हैकहकर उन्‍होंने शराब पीकर बहकने वाली प्रक्रिया को अनजाने ही संदिग्‍धतता के तौर पर सर्टीफाइड कर दिया।
नाक की सीध में मूर्ख ही चलते हैं। जबकि पगडंडी भी सीधी नहीं हुआ करती हैं। उन्‍हें सीधा करने के प्रयत्‍न इसी प्रकार किए जाते हैं जिस प्रकार यह बयान दिया गया है। अब पता नहीं पगडंडी सीधी होगी या इसे सीधे करने वाले सीधे होने को मजबूर हो जाएंगे। भेड़ और भीड़ एक दूसरे का अनुसरण करती हैं। यही मूर्खों की ताकत है, गधा मूर्खता का पर्याय है तो क्‍या घोड़ा विपरीत अर्थ देता है। गधा घोड़ा सब मूर्खता के दायरे में ही आते हैं। एक लगाम से काबू आता है और दूसरा बिना लगाम के भी बेलगाम नहीं हो पाता। बेलगाम लेकिन काबू में आने वाले गधे दिमाग से पैदल होते हैं और लगाम से काबू में लाए जाने वाले घोड़े बुद्धि से पैदल नहीं होते, वे किसी भी तरह के मैदान में तेजी से दौड़ने में निष्‍णात होते हैं। दौड़ने में अपनी मर्जी उनकी भी नहीं दौड़ा करती। गर वे अपनी मर्जी से दौड़ते पाए जाते तो झांसी की रानी लक्ष्‍मीबाई का यूं नाम न होता, चेतक का नाम लगाम के दुरुस्‍त इस्‍तेमाल से चर्चा में आया। इस पर कविताएं लिखी गईं, क्‍या यह सौभाग्‍य बेलगाम घोडों या लगामधारी गधों के हिस्‍से आता।  
चाहे बुद्धिमान गधे हों या घोड़े वे नुक्‍कड़ पर अवश्‍य मुड़ जाते हैं और नुक्‍कड़ से जुड़ने की कला में दक्ष होते हैं। अगर यह कहा गया होता कि नब्‍बे प्रतिशत बुद्धिमान हैं तो चर्चा ही नहीं होती। कोई हंगामा नहीं मचता। कोई पहाड़ नहीं उछालता। अब उछाला गया वह पहाड़ टुकड़ों में बंटकर दस प्रतिशत बुद्धिमानों के सिरों पर गिर रहा है जबकि सब जानते हैं कि उन्‍होंने अपनी बुद्धिमत्‍ता के हेलमेट धारण कर  रखे हैं। वैसे यह गिरना सचमुच का गिरना नहीं है फिर भी क्‍योंकि आजकल आभासी संसार की शक्ति वास्‍तविकता दुनिया से अधिक मजबूत है इसलिए सिर्फ मूर्ख और नब्‍बे प्रतिशत ने कोहराम मचा ही दिया। कवि दुष्‍यंत कह गए हैं कि एक पत्‍थर तो तबीयत से उछालो यारो, पर कहने वाले अब इसे बदनियति से पहाड़ उछालना बतला रहे हैं। कई लोग तबीयत से पहाड़ उछालते हैं परंतु दुर्भाग्‍य देखिए कि उनके उछालने का न तो दस प्रतिशत और न नब्‍बे प्रतिशत ही नोटिस लेते हैं, पहाड़ भी बे‍-नोटिस खड़े रहते हैं।
बवाल मचाने के लिए भी बयान देना एक कला है जिसमें अल्‍पमतों द्वारा बहुमतधारकों को गरियाया जाता है, इस कला में सब पारंगत नहीं होते। इन मामलों में कई लोगों की कला पिलपिली होती है। पारंगत न होने के कारण बयानबाजी के समूचे रंगों का प्रभाव फि़ज़ा में नहीं गमकता और न बरसता है।
गधे घोड़े की चर्चा करके लगता है, मैंने उल्‍लू से दुश्‍मनी कर ली है। मूर्खता में उल्‍लू की कोई मिसाल नहीं है। भला जो दिन में सोए और रात को जागे, उसे यूं ही तो उल्‍लू नहीं कहा जाता है। जिन बच्‍चों के बाप का सम्‍मान करना हो उन्‍हें उल्‍लू का पट्ठा कह कर बेधड़क चने के झाड़ पर प्रतिष्‍ठापित कर दिया जाता है। गधे घोड़े उल्‍लू की यह मूर्खीय व्‍यथा, कहो कैसी रही ?

गाजर के हलवे में तरबूज की खोज : दैनिक जनवाणी स्‍तंभ 'तीखी नजर' 18 दिसम्‍बर 2012 अंक में प्रकाशित


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नब्‍बे फीसदी भारतीय बेवकूफ हैंन्‍यायमूर्ति काटजू के इस कथन का सकारात्‍मक पक्ष भीहै कि बेवकूफ बहुमत में हैं। लोकतंत्र ही बहुमत, बहुमत ही लोकतंत्र है, इसके मुकाबले न ठहरा कोई तंत्र है। मतलब लोकतंत्र में बहुमत की तूती बोलती है और पुंगी बजती है। सोचिए भला, सिर्फ दस प्रतिशत बु‍द्धिमान क्‍या घास छील लेंगे, कोशिश करेंगे भी तो थक जाएंगे। उनने माहिर चिकित्‍सक की भांति कहा है कि इनके दिमाग में भेजा नहीं होता। इससे यह भी लगता है कि वे बेवकूफों के सिर में भेजा ढूंढ रहे होंगे। बेवकूफों के सिर में भेजा ढूंढना वैसा ही है, जैसा गाजर के हलुवे में तरबूज की तलाश। पहले से नियत यह आम धारणा बिल्‍कुल बेबुनियाद है कि जिस के पास जो चीज नहीं होतीवह जमाने भर में दीवानों की तरह उस चीज की बहुत शिद्दत से खोज करता है। उन्‍हें इतने भर से तसल्‍ली नहीं हुई और उसके बाद नब्‍बे फीसदी बहुमत वालों को पागल कह दिए। उनके दिमाग को भूसामय बतला दिया। मतलब यह है कि वे खुद ही निश्चित नहीं हैं कि भारतीय बेवकूफ हैं, पागल हैं या उनका दिमाग भूसे का भंडार है। मूर्ख लोगों को आसानी से बहकाया जा सकता हैकहकर उन्‍होंने शराब पीकर बहकने वाली प्रक्रिया को अनजाने ही संदिग्‍धतता के तौर पर सर्टीफाइड कर दिया।
नाक की सीध में मूर्ख ही चलते हैं। जबकि पगडंडी भी सीधी नहीं हुआ करती हैं। उन्‍हें सीधा करने के प्रयत्‍न इसी प्रकार किए जाते हैं जिस प्रकार यह बयान दिया गया है। अब पता नहीं पगडंडी सीधी होगी या इसे सीधे करने वाले सीधे होने को मजबूर हो जाएंगे। भेड़ और भीड़ एक दूसरे का अनुसरण करती हैं। यही मूर्खों की ताकत है, गधा मूर्खता का पर्याय है तो क्‍या घोड़ा विपरीत अर्थ देता है। गधा घोड़ा सब मूर्खता के दायरे में ही आते हैं। एक लगाम से काबू आता है और दूसरा बिना लगाम के भी बेलगाम नहीं हो पाता। बेलगाम लेकिन काबू में आने वाले गधे दिमाग से पैदल होते हैं और लगाम से काबू में लाए जाने वाले घोड़े बुद्धि से पैदल नहीं होते, वे किसी भी तरह के मैदान में तेजी से दौड़ने में निष्‍णात होते हैं। दौड़ने में अपनी मर्जी उनकी भी नहीं दौड़ा करती। गर वे अपनी मर्जी से दौड़ते पाए जाते तो झांसी की रानी लक्ष्‍मीबाई का यूं नाम न होता, चेतक का नाम लगाम के दुरुस्‍त इस्‍तेमाल से चर्चा में आया। इस पर कविताएं लिखी गईं, क्‍या यह सौभाग्‍य बेलगाम घोडों या लगामधारी गधों के हिस्‍से आता।  
चाहे बुद्धिमान गधे हों या घोड़े वे नुक्‍कड़ पर अवश्‍य मुड़ जाते हैं और नुक्‍कड़ से जुड़ने की कला में दक्ष होते हैं। अगर यह कहा गया होता कि नब्‍बे प्रतिशत बुद्धिमान हैं तो चर्चा ही नहीं होती। कोई हंगामा नहीं मचता। कोई पहाड़ नहीं उछालता। अब उछाला गया वह पहाड़ टुकड़ों में बंटकर दस प्रतिशत बुद्धिमानों के सिरों पर गिर रहा है जबकि सब जानते हैं कि उन्‍होंने अपनी बुद्धिमत्‍ता के हेलमेट धारण कर  रखे हैं। वैसे यह गिरना सचमुच का गिरना नहीं है फिर भी क्‍योंकि आजकल आभासी संसार की शक्ति वास्‍तविकता दुनिया से अधिक मजबूत है इसलिए सिर्फ मूर्ख और नब्‍बे प्रतिशत ने कोहराम मचा ही दिया। कवि दुष्‍यंत कह गए हैं कि एक पत्‍थर तो तबीयत से उछालो यारो, पर कहने वाले अब इसे बदनियति से पहाड़ उछालना बतला रहे हैं। कई लोग तबीयत से पहाड़ उछालते हैं परंतु दुर्भाग्‍य देखिए कि उनके उछालने का न तो दस प्रतिशत और न नब्‍बे प्रतिशत ही नोटिस लेते हैं, पहाड़ भी बे‍-नोटिस खड़े रहते हैं।
बवाल मचाने के लिए भी बयान देना एक कला है जिसमें अल्‍पमतों द्वारा बहुमतधारकों को गरियाया जाता है, इस कला में सब पारंगत नहीं होते। इन मामलों में कई लोगों की कला पिलपिली होती है। पारंगत न होने के कारण बयानबाजी के समूचे रंगों का प्रभाव फि़ज़ा में नहीं गमकता और न बरसता है।
गधे घोड़े की चर्चा करके लगता है, मैंने उल्‍लू से दुश्‍मनी कर ली है। मूर्खता में उल्‍लू की कोई मिसाल नहीं है। भला जो दिन में सोए और रात को जागे, उसे यूं ही तो उल्‍लू नहीं कहा जाता है। जिन बच्‍चों के बाप का सम्‍मान करना हो उन्‍हें उल्‍लू का पट्ठा कह कर बेधड़क चने के झाड़ पर प्रतिष्‍ठापित कर दिया जाता है। गधे घोड़े उल्‍लू की यह मूर्खीय व्‍यथा, कहो कैसी रही ?

फेसबुकिया ‘जन्‍मदिन’ से मुन्‍नाभाई की लिखचीत (चैटिंग)

जन्‍मदिन’ मेरा ऑनलाईन था जबकि मैं स्‍वयं सदा की तरह ऑफलाईन। लेकिन वो जन्‍मदिन’ ही क्‍या जो तलाश’ न सके। मैं फेसबुक’ पर मौजूद था किंतु प्रत्यक्ष नहीं परोक्ष रूप में। एकाएक मेरे संदेश बॉक्‍स में किसी की उपस्थिति दर्ज हुई। जन्‍मदिन है,चाहे समय रात के बारह बजे का ही था। मेरे जन्‍मदिन ने मुझे शुभकामनाएं दी थीमैंने तुरंत संदेश के प्रत्‍युत्‍तर में धन्‍यवाद’ लिखकर भेजा। अब उधर से संदेश आया हा हा हा lol’ 

मैं : इस हंसने का कारण ?

जन्‍मदिन : जिंदगी से प्‍यार करने वाले इंसान तेरी जिंदगी का प्रत्‍येक पल लगातार कम हो रहा है और तू शुभकामनाओं को शुभ की तरह ले रहा है। चल मरने के लिए तैयार हो जा।

मैं : मतलबजन्‍मदिन है, आज शुभकामनाओं पर तो अधिकार है मेरा, 364 दिन की तपस्‍या के बाद शुभकामनाएं लिए यह दिन आता है इसलिए इसे खुशी की तरह ही लूंगासब लेते हैं। वैसे भी इसमें दुखी होने की कौन सी बात है, आज फेसबुक के कारण हजारों की संख्‍या में शुभकामनाएं मिल जाती हैं, लाखों में न सही और तुम मेरे मरने की कामनाएं कर रहे हो।

जन्‍मदिन : क्‍या यह सच्‍ची शुभकामनाएं हैं, जिंदगी का साल रीत रहा है, सब कुछ पल पल बीत रहा है, तुझे लग रहा है तू जग को जीत रहा है।

मैं : सच्‍ची ही हैं और क्‍या, यही तो जीवन का गीत है, इन्‍हीं शुभकामनाओं से तो मानव करता प्रीत है।

जन्‍मदिन : सच्‍ची नहीं हैंसच्‍चाई तो कड़वी है और वह यह कि आज तेरी जिंदगी से एक बरस और कम हो गया है। तू मौत के और पास पहुंच गया है। वैसे एक बात बतला कि तू जिंदा रहना चाहता है या मरना ?

मैं : मरना तो कोई नहीं चाहता हैएक चींटी या मच्‍छर को भी अपने प्राणों से मोह होता हैसो मुझे भी है।

जन्मदिन : फिर जन्‍मदिन से खुश क्‍यों हो रहा हैअधेड़ प्राणी ( मेरे 54 बरस का होने पर मुझ पर तंज कसा गया था)

मैं : (सोचने लगा, बात तो सोलह फीसदी सही है। सब जीना चाहते हैं फिर मौत के पास जाते हुए भी अनजाने में इतना खुश हो रहे हैं)

जन्‍मदिन : क्‍या हुआक्‍या सोचने लगा ?

मैं : (मरी हुई आवाज मेंमेरे शब्‍द गले में अटक रहे थेऊंगलियां कीबोर्ड पर चलने में विद्रोह करने के मूड में आ गई थींयह भी कह सकते हैं कि वह भी डर गई थीं क्‍योंकि मेरा मरना मेरी देह के प्रत्‍येक अंग-प्रत्‍यंग का मरना यानी निष्‍प्राण होना था। मेरी ऊंगलियों के हाथ-पांव फूल गए थे। मेरी दशा ऐसी हो गई कि काटो तो खून न निकलेदिसम्‍बर की कड़ाके की सर्दी में भी मैं पसीना-पसीना हो गया था। मेरी ऊंगलियों के माथे पर भी पसीने की बूंदे उभर आई थीं। मैं कुछ नहीं लिख पाया)

जन्‍मदिन : खिलखिला रहा था क्‍यों डर गया ?

मैं : (सचमुच डर गया थामुझे स्‍वीकारना ही पड़ा) यस।

जन्‍मदिन : जब यह सनातन सच्‍चाई है तो फिर इंसान क्‍यों नोटों के लालच में दीवाना हुआ जा रहा है। हर तरह से नोट जमा कर रहा है। अपनी मौत की ओर बढ़ती गति को खुश होकर जी रहा है।

मैं : लेकिन यह इंसान के हाथ में तो नहीं है ?

जन्‍मदिन : फिर जन्‍मदिन न मनाना तो इंसान के हाथ में ही है। इसे मनाना तो तू छोड़ दे।

मैं : लेकिन मेरे अकेले के छोड़ने से क्‍या होगा ?

जन्‍मदिन : समाज में जितनी भी क्रांतियां आई हैं या आती हैंवे सिर्फ एक अकेले की सोच और संघर्ष का प्रतिफल होती हैं। तू शुरूआत तो कर।

मैं : मुझे कौन जानता है और कोई मेरी बातों को क्‍यों मानेगामैं कोई बहुत बड़ा नेता नहीं हूंसत्‍ता में किसी शीर्ष पद पर विद्यमान नहीं हूं। मंत्री नहीं हूंराष्‍ट्रपति नहीं हूंसेलीब्रिटी नहीं हूंकोई बहुत बड़ा साहित्‍यकार नहीं हूंहांएक छोटा सा कवि, अदना सा व्‍यंग्‍य लेखक और कमजोर  हिंदी का मजबूत ब्‍लॉगर  जरूर हूं और जितना लिख लेता हूं उसमें से 15 या 20 परसेंट छप जाता है। मैं बाल ठाकरे नहीं हूंपोंटी चड्ढा नहीं हूं और तो और किसी मंत्री का निजी सचिव भी नहीं हूं। मैं असीम त्रिवेदी भी नहीं हूं और उन दो कन्‍याओं में से भी नहीं हूं जिन्‍हें फेसबुक पर टिप्‍पणी करने और लाइक करने के आरोप में हिरासत में ले लिया गया था। आखिर मेरी हैसियत है क्‍या ?

जन्‍मदिन : इनमें से कोई न सहीकिंतु एक आम आदमी तो है ही तू।

मैं : आम आदमी’ पर भी अब केजरीवाल का पेटेंट हो चुका है। क्‍या बचा हूं मैंसिर्फ एक वोटरजिसके बैंक खाते में अब सरकार सीधे सब्सिडी का पैसा डालेगी और वोट हथिया लेगी। जबकि मैं यह सच भी जानता हूं कि मेरा कोई बैंक खाता नहीं है और अब तो आसानी से खुलने वाला भी नहीं है। (मेरी बातों के जाल में जन्‍मदिन’ पूरी तरह उलझ गया था। मेरे संदेश बॉक्‍स में जन्‍मदिन की ओर से अब एक अंतिम संदेश आया कि मुझे अभी 14 दिसम्‍बर के दिन पैदा हुए बहुत सारे प्राणवानों को शुभकामनाएं देनी हैंमैं चलता हूं।)

तभी मेरी नींद खुल गई।  मेरी धर्मपत्‍नी मुझे जगाकर बहुत प्‍यार से जन्‍मदिन के लिए विश’ कर रही थी क्‍योंकि मैं लैपटॉप को गोद में लिए लिए हुए झपकी ले रहा था। सामने घड़ी में समय देखा 12 बजकर 5 मिनिट हुए थे।  मैंने पत्‍नी को अपने आगोश में ले लिया और इस फेसबुकिया’ दु:स्‍वप्‍न को भूलने की चेष्‍टा करने लगा। अब तक मेरी टाइमलाईन पर शुभकामनाओं की लाईन लग चुकी थी। एकाएक अहसास हुआ मात्र 5 मिनिट में इतनी बड़ी कहानी।

इस लिखचीत से यह सीख मिलती है कि सपने की गति काफी तीव्र होने का आधार सबसे पुख्‍ता है।  

इंडिया की हंडिया : दैनिक जनवाणी स्‍तंभ 'तीखी नज़र' 11 दिसम्‍बर 2012 को प्रकाशित

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एफडीआई और वालमार्ट से सब रिश्‍तेदारी जोड़ने में जुट गए हैं। बवाल मचा हुआ है। कोई मित्र उन्‍हें चच्‍चा बतला रहे है तो कोई उन्‍हें दद्दू कह रहे हैं। मेरे एक मित्र उनके साथ वाली को भौजी कहते नहीं अघा रहे हैं। दूसरे गरीब की जोरू बतला रहे हैं। मेरी मानो तो पहली बार इसे अमीर की बेगम बनने का मौका मिला है। सो खुद बेगम हो जाएंगी और अपने चाहने वालों को गमों से सराबोर कर देंगी। अभी तक तो यह भी नहीं फाईनल हुआ है कि वे समलिंगी हैं अथवा उभयलिंगी। कुछ कुछ मुगालता फिज़ा में महका हुआ है।  फिर यह क्‍यों नहीं बतलाते कि अब तक इनके अपने वे कहां पर छिपे बैठे थेबैठे होते तो दिखलाई दे जातेहो सकता है छिपे लेटे हों। जो भी होंआखिर वे कहां थेक्‍या किसी कुंभमहाकुंभ में बिछड़े थे या फिरंगी आजादी देते समय किसी गोपनीय डील के तहत उन्‍हें अपने साथ ले गए थे। अब क्‍यों आजाद कर दिया है। फिर भी इतना तो पक्‍का तय है कि एफडीआई नहीं किसी की माई है। जो बच्‍चों के हित के लिए काम करेयह तो सबको हिट ही करेगी।
सोचा होगा कि अब तक खूब मालदार हो गया होगा इंडियाबन जाओ चच्‍चा या दद्दू और खाली करो इंडिया की हंडिया। हंडिया तब तक ही भाती है जब तक उसका ढक्‍कन नहीं खोला जाता। ज्‍यों ही ढक्‍कन खुलता है सारी असलियत नमूदार हो जाती है। इससे कई बार इज्‍जत का फलूदा बन जाता है। फलूदा न बन पाए तो ये घनिष्‍ठ नातेदार चच्‍चा या दद्दू अपनी हरकतों से बाज नहीं आते हैं और इज्‍जत को लूटने में लग जाते हैं। यही तो इनकी आघातें हैं।  दरअसलये चच्‍चादद्दू कोई और नहीं अंकल’ ही हैं और इन्‍हें मुगालता रहा है कि इनमें अकल बहुतायत से लबालब है। अंकल’ कहलवाते हैं और अकल’ अपनी भिड़ाते हैं। नब्‍बे प्रतिशत को मूर्ख बतलाते हैं। अपनी इस तथाकथित अक्‍ल के बूते उन्‍होंने नेताओं को तो फांस ही रखा है अब किसानों को भी उलझाने का उपक्रम चालू कर दिया है। काफी हद तक उनकी अक्‍ल के घोड़ों में रवानगी आ गई है। रही सही कसर गति उनके नाते-रिश्‍तेदारी खोजक यार पूरी कर रहे हैं।
जहां तक मालदार होने का मामला है तो इसमें एक ही राय है कि जहां होता है माल, वहीं पर वॉलमार्ट की आर्ट निखरकर सामने आती है और वहीं पर कला के गलियारे ओपन होते हैंवहीं पर भ्रष्‍टाचार अपने बवाल से सबको मोहित किए रहते हैं। घपले-घोटालों की किस्‍मत खुल खुल जाती है। ईमानदारी को अपनी नानी,चाची, दादी सब याद आती हैं और नॉस्‍टेल्जिया’ सक्रिय हो उठता है। अतीत की यादें सोडे में उफान की मानिंद सुर्खियों में कहर बरपाती हैं। चैनलों को जोर का झटका पूरी ताकत से लगाने का कार्य मिलता है। मालदार की ऐसी तैसी करने के नाम पर किसानों और पब्लिक का बेड़ा गर्क किया जाता है।
जबकि सही मायनों में एफडीआई की सटीक व्‍याख्‍या फुल ड्रामा इन इंडिया’ की जा सकती है परंतु इसे फॉरेन डायरेक्‍ट इंवेस्‍टमेंट’ कहकर सदा से सबको लुभाया जाता रहा है। जबकि इस असलियत की कलई कुछ लोगफेल्‍ड डेमोक्रेसी इन इंडिया’ का नाम देकर खोलते हैं और फटाफट डकारो इंडिया’ कहकर इनकी नीयत पर ही सवाल उठा देते हैं। सोशल मीडिया पर इनकी फजीहत जारी है किंतु संसद में सांसद इनकी नित नई गोलाईयां उभारने में बिजी हैं। चक्‍करघिन्‍नी की तरह घूमते देश के सिर पर कभी कोई इस बहाने और कभी उस बहाने से सवार हो जाता है और लूट कर किसी भी स्‍टेशन पर जानबूझकर छूट जाता है फिर नए लुटेरे मौका देख सवार हो जाते हैं। लूट का खेल जारी है। रही सही कसर वे नोंच खरोंच कर पूरी कर रहे हैं।
पब्लिक और किसान हैरान हैंपरेशान हैंमाल मिलेगा या उनके और माल के मध्‍य में वॉल खींच दी जाएगी। वाल पारदर्शी शीशे की होगीमाल खूब दिखेगालगेगा कि इस बार घर जरूर भरेगा परंतु जब किसान उस माल को लेने के लिए आगे बढ़ेगा तो शीशे से टकराएगा और वॉलमार्ट का शीशा नहींइस देश का किसान चूर चूर हो जाएगा। किसान की नियति टूटना ही है और इस बार बिखर जाएगा कांच की किरचों की मानिंद। रिटेल की टेल हनुमान की पूंछ की तरह लंका जलाती दिखाएगीसबको लेगी लपेटपेट पर देगी तीखी और गहरी चोट। देश के शरीर पर घाव दर घाव होते रहेंगे और उससे भी तेजी से वस्‍तुओं के भाव चढ़ेंगेइंडिया की हंडिया खाली करने की यह क्रियाकहो कैसी रही ?

आम ने बनायी खिचड़ी : जनसंदेश टाइम्‍स 11 दिसम्‍बर 2012 स्‍तंभ 'उलटबांसी' में प्रकाशित



खास के जमाने हवा हुए। अब आम चर्चा में है। सर्दियां हैं और आम चर्चा मेंकैसा विरोधाभास है। जरूर जनाब कोरी गप्‍प हांक रहे हैं। जबकि यह सरासर गप्‍प नहीं है। धूल में लट्ठमारी भी नहीं की जा रही है क्‍योंकि आजकल किसी भी मौसम में कोई भी तरकारी बाजार में मिल जाती हैवैसे ही मौसम कोई भी हो मौसम और बे-मौसमी फल उपजते ही नहींपकते भी हैं। पूरी तरह पकने के बाद फल को या तो कोई खा लेता है अथवा पके हुए फल को देखकर अन्‍य वृक्षों पर लदे फल भी पकने लगते हैं। संगत का असर सिर्फ इंसान और हैवान की ही नहींअपितु प्रकृति की प्रत्‍येक कसक और तरंग की गत बना देता है। एक सड़ा आमफल, भरी पूरी आमों की टोकरी को सड़ा कर खास बना देता है। बिजनेसपुरुष उससे भी नोट बनाने नहीं चूकता और सड़ा आम काट-निकाल कर, बाकी के गूदे का आम पापड़ बनाकर जब बेचता है तो खाने वाले उसे जीभ चटका चटका और आंखें मटका मटका कर स्‍वाद लेते हैं।
आम पकाने की कोशिशें जारी हैं। सिर्फ गर्मियों में ही पकने वाला आम नहीं है आम आदमी। खासजन आजकल किसी भी मौसम में भी पकने और पकाने में शातिर हो चुके हैं। कई बार तो अधपके फलों में से भी आवाज आने लगती है कि पक गएपक गए,पक गए। आम पके या न पकेकोई फल पका या कच्‍चा रह गया किंतु आम आदमी की चर्चा सुनकर खास आदमी के कान जरूर पक चुके हैं। उनके कानों को आम आदमी के पकने के प्रभाव से मुक्ति दिलाने वाला चाहिए। खास आदमी आज आम आदमी से बेइंतहा नाखुश है और अपनी नाराजगी का खुलकर इजहार कर रहा है। कान पके तो दर्द दिमाग में होता है इसलिए कानों को पकने से बचाना चाहिए। आपके कानों को पकाने वाले,आपके तो कान पका रहे हैं किंतु वे जिस खिचड़ी को पकाने में मशगूल हैंउसका आपको झूठे भी इल्‍म नहीं है।  खिचड़ी बनाने में कम आग लगती हैं। कम समय लगता है फिर भी कितनी ही खिचडि़यों को पकने में पूरे जमाने लग जाते हैं। बीरबल की बनाई जाने वाली खिचड़ी का आज तक स्‍वादुजन इंतजार कर रहे हैं। खाने वाले इंतजार करते हुए गुजर जाते हैं परंतु खिचड़ी नहीं पकतीपकाने वाला पक जाता है। अब अगर खिचड़ी बुखार से पीडि़त को खिलानी है या पेट दर्द से दुखी को, फिर तो खिचड़ी का पका होना जरूरी हो जाता है। कई बार खिचड़ी तो पक जाती है किंतु वे कंकर नहीं पकते जो कभी पकने के लिए नहीं पैदा होते हैं। जबकि पकने वाली खिचड़ी को कोई नहीं पूजता है जबकि वह रोगों में राहत पहुंचाती है और पूजनीय होनी चाहिए। लेकिन आज तक खिचड़ी को पूजने की कोई मिसाल न तो ढूंढने पर मिलती है और न पूजने पर।
पत्‍थर को पूजो तो हरि मिल जाते हैंइंसान को पूजो तो खास जन मिल जाते हैं। फिर आम आदमी कैसे मिलेगा। आम आदमी को खोलने की यह प्रक्रियाकहो कैसी रही ?

व्‍यंग्‍य का शून्‍यकाल : कादम्बिनी मासिक दिसम्‍बर 2012 अंक में किताबें मिलीं में उल्‍लेख


अब पैदल चलने के लाईसेंस बनेंगे .. : मिलाप दैनिक स्‍तंभ 'बैठे ठाले' 10 दिसम्‍बर 2012 में प्रकाशित



आप पैदल चलना जानते हैं और आपके पास लाइसेंस नहीं है तो सावधान हो जाइए। दिल्‍ली में पैदल चलने वालों के लिए लाइसेंस अनिवार्य होने वाला है। बहरहाल, शुरूआत में एक वर्ष की अवधि के लिए इस लाइसेंस की कीमत सिर्फ एक सौ रुपये सालाना रखी जाएगी। यह लाइसेंस सबको एक ही कीमत पर मिलेगा, मतलब बूढ़ेबच्‍चेजवान हों या बीमार सबको एक ही तराजू पर तोला जाएगा। तोलने का यह कार्य नगर निगम करेगी। इसके आरंभिक दौर में अभी घोड़ेघोडि़योंबग्घियों पर एकमुश्‍त चार हजार रुपये वसूले जाने की योजना तैयार है और बस लागू होने ही वाली है। इस योजना का अगला चरण पैदल चलने वालों की जेब पर रखा जाएगा। इसके बाद साईकिल चालकों के लिए भी लाइसेंस लेना अनिवार्य किया जा रहा है। इसके लिए मात्र पांच सौ रुपये का खर्च आएगा और लर्निंग लाइसेंस के लिए सिर्फ एक महीने के लिए एकमुश्‍त दस रुपये ही चुकाने होंगे और सिर पर लालरंग से चिन्हित एल’ लगाने के लिए एक विशेष टोपी पहननी होगी। नगर निगम की एक चहेती कंपनी ऐसी पांच टोपियां 250 रुपये में मुहैया करवाने के लिए तैयार हो गई है।
अभी तक सिर्फ रिक्‍शे पर लाइसेंस जरूरी थालेकिन नए निर्णय में रिक्‍शा चालकों को भी लाइसेंस लेना होगा और यह व्‍यवसायिक श्रेणी में जारी किए जाएंगे जिनका सालाना शुल्‍क एक हजार रुपये होगा। निगम सोच रही है कि इससे रिक्‍शों की संख्‍या में कमी आएगी और भीड़ भरी सड़कों पर यातायात का संचालन सुचारू रूप से हो सकेगा। पांच बरस तक के बच्‍चों को पैदल चलने के लाइसेंस से छूट रहेगी बशर्ते कि वे दस वर्ष या उससे अधिक की आयु के किसी अभिभावक के साथ पैदल चल रहे हों। जो बच्‍चे अकेले घूमते पाए जाएंगे उन्‍हें निगम जब्‍त कर लेगी और छोड़ने के लिए एक सौ रुपये का जुर्माना वसूलेगी। दो घंटे से अधिक देरी से अपने बच्‍चों को लेने आने वाले अभिभावकों से 500 रुपये उनकी खुराक के नाम पर वसूल किए जाएंगे। चाहे बच्‍चे को निगम की ओर से एक अदद टॉफी भी न दी गई हो।
निगम के इस अभूतपूर्व कदम की वित्‍त मंत्री ने प्रशंसा की है और गृह मंत्री ने विश्‍वास जताया है कि इससे बच्‍चों के खोने की घटनाओं में कमी आएगी क्‍योंकि जब बच्‍चे को अकेला छोड़ा ही नहीं जाएगा तो उनके खोने का तो सवाल ही बेमानी है। इससे पुलिस पर भी बोझ कम होगा किंतु उन्‍होंने जुर्माना वसूलने के लिए लगाए जाने वाले पुलिसकर्मियों के कार्य के बारे में कोई टिप्‍पणी नहीं की है। इससे ऐसा लगता है कि उन्‍हें अपने पुलिसकर्मियों पर भरोसा है कि वे अपने चाय-पानी का खर्च इससे खुद ही निकालने में कामयाब हो जाएंगे।
इसके अनूठी योजना के सफल होने के बाद आवारा जानवरों के पैदल चलने पर इस प्रक्रिया को व्‍यवहार में लाया जाएगा। जिससे सड़कों पर आवारा पशुओं के घूमने पर लगाम लग सके और कुत्‍तों के इंसानों को काटने की घटनाएं में कमी आए। अभी यह स्‍पष्‍ट नहीं किया गया है कि आवारा पशुओं को पकड़ने पर जुर्माना कौन देगा, हो सकता है कि इसे पुलिस और निगम के विवेक पर छोड़ दिया जाए और वे आजाद हों कि इसके लिए वे राह चलते किसी को भी पकड़ उस पर आरोप मढ़कर वसूली कर सकते हैं। अभी पक्षियों के उड़ने और चलने के संबंध में और कौवों इत्‍यादि के शोर मचाने पर भी राजस्‍व वसूलने की कई योजनाएं विचाराधीन हैं। देश को खुशहाली की राह पर ले जाने वाले इन कदमों में भरपूर दम है, इसलिए इसके विरोध किए जाने का कोई समाचार अभी तक नहीं मिला है। 
चार साल पहले दिल्‍ली की सीएम ने पैदल चलने वालों पर चलते समय सतर्क रहने के लिए उपदेश झाड़ा था। कयास लगाया जा रहा है कि यह उसी आदेश की अगली कड़ी है। आपके पास भी इसे अमली जामा पहनाने और देश को विकास की ओर ले जाने के कई सूत्र होंगे तो देर किस बात कीआप भी ऐसे मशविरों को सरकारहित में साझा कीजिए और देशभक्त सिद्ध होने का मौका मत गंवाइए 

जनसत्‍ता 9 दिसम्‍बर 12 के रविवारी परिशिष्‍ट में प्रकाशित अविनाश वाचस्‍पति के बाल गीत

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दैनिक हरिभूमि 9 दिसम्‍बर 2012 अंक में प्रकाशित पुस्‍तक समीक्षाएं

क्‍या होंगे वहां खुदाबख्‍श 
कार्यालय तेरी अकथ कहानी
कार्यालय तेरी अकथ कहानी : व्‍यंग्‍यकार वीरेन्‍द्र सरल
क्‍या होंगे वहां खुदाबख्‍श : कहानीकार श्‍याम विमल

भूल कर भी कोई भूल हो न ! : जनसत्‍ता वार्षिकांक दीपावली 2012 में प्रकाशित

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आपका पैसा आपका हाथ, किंतु वोट हमारा है : जनसंदेश टाइम्‍स 4 दिसम्‍बर 2012 स्‍तंभ 'उलटबांसी' में प्रकाशित



आपका पैसा आपके हाथ’ सत्‍ता पक्ष ने लुभावना जाल फेंका है। जाल लुभाए न तो पब्लिक झांसे में नहीं आती और सदा से फंसता शिकार ‘आम आदमी’ इस बार फिर से हाथ के फेर में उलझने को अभिशप्‍त हो गया है। इस बार शातिर शिकारी ने ऐसा पांसा फेंका है जिसके असर से दूर की कौड़ी भी समीप की हो गई है। अपने पैसे को वह शिकार का बतला रहा हैशिकार भी  उसे अपना मान बैठा है। वह सोचता है कि मानने में क्‍या हर्ज हैजब खर्च नहीं हो रहा हैउल्‍टे खर्चा पानी ऑन एकाउंट मिल रहा है। जिससे सुखद की सुखदाहट गुदगुदी में बदल गई है। गुदगुदी सर्वर होती है, गुदगुदाने से दोनों को असीम सुख की प्राप्ति होती है। सुख न होउसकी गुदगुदी ही होयथार्थ न होस्‍वप्‍न ही हो  आखिर उससे हौसला मिलता है। कितने तो सिर्फ हौसलों के बल पर किले फतह कर लेते हैं।
अब कुछ और मिल रहा होता तो एकबारगी विचार भी किया जाता पर जब साक्षात धन मिल रहा है या मिलने की संभावना नजर आए तो भ्रमित होना बनता है। भ्रम का जाल ‘फेसबुक’ के नशे से कम नहीं होता। इसलिए आम आदमी इसमें पूरा उलझता है। नशा ‘राम’ नाम का भी टल्‍ली कर देता है फिर धन का नशा तो शान में रोजाना बढ़ोतरी करता है। नशा या शान किसी में भी हो इजाफा, दोनों चीजें भरपूर मजा देती हैं। मजा ‘जाम’ बनकर टकराता है। इसलिए पैसा सदा सबको सुहाता है। पहले शराब की बोतलें छिपकर बांटी जाती रही हैं। पैसा भी छिपाकर ही बांटा गया है किंतु इस बार तो क्रांति हो गई है। करेंसी नोट ढोल बजाकरपीटकर बांटे जाएंगे, मानो भ्रष्‍टाचार को कानूनी मान्‍यता मिल गई है और वे सीधे ‘आम आदमी’ के बैंक खातों को रोशन करेंगे। बस कहा उसे सब्सिडी जाएगा और सबको सिड़ी बनाया जाएगा। दलाली का खेल खत्‍मजिससे दलाल चिंता के मारे लाल हुए जा रहे हैं कि ऐसा क्‍या किया जाए ताकि दलाली बंद न होदलाली का जाना दीवाली का लुप्‍त होना है। तभी एकाएक उनके चेहरे खिल उठते हैं। दलाली चालू हो गई है।
वोट हथियाना है तब भी किसी को नाराज करना नहीं बनता। वरना गणित को कैसे उखाड़ा जाएयह चिंता करने से बेहतर है कि न बिगड़ने दिया जाएन गड़ने दिया जाए। शर्मो हया का कहीं नामोनिशां नहीं है। वैसे भी कर्म फोड़ने सेअच्‍छा बेशर्म होना इंडिया है। नोट बांटने से वोट बढि़या संख्‍या में मिलेंगेसौदा सुच्‍चा और खरा है क्‍योंकि उसी की ताकत से भविष्‍य में नोट जुगाड़े जाएंगे। सुन रहे हैं कि खातों को पैसे खिलाने का खेल जारी रहेगाअच्‍छा इंवेस्‍टमेंट है। खाते तरावट की खबर सुन प्रसन्‍न हैं। लोकतंत्र के सभी खंबे नोटों की चिनाई करके मजबूत कर दिए गए हैं। इस बार यह दांव सफल हो जाए तो अगली बार सोशल मीडिया (न्‍यू मी‍डिया) का तोड़ भी निकाला जाएगा। एक भी खंबा कमजोर नहीं रहने दिया जाएगा। इस बार गरीबों को और अगली बार तथाकथित गरीबों कोसरकार की यह चालकहो कैसी रही ?

कहो, कैसी रही ? : जनवाणी स्‍तंभ 'तीखी नज़र' में 4 दिसम्‍बर 2012 को प्रकाशित


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चारों की चौकड़ी आज स्‍पेशल सुविधाओं के तहत स्‍वर्ग में धूम मचा रही है। जबकि उन्‍होंने जिन कारनामों को अंजाम दिया थाउसके अनुसार उनकी नर्क में सजा पाने की ग्राह्यता बनती थी। ठाकरे भगवान के सैनिकों का गठन करके उनकी दबंगई के बल पर वहां मौजूद थे। कसाब को यमराज के कार्यों में हस्‍तक्षेप के चलते तुरंत बुलाया गया थामच्‍छर ने यमराज के काम को आसान किया था जिससे यम मंत्रालय का टीए/डीए और यमराज को अलॉट किए जाने वाले विशेष भत्‍तों में इकानॉमी लाने के कारण और दारू किंग पोंटी चड्ढा को अपरोक्ष तौर पर यम मंत्रालय के कामकाज में सहयोगी पाया गया था।
स्‍वर्ग में काफी लंबे अरसे से रह रहे शहीदमहान पुरुषबलिदानीपरोपकारीदानवीरशुभ कर्मों के प्रणेता और इंसानियत के पैरोकारों की इनके स्‍वर्ग में बंगलों के अलॉटमेंट पर कानाफूसी जारी थी। जिस स्‍वर्ग का माहौल सदैव आनंददायक रहा है और कश्‍मीर से जिसकी तुलना की जाती है,आज वहां भी मौसम काफी गर्म बना हुआ है।  यमसत्‍ता के शीर्ष में बैठे विशिष्‍टगण ही जानते थे कि अगर इन चारों में से किसी को भी विशेष सुविधाएं न दी गईं तो स्‍वर्ग और नरक की सत्‍ता की वे ईंट से ईंट बजा देंगे। इस शुभ कार्य के लिए उन्‍हें ईंटें भी पृथ्‍वी अथवा नर्क से मंगवा कर देनी होंगी।
चारों चर्चा कर रहे हैं कि स्‍वर्ग में आगे की रणनीति क्‍या हो। इन्‍हें पैंतीस-पैंतीस लाख के टॉयलेट्सअत्‍याधुनिक गैजेट्स इत्‍यादि सभी प्रकार की विलासिता श्रेणी की उच्‍चस्‍तरीय सुविधाएं दी गई हैं। बजट कहां से आ रहा हैइस बारे में धरती की तरह स्‍वर्ग में चिंता नहीं की जाती है। स्‍वर्ग में गरीबों के झांकने पर भी प्रतिबंध है। स्‍मार्ट फोन, टेबलेट्स तो उपलब्‍ध कराए ही गए हैं।
ठाकरे दहाड़ते हुए कसाब को बतला रहे हैं कि मैं पृथ्‍वी पर रहातब तक तुम्‍हें फांसी नहीं लगने दी। यह मेरा ही प्रताप है क्‍योंकि मैं ही भगवान के सैनिकों का बिग बास हूं। वैसे महाराष्‍ट्र में तो मैं सबका ही बिग बास हूं।
मेरे आने के तुरंत बाद सरकार मनमानी पर उतर आई है और उन्‍होंने तुम्‍हारा गला भी काट दिया है। इस घटना को यूं तो इस डेंगू मच्‍छर ने अंजाम दिया है। मेरे परिवारजन और सरकारी अमले ने मेरी देह से प्रेम के चलते मेरे दिवंगत होने की प्रामाणिक घोषणा भी तीन दिन बाद ही जारी की। यह सब उस राज की बदमाशी हैवरना तो मेरा बेटा उद्धव तो बहुत मासूम है और उसी दिन से गुमसुम है। राज ने सबको सैट कर लिया। उधर मैंने पृथ्‍वी छोड़ी मेरे पीछे यूपी हरियाणा के दारू किंग पोंटी चड्ढा को उसके भाई के साथ मेरे पीछे रवाना कर दिया। उसका भाई तो स्‍वर्ग पहुंचने से पहले ही हिंदी फिल्‍मों की तरह कहीं बिछड़ गया।
मीडिया में मुझे ही सुर्खी मिलनी थी लेकिन पोंटी चड्ढा और उसके भाई की मौत के कारण मेरे स्‍पेस पर कब्‍जा कर लिया गया। अब मेरे से जुड़े किसी मामले को तूल न मिले इसके लिए सरकार ने तेरी गर्दन को कस के मसक दिया। सरकार जानती थी कि कसाब की अंतिम और पहली इच्‍छा भारत में सदा आतंक फैलाने की रही है। दूसरी और अंतिम इच्‍छा  'जब तक रहा मेहमान' फिल्‍म में लीड रोल करने की थी।  
मच्‍छर ने बतलाया कि मैं उनके सामने था किंतु किसी ने मुझे मारने की कोशिश नहीं की। वे चाहते थे कि मैं कसाब को काटूंतभी मुझे प्राणदान मिलेगाइसलिए मुझे मजबूरन कसाब को काटना पड़ा। अब ऐसी सरकार पर मैं क्‍या भरोसा करूं। 
अभी यह चर्चा चल ही रही थी कि तभी घोषणा की गई कि स्‍वर्ग में इन चारों की गतिविधियों के जीवंत प्रसारण के लिए बिग बॉस’ ने ठेका ले लिया है और जल्‍दी ही चारों तरफ से स्‍वर्ग को घेर लिया गया है और आधुनिक गैजेट्स की फिटिंग करवाई जा रही है ताकि पृथ्‍वी के टीवी चैनलों में इसका सीधा प्रसारण करके टीआरपी बटोरी जा सके। नरक की ग्राह्यता धारक इन महानुभावों के स्‍वर्ग में कब्‍जे और वहां पर इनके कारनामों का सीधा प्रसारण, कहो कैसी रही ?

खादी वाला सफेदपोश गुंडा : देशबंधु 1 दिसम्‍बर 2012 के संपादकीय पेज पर प्रकाशित

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देशबंधु पर घूम रहा था
मैंने देखा और अपने
प्रिय पाठकों लिए
पकड़ लाया हूं।


जयशंकर प्रसाद की कहानी ‘गुंडा’ और उसका मुख्‍य किरदार ‘नन्‍हकू’ खूब फेमस हुआ। गुंडागिरी, लंपटता, चोरी, डकैती में कमाई की भरपूर संभावनाएं रही हैं जबकि इनके विकल्‍प के तौर पर आजकल राजनीति जरायमपेशाओं के लिए काफी मुफीद हो गई है। चोरी करना वह काम है जो छिपकर और बचते बचाते और मुंह छिपाते किया जाता है किंतु जब इसे निर्लज्‍ज, बेशर्म या दबंग होकर ढीठता से अंजाम तक पहुंचाया जाए तो वही डकैती हो जाती है। चोरी और डकैती के भिन्‍न अर्थों का यह सामान्‍यीकरण है।  
समाज में गुंडई और दबंगई के नए-नए प्रयोग किए जा रहे हैं, इससे गुंडों की रुचि-संपन्‍नता का पता चलता है। नेता वही जो गुंडई करें और इन्‍हीं के कारनामों से गुंडई के निहितार्थों को पब्लिक बेहतर तरीके से जानने और समझने लग गई है। इसमें रोजाना हो रहे बदलावों से आम पब्लिक रूबरू हो रही है।
फिल्‍मों में सभी प्रकार के गुंडों का वर्चस्‍व रहा है और वे पब्लिक को भाते हैं। फिल्‍मों का सबसे मनपसंद गुंडा शोले के गब्‍बर सिंह को माना जा सकता है जिसने गुंडा-सह-डाकू के कॉम्‍बो किरदार में जीवन के अनूठे रंग भरकर विलेनत्‍व को भरपूर ऊंचाइयां दीं। कितने डाकू और विलेन आए परंतु कोई गब्‍बर की महानता को छू भी नहीं पाए। गब्‍बर‍ सिंह की ऐसी शख्सियत से प्रभावित होकर नेता भी गुंडई पर उतर आएं है तो इसमें हैरान होने की बात नहीं है, यह समय की पुकार है। नेता यूं तो सभी कारनामों पर अपना अवैध कब्‍जा कर चुके हैं परन्‍तु जिम्‍मेदारी लेने से सदा पीछे रहे हैं। कुछ कहें और शोर मच जाए तो डर कर तुरंत मुकर जाते हैं। गुंडईकर्म की पहचान आजकल नेताधर्म से होने लगी है। नेताओं के इस क्षेत्र में धाक जमाने से गुंडई में निर्भीकता का बोलबाला बढ़ गया है।
गुंडाकर्म जिसे मवालीगिरी कहा जाता है, को भरपूर प्रतिष्‍ठा मिली है। यह गर्व का सूचकांक बन गया है। इसके विरोध में चाहे मीडिया कितना ही चीखे चिल्‍लाए, पब्लिक सोशल साइटों पर कमेंट करेलाइक करे या जमकर हल्‍ला–गुल्‍ला करे। फिल्‍मों में चोर खुद शोर मचाते रहे हैं। शशिकपूर अभिनीत फिल्‍म ‘चोर मचाए शोर’ का नाम बेसाख्‍ता आपके जहन में कौंध गया होगा। वही शोर मचाने का जिम्‍मा आजकल आम आदमी’ ने संभाल लिया है।  इसी के परिणामस्‍वरूप शोर मचाने को वैधानिक मान्‍यता दिलाने के लिए आम आदमी’ नामक एक दल रूपी दलदल की स्‍थापना हो चुकी है। जल्‍दी ही आप शोरगुलनामक पार्टी को चुपचाप राजनीति में घुसता देखेंगे।  
‘आम आदमी’ जब चर्चा में है तो ‘आम औरत’ क्‍यों न चर्चित होना चाहेगी। उनके मन में भी  ‘आम आदमी’ के कंधा से कंधा मिलाकर कंधा मिलाने का सुख लूटने की हसरत पलती होगी।  बस मेरी आपसे इतनी गुजारिश है कि आप लूटने को लेटना मत समझ लीजिएगा। चर्चा  गुंडई के विभिन्‍न रूपों की हो रही थीं कि लूटना से लेटना तक भटक गई जबकि विमर्श गुंडई पर केन्द्रित हो गया। दरअसल, इसके लिए दोषी व्‍यंग्‍य लेखक नहीं है। यह सब चीजें आपस में इतनी रली मिली हैं कि इनमें मिलावट होने का भ्रम होने लगता है। एक की चर्चा हो रही हो तो दूसरी भी उसमें कूद पड़ती है और मानव मन इनकी कूदन--कला से मुग्‍ध हुए बिना नहीं रहता। जो सहज अपनी गति से चल रहा है,वह परदे के पीछे छिप जाता है।
‘वर्दीवाला गुंडा’ फिल्‍म हिट हुई और इसका उपन्‍यास खूब बिका। यह गुंडों की शराफत है वरना वे बे-वर्दी वाला गुंडई कर्म निबाहने में पीछे नहीं रहते हैंबलात्‍कार इसी को तो कहते हैं। गुंडे का क्‍या है विवस्‍त्र होकर भी कूद सकता है। वर्दी खाकी भी हो सकती है और खाली भी, सेना की भी और खादी की भी। सुर्खियों में आने के लिए एक चिकित्‍सा मंत्री ने अपना ही इलाज कर डालाइसे कहते हैं ‘अपना इलाज बवाले जान’। मंत्री ने खुद को ‘खादीवाला सफेदपोश गुंडा’ कहकर हल्‍की सर्दी के माहौल में गजब की गरमाहट ला दी है। इससे उनकी मल्‍टीटास्किंग प्रतिभा का परिचय बखूबी मिल जाता है। खादी को प्रतिष्‍ठा और सम्‍मान दिलाने के लिए महात्मा गांधी जी चरखा काता। उसी को कुख्‍याति और अपमान का सूचक सिद्ध करने में मंत्री ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। खादी की साख को राख करने के लिए नेताओं ने सफेद खाकी में खूब कारनामे किए हैं परंतु अ‍ब खुले आम स्‍वीकार करके अपनी नेकनीयत को जाहिर  कर दिया है। देश का खूब तेजी से विकास हो रहा है इसलिए उन्‍होंने खुद को खादीवाला गुंडा कहकर परोक्ष तौर पर गांधीगिरी को दोबारा से जीवंत कर दिया है और खादी की इज्‍जत को सरेआम मिट्टी में सान करके लूट लिया है। गुंडों का खादी पहनना मुझे तो अचंभित नहीं कर रहाकहिए कैसी रही ?

शून्‍यकाल से सवाल ! : दैनिक अमर उजाला 1 दिसम्‍बर 2012 के अंक में 'शब्दिता' में 'परख' के अंतर्गत प्रकाशित

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मन से मुकाबला कर रही है इंटरनेट की गति : दैनिक प्रभात 20 नवम्‍बर 2012 अंक में प्रकाशित आलेख

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दैनिक प्रभात के रविवार 28 अक्‍टूबर 2012 में 'बुक वॉच' स्‍तंभ में 'व्‍यंग्‍य का शून्‍यकाल' की समीक्षा

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